

आज जब जीवन बिल्कुल असुरक्षित बन गया है, पग-पग संकट और खतरे चारों ओर खड़े हैं, तो अपनी प्राण रक्षा अत्यन्त आवश्यक हो जाती है। यदि किसी शत्रु अथवा किसी आकस्मिक दुर्घटना से जान का भय हो, तो व्यक्ति का जीवन चाहे कितना ही धन-धान्य से पूरित हो, उसका कोई अर्थ नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी ओर से, अपनी सुरक्षा की ओर से सचेष्ट रहता ही है, परन्तु दुर्घटना बिना सूचना दिये आती है।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन में भी एक क्षण ऐसा आया जब वह अपने आप को पूरी तरह से असहाय समझने लगे थे, युद्ध के पहले दिन रावण की सेना से पराजित होने के बाद राम के मन में भी संशय, निराशा के साथ-साथ उनके मानसिक और आत्मिक शक्ति में भी कमी आने लगी थी। तब सबसे वृद्ध और अनुभव की खान “जाम्बवान” के कहने पर भगवान युद्ध छोड़कर दुर्गा को प्रसन्न करने के लिये शक्ति की साधना करना प्रारंभ किया। शक्ति दुर्गा भगवान राम को ‘होगी जय’ का आशीर्वाद देती हैं और लीन हो जाती हैं, जिससे राम के अंदर शक्ति और आत्मिक दृढ़ता का नवीन संचार होता है।
अतः उक्त दुर्गा शक्ति युक्त पुरूषोत्तम श्रीराममय रक्षा कवच से परिपूर्ण होकर अपने जीवन में सर्व सफलता प्राप्ति हेतु इस कवच को धारण करें। जिससे शारीरिक, मानसिक, आत्मिक शक्ति की वृद्धि होती है और व्यक्ति के अंदर स्वतः ही निरंतर क्रियाशील रहने की भावना के साथ देह में स्फूर्ति, ओज, तेज की वृद्धि होती है। मन में स्वतः ही उमंग, आनंद, उत्साह, प्रसन्नता एवं सफलता का वातावरण बनता है। जब उक्त समस्याओं का समाधान होना प्रारंभ होता है, तब व्यक्ति को पूर्ण आनन्द के साथ, बिना किसी भी चिन्ता या मानसिक तनाव के, पूरे वर्ष भर श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसर होते हुये ऐसे कामनाओं की पूर्ति प्राप्त होती रहती है।
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