





विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विध्नतस्य र्न जायते।।
अर्थात् विद्या प्रारंभ करते समय, विवाह के समय, गृह प्रवेश के समय, घर से बाहर जाते समय, यात्रा प्रारंभ करने से पहले, युद्ध में जाने से पहले, संकट के समय जो विध्नविनाशक, वरदायक भगवान गणपति की वंदना करता है उसकी सदैव विजय होती है। क्येांकि जहां गणपति हैं वहां आदि देव शिव और महादेवी पार्वती भी हैं, वहां ऋिद्धि-सिद्धि हैं, शुभ और लाभ हैं, अर्थात् जीवन का सम्पूर्ण आनन्द है। प्रस्तुत स्तोत्र गणेश वंदना का महान स्तोत्र हैं, जिसका नित्य प्रति और विशेष कर बुधवार को तथा प्रत्येक मास की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को अवश्य ही करना चाहिए।
।। श्री गणेश स्तोत्रम् ।।
ऊँ कारमांद्यं प्रवदन्ति सन्तो वाचः श्रुतीनामपि ये गुणन्ति।
गजाननं देव- गणानतांघ्रिं भजेऽहमर्द्धेन्दु- कृतावतंसम् ।। 1
पादारविन्दार्चलन तत्पराणां संसार- दावानल भड्ग-दक्षम्।
निरन्तरं निर्गत-दान- तोयैस्तं नौमि विघ्नेश्वरमम्बुजाभम्।। 2
कृताड्ग- रागं नव-कुंकुमेन, मत्तालि- मालां मद-पड्क-लग्नाम्।
निवारयन्तं निज-कर्ण-तालैः, को विस्मरेत् पुत्रमनड्क-शत्रो:।। 3
शम्भोर्जटा-जूट-निवासि-गड्गा-जलं समानीय कराम्बुजेन।
लीला भिराराच्छिव मर्चयन्तं, गजाननं भक्ति-युवा भजन्ति।। 4
कुमार-भुक्तौ पुनरात्म-हेताः, पयोधरौ पर्वत-राज-पुत्रयाः।
प्रक्षालयन्तं कर-शीकरेण, मौग्ध्येन तं नाग- मुखं भजामि।। 5
त्वया समुद्धृत्य गजास्य-हस्तं, शीकराः पुष्कर-रन्घ्र-मुक्त:।
व्यामाड्गने ते विचरन्ति ताराः कालात्मना मौक्तिक-तुल्य-भासः।। 6
क्रीडा-रते वारि-निधौ गजास्यै, वेलामतिक्रामति वारि-पूरे।
कल्पावसानं परिचिन्त्य देवाः कैलास-नाथं श्रुतिभिः स्तुवन्ति।। 7
नागानने नाग-कृतोत्तरीये, क्रीडा रते देव-कुमार- सड्घ्ो:।
त्वयि क्षणं काल-गति विहाय, तौ प्रापतुः कन्दुकतामिनेन्दु।। 8
मदोल्लसत्-पंच-मुखैरजस्त्रमध्यापयन्तं सकलागमार्थान्।
देवान् ऋषीन् भक्ति-जनैक-मित्रं, हेरम्बमर्कारुणमाश्रयामि।। 9
पादाम्बुजाभ्यामति-कोमलाभ्यां, कुतार्थयनतं कृपया घरित्रीम्।
अकारणं कारणमास-वाचां, तन्नाग-वक्त्रं न जहाति चेतः।। 10
येनापितं सत्यवती-सुताय, पुराणमालिख्य विषाण-कोटया।
तं चन्द्र-मौलेस्तनयं तपोभिराराध्यमानन्द-धनं भजामि।। 11
पदं श्रुती-नामपदं स्तुतीनां, लीलावतारं परमात्म-मूर्तेः।
नागात्मको वा पुरुषात्मको वेत्यभेद्यमाद्यं भज विध्न-राजम्।। 12
पाशांकुशौ भग्नरदं त्वभीष्टं, करैर्दधानं कर-रन्घ्र-मुक्तै:।
मुक्ता-फलाभैः पृथु-शीकरौधेः, सिंचन्तमड्गं शिवयोर्भजामि।। 13
अनेकमेकं गजमेक-दन्तं, चैतन्य-रूपं जगदादि-बीजम्।
ब्रह्मेति यं ब्रह्म-विदो वदन्ति, तं शम्भु-सूनुं सततं भजामि।। 14
अड्के स्थितया निज-वल्लभाया, मुखाम्बुजालोकन-लोल-नेत्रम्।
स्मेराननाब्जं मद-वैभवेन, रुद्धं भजे वि श्व-विमोहनं तम्।। 15
ये पूर्वमाराध्य गजानन! त्वां, सर्वाणि शास्त्राणि पठन्ति तेषाम्।
त्वत्तो न चान्यत् प्रतिपाद्यमस्ति, तदस्ति चेत सत्यमसत्य-कल्पनम्।। 16
हिरण्य वर्ण जगदीशितारे, कवि पुराणं रवि-मण्डलस्थं।
गजाननं यं प्रवदन्ति सन्तस्तत् काल-योगैस्तमहं प्रपद्ये।। 17
वेदान्त गीतं पुरूषं भजेऽहमात्मानमानन्द-धनं हृदिस्थम्।
गजाननं यन्महसा जनानां, विध्नान्धकारो विलयं प्रयाति।। 18
शम्भोः समालोक्य जटा-कलापे, शशाड्क-खण्डं निज-पुष्करेण।
स्व-भग्न-दन्तं प्रविचिन्त्य मौग्ध्यादाकर्ष्टु-कामः श्रियमातनोतु।। 19
विघ्नार्गलानां विनिपातनार्थ, यं नारिकेलैः कदली-फलाद्यैः।
प्रभावयन्तो मद-वारणायं, प्रभुं सदाऽभीष्टमहं भजेतम्।।20
यज्ञैरनेकैर्बहुभिस्तपोभिराराध्यमाद्यं गज राज वक्त्रम्।
स्तुत्याऽनया ये विधिना स्तुवन्ति, ते सर्व-लक्ष्मी-निधयो भवन्ति।। 21
।। श्री गणेश-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
1- सभी शास्त्र, वचन जो भगवान द्वारा रचे गये तथा श्रवण के योग्य हैं, वे वचन तथा सिद्ध वचन जिन्हें ‘आद्य ऊँ कार’ कहते हैं। देवता छंद वंदना करते है, तथा मस्तक पर अर्ध चन्द्र आभूषण के समान शोभायमान हैं, उन गजानन का मैं वंदन करता हूं।
2- आपके शरीर में मद् द्रव्य निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, और यह मद् द्रव्य सांसारिक व्यक्तियों को दाह, अग्नि को नष्ट करने में समर्थ है, ऐसे महान रक्त कमल के समान आभा वाले विघ्नेश्वर को मैं प्रणाम करता हूं।
3- आपके स्वरूप में नित्य नवीन कुमकुम का लेपन किया जाता हैं, तथा अपने दोनों कर्ण को हिलाकर मद् में डूबे हुए भंवरों को हटाते रहते है। आप कामदेव को हीन करने वाले भगवान शिव के पुत्र है, आपका निरन्तर स्मरण करता हूं।
4- भगवान गणपति अपने करकमलो द्वारा भगवान महेश्वर के जटाजूट से गंगा जल लेकर उसे क्रीड़ा करने के बहाने से भगवान शंकर को विराजमान रखते है, जिससे गंगा निरन्तर बहती रहे, उन श्री गजानन की मैं पूर्ण भक्ति सहित वंदना करता हूं।
5- जो अपनी सूंड में जल भरकर आदि शत्तिफ़ मां पार्वती का अभिषेक करते हैं, और उसे निरन्तर प्रसन्न करते है, उन भगवान गणपति का मैं सदैव पूजन वंदन करता हूं।
6- हे दिव्य देव गजानन! आप द्वारा अपनी सूंड में उठाकर जो जल बिन्दु आकाश की और फैलाये जाते है वही ही जल बिन्दु काल क्रम में तारे बनकर प्रकाशित होकर गगन मंडल में घूमते हैं, मैं आपका वंदन करता हूं।
7- आपकी महिमा विशाल हैं, जब सागर में जल क्रीड़ा करते है तो जल राशि उछल-उछल कर किनारे तोड़ने लगती है, और देवता यह सोचने लगते है कि प्रलय आ गया हैं, वे भगवान शंकर का आह्नान करने लगते है। उन भगवान गणपति की मैं निरन्तर वंदना करता हूं।
8- आप अपने बल रूप में जब उत्तरीय धारण कर देवताओं के साथ क्रीड़ा करते है, तब यह महान लीला देखकर सूर्य और चन्द्र भी अपनी काल गति भूलकर आपके सन्मुख क्रीड़ा कन्दूक अर्थात् आपके सन्मुख गेंद बनकर उपस्थित हो जाते हैं। ऐसे भगवान गणपति की मैं वंदना करता हूं।
9- आप अपने पंचमुखों द्वारा सदैव देवों और ऋषियों को गूढत्तम आगम शास्त्रों का अर्थ बताते है, और उगते हुए सूर्य के समान रक्त वर्ण के कारण आपका नाम ‘हेरम्ब’ हैं तथा भक्तों के एक मात्र मित्र हैं। उन भगवान गणपति की शरण में आकर मैं अपने धन्य धन्य अनुभव करता हूं।
10- जो अपने चरण कमलों के स्पर्श द्वारा इस पृथ्वी को धन्य करते है, तथा अपनी सिद्ध वाणी के कारण जगत के सभी कार्यो के कारण हैं, और चेतना सदैव आपके पास विद्यमान रहती है, उन भगवान गजानन का मैं वंदन करता हूं।
11- आपकी महिमा तो उतनी विशाल हैं कि आपने विशाल दांतो के अग्रभाग से पुराण और श्रीमद् भागवत को लिपि बद्ध कर दिया और जो आनन्द मय ‘चन्द्रमौली भगवान शंकर’ के पुत्र हैं ऐसे ज्ञान के प्रकाश गजानन की मैं वंदना करता हूं।
12- श्रुति, पुराण, स्तुति के द्वारा भी आपका स्तवन पूर्णरूप से नहीं किया जा सकता और परमात्मा मूर्ति के लीलारूपी अवतार है, जो गजमूर्ति स्वरूप हैं या पुरूष मूर्ति स्वरूप है यह समझ के परे है उन आदि देव विध्नहर्ता गजानन की मैं वंदना करता हूं।
13- आपके स्वरूप में चार हाथों में पाश, अकुंश, भग्नदंत, और वरमुद्रा धारण किये हुए हैं तथा अपने सूंड के छिद्र से निकलती हुई मोती कणों जैसी जलधारा से भगवान शिव और भवानी के साक्षात शरीर का अभिषेक करते है, उन भगवान गजानन की मैं वंदना करता हूं।
14- जो एक होकर भी अनेक रूप अर्थात् द्वादश नामों से शोभा पाते है, जो चैतन्य रूप हैं, जो जगत के आदि बीज है, ब्रह्मविद्या के जानकार, जिन्हें ब्रह्म कहते है, उन शम्भुपुत्र श्रीगणेश की मैं वंदना करता हूं।
15- जिनके दांये और बांये ऋद्धि और सिद्धि विराजमान हैं, जिनके मुख कमल पर सदा कोमल मुस्कान रहती है, तथा अपने मस्तक से निकलने वाली मद्भास से सदैव प्रसन्न रहते हैं। उन जगत मोहक गणपति की मैं वदना करता हूं।
16- हे देवाधिदेव गजानन! जो सर्वप्रथम आपकी पूजाकर शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, उन्हें आपके स्वरूप का दृश्य प्राप्त होता हैं, संसार के अन्य दृश्य सामान्य प्रतीक होते हैं, उन गजानन की मैं वंदना करता हूं।
17- आपके शरीर की शोभा स्वर्ण के समान है, और गगन मंडल, आदित्यमंडल में स्थित देवता, सप्तऋषि, साधु ‘गजानन’ कहते है, मेरी यही इच्छा हैं कि उन भगवान गणेश को मैं निरन्तर स्मरण कर प्राप्त करुं।
18- जिनके तेज से विघ्नरूपी अंधकार का नाश हो जाता हैं, वेदांत, शास्त्र जिन्हें आनन्दघन परमात्मा के नाम से जाना जाता है, उन्हीं गजानन को मैं अपने हृदय में स्थापित होने कि प्रार्थना करता हुए वंदना करता हूं।
19- जो गणपति अपने बाल स्वरूप में भगवान शंकर के जटा में स्थित चंद्रखण्ड को अपना दांत समझकर खींचने का प्रयास करते हैं, और शंकर प्रसन्न होते है, ऐसे भगवान गणेश मेरे ऐश्वर्य की वृद्धि करें, उनकी मैं वंदना करता हूं।
20- अपने जीवन में बाधाओं को हटाने के लिए भगवान गजानन का ध्यान करते हुए सभी लोग नारियल, कदली फल, केला आदि से पूजा अर्चना करते है, और जो अपने भक्तों को अभिष्ट फल प्रदान करते हैं, ऐसे भगवान गणपति का मैं वंदना करता हूं।
फलश्रुति
21- इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक में लिखा है कि अनेक प्रकार के यज्ञो और तप के द्वारा जिन महादेव पुत्र की उपासना की जाती है और जो गजराज मुख भगवान गणपति के स्तोत्र का पाठ करते है, उन्हें जीवन में विघ्नों से मुक्ति मिलती है, और भगवती लक्ष्मी की कृपा निरन्तर प्राप्त होती रहती हैं।
विशेष
अपने पूजा स्थान में गुरु चित्र, गुरुविग्रह, गुरु यंत्र के साथ पारदेश्वर अर्थात् भगवान शंकर के रस से निर्मित पारद गणपति की स्थापना कर उन्हें नित्य कुमकुम का तिलक लगाकर जो व्यक्ति, साधक गणेश स्तोत्र, गणेश मंत्र ‘ ऊँ गं गणपतयै नमः’ तथा गणेश स्तुति का पाठ करता है उसे जीवन के सभी विघ्नों से मुक्ति प्राप्त होती है, क्योंकि गणपति का पारदेश्वर स्वरूप पूर्ण विघ्नहर्ता और विजय प्राप्ति स्वरूप माना गया है, यदि आपके पूजा स्थान में पारदेश्वर गुरुपादुका, पारदेश्वर गुरु यंत्र, और पारदेश्वर शिवलिंग तथा पारदेश्वर गणपति नहीं है तो वह पूजा स्थान पूर्ण नहीं है, आपके पूजा स्थान में मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठयुक्त ये चारों स्वरूप अवश्य ही स्थापित होने चाहिए।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,