





जीवन-रस का विकास प्रमुख आवश्यकता है। गुरु तो दर्शन और ज्ञान दोनों का ही आधार तैयार करता है। आत्मा के दो ही कार्य हैं- देखना और जानना ‘यः किंचित् करोति यश्चकिंचित् जानाति स आत्मां’ चेतना के बिना क्रिया बन नहीं सकती। शेष जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह त्रिगुण का आवरण मात्र है। इस परदे को हटाकर स्वयं का ज्ञान कराना ही गुरु का कार्य है। गुरु ही शिष्य की परीक्षा लेता है, ऐसा नहीं है।
शिष्य भी गुरु को स्वीकार करने से पूर्व परीक्षा लेता ही है अथवा ले सकता है। गुरु उस समय तक परीक्षा लेता रहेगा, जब तक कि शिष्य का धैर्य टूट न जाए, उसका अंहकार चूर-चूर न हो जाए। शिष्य की अहंरूपी प्रतिरोधक क्षमता को समाप्त करना अनिवार्य होता है। फूल समान शिष्य में गुरु महक भरता है। परीक्षा भी लेता रहता है। सेवा, डांट-फटकार सब कुछ शिष्य के अंहकार को गलाने के लिए आवश्यक भी है। हर स्थिति में गुरु के प्रति श्रद्धा बनी रहे, क्रोध न आ सके, यही सफलता का सूचक है।
आज समय का अभाव है। शिष्य कुछ पाना भी चाहता है, गुरु देना भी चाहता है, किन्तु शिष्य कहता है, मुझे तो कुछ ऐसा दो कि मुझे समय भी न लगाना पड़े और जो चाहता हूं वह मिल भी जाए। ऐसा कैसे संभव है? इससे स्पष्ट है कि शिष्य कितना संकल्पहीन, कितना उतावला है और लक्ष्य को बिना परिश्रम और कर्म के पाना चाहता है। कोई भी गुरु ऐसे शिष्यों को तैयार नहीं कर सकता। न ही गुरु से ऐसे प्रश्न करना चाहिए।
अच्छे गुरु के तो पास बैठने से ही मन शांत होने लगता है। द्वंद्ध रूपी विचारों का तांता टूटने लगता है। कुछ बोलने की या प्रश्न करने की भी आवश्यकता नहीं रहती। यह भी आवश्यक है कि शिष्य स्वयं भी सद्भाव के साथ ही बैठे। गुरु मित्र होता है, सलाहकार होता है, प्रेरक होता है। शिष्य के सामने अनेक चुनौतियां रखता है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध गहन आत्मीयता का होता है। सच तो यह है कि दोनों अलग होते हुए एक-दूसरे को समर्पित हो जाते हैं। दोनों को ही एक-दूसरे में अपना प्रतिबिम्ब स्वरूप इष्ट नजर आने लगता है। गुरु का तो प्रतिबिम्ब शिष्य होता है। ‘जानत तुमहि होई जाई’ के अनुसार गुरु के ज्ञानमय प्रकाश को पा जाने के अनन्तर शिष्य भी गुरु भाव में ही चला जाता है- इस तरह शिष्य- गुरुमय हो जाता है। अर्थात् वहां न गुरु गुरु है, न ही शिष्य। दोनों एक हो जाते हैं। केवल ज्ञान शेष रह जाता है।
गुरु ही शिष्य को गुरु बनाता है। अपनी प्रतिकृति रूप बना देता है। शिष्य को आत्मदर्शन का मार्ग दिखाता है, उस पर चलाता है और स्वयं की छवि उसमें देखता है। एक स्तर पर पहुंचकर वह शिष्य को भी गुरु रूप में मान लेता है। अर्थात् वहां न गुरु गुरु है, न ही शिष्य शिष्य। दोनों एक हो जाते हैं। केवल शरीर दो रहते हैं। गुरु एक-एक करके पाप मुक्त करता है, आवरण हटाता है, ताप हरण करता है। इसके लिए स्वयं भी तप करता है, ईश्वर से प्रार्थना करता है, चिन्तन-मनन करता है। शिष्य के लिए नित्य जीवन ज्ञान का स्वरूप तैयार करता है, शिष्य को किस रूप में ग्राह्य होगा, उसी के अनुकूल उसे प्रसवित करता है। सारी प्रक्रिया में पहले स्वयं गुजरता है।
शिष्य के लिए गुरु कठोर होता है, माता सदा निर्मल रहती है। कठोर अनुशासन के बिना न शरीर की साधना संभव है, न ही मन की। भावनाओं का परिष्कार अत्यधिक महत्वपूर्ण भाग होता है और अत्यन्त कठिन भी। व्यक्ति सत, रज और तम की मात्र को भी सत्व में बदलने का कार्य करता है। इसके बिना लक्ष्य प्राप्ति संभव ही नहीं है। समर्पण का भाव भी इसके बिना आगे नहीं बढ़ सकता। गुरु-शिष्य का एक ही सम्बन्ध है- आस्था का। यही समर्पण का जनक भी है। बिना शंकाओं के गुरु के आदेशों को मानने लायक बनाना, फिर उसे चारों ओर से समेटकर ज्ञान-प्रवाह में केन्द्रीभूत करना वैसा ही है जैसा कि सोने को पहले तपाना फिर नया डिजाईन में तैयार करना, गढ़ना।
जीवन संकल्प-विकल्प के बीच झूलता रहता है। विकल्पों के बाहर निकलकर इच्छाशक्ति अथवा संकल्प शक्ति ही शिष्य का निर्माण करती है। शिष्य का समर्पण भाव ही गुरु शक्ति से कृपा प्राप्त करने में सफल होता है। तभी व्यक्ति की प्राण शक्तियां केन्द्रीभूत हो सकती हैं, पाप क्षय का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। गुरु के ज्ञान और शिष्य का कर्म मिलकर, पूर्णता तक पहुंचकर ही प्रकाश को प्राप्त कर सकते हैं।
गुरु शिष्य सम्बन्धों की यह व्याख्या तो अत्यन्त सरल सामान्य व्याख्या है। मूल रूप से तो गुरु शिष्य का सम्बन्ध एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है जिसमें गुरु शिष्य को प्रदान करें और शिष्य के लिये यह आवश्यक है कि वह अपना अहंकार, अज्ञान छोड़ कर गुरु में ही अपना प्रतिबिम्ब देखे और उसके लिये प्रतीक स्वरूप कुछ विशेष दिन नियत किये गये हैं। गुरु तो अपना ज्ञान हर समय देता ही रहता है। लेकिन वर्ष में कुछ दिन ऐसे नियत होते हैं जब गुरु कृपा का भण्डार शिष्य के लिये और अधिक खुल जाता है। ये दिवस होते हैं- नववर्ष का प्रथम दिन, मकर संक्रान्ति, महाशिवरात्रि, वंसत पंचमी, होली, आश्विन नवरात्रि, गुरु जन्मोत्सव, गुरु पूर्णिमा, शारदीय नवरात्रि, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा। इन दिनों में गुरु तो शिष्य को बिना मांगे ही सब कुछ प्रदान कर देता है लेकिन इससे पहले शिष्य को अपने जीवन का लक्ष्य तो निर्धारित करना ही पड़ेगा और लक्ष्य प्राप्ति के लिये संकल्प की आवश्यकता रहती है। संकल्प और आलम्बन नहीं छूटता बल्कि मजबूत होता जाता है। यही एकाग्रता को शनैः शनैः तन्मयता में बदल देता है। तन्मयता में व्यक्ति स्थिर भावापन्न हो जाता है। उसकी स्वाभाविक तथा वातावरण जन्य चंचलता समाप्त होती है।
कालचक्र के इस खण्ड में पुनः नया वर्ष आ रहा है और जीवन का आधार ही नवीनता है। यह नवीनता देह के माध्यम से नहीं आ सकती क्योंकि मनुष्य जब पैदा होता है वह घड़ी देख कर इस संसार में नहीं आता और जब वह जाता है तब भी घड़ी देख कर अपने प्राण नहीं छोड़ता, जन्म और मृत्यु कीलें है और इन्हीं कीलों के बीच मनुष्य की जीवन डोर बंधी है। हर क्षण परिवर्तनशील है और जीवन का प्रत्येक क्षण बीते गए क्षण से अलग है। ईश्वर ने हर क्षण की रचना मनुष्य के लिये इस प्रकार की है कि वह प्रत्येक क्षण का मूल्य समझे और प्रत्येक क्षण को किस प्रकार आनन्द क्षण में परिवर्तित कर सकते हैं यही क्रिया ‘गुरु शिष्य’ सम्बन्ध कहलाती है।
नववर्ष पर मैं तुम्हें संदेश देता हूं कि अब तुम्हें अपने मन में साहस का संचार करना है। अब तुम्हें अपने पंखों को पूरी तरह से खोल कर फड़फड़ाने हैं। मेरे साथ उड़ने की क्षमता मन में संजोनी है। सारे बंधनो को तोड़कर मुक्त आकाश में, मेरे साथ उड़ते हुए जीवन का रस, जीवन का आनन्द और जीवन की पूर्णता प्राप्त कर लेनी है। नववर्ष पर मैं आपको यह संदेश देता हूं कि आप अपने मन को पूर्ण रूप से नियंत्रण कर सकें और पकड़ सकें क्योंकि मन में प्रेम के अलावा कोई दूसरी चीज है ही नहीं। मन और प्रेम को एक ही शब्द कहा गया है। मनुष्य में प्रेम के अलावा कुछ था ही नहीं, विषाद जो दूसरों ने आपको दिया, घृणा दूसरों ने आपको दी, आपके पास ऐसी कोई चीज थी ही नहीं। भूख, प्यास, घृणा, विषाद, पीड़ा, चिन्ता यह सब तुम्हें समाज ने दिये हैं और इन बाहर से आई हुई वस्तुओं को तुमने अपने मन में बसा लिया है। मन, जहां प्रेम स्थापित होता है, जहां गुरु स्थापित होता है, वहां इन वस्तुओं का क्या काम है? नववर्ष पर संकल्प लो की इन बातों की जीवन में आवश्यकता नहीं है उन्हें अपने जीवन से निकाल दो। क्योंकि जीवन यात्रा में बहुत दूर तक प्रेम ही चलेगा, गुरु ही चलेगा।
तुम्हारा और मेरा जीवन, यह अलग हो ही नहीं सकते हैं। मेरे बिना तुम्हारे जीवन का कोई अस्तित्व नहीं है। तुम्हारा जीवन, जीवन नहीं है। यह देह रूपी शरीर अवश्य है लेकिन प्राणों का जीवन नहीं है। क्योंकि तुम्हारे जीवन का प्राण मैं हूं, चेतना मैं हूं, तुम्हारे पास केवल शरीर है और इस शरीर में प्राणों की चेतना मेरे माध्यम से प्राप्त हो सकती है क्योंकि मैं तुम्हारा गुरु हूं। निराशा के घने अंधकार में जब मानसिक शांति और कामनाओं की पूर्ति नहीं होती है तो उसकी तलाश प्रारम्भ होती है एक ऐसे व्यक्तित्व के लिए जो सारी सफलतायें अर्जित किये हुए हों, जो उसके सुख दुख को समझ सकें, जो उसे जीवन का सही मार्ग दिखा सकें। जीवन में पल-पल आती समस्याओं से मुक्ति दिला सकें। कई बार इस खोज में व्यक्ति भटक भी जाता है लेकिन जहां चाह वहां राह, सच्चे ज्ञान के पिपासु को सच्चा मार्गदर्शक मिल ही जाता है, हर व्यक्ति के जीवन में एक बार उसके गुरु अवश्य ही मिलते है। उस समय गुरु तो शिष्य को पहचान जाते हैं और ज्ञानवान शिष्य भी गुरु को पहचान लेता है और यात्रा प्रारम्भ होती है जिसमें शिष्य के पास गुरु रूपी मित्र, पिता मार्गदर्शक हर समय रहता है। ऐसी स्थिति में शिष्य अपने आप को अकेला अनुभव नहीं करता है, हर समय उसके मस्तक पर गुरु का वरद् हस्त रहता ही है।
जीवन में कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है, कि मनुष्य अपना कार्य करते-करते निराश हो जाता है, उसे जीवन को संचालित करने हेतु जिस चेतना की, ऊर्जा की, तप की आवश्यकता होती है, वह चैतन्य ज्वाला ही मन्द होने लगती है, निराशा में व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता है। यह सही है, कि पुरुषार्थी व्यक्ति को कार्य करते रहना चाहिए, बाधाओं का हंस कर सामना करना चाहिए।
भैरव, शिव के अंश हैं और उनका स्वरूप चार भुजा, खड्ग, नरमुण्ड, खप्पर और त्रिशूल धारण किये हुए, गले में शिव के समान मुण्ड माला, रूद्राक्ष माला सर्पो की माला, शरीर पर भस्म, व्याघ्रचर्म धारण किये हुए, मस्तक पर सिन्दूर और त्रिपुण्ड, ऐसा ही प्रबल स्वरूप है। भैरव-शिव समान ऐसे देव हैं, जो हर प्रकार का संकट दूर कर, उन्हें अपने आश्रय में अभय प्रदान कर, बल तेज, यश, सौभाग्य प्रदान करते ही हैं।
इस नूतन वर्ष रूपी पर्व को पूर्णरूपेण आनन्द युक्त बनाने हेतु पूज्य गुरुदेव जी अपने सभी शिष्य और साधकों को दिव्यतम काल भैरव महामृत्युजंय शिव शक्ति युक्त दीक्षा और ब्रह्म वर्चस्व पूर्णमद् दीक्षा प्रदान करेंगे। जिससे साधक के जीवन में अभय, बल, शौर्य, आरोग्यता, सौभाग्यता, धनलक्ष्मी की परिपूर्णता शिव परिवार के रूप में प्राप्त हो सके। नूतन वर्ष की चेतना, उत्साह निरन्तर बना रहे और पूरे वर्ष भर उन्नति की ओर अग्रसर रहें।
उसी शिव शक्ति ब्रह्मस्वरूप में पूर्णता से प्राप्त करने हेतु 1,2,3 जनवरी 2014 को काल भैरव महामृत्युंजय शिव शक्ति साधना शिविर, त्रिवेणी भवन, व्यापार विहार, बिलासपुर, छतीसगढ़ में सम्पन्न होगा।
मैं तुम्हे परिचय कराना चाहता हूं प्राणों में उतरने की उस क्रिया का, जिससे बुद्ध ने आनन्द प्राप्त किया, जिससे कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया, उसे कह सके कि तुम जो देख रहे हो, वह श्मशान है। तुम सोच रहे हो, लेकिन तुम बाण नहीं चला रहे हो। भीष्म को मार रहे हो, तुम बाण चलाना चाह रहे हो, लेकिन तुम बाण नहीं चला रहे हो। भीष्म तो पहले से ही मरा हुआ है, उसे मैं पहले ही मार चुका हूं। तुम तो केवल निमित्त हो, मैं तुम्हें निमित्त बना रहा हूं। मैं तो तुम्हें और कुछ करने को नहीं कह रहा हूं, तीर तुम चला ही नहीं सकते, तुममें तीर चलाने की ताकत नहीं है। अगर मैं यहां नहीं बैठा होता तो तुम कुछ नहीं कर सकते थे। तुममें यह ताकत, यह क्षमता नहीं है।
और जब अर्जुन तीर चलाता तो कर्ण का रथ एक दम से पांच गज पीछे सरक जाता था। कर्ण भी बहुत बड़ा योद्धा था, बहुत बहादुर था, लेकिन फि़र भी रथ पांच गज पीछे सरक गया, एक तीर से। और जब कर्ण तीर से बाण चलाता तो अर्जुन का रथ एक गज पीछे सरक जाता । अर्जुन गर्व से बहुत फ़ूल कर बोला- ‘‘कृष्ण! मेरी बाणों की ताकत देखी । तुम कर्ण की बहुत तारीफ़ करते थे कि वह तीर चलाने में बहुत ताकतवान है। मैं जब तीर चलाता हूं तो उसका रथ पांच गज पीछे धकेल देता हूं। मगर उसके तीर से मेरा रथ केवल एक गज ही पीछे सरकता है।’’
कृष्ण ने कहा- ‘‘मैं जो बैठा हूं जो तीनों लोकों का भार लेकर, इसलिये ये रथ एक गज ही सरकता है। इसलिये तुम्हारा रथ रूका हुआ है अर्जुन! नहीं तो तुम्हारा रथ कब का धवस्त हो गया होता। तुम कुछ नहीं कर रहे हो, लड़ तो मैं रहा हूं तीर तो मैं चला रहा हूं, तुम तो निमित्त मात्र हो।’’
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