





वैराग्य का अर्थ है हमारा संबंध ही न रहे, असंग हो गये, असंबंधित हो गये। भाषा में, जो विराग का अर्थ है, उसका अर्थ है भोगने लायक पदार्थ को छोड़ कर चले जाना। मौजूद हो, निकट हो, तो भी उसके भोगने की आकांक्षा न जगनी। भोग भी रहे हों तो भी भोग की आकांक्षा न जगनी।
जनक रह रहे है अपने महल में, सब कुछ वहां है भोगने योग्य, लेकिन भोगने की वासना नहीं है। आप जंगल भाग जांए, कुछ भी नहीं है भोगने योग्य वहां, लेकिन भोगने की वासना सपने बनेगी, वृत्तियां उठायेगी, मन दौड़-दौड़ कर वहां जायेगा जहां भोगने योग्य पदार्थ होंगे।
तो भोगने योग्य पदार्थ की उपस्थिति या गैर-उपस्थिति का सवाल नहीं है, वासना का सवाल है। और यह बड़े मजे की बात है कि जहां पदार्थ न हों, वहां वासना ज्यादा प्रखर रूप से मालूम पड़ती है, जहां पदार्थ हो वहां उतनी प्रखर मालूम नहीं पड़ती। अभाव में और भी ज्यादा खटक पैदा हो जाती है।
जो सब छोड़ कर चला आया हो, सब छोड़ दिया हो उसने, यह भी वैराग्य की परम अवधि नहीं है, यह भी वैरागय का चरम रूप नहीं है, क्योंकि हो सकता है राग भीतर रहा हो। यह भी हो सकता है कि छोड़ कर भागना राग का ही एक अंग रहा हो।
वैराग्य का अर्थ है- सब भोगने योग्य मौजूद हो और भीतर भोगने की वासना न हो।
कौन तय करेगा यह? यह व्यक्ति को स्वयं ही निर्णय करना है। दूसरों के निर्णय की बात नहीं है, आप अपने निर्णायक हैं। भीतर वासना न जगती हो, भोगने योग्य पदार्थ मौजूद हों और भीतर कोई वासना न दौड़ती हो-पक्ष में या विपक्ष में, इधर या उधर मन भागता ही न हो, आप डांवाडोल न होते हो, आप वैसे ही हों, जैसे बाहर कुछ भी नहीं है, पदार्थ हो बाहर, और भीतर प्रतिबिंब किसी तरह का रस या विरस पैदा न करता हो-तो वैराग्य की अवधि है।
हमारे लिये अति कठिन मालूम पड़ेगा। क्योंकि हम सबने विराग का राग से विपरीत रूप समझ रखा है। एक आदमी अपने पत्नी-बच्चे, घर-परिवार को छोड़ कर भाग जाता है, हम कहते हैं विरागी है। लेकिन भागता है, उससे खबर देता है कि राग अभी जुड़ा था। कोई भागता है तो मकान से डर कर नहीं भागता, अपने भीतर की वासना से ही डर कर भागता है। मकान क्या भगायेगा! और अगर मकान अभी भगा सकता है, तो अभी आत्म-स्थिति बनी नहीं है। एक आदमी खोज रहा है मकान बड़े और मकान उसे भगा रहा है, दौड़ा रहा है। और एक आदमी मकान से डर कर जंगलों में भाग रहा है, मकान उसे भी दौड़ा रहा है। पीठ मकान की तरफ है, लेकिन जुड़ा मकान से ही है।
न, एक आदमी को वस्तुएं भगाना बंद कर देती हैं, दौड़ाना बंद कर देती हैं। वस्तुओं की कोई भी चुनौती आदमी के ऊपर नहीं रह जाती। वह वस्तुओं की चुनौती ही स्वीकार नहीं करता है। तब तो वैराग्य का अर्थ हुआ आत्म-स्थिति, अपने में ठहर गया जो।
हम में से कोई भी अपने में ठहरा हुआ नहीं है। पुरानी कहानियां हैं, बच्चों की कहानियों में अभी भी उस तरह की घटना घटती है, कि कोई राजा है, उसके प्राण किसी तोते में बंद है। राजा को मारो, मरेगा नहीं, जब तक कि तोते को न मार दो। तो प्राण तोते में छिपा रखे हैं। जब तक तोता बचा है, राजा बचा रहेगा। यह कहानी नहीं है सिर्फ, हम सबके भी प्राण कहीं और बंद है। आपकी तिजोड़ी में हो सकते हैं आपके प्राण बंद हों, तोते में न हों। तिजोड़ी चली जाये…।
हम सब अगर अपनी स्वयं की खोज करें तो हमारे प्राण कहीं न कहीं, किन्हीं न किन्हीं तोतों में बंद हैं। जब तक आपके प्राण कहीं और बंद हैं, तब तक आप आत्म-स्थिति नहीं हैं। आपके प्राण वहां नहीं है जहां होने चाहिये। आपके भीतर होने चाहिये, वहां नहीं हैं, कहीं और हैं।
यह कहीं और होना बहुत तरह का हो सकता है। एक आदमी सोचता है कि उसकी आत्मा उसका शरीर है, तो यह भी कहीं और है। कल यह बूढ़ा होने लगेगा, तो पीड़ित होगा, दुःखी होगा, क्योंकि शरीर दीन-हीन होने लगा, झुर्रिया पड़ने लगीं, कुरूप होने लगा-रूग्ण, जीर्ण। यह मरने के पहले मरा हुआ अनुभव करेगा। क्योंकि इसने जिस जवान शरीर में अपने प्राण रखे थे वह जा रहा है।
कहां आप अपने प्राण रख लिये हैं, इसमें भेद हो सकता है, लेकिन कहीं आपके प्राण हैं, बाहर, तो आप राग में जी रहे हैं। राग का मतलब हैः आत्मा अपनी जगह नहीं, कहीं और है। फिर इसके उलटे भी आप भाग सकते हैं, लेकिन आत्मा कहीं और है।
आत्मा अपने भीतर है, मैं अपने में ठहरा हुआ हूं, कोई चीज खींचती नहीं और मेरे भीतर किसी तरह की तंरग पैदा नहीं करती, वैराग्य की यही परिभाषा है। इसलिये वैराग्य आनंद का द्वार है। क्योंकि जो अपने में ठहर गया, उसे दुःखी करने का कोई उपाय नहीं।
और ध्यान रहे, वे कहानियां बच्चों की ठीक कहती हैं। जो अपने में ठहर गया, जिसके प्राण अपने में आ गये, बिखरेंगी। वह उनका स्वभाव है। जब वे बिखरेंगी तब यह भ्रम पैदा होगा कि मैं भी मर गया। यह स्वयं का मर जाना एक भ्रम है, जो पैदा होता है मरणाधर्मा वस्तुओं से स्वयं को जोड़ लेने से।
वैराग्य का अर्थ है, जिसने सारे संबंध तोड़ कर उसको जान लिया, जो सदा संबंधित होता रहा था।
‘भोगने लायक पदार्थ के ऊपर वासन जाग्रत न हो…..।’
विपरीत वासना जाग्रत हो नहीं, वासना ही जाग्रत न हो, किसी भी अर्थ की। तब वैराग्य की अवधि जान लेना। यह खुद के लिये सूत्र दिया जा रहा है। इससे दूसरे की जांच करने मत जाना।
हम सब बहुत होशियार हैं! हमें परिभाषाएं मिल जायं तो हम दूसरे की जांच करने जाते हैः कि अच्छा, तो फलां आदमी विरागी है या नहीं?
आपका कोई प्रयोजन नहीं है, दूसरे से आपका कोई लेना-देना नहीं है, राग में होगा तो दुःख भोगेगा, विराग में होगा तो आनंद भोगेगा, आपका कोई भी संबंध नहीं है।
लेकिन हम इतने कुशल हैं स्वयं के साथ धोखा करने में, कि अगर हमारे हाथ में कोई परिभाषा, कोई कसौटी लगे, तो हम दूसरों को कसने निकल जाते हैं, खुद को कसने की फिक्र नहीं करते।
अपने को कसना, यह सूत्र आपके लिये है। यह सूत्र किसी और पर चिंतन करने के लिये नहीं हैः कि महावीर विरागी हैं या नहीं? कि कृष्ण विरागी हैं या नहीं?
होंगे या न होंगे, कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह उनकी बात है। होंगे विरागी तो आनंद पायेंगे, नहीं होंगे तो दुःख पायेंगे, आप कहीं बीच में आते नहीं हैं।
कुछ लोग कहते हैं, कैसे पता चले कि कोई आदमी वस्तुतः ज्ञान को उपलब्ध हो गया? जरूरत क्या है कि कोई आदमी वस्तुतः ज्ञान को उपलब्ध हो गया है, इसका आपको पता चले? आप हुए हैं कि नहीं, इतना पता चलता रहे, काफी है। दूसरा हो भी गया हो, तो उसके होने से आप नहीं हो जाते। दूसरा न भी हुआ हो, तो उसके न होने से आपको कोई बाधा नहीं पड़ती।
लेकिन क्यों हम ऐसा सोचते हैं? उसके कारण हैं। हम पक्का कर लेना चाहते हैं कि कोई वैराग्य को उपलब्ध नहीं हुआ। उससे हमको राहत मिलती है कि फिर कोई हर्ज नहीं, हम भी न हुये, तो कोई हर्ज नहीं, कोई उपलब्ध नहीं हुआ! इससे मन को सांत्वना मिलती है, इससे मन को आधार मिलता है कि हम जैसे है, ठीक है, क्योंकि कोई कभी उपलब्ध नहीं हुआ, हम भी नहीं हो रहे हैं!
इसीलिये हमारा मन कभी मानने का नहीं करता कि कोई वैराग्य को उपलब्ध हुआ। हम खोजते हैं तरकीब कि पता चल जाये कि नहीं हुआ। अगर कोई वैराग्य को उपलब्ध हुआ है तो हमें अड़चन होती है भीतरी। वह अड़चन यह है कि कोई और हो गया उपलब्ध, तो मैं भी हो सकता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा। इससे ग्लानि पैदा होती है।
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