





मोहिनी एकादशी केवल शारीरिक उपवास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी गहरा परिवर्तन लाती है। इस पर्व का महत्व इतना अधिक है कि इसे तीर्थ यात्रा, दान, यज्ञ से भी अधिक फलदायी माना गया है।
जीवन में पापों के नाश, माया से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति, सौन्दर्य व आकर्षण तथा रस की प्राप्ति के लिए मोहिनी एकादशी का दिवस सर्वश्रेष्ठ एवं शुभ माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि मोहिनी एकादशी आध्यात्मिक उन्नति चाहने वालों के हृदय में गहरा महत्व रखती है। साधक यदि मोहिनी एकादशी के दिन दीक्षा लेतें है तो जन्म-जन्मांतर के पाप, यहाँ तक की मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा जन्मों से संचित नकारात्मक कर्म दूर होते ही हैं तथा मानसिक और शारीरिक रुप से उनकी आत्मा भी शुद्ध होती है जिससे गुरु द्वारा शांति, समृद्धि और सुरक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और दानवों ने अमृत निकाला तब वे सभी लोगों में इस बात का संघर्ष होने लगा कि यह अमृत पान किसको प्राप्त होना चाहिये। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रुप इस प्रकार धारण किया कि वह अमृत देवताओं को ही सुलभ हो। भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरु सांदीपनि से यही दीक्षा प्राप्त किया था। जिससे जब वे अपनी मोहिनी मुरली की तान छेड़ते थे तो ब्रज की सारी गोपीयाँ आकर्षणबद्ध होकर रास नृत्य के लिए अपने आप सम्मोहित होकर चली आती थी। देवी मोहिनी ऐसी ही आकर्षण स्वरुपा देवी हैं। जो मनुष्य को सब कुछ प्रदान करती हैं तथा उसके अंदर रस, सौन्दर्य, रुप, काम, अनंगता की अमृत वर्षा कर देती हैं।
जीवन को निरोगमय, दीर्घायुमय बनाये रखने के लिए जिम्, व्यायाम अथवा ताकत के टैबलेट लेने से शरीर निरोगमय या भगवान श्री कृष्ण के समान आकर्षण और माहिनीयुक्त नहीं बन सकता और न ही केवल विचार करने से अथवा प्रार्थना करने से, भगवती महालक्ष्मी से हम सीधे धन की याचना नहीं कर सकते। महाकाली हमारे सामने उपस्थित होकर सहज हमारे जीवन के अभाव समाप्त नहीं कर सकती और ऐसी स्थिति में जीवन को सवांरने के लिए दो ही उपाय हैं – प्रथम साधना के द्वारा और द्वितीय गुरु कृपा के द्वारा। समर्थ गुरु अपने कृपा की वृष्टि करते हैं दीक्षा के माध्यम से। दीक्षा जो कि सीधे-सीधे परिवर्तन की क्रिया का दूसरा नाम है, दीक्षा जो कि अनगढ़, बैडौल पत्थर को तराशने की क्रिया का नाम है और जीवन के समस्त पापों को समाप्त कर, रोग रहित व सौन्दर्य आकर्षण के माध्यम से समाज में एक अलग स्थान बनाने का श्रेष्ठतम माध्यम है- सर्व पाप रोग नाशिनी सौन्दर्याकर्षण मोहिनी दीक्षा। देवी मोहिनी केवल सौन्दर्य की अधिष्ठात्री देवी ही नहीं बल्कि अपने भीतर के अंतर्मन से जुड़ने, ईश्वर के प्रति समर्पण करने और सच्ची आध्यात्मिक भक्ति से प्राप्त शांति का अनुभव करने का पर्याय भी हैं।
अतः यह बड़े भाग्य से प्राप्त होने वाली दीक्षा है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति इसके लिए उपस्थित नहीं होगा और जो उपस्थित होगा जीवन में आरंभ होगी उदास से उल्लास के ओर की यात्रा, रोग से निरोग के ओर की यात्रा, दुर्बलता से बलशाली की ओर यात्रा, शून्य से संपूर्ण की यात्रा। ‘संपूर्णता’ ही “सर्वपापरोगनाशिनीसौन्दर्याकर्षणमोहिनीदीक्षा”कासहीविश्लेषण है।
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