





साहित्य यदि समर्पण की परिकाष्ठा को छू ले तो एक अंकुर को सूर्य और सूर्य को समिधा कर सकता है। हम सभी जानते हैं कि 14 नवम्बर को जवाहर लाल नेहरु का जन्मदिन बाल दिवस के रुप में मनाया जाता है लेकिन 14 नवम्बर 1913 को प्रसिद्ध सामाचार एजेंसी ने एक खबर छापी “एशियाकेपहलेव्यक्तिकेनोबेलपुरस्कार जीतने की”।एकअंजानभारतीयकवि, जिन्होंनें अंग्रेजी में ‘गीतांजली’ लिखा। एक ऐसा काव्यग्रंथ जो आत्मा की यात्रा, ईश्वर के वियोग और परम ज्ञान जैसे विषयों पर केन्द्रित है।
जब मनुष्य के प्रति प्रेम अनजाने में ही परमात्मा के प्रति प्रेम में परिवर्तित हो जाता है, भक्त का ईश्वरीय प्रेम के प्रति व्याकुलता, आत्म-निरीक्षण और सांसारिक मोह को त्यागकर प्रभु में विलिन होने की चाहत ही ‘गीतांजली’ में ‘अंजली’ होने को सिद्ध करती है। गुरुदेव मंदिर, मूर्तियों, कर्मकाण्ड से ऊपर उठकर प्रेम और करुणा को ही सच्ची आध्यात्मिकता मानते हैं। वे नहीं मानते कि भगवान किसी ‘आदम ब्रिज’ की तरह है। उनके लिए प्रेम प्रारंभ है और परमात्मा अंत; अर्थात् ईश्वर को सीधे प्रेम और समर्पण से पाया जा सकता है।
महाकवि रविन्द्र एक साहित्यकार के अलावा एक कुशल महागायक भी थे। उनके अधिकांश गीत संगितात्मक भी हैं इसिलिए उनके गूढ़ अभिप्रायों का ठीक-ठीक पता लगाना टेढ़ी खीर है। ये सिद्धि प्राप्त व्यक्तियों के लिये ही संभव होगा कि वे टैगोर की मानसिक अवस्था का पता लगा पाएं। गीताजंली चन्द कविताओं और गीतों का संग्रह ही नहीं है बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा का दस्तावेज भी है। दैवीय प्रेम, मानवीय इच्छाएं और इस ब्रह्माण्ड में अपने होने का मतलब खोजने की एक कोशिश है।
हमारा जीवन एक बासूँरी की तरह है, जिसे ईश्वर ने उठाया है और उससे तरह-तरह के स्वर निकालता रहता है। मनुष्य जो भी रचता है वह उसका नहीं बल्कि ईश्वर का ही विस्तार है। यही कारण है कि आध्यात्मिक यात्रा में निराशा और आंतरिक संघर्ष के क्षण भी आते हैं, जहाँ सांसारिक इच्छाएं ईश्वर से दूरी पैदा करती हैं। जीवन के उतार-चढाव से उत्पन्न होने वाली लालसा और आनंद, भावनाओं के शिकार हैं, फिर भी इन सबके बीच उच्चता की झलकियाँ भी मिलती हैं इसीलिए साधना या प्रार्थना के माध्यम से कविन्द्र शक्ति नहीं, बल्कि शुद्धि मांगते हैं।
प्रेम एक ऐसा रहस्य है जो हजारों साल से दार्शनिकों कोचुनौती देता रहा है, कवियों को लुभाता रहा है और आम लोगों को रोमांचित करता रहता है। जहाँ प्रेम होगा वहाँ विरह भी होगी, जहाँ विरह होगा वहाँ शक भी होगा, कि क्या मेरा प्रेम मुझे याद भी रखेगा। कहीं मुझे भूल तो नहीं जायेगा। मिलना, बिछुड़ना, प्रेम का आशंकित होना, यह सब मिलकर प्रेम को बना देते हैं शाश्वत, सनातन, चिरंतन। विरह की वेदना ही एक सामान्य मनुष्य को असामान्य बना सकती है, एक साधक का हृदय पक्ष जागृत कर देती है जिससे स्पन्दन होता है एक काव्य का, एक विश्वास का, एक समर्पण का –
मन्द ध्वनि नहीं सुनी उसके चरणों की,
वह आता है, वह नित्य आता है…
हर घड़ी, हर काल, हर दिन, हर रात
वह आता है, वह नित्य आता है…..
भिन्न दशाओं में मन के, नाना प्रकार के गीत गाए हैं,
उसके सुरों से सदा, यही उद्घोषित होता है
वह आता है, वह नित्य आता है…..
यह उसी के चरण-कमल हैं, शोक-दुःख में हृदय विकल हैं,
सुनहरा संसर्ग है उसके पदार्विन्द का, यह आनन्द का स्फुरित पल है
वह आता है, वह नित्य आता है ……।
“दुःख आदमी को मांजता है, जिंदगी से जूझने लायक बनाता है, लड़ने की आंतरिक शक्ति(आत्मबल) प्रदान करता है।”
मनुष्य अक्सर अपने आराध्य से मजबूती, सुख, सामर्थ्य और दीर्घ जीवन की कामना करता है, वह जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति और प्रगति की याचना करता है। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि कविन्द्र रविन्द्र अपने अपने आराध्य से दुःख की याचना करते हैं, व्यथा मांगते हैं जिसकी ज्वाला तन-मन के सारे कलेश जलाकर पार कर दे। जीवन पावन हो जाये और शान्ति से जाग उठे एक निर्मल प्राणधारा।
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं,
केवल इतना होवे करुणाम….
कभी न विपदा में पाऊँ भय।
दु:ख -ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही,
पर इतना होवे करुणामय,
दुःख को मैं कर सकूँ सदा जय।।
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