





संसार के कुछ नियम हैं, उसकी एक ताल है, एक लय है, उसके साथ मिलाकर उसके संगीत में बहना शुरू कीजिए, इसका फल सुखमय होगा। इससे हट कर अगर आप चलें तो फिर वहीं चोट खाने की बारी आती हैं, दुनिया में जो भी नियम आपके लिए भगवान ने बनाए हैं, वे सब आपके लाभ के लिए हैं। उसके साथ सहयोग कीजिए। उसकी धारा के विपरीत दौड़ेगे तो वहीं चोट मिलेगी, वहीं से दुख प्रारम्भ होते है। मनुष्य पहले अपनी आदतें बनाता है, फिर आदतें मनुष्य के स्वभाव को बनाती है और स्वभाव मनुष्य को कर्म के दलदल में डाल देता है। जैसी आदतें बन जाती है, उसी के अनुसार मनुष्य कर्म के बंधन में हमेशा के लिए बंध जाते है। सामान्य रूप से अगर नम्र स्वभाव है, तो किसी के प्रति गुस्सा आ गया तो आपका गुस्सा शान्त हो जाएगा। क्रोधित स्वभाव है और गुस्सा आ गया तो जल्दी नहीं जाएगा और उगलोगे। गुस्सा आ गया तो कुछ-न-कुछ प्रतिक्रिया करोंगे ही, कुछ ऐसा कर्म कर दोगे, कुछ गलत कर दोगे किसी को चोट पहुंचा दोगें।
गुस्सा ऐसा है कि अगर आ गया तो जाएगा नहीं। एक बार किसी की बात का बुरा मान लिया, तो वह जिन्दगी-भर बुरा-ही-बुरा रहेगा। चाहे कोई कितना भी कहे, फिर कोई सुधार की बात नहीं हो सकती। पत्थर पर खींची हुई लकीर की तरह है किसी ने बुरा कह दिया तो नम्र स्वभाव वाला आदमी थोड़ी देर के लिए के लिए सोचेगा फिर कहेगा की रहने दो इसमें ज्ञान की कमी है। उग्र स्वभाव ऐसा है कि जिन्दगी-भर के लिए गांठ बांध ली। अब तो चाहे कुछ भी हो। मरेंगे या फिर मारेंगे, खुद कीचड़ से खड़े हैं दूसरे को घसीटकर यहीं लेकर आएंगे। बाहर से कितने भी भगत बने रहिए, कितनी भी भक्ति-भक्ति करते रहेगे लेकिन अगर उनका स्वभाव उग्र है और किसी से कोई झगड़ा हो गया तो पूजा-पाठ छोड़ देंगे, माला छोड़ देंगे, फिर झगड़े से निपटोगे, पहले इस काम से निपट लें पूजा पाठ तो बाद में करनी ही हैं।
आपका मन कोमल है तो यह कहेंगे अपनी राह पर आगे बढ़ते रहना है क्योंकि भाग-दौड़ का नाम ही जिन्दगी। इस भाग-दौड़ में दौड़ते-दौड़ते बीच-बीच में बाधाएं आती है, उनको लांघना हैं। और आगे बढ़ना और आगे बढ़ते रहना है। व्यक्ति यह सोचता है कि हर परेशानी उसकी हिम्मत को देखने के लिए आती है, इरादा कमजोर तो नहीं था न, हर मुसीबत यह बताने आती है कि यह आदमी था क्या, इतना कमजोर कि छोटी-मोटी बात से रूककर बैठ गया। या ऐसा जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग के ऊपर नृत्य कर दिया और संसार को कह दिया कि काल के सिर पर पांव रखकर भी नाचा जा सकता है, तुम्हारे अन्दर हिम्मत होनी चाहिए, तुम्हारे अन्दर संकल्प शक्ति होनी चाहिए।
एक बार मजबूत इरादा करके चलो। कठोपनिषद् मे वर्णन आता है कि नचिकेता यमराज के घर गया था, उसे मिलने के लिए उसे ढूंढ़ने के लिए, क्योंकि पिता ने कह दिया था कि मैं तुझे मौत को देता हूं, पिता ने तो गुस्से में आकर कह दिया। नचिकेता सीधा ही मौत के घर पहुंच गया, दरवाजा खटखटाया कि हैं क्या? पता लगा कि यमराज हैं नहीं घर पर। तीन दिन तक प्रतीक्षा करता रहा। दुनिया में हर जगह इन्सान के पीछे मौत पड़ी है कभी मान-सम्मान के रूप, हानि, चिंता, कभी निराशा का रूप लेकर, कठिनाई बनकर, चुनौती बनकर, हर जगह यदि मौत की तरफ चल पड़े कि मैं आ रहा हूं तेरे द्वार। अब तू बता क्या, प्राण हथेली पर लेकर कोई खड़ा हो जाए तो मौत भी अपने घर पर नहीं मिला करती। एक बार कोई हिम्मत करके चले पड़े। तो फिर डराने वाली चीज कहीं पर भी नहीं है। इसलिए कहा गया है।
तावत् भेतव्यं यासवत् भयं अनागतम्।
मीठा बोलेगें मीठे लोग मिल जाएंगे, बुरा बोलेंगे बुरे मिल जाएंगे, जैसा व्यक्ति होता है उसको वैसे ही व्यक्ति मिल जाते हैं, प्रेम वाले को प्रेम वाले मिल जाते है। कर्म बंधन बनता है, कर्म आपको बांधता है, कर्म आपको फल देता है। अच्छा करोंगे अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोंगे तो बुरा फल मिलेगा। विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति की बुद्धि सोचती नहीं, इतना तेज दिमाग था, पर दिमाग काम नहीं करता, उसका परिणाम यह है कि खाने-पीने में भी गड़बड़ हो गई है। जो खा रहे हैं वह लग नहीं रहा, रात को सोने की कोशिश कर रहे है पर नींद नहीं आ रही है तो करवटें बदल रहे हैं। दुष्कर्म बनकर सामने आता है तो वह अन्दर और बाहर दोनों ओर से जलाएगा, अन्दर से भी जलाएगा, नुकसान ही नुकसान। जहां जाओगे एक मुसीबत नहीं, दस तरह की मुसीबतें। शरीर ठीक नहीं, घर के लोग ठीक नहीं। परिस्थितियां ठीक नहीं है, धन का अभाव, मन अशांत है, इन्सान निराशा में आ जाता है, बैचेन रहता है। जितना बेचैनी होगी उतनी ही परेशानी बढे़गी, धीरज रखो और आगे बड़ो।
बहुत ज्यादा सोचोंगे तो बेकार के चक्कर में पड़ जाओंगे। ज्योतिष-शास्त्र भी कर्म को बहुत सुन्दर ढंग से दर्शाता है कि कहां-कहां किस-किस तरह से किस किस चीज का प्रभाव मन पर आ रहा है। लेकिन इससे पहले हम एक बात समझें की, हमारी जो ग्रन्थियां है, शरीर के अन्दर उनका भी प्रभाव आपके शरीर पर आता है, आपके कर्मों पर आता है, आपके स्वभाव पर आता है। मौसम का, वातावरण, व्यक्तियों,संगति,भोजन,विचारों का, सबका प्रभाव मनुष्य के ऊपर पड़ता है। आदमी ठीक जा रहा था, सड़क पर कोई आदमी ऐसा मिल गया, चलते चलते टकराकर चला गया। उससे इतना ही तो कहा था कि भई देखकर चला करो, उसने सीधे गाली दे दी गाली दे दी तो आपको उसको समझाना था कि बुद्धि ठीक है तो वह गला पकड़कर खड़ा हो गया अब आपने थोडी सा ताकत दिखाई तो उसने पत्थर ही मार दिया।
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