





शिव शक्ति स्वरूप, शक्ति पूर्ण, अजर-अमर आत्मा युक्त, सर्व दुःख संहारक स्वरूप हैं। शक्ति के अभाव में व्यक्ति को दुःख दारिद्रय, भय, विनाश की आशंका रहती है, शक्ति के जाग्रत होने से साधक स्वयं शक्ति पुंज बन जाता है, जिसके कारण आत्म विश्वास की एक ऐसी महान शक्ति उसमें समाहित हो जाती है। इसके फलस्वरूप उसकी बाधाएं, विपत्तियां, अपने आप दूर होने लगती हैं, शिव साधना से शक्ति की उत्पत्ति होती है, शिव साधना में निरन्तर यह भावना रहनी चाहिए कि हम एक शक्ति पुंज की लहरें हैं, जो कि शिव के प्रतीकों शिव त्रिनेत्र, अर्द्धचन्द्र, डमरू, वृषभ, लिंग, श्वेत वर्ण के माध्यम से निरन्तर प्रवाहित हो रही है क्योंकि शिव तत्व का प्रत्येक अंग शक्ति स्वरूप हैं।
महाशिवरात्रि के सम्बन्ध में अनेकों आख्यानों में यह आख्यान महत्वपूर्ण है कि भगवान शिव का प्रगटीकरण महाशिवरात्रि की रात्रि में हुआ। रात्रि प्रतीक है अन्याय, अज्ञान, अंधकार, पाप, हिंसा, धोखा, असत्य और दुर्भाग्य की। भगवान शिव ऐसी ही रात्रि में प्रकट होकर मनुष्य जीवन के इन सारे तमोगुणों को समाप्त करते हैं और उसे नया प्रकाश प्रदान करते हैं। शिवरात्रि के बाद महा अमावस्या आती है, महा अमावस्या सम्पूर्ण जीवन के अंधकार का स्वरूप है और यह सम्पूर्ण अंधकार ज्ञानमय शिव के माध्यम से ही नष्ट हो सकता है।
भगवान शिव प्रत्येक क्षण आनंदित, प्रत्येक क्षण तरंगित व उल्लसित हैं और इसी से महाकाल आशुतोष की संज्ञा से विभूषित है।
भगवान शिव सदैव आनन्द मग्न हैं और शक्ति स्वरूपा मां भगवती पार्वती इस जीवन में आनन्द और सरसता की साकार मूर्ति हैं। इनके परस्पर मिलन से सम्पूर्ण प्रकृति इस पावन दिवस पर अपने पूर्ण श्रृंगार के साथ नृत्य कर उठती है और इसी से साधना का यह पावन पर्व दुर्लभ अवसर बन जाता है। सम्पूर्ण रूप से प्रकृति का अणु-अणु चैतन्य होकर साधक को उसका मनोवाछित प्रदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। भगवान शिव तो सर्वथा सरल और भोले हैं जिनके विषय में कहा गया है कि मिट्टी से बना शिवलिंग, बेल के पत्तों से पूजन और गाल बजा देने से मंगल ध्वनि! इतना ही त्रैलोक्य संपत्ति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त हैं।
महाशिवरात्रि से सम्बन्धित एक अद्भुत आख्यान शास्त्रों में वर्णित है-भगवान सदाशिव अविनाशी, अव्यक्त, अदृश्य देव हैं। सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्मा ने की तथा सृष्टि का पालना विष्णु करते हैं। दोनो ही देवों मे वाद-विवाद हुआ की संसार में अग्रणी कौन हैं? वाद-विवाद होते-होते युद्ध की स्थिति आ गई और कई काल तक युद्ध चलता रहा। तब सारे देवों ने सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव की आराधना सम्पन्न की और भगवान सदाशिव लिंगाकर रूप में, जिसके चारों और तीव्र ज्योति प्रकाशित हो रही थी, प्रकट हुए। दोनों देवों ने निर्णय किया की जो इस महान ज्योति का आदि अंत जान लेगा वही संसार में सर्व पूज्य होगा।
ब्रह्मा सूक्ष्म रूप बन कर आकाश मार्ग की ओर गतिशील हुए तथा विष्णु कूर्म रूप बन कर पाताल मार्ग की ओर गतिशील हुए। हजारों योजन की यात्रा करने के पश्चात भी उस लिंग और प्रकाश पुंज का कोई ओर छोर प्राप्त नहीं हुआ। ब्रह्मा जब आकाश मार्ग की ओर गतिशील थे तो उन्हें आकाश में उड़ता हुआ एक केतकी पुष्प प्राप्त हुआ, ब्रह्मा ने उस पुष्प से पूछा की तुम कहां से आये हो? तो उसने उत्तर दिया कि मैं इस शुभ्र ज्योर्तिमय लिंग के ऊपर स्थिर था।
ब्रह्मा उस पुष्प को लेकर धरती पर आये उसी समय विष्णु भी भूमि पर आये। भगवान विष्णु ने कहा कि मुझे पाताल में भी इस ज्योर्तिलिंग का कोई छोर नहीं मिल रहा है जबकि ब्रह्मा ने कहा कि मुझे इस लिंग का पता चल गया है और इसके प्रमाण स्वरूप में यह पुष्प लेकर आया हूं। उसी समय शिव प्रकट हुए और ब्रह्मा को कहा कि तुम असत्य वचन कह रहे हो इसलिए संसार में कभी तुम्हारी पूजा नहीं होगी और केतकी पुष्प को श्राप दिया की किसी पूजा में तुम्हें अर्पित नहीं किया जा सकेगा। विष्णु को यह वरदान दिया कि तुम्हारी सत्य निष्ठा के कारण तुम्हें लक्ष्मी प्राप्त होगी और जगत में सदैव तुम्हारी पूजा सम्पन्न होगी। यही कारण है कि ब्रह्मा का पूरे संसार में पुष्कर के अलावा कोई मंदिर नहीं है तथा विष्णु जगत में सर्वपूजित हैं। भगवान शिव का यह प्रगटीकरण महाशिवरात्रि के दिन हुआ था और शिव ने वरदान दिया कि जो इस दिन जलधारा से मेरा पूजन करेगा उसे जीवन में चतुवर्ग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्त होगा।
इसी प्रकार एक कथा ने अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का मां गौरी से विवाह सम्पन्न हुआ था। यह विवाह सृष्टि का प्रथम अन्तर्जातीय विवाह कहा जा सकता है क्योंकि भगवान शिव तो अमर है, अजन्मा हैं तथा उनके कुल इत्यादि के सम्बन्ध में कोई जानकारी ही नहीं है। मां पार्वती क्षत्रिय कुल में राजा दक्ष के यहां उत्पन्न हुई थीं। इस विवाह में देव-राक्षस, भूत-प्रेत, गन्धर्व-अप्सराएं सभी सम्मिलित थे। उसी शुभ अवसर के फल स्वरूप पूरे संसार में यह महोत्सव आनन्द पर्व के रूप में सम्पन्न किया जाता है। महाकालः- स्कन्दपुराण के अवंती खण्ड में महाकाल वन में शिव के निवास करने की कथा है।
प्रलयकाल में सम्पूर्ण संसार अन्धकारपूर्ण था। न पंचतत्व थे और न चाँद सितारे। केवल एक महाकाल ही थे। उन्होंने जगत के निर्माण का विचार किया। उन्होंने एक स्वर्ण अण्ड उत्पन्न किया। उसे अपने हाथ में रख उसके दो भाग किए। नीचे के भाग को पृथ्वी और ऊपर के भाग से आकाश का निर्माण हुआ। ब्रह्मा भी उत्पन्न हुए। शिव ने उन्हें सृष्टि निर्माण के लिए आज्ञा दी। ब्रह्माजी के ध्यान करने पर शिवजी ने उन्हें षडंग सहित वेद प्रदान किए। फिर ब्रह्माजी के निवेदन करने पर शिवजी ने महाकाल वन में निवास करना स्वीकार किया।
अवन्तिका नगरी की विशेषता यह है कि यहाँ पर पाँच वस्तुएं एक ही स्थान पर विद्यमान हैं जो अत्यत दुर्लभ हैं। जैसे श्मशान, उषर, क्षेत्र, पीठ और वन।
श्मशानम्षरं क्षेत्रं पीठं तु वनमेव च।
पंचचैक न विद्यन्ते महाकलपुरादृते।।
भारत के नाभिस्थल में कर्क रेखा पर स्थित महाकाल का वर्णन रामायण, महाभारत, पुराण तथा संस्कृत के अनेक काव्यो में किया गया है। धार के राजा भोज के पुत्र उदयादित्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उसका शिलालेख ऊपर की दूसरी मंजिल पर लगा है। मंदिर के तल मंजिल पर महाकाल का विशाल शिवलिंग है। सामान्यता शिवलिंग की जलाधारी का मुख उत्तर की ओर होता है परन्तु महाकाल की जलाधारी का मुख पूर्व में है। पूजा के सभी पात्र तथा गणेश, पार्वती तथा कार्तिकेय की मूर्तियां चाँदी की हैं। प्रांगण में पहली मंजिल पर ओंकारेश्वर तथा दूसरी मंजिल पर नागचन्द्रेश्वर की मूर्तियां हैं।
महाकाल मन्दिर के परिसर में वृद्ध महाकालेश्वर, अनादिकल्पेश्वर, सप्त ऋषि, नीलकण्ठेश्वर, बाल हनुमान, बृहस्पतिश्वर आदि देवताओं के मन्दिर हैं। चौरासी महादेव में से 5 अनादिकल्पेश्वर, 7 त्रिविष्टपेश्वर, 12 चन्द्रादित्येश्वर और 60 स्वप्नेश्वर महाकाल परिसर में ही हैं।
विशालकाय गणेश जी की मूर्ति के आस-पास ऋद्धि-सिद्धि देवियां हाथ जोडे़ प्रार्थना कर रही हैं। चरण में मूषक लड्डू को पकड़े हुए है। यहीं पर पंचमुखी हनुमान जी की भी प्रतिमा सबसे सुन्दर और आकर्षक है।
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