





संसार के सब पदार्थ दो श्रेणियों में विभक्त है, जड़ और चेतन। जड़ पदार्थों के फिर अनन्त रूप हैं। चेतन-तत्व भी दो प्रकार का है। एक तो वह, जिसे जीव, प्रत्येक, आत्मा आदि कहते हैं- जो अल्शक्ति, अल्पज्ञ, परिच्छिन्न और प्रतिशरीर भिन्न है। संख्या में यह अनन्त है। चेतन का दूसरा स्वरूप यह है, जो समस्त जड़ और चेतन समुदाय में व्यापक है, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, सबका नियन्त्रण करता है, और जिसे ब्रह्म, परमात्मा आदि शब्दों से अभिहित करते है। बस, संसार में ये ही तीन तत्व हैं।
प्रत्येक पदार्थ में कुछ न कुछ शक्ति होती है। किसी भी शक्ति में भलाई या बुराई स्वभावतः नहीं होती। उसके सद्पयोग या दुरूपयोग से भलाई-बुराई का संबंध है। यदि किसी शक्ति का सदुपयोग किया गया, तो परिणाम भला देखकर लोग उस शक्ति को प्रशस्य ठहरा देते है और यदि अज्ञान या प्रमाद के कारण उसका दुरूपयोग हुआ, तो फिर भयंकर परिणाम देखकर उस शक्ति की या तदाधार पदार्थ की ही लोग निन्दा करने लगते है।
संसार का प्रत्येक कण अपनी शक्ति रखता है। शक्ति के बिना कुछ है ही नहीं। यह और बात है कि हमें किसी की शक्ति का ज्ञान न हो। जो लोग नहीं जानते कि बल तथा अग्नि आदि पदार्थो में क्या शक्ति है, वे उसका उपयोग भी क्या कर सकते है। जिनको जितना ज्ञान है, वे उतनी शक्ति का सम्पादन करके यशस्वी और कृतकार्य होते है। साधारण जन अपने साधारण ज्ञान से अग्निद्वारा भोजन आदि पकाने का काम ले लेते है और बस, जो लोग इतना भी नहीं जानते, वे इस सुविधा से भी वंचित रहते है। परन्तु जिनको सुदृढ़ अध्ययन से विशेष ज्ञान प्राप्त है, जो विज्ञान में निष्णात है, वे अग्नि और जल आदि पदार्थो में अपरिमित शक्ति ढूँढ़कर संसार को चकित कर देते हैं।
आज पाश्चात्य देश प्रकृति की उपासना में मग्न है। शक्ति और शक्तिमान में अभेद होता है, व्यवहार में ऐसा ही समझा जाता है। पाश्चात्य देश प्राकृतिक शक्ति की उपासना आजकल कर रहे है और जल, अग्नि और वायु आदि पदार्थो का विश्लेषण करके दुनिया को दंग कर रहे है। जब प्रकृति में इतनी शक्ति है, तब आत्मा में कितनी होगी। वह तो इससे बहुत बढ़कर है न! जो प्रकृति-निरीक्षण भलीभाँति कर लेते है और अन्त में जिज्ञासा शान्त नहीं होती, शान्ति नहीं मिलती, वे फिर चेतन की ओर मुड़ते है, चेतनाभिमुख होते है-‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’। चेतन का अनुसंधान करते हुऐ उसे अपना तथा अपने नियामक का स्वरूप ज्ञात होता है और उपासना से शक्ति सम्पादन होती है। प्राचीन भारत ने अब से बहुत पहले प्रकृति के ये खेल खेलकर आत्म-चिन्तन किया था और इस दिशा में भी इति कर दी थी, इतनी कि आजकल के अनुभवशून्य जन उस पर अविश्वास करके मजाक उड़ाते है। क्या करें? जो बात जिसकी समझ के बाहर की होती है, उसको वह क्या कहे?
दूर मत जाइये। पाश्चात्यों ने प्रकृति की उपासना करके जिस शक्ति का ज्ञान सम्पादित किया है और जिसके द्वारा उन्होंने रेल, तार, वायुयान आदि निकालकर संसार को आश्चर्य में डाल दिया है, यह आत्मिक शक्ति के आगे कुछ भी नहीं है। परन्तु जिनको उस शक्ति का ज्ञान नहीं है, उनके लिये यही बहुत बड़ी बात है! यदि किसी के घर में बड़ा भारी खजाना गड़ा हो, पर उसे उसका कुछ भी पता न हो, तो वह एक पैसे को ही बहुत कुछ समझेगा और अपनी गरीबी में उससे बहुत ज्यादा सहायता लेगा। मतलब यह कि आत्मिक शक्ति के आगे प्राकृतिक शक्ति कुछ भी नहीं है, पर इसी ने आज दुनिया को चकित कर दिया है। और यदि आप ऐसे एकान्त जंगली या सुदूरवर्ती प्रदेशों में चले जायँ, जहाँ अभी तक रेल-तार आदि की चर्चा न पहुँची हो और वहाँ के लोगों से कहें कि एक जगह पानी भरकर आग सुलगा दी जाती है और यह आग पानी लाखों मन बोझ हजारों कोस बात की बात में पहुँचा देता है, न बैलों की जरूरत, न घोड़ों की, तो लोग आपको पागल कहने लगेंगे। वे कहेंगे, ‘कैसा बेवकूफ आदमी है! हम लोगों को पागल बनाने चला है! भला, बिना घोड़े-बैल आदि के इतना बोझ कैसे ढ़ोया जा सकता है? और इतनी जल्दी कोई कहीं से कहीं कैसे पहुँच सकता है? आग पानी से यह काम कैसे हो सकता है? इत्यादि। वे तार, ग्रामोफोन, हवाई जहाज आदि की बातों को शेख चिल्ली की कहानियों से बढ़कर महत्त्व कभी भी न देंगे। क्यों? इसलिये कि उनको इस विषय में कुछ पता नहीं है। जिस बात को जो नहीं जानता और प्रत्यक्ष नहीं देखता, उसके संबंध में उसकी ऐसी ही धारणा होगी।
भारतवर्ष ने प्राकृतिक शक्ति की पूर्ण उपासना करके आध्यात्मिक शक्ति का जो चमत्कार दिखाया था, उसकी झलक हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिलती है। संसार में एकमात्र भारत ने ही वैसी आध्यात्मिक शक्ति का सम्पादन किया था और अब वह भी उसे प्रायः बिल्कुल खो बैठा! हजारों वर्ष से प्रकृतिवादी देशों के संसर्ग से इसके आध्यात्मिक शक्ति जाती रही। आध्यात्मिक शक्ति के प्रवाह में प्राकृतिक शक्ति की ओर तो उदासीनता हो ही गयी थी, जिससे उसका ह्रास हो गया और बाद में अपनी चीज भी जाती रही। ‘दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम!’ आज हम इधर के है न उधर के!बाहर वालों को तो अभी तक वैसी आध्यात्मिकता का कभी अनुभव हुआ ही नहीं है, न उन्होंने ऐसी बातें ही सुनीं। तब वे हमारे ग्रन्थों की आध्यात्मिक शक्ति की बातों पर कैसे विश्वास करें? वे उनको मनगढ़न्त गप्पें बतलाते हैं! जब बात समझ में ही नहीं आती, तो बस क्या है? उनके साथ ही हम लोग भी हाँ में हाँ मिलाने लगे है! हम भी अपनी पुरानी आध्यात्मिक शक्ति की अवशिष्ट चर्चा को गपोड़बाजी कहने लगे है! कितना अज्ञान !
सारांश यह कि आत्मा में जो शक्ति है, अन्तर्जगत् में जो विद्युत है, उससे हम आज एकदम अपरिचित हैं। सामने उदाहरण भी प्रायः नजर नहीं आते। इसीलिये साधारण लोगों की बुद्धि में वैसी बातें नहीं आतीं और फलतः देश आध्यात्मिकता से दूर हटता जा रहा है! जब विश्वास ही नहीं तो फिर उसके साधन में प्रवृति कैसी? यह हमारे दुर्भाग्य की बात है।
जल में विद्युत है और सदा रहेगी। परन्तु जो उसे समझे और उसकी प्राप्ति के लिये साधना करे, उसे वह सुलभ हो जायेगी। फिर तो यन्त्र द्वारा प्रकट करके उसके स्वरूप से वह संसार की आँखे खोल देगा और सब मान जायँगे। परन्तु यदि साधना न की जाय, मन्त्रादि का निर्माण करके उसके द्वारा उसे प्रत्यक्ष सिद्ध न किया जाय तो फिर केवल ज्ञान कुछ काम न देगा। ज्ञान की सफलता कर्म और उपासना से है।
पहले तो आत्मा का विवेक हो। फिर उपासना और कर्म की साधना से उसकी शक्ति का विकास किया जाय। साधन हमारे ग्रन्थों में लिखे हैं। साधक चाहिये। विश्वास साधक उत्पन्न करता है। यदि हमें अपने पूर्वजों की बातों में विश्वास हो और धर्मग्रन्थों में श्रद्धा, तो अवश्य हम अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर लें। परन्तु पाश्चात्य जडवाद के संसर्ग से हममे जो दोष आ गये है, उनका दूर होना जरा कठिन है। तो भी, साधक विश्वासपूर्वक इधर झुकते हैं, वे स्पष्ट देखते है कि आध्यात्मिक शक्ति क्या चीज है और कैसी है? वे फिर इस पर मुग्ध होकर समस्त दुनिया को तुच्छ समझ लेते हे। आध्यात्मिक शक्ति क्या चीज है, सो अनुभव से जाना जा सकता है। हमें उसकी उपासना से कल्याण मिलेगा।
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