





ज्ञातवास के समय यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया था- पृथ्वी से भारी क्या है? तो युधिष्ठिर ने तुरन्त जवाब दिया- पृथ्वी से भारी माँ होती है। यह बिल्कुल सही उत्तर था। कारण, पृथ्वी तो सिर्फ दुनिया भर के भार का वहन करती है, लेकिन माँ अपने बच्चों के दुःख-दर्द, इच्छाओं-अनिच्छाओं, उनकी भूख-प्यास और उनके हर कार्यकलाप को न सिर्फ वहन करती है, बल्कि उसका निराकरण भी करती है।
छांदोग्य उपनिषद तो माता की महिमा के वर्णन में इतना आगे है कि उसमें कहा गया है कि स्वप्न में भी यदि मातृ-शक्ति के दर्शन हो जाये, तो मनुष्य को समृद्धि की प्राप्ति होती है।
परमेश्वर की निश्छल भक्ति का अर्थ ही माँ है। ईश्वर का रूप कैसा है, यह माँ का रूप देखकर जाना जा सकता है। ईश्वर के असंख्य रूप माँ की आँखों में झलकते हैं। संतान अगर माँ की आँखों के तारे होते हैं, तो माँ भी उनकी प्रेरणा रहती है। हमारी पूजनीय शोभा माँ!
माँ शब्द ही इस जगत का सबसे सुंदर शब्द है। इसमें क्या नहीं है? वात्सल्य, माया, अपनापन, स्नेह, आकाश के समान विशाल मन, सागर समान अंतःकरण, इन सबका संगम ही है माँ। न जाने कितने कवियों, साहित्यकारों ने माँ के लिये न जाने कितना लिखा होगा। लेकिन माँ के मन की विशालता, अंतःकरण की करुणा मापना आसान नहीं है।
वेद वाक्य के अनुसार प्रथम नमस्कार माँ को करना चाहिये। सारे जग की सर्वसम्पन्न, सर्वमांगल्य, सारी शुचिता फीकी पड़ जाती है माँ की महत्ता के सामने। सारे संसार का प्रेम माँ रूपी शब्द में व्यक्त हो जाती है। माँ शब्द में न जाने कैसा माधुर्य है कि वह जिस शब्द में जा मिलता है, उसी में एक अपूर्व सरलता व हृदयग्राही प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इसीलिये माँ का स्थान ईश्वर के समान है, क्योंकि ईश्वर ने मानवता के सृजन का उत्तरदायित्व माँ को ही दिया है।
माता जी के प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, करूणा, ममता, त्याग व कृपा दृष्टि की छत्र-छाया में हम अपने जीवन में पूर्ण सुख-समृद्धि, धन-धान्य व उन्नति से सराबोर हो रहें है, यह संभव है केवल और केवल दैवीक शक्ति स्वरूपा हमारी पूजनीय गुरू माँ के सहयोग से। ऐसी आद्या शक्तिमय हमारी गुरू माँ जो निरन्तर अपने शिष्यों के कल्याण हेतु क्रियाशील रहती हैं और उनके सुख-दुःख में हमेशा साथ रहती है। अपनी ममता के आंचल में सभी शिष्यों का शिशु समान निरन्तर पालन-पोषण किया है, जिसके फलस्वरूप आज सिद्धाश्रम साधक परिवार का नाम सूर्य समान तेजस्वी हो रहा है।
आद्या शक्ति माँ सम्पूर्ण संसार में सबसे अधिक पूज्य है, उनकी आराधना सर्वोत्तम मानी गयी है। भौतिक रूप में प्रकृति शरीर धारिणी हमारी गुरू माँ शोभा माताजी उसी परात्पर शक्ति माता की स्वरूप है। जिनके वात्सल्य में अनंत शिशुवत् शिष्य-शिष्यायें शिक्षित-दीक्षित होकर पूर्णता प्राप्त कर रहें हैं। यह हमारी गुरू माता के मातृत्व भाव का व्यापक स्वरूप है, जिसे तीक्ष्ण से तीक्ष्ण बुद्धि द्वारा नहीं अपितु निर्विकार अबोध भाव से ग्रहण किया जा सकता है, यह भाव ही शिष्य के कल्याण के लिये पर्याप्त है।
हे पूजनीय गुरू माँ! आपके इसी करूणामय चेतना को आत्मसात करने के लिये हम सभी शिष्य नित्य आतुर रहते हैं। आपकी वात्सल्यता ही सभी शिष्यों को सतकर्म व सेवाभाव की ऊर्जा प्रदान करती है। आपकी दिव्यमय तेजस्विता शिष्यों के दुःख, संताप, रोग, कष्ट, पीड़ा, बाधा, दरिद्रता आदि समस्या रूपी अंधकार को समाप्त कर जीवन को प्रकाशवान करती है। ऐसा दिव्य स्वरूप धारण किये हुये भी सामान्य गृहिणी की भांति गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों का पालन करने के साथ ही आप अपने शिष्यों की इच्छाओं को पूर्ण करने मे सहयोग भी प्रदान करती हैं।
है! गुरू माँ! आपकी विराटता का उल्लेख शब्दों के माध्यम से करना असंभव सा है। क्योंकि सामान्य से गृहस्थ जीवन में रहते हुये भी अपने अन्दर जो दिव्य तेजमय शक्ति समाहित कर रखी है वह आपके नेत्रों से निकलने वाले अग्नि स्फुलिंग के प्रवाह से साथ ही आपके व्यक्तित्व के ओज से स्पष्ट होता है कि आप उस विराट सत्ता का ही पूर्ण अंश हैं जिस प्रकार माँ गौरी के व्यक्तित्व के बारे में वर्णन मिलता है। मातृ सत्ता के लिये जो वर्णन मिलता है जैसे सरलता, ममत्व, वात्सल्यता, करूणा, परोपकार, त्याग, गरिमा आदि सभी आपके व्यक्तित्व में साफ-साफ झलकती है। आपकी मासूम-सी मुस्कुराहट ही सारी दुष्चिंताओं को दूर करने के लिये पर्याप्त है।
लम्बे अर्से से इस सिद्धाश्रम साधक परिवार की ख्याती को ज्वलन्त बनाये रखने के लिये आपने सद्गुरूदेव जी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर वैसा ही सहयोग प्रदान किया जिस प्रकार माँ भगवती ने सद्गुरूदेव को किया। आपकी करूणा, आपकी वात्सल्यता में वैसी ही झलक शिष्यों को आभाषित होती है जिस प्रकार से माँ भगवती शिष्यों को अपने प्रेम से सरोबार करती थी। जिस प्रकार कैलाश पर्वत का चिन्तन करते ही मन में जिस शिव-गौरी परिवार की कल्पना उभरती है, ठीक वैसे ही यह कैलाश सिद्धाश्रम दृश्यमान होता है। वास्तव में कैलाश सिद्धाश्रम को कैलाश पर्वत ही कहा जाय तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पर यह सब कुछ वन्दनीय गुरू माँ के सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता था। आपने इस कैलाश सिद्धाश्रम परिवार को जो साहस, जो चेतना और शिष्यों को आत्मीयता के साथ जो मर्यादा और करूणा भाव सिखाया वह अतुलनीय है।
माता जी ने गुरू जी के साथ ज्ञान की उस कसौटी पर चलते हुये उन्होंने अपने प्राणों का तेल पीला कर हम शिष्य रूपी दीपक को ज्ञान से, चेतना से सींचा है ताकि हम और अधिक समाज में सद्गुरूदेव निखिल जी के ज्ञान को व्यापक रूप से फैला सकें। माता जी और करूणा दोनों में कोई भेद नहीं। हम सभी शिष्य-शिष्या यह संकल्पित हों कि जिस प्रकार वन्दनीय माता जी ने अपने कठिन परिश्रम, अपने तपपुंज से, अपनी चित्त शक्ति से जो प्रेरणा हमें प्रदान की है वह आत्मसात् कर नवीन ज्योति के रूप में उभरें यही हमारी ओर से माता जी को सच्चा उपहार होगा।
हम सभी शिष्यों के मन में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी माता जी के अवतरण दिवस की प्रफुल्ता को एक यादगार रूप में व्यक्त करने के लिये क्रिया रूप में हम सिद्धाश्रम साधक परिवार की ज्ञान की थाती को और विस्तारित कर सके इस हेतु हम संकल्पित हों और प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान की पत्रिका परिवार की बढ़ोतरी करें। साथ ही इस दिवस को साधनात्मक क्रिया रूप में सामुहिक गुरू पूजन सम्पन्न कर और गरीब, असहाय-अनाथ, जरूरतमंद लोगों को यथोचित्त दान करें और विशेषतया ज्ञान का दान करें, साथ ही आपको अधिक-से-अधिक लोगों को सिद्धाश्रम साधक परिवार से जोड़ने का कार्य करना है और आपको इस सम्पूर्ण विश्व को निखिल युग में परिवर्तित करना है।
मां की महिमा शब्दों में व्याख्ययित नहीं हो सकती। हम ईश्वर की वंदना करते हैं, तो सबसे पहले उसे मातृ-रूप में देखते हैं- त्वमेव माता च पिता त्वमेव——————। जब भी हम कष्ट में होते हैं, तो मुंह से एक ही शब्द निकलता है- मां। हे जगत् जननी, आनन्दमयी, आद्या शक्ति, माँ पराम्बा स्वरूपा गुरू माँ आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन! गुरू+माँ = गुरू माँ जब गुरू शब्द ही माँ से जुड़ गया है तो आपके व्यक्तित्व का और क्या बखान करूं, मेरी कलम में उतने शब्द नहीं है। कितना भी कुछ लिखूं कुछ-न-कुछ बाकि रह जाता है———-
कैलाश सिद्धाश्रम साधक परिवार, जोधपुर
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