





‘सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।’’
सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजये में सम रहते हुये युद्ध करो। समदृष्टि के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करो। जब सुख-दुःख, हानि-लाभ और जय पराजय में हमारी दृष्टि सम हो जाती है तो दुःख, हानि और पराजय हमें अन्दर से बहुत व्यथित नहीं करते। जीवन का गणित ही कुछ ऐसा है कि यह एक -जैसा नहीं रहता। सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय चक्र चलता ही रहता है। मन को इस प्रकार अनुशासित कर लेना चाहिये कि वह दुःख में अनुद्विग्न और सुख में निःस्पृह रहे-
‘दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः’।
मन की यह स्थिति प्राप्त करना कठिन है, परंतु असंभव नहीं। गीता में बताये गये मन के प्रशिक्षण के उपायों से यह स्थिति प्राप्त की जा सकती है। सुख-दुःख, हानि-लाभ, जय-पराजय, यश-अपयश में ही नहीं, जीवन-मृत्यु में भी समभाव रहने की शिक्षा गीता द्वारा प्राप्त होती है। गीता का साधक मृत्यु से डरकर नहीं मरता, वरन् वह मृत्यु का वरण करता है। मृत्यु कभी भी आ सकती है। अतः वह अपना ध्यान निरन्तर परमतत्व में लगाकर अपना कार्य करता हुआ मृत्यु के वरण के लिये तैयार रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं-
‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।’
युद्ध (कर्तव्यनिर्वाह) तथा हरिस्मरण साथ-साथ चलते रहना चाहिये। क्रम है-हरिस्मरण प्रथम और युद्ध उसके बाद।
गीता का ज्ञान मनुष्य को भयमुक्त बना देता है। वस्तुतः मृत्यु का भय ही मूल भय है। अन्य भय इसी से जुड़े है। हम साँप काटने से क्यों डरते हैं, बीमार पड़ने से क्यो डरते हैं? क्योंकि अंततः इनसे मृत्यु हो जाती है। श्रेष्ठ व्यक्तियों के लिये मृत्यु के अतिरिक्त भी एक और भय होता है- वह है माननाश का भय। श्रेष्ठ लोग मरना पसन्द करेंगे, परंतु माननाश नहीं चाहेंगे। गीता समस्त भयों से मुक्ति प्रदान करती है। जो भयमुक्त है, वही महान् योद्धा है। संसार-समर में वही विजय होता है। निर्भयता का अंश जिस व्यक्ति में जितना अधिक है, वह उतना ही सफल होगा और उसका जीवन भी उतना ही अच्छा होगा। निर्भय व्यक्ति ही संसार-समर में विजयी होता है। डरपोक तो मैदान में उतरता ही नहीं।
कृष्ण ने इस महान् दर्शन का केवल उपदेश ही नहीं किया है, बल्कि उन्होंने इसे जीकर दिखाया है। जन्म के पहले से ही मृत्यु श्रीकृष्ण का पीछा कर रही है। उनका खुद का मामा कंस उनका वध कराना चाहता है। कंस को भय है कि वह श्रीकृष्ण के द्वारा मारा जायेगा। अतः वह शिशु श्रीकृष्ण को ही समाप्त कर देना चाहता है। कौनसे उपाय कंस ने श्रीकृष्ण को मरवाने के लिये नहीं किये! परंतु हर बार मृत्यु हारी और श्रीकृष्ण जीते है। क्या मृत्यु निरन्तर हमारा पीछा भी नहीं कर रही है? हम प्रतिपल मृत्यु के निकट पहुँच रहे हैं। मृत्यु जीवन की अवश्यंभावी घटना है। यह टल ही नहीं सकती-
‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु।’
जो पैदा हुआ है, वह मरेगा अवश्य। अतः मृत्यु के प्रति स्वागत की दृष्टि विकसित कर लेनी चाहिये। प्रभास क्षेत्र में सारे यदुवंशी एक-दूसरे को मार-काट रहे हैं। श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे लेटे यह सब देख रहे हैं। जरा नाम के एक बहेलिये का तीर आकर श्रीकृष्ण के पाँव में लगता है और वे इसी को अपनी संसार लीला समेटने का बहाना बना लेते हैं पूरी प्रसन्नता और तटस्थता के साथ। ब्रह्मास्त्रों एवं दिव्यास्त्रों को प्रभावहीन बनाने की शक्ति रखने वाली विभूति संसार से विदा होने का कैसा बहाना चुनती है- एक अदने से बहेलिये का तीर।
श्रीकृष्ण आदिगुरू है, जगद्गुरू है। वे व्यक्ति को अन्दर से इतना ठोस बना देते हैं कि वह जीवन की हर सम-विषम परिस्थिति का धैर्य और शान्तिपूर्वक मुकाबला कर सकता है। वे लाभ के साथ हानि, जय के साथ पराजय, यश के साथ अपयश, सुख के साथ दुःख और जीवन के साथ मृत्यु से जुड़े रहने का स्पष्ट उपदेश करते हैं। वे इन सब में समभाव रहने की शिक्षा देते हैं। वे सिक्के के दोनों पहलुओं को स्पष्ट पहलुओं को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करते हैं। यदि मनुष्य विपरीत स्थिति के अस्तित्व को नकारता है और वही घटित होती है तो टूट सकता है, विक्षिप्त हो सकता है। गीता के उपदेश द्वारा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मन से इतना मजबूत बना दिया है कि यदि वह महाभारत का युद्ध हार भी जाता तो तत्काल दूसरे युद्ध के लिये प्रस्तुत हो जाता। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सामने ऐसे क्षण आये भी। अभिमन्यु मारा जा चुका है। अर्जुन इस समाचार से व्यथित होते है, शोक और विषाद में पहुँचते हैं। श्रीकृष्ण तुरंत अर्जुन को स्मरण कराते हैं- यह युद्ध है, यह अपना मूल्य लेगा ही। युद्ध में सब कुछ सम्भव है। अर्जुन पुनः दूसरे दिन के युद्ध के लिये संकल्प और उत्साहपूर्वक प्रस्तुत होते हैं और उस दिन के लिये वे अपने सामने एक महान लक्ष्य भी रखते हैं।
समत्व मन की श्रेष्ठ स्थिति है। समत्व के अभाव में ऊँचे उद्देश्य नहीं प्राप्त हो सकते। समय और परिस्थितियों के थपेड़े हमें डाँवाडोल करते रहेंगे। समत्व के साथ एक-एक कदम दृढ़ता से उठाने पर ही हम महान् लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है। आज कोई सफलता मिली, आनन्दित हो गये, प्रयत्न शिथिल हो गया। कल कोई असफलता मिली, विषादग्रस्त हो गये फिर प्रयत्न शिथिल हो गया।
अतः बड़े उद्देश्य की प्राप्ति के लिये समत्व में ही स्थित होना चाहिये। श्रीकृष्ण सिद्धि-असिद्धि में समभाव रहने का उपदेश करते हैं और समत्व को ही योगी की संज्ञा देते हैं-
‘सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।’
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