





यदि मानव के भाग्य का उदय हो जाय तो उसके लिये यही तो मंगलमय है कि वह श्रीकृष्ण-नाम को मन में, चित्त में और कण्ड में प्रतिक्षण स्मरण करता रहे। यही तो सबसे बड़ी कमाई है कि वह श्रीकृष्ण तत्व को न भूले। सम्पूर्ण जीवन की सफलता इसी में भरी है कि श्रीकृष्ण के बालस्वरूप को ध्यान से न हटने दे। ‘दामोदर’ शब्द यहां पर इसलिये रखा कि वह यशोदा की गोद में खेलने वाले श्री कृष्ण को लक्ष्य में रखे। श्रीकृष्ण की बाल लीला में जो ब्रह्मलीला छिपी है, उसी को स्मरण कराने के लिये इस श्लोक में ‘दामोदरकीर्तनम्’ शब्द का प्रयोग किया गया है। श्रीकृष्ण तत्त्व बोध के बिना किसी भी आत्मा ज्ञानी को अपने स्वरूप का बोध नहीं हो पाता, किंतु श्रीकृष्ण तत्त्व के प्रकाश को माया ने आच्छादित कर रखा है। इसलिये कृष्ण-कृपा का पात्र बने बिना इस जीवात्मा को माया छोड़ती ही नहीं। अस्तु, कृष्ण के चरणों का चिन्तन अवश्य ही करना चाहिये। देवर्षि नारद जी का कहना है- ‘कलौ भक्तिः भक्तिर्भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः।।’ अर्थात् कलियुग में केवल भक्ति, भक्ति ही सार है। भक्ति से तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं। श्रीव्यासजी ने अठारह पुराणों को मथने पर श्रीकृष्ण भक्ति को ही मुख्य पाया।
कलियुग में केवल श्रीकृष्ण के भक्तों को शीघ्र ही उनका साक्षात्कार हो जाता है। श्रीकृष्ण भक्त के पाप, ताप सभी भस्म हो जाते हैं और आत्मा में दिव्य प्रकाश का उदय होने लगता है। श्री शुकदेवजी कहते है-
अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः
क्षिणोत्यभद्राणि शमं तनोति च।
सत्त्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं
ज्ञानं च विज्ञानविराग्युक्तम्।।
अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की अविचल स्मृति सारे पाप-ताप और अमंगलों को नष्ट कर देती है तथा परम शान्ति का विस्तार करती है। उसी के द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, भगवान की भक्ति प्राप्त होती है एवं परम वैराग्य से युक्त भगवान के स्वरूप का ज्ञान तथा अनुभव प्राप्त होता है।
इस श्लोक का यही निचोड़ है कि चाहे जो कुछ हो जाय, पर श्रीकृष्ण चिन्तन न छूटने पाये।
श्रीकृष्ण नाम में एक ऐसी विशेषता छिपी है, जो सब प्रकार की आत्मोन्न्ति करने में अद्वितीय है। जब भक्त के अन्तः करण में शुद्ध भाव का प्रादुर्भाव हो जाता है, तब उसे प्रतिक्षण आत्मा का साक्षात्कार होने लगता है और वह उस आत्मसाक्षत्कार में विभोर हो विश्व को भूल जाता है।
श्रीकृष्ण भक्त के द्रव्य, देश, काल-ये सब स्वतः शुद्ध हो जाते है, क्योंकि उसके द्वारा ऐसी कोई क्रिया ही नहीं होती जो प्रतिक्षण सबको शुद्ध न बनाती हो। जब मन, वचन और कर्म सभी में श्रीकृष्ण तत्त्व समा जाता है, तब भावना तो निर्मल दर्पण के समान स्वयं बलिहारी लेने लगती है। फिर तो चिंता में प्रभु को बसाने-त्यागने का भाव ही सामने नहीं आता।
कैमरे के जड़ काँच की खूबी तो देख लीजिये कि वह अपने में जिसको प्रतिबिम्बित कर लेता है, उसका नेगेटिव स्वयं ही बन जाता है। कैमरे ने जिसको अपने में उतार लिया-एक दिन के लिये नहीं, दो-चार दिन के लिये नहीं अपितु सदा के लिये उसकी छवि को अपने उर में अंकित कर लेता है। यही कैमरा यदि विशेष श्रेणी का हो तो पूछना ही क्या, कोसों की दूरी पर उड़ते हुऐ विमानों के चित्र खींच लेता है, किरणों का और आकाश की सतह का चित्र बड़ा कर देता है। यह सब खूबी कैमरे के काँच में विद्यमान है, पर सब नहीं समझ पाते हैं। इसी प्रकार मानव का चेतन अन्तः करण, जिसमें चेतन आत्मा का योग और प्रेरणा दोनों की ही सहायता रहती है-ऐसा अन्तःकरण जब श्रीकृष्ण के कृष्ण तत्त्व से आलोकित होने लगता है तब वह भी अपने भीतर कृष्ण की छवि को उतार लेता है और श्रीकृष्ण तत्त्व का निगेटिव बन जाता है। फिर उसे पुनः पुकारना नहीं पड़ता। प्रेमभरी भावना का भूखा भक्त जब अपने प्रियतम श्यामसुन्दर की श्रीकृष्ण छवि को अंदर उतार लेता है, तब वह अपने प्रियतम के आनन्द में इतना विभोर बन बैठता है कि उसे यह भी याद नहीं रहता है कि मैं कौन हूँ। प्रियतम को खोजने वाला अब तो मस्तराम बन बैठा। उसे अब कुछ चाहिये ही नहीं। वह केवल प्रियतम की छवि को सामने ही नाचते देखना चाहता है।
रसराज-व्रजराज के रसानन्द-साम्राज्य में उपलब्धि की अलौकितता और दिव्यता का आलोक जिसे प्राप्त हो जाता है। जो इस भक्ति रस की तरंगों में अनुभूति पाने लगता है, उसी को भक्तगण ‘कृतार्थ हो गया’ मानते है।
सोवत जागत ध्यान तुम्हारो।
कृष्ण तुम्हें अब कहाँ पुकारो।।
जब पल-पल, क्षण-क्षण प्रियतम श्याम की कृष्णात्विषा सामने झलकती नजर आ रही हो, तब कौन किसको पुकारे और पुकारे भी तो किसलिये? बाहर-भीतर, तन में- मन में, प्रेम में प्रियतम का आलोक ही भरपूर अवलोकित हो रहा है। सर्वत्र उसी की झाँकी का आनन्द है।
बिन्दु को सिन्धु में समाते तो सब कोई देख लेते हैं, किंतु सिन्धु को बिन्दु में छिपा लेना-यह गति तो बड़ी विचित्र और अनिर्वचनीय है। इसे कहते नहीं बनता। यह सामर्थ्य माधुर्य भाव की पवित्रता के अनन्य भाव में ही देखने को मिलेगी। श्याम सुन्दर की कृष्ण छवि को अपने में छिपा लेना अथवा उनको जब-जब चाहे अपने पास बुला लेना-यह जादू गोपियों के प्रेम मन्त्र में अतोल भरा था। गोपीजनों के अटूट और अद्वितीय प्रेम की परीक्षा अनेक बार हुई, परंतु वे कभी पूर्ण अंक प्राप्त किये बिना नहीं रहीं। वे अपने अभ्यास में कभी पीछे नहीं रही। नटवर ने न जाने कितने रूप बदले। अनेकों रंग-ढंग अपनाये तथापि गोपीजनों को वे परास्त न कर सके और अन्त में उन्हें निजमुख से कहना ही पड़ा था कि गोपियो! आपका ऋण मैं कभी नहीं चुका पाऊँगा। आपके इस त्याग और तप का, इस प्रेमोत्सर्ग का बदला है ही नहीं। अतः मै सदा ही आपका ऋणी रहूँगा।
जो सिन्धु गोपियों के प्रेम बिन्दु में समा गया था, बिन्दु में छिपे हुए उस सिन्धु ने सबको तन्मय कर दिया। सौन्दर्य, माधुर्य और प्रेम रस की यह दिव्य साधना-प्रेम, प्रेमी एवं प्रेमास्पद की यह त्रितयी ही प्रेम साधना की दिव्य परिणति है। प्रभु-नाम की अचिन्त्य शक्ति प्रेमास्पद तक पहुँचा देती है। इसकी मधुर मिठास अनुभूति से ही गम्य है। प्रेमी भक्त का करूण-क्रन्दन प्रेम सिन्धु भगवान को समीप में उपस्थित कर देता है। भक्त बिल्वमंगल प्रार्थना करते हुये कहते हैं-
हे देव हे दयित हे भुवनैकबन्धो
हे कृष्ण हे चपल हे करूणैकसिन्धो।
हे देव! हे दयित! हे त्रिभुव के अद्वितीय बन्धु! हे कृष्ण! हे लीलामय! हे करूणा के एकमात्र सिन्धु! हे नाथ! हे प्रियतम! हे नयनाभिराम! हाय, हाय, मैं तुम्हारे चिन्मय स्वरूप को कब देख पाऊँगा?
श्रद्धा से, अवहेलना से-कैसे भी, एक बार किया गया कृष्ण-नाम का प्रेममय कीर्तन मनुष्य मात्र को तार देता है तो फिर-
श्रीकृष्णनामामृतमात्महृद्यं
प्रेम्णा समास्वादनभक्तिपूर्वम्।
यत्सेव्यते जिव्हिकयाविरामं
तस्यातुलं जल्पतु को महत्त्वम्।।
अपने मन को अत्यन्त प्रिय लगने वाले श्रीकृष्ण नाम अमृत का प्रेम से रसास्वादन की चेष्टा के साथ जो जिव्हा द्वारा अविराम सेवन किया जाता है, उसकी अनुपम महत्ता का कौन वर्णन कर सकता है।
श्रीकृष्ण नाम प्रेम, रूप प्रेम, लीला प्रेम, धाम प्रेम का मधुर आस्वाद महाभागा गोपियों ने चखा था। इसीलिये वे प्रेम बिन्दु में प्रेम सिन्धु की साधना में प्रतिष्ठित हो सकीं।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,