





जब केदारनाथ के पीछे शंकराचार्य का देहावसान होने को था, तो उस समय उनका सिर अपने शिष्य हरि की गोद में था और हरि अत्यंत भाव विह्नल हो रहा था, उसने कहा- ‘गुरुदेव’ आपने 32 वर्ष की अवस्था में 3200 वर्षों का काम कर दिया है, बहुत छोटी सी आयु में आप जा रहे हैं, यह हमारे लिए बहुत दुःखदायक है, हम नहीं समझ सकते कि हम क्या करेंगे, क्या होगा? तब शंकराचार्य ने एक श्लोक की रचना की जो अंतिम श्लोक था।
दीर्घ प्रभातं अंतरवदैवं अग्निज्ज्वलां पूर्ण मदैव सिन्धुं।
शीर्षस्थ पूर्ण भवतं वदैन्यं, श्रीयं श्रीयत्वं भवतां वदैव।।
उन्होंने अपने संस्कृत पाण्डित्य से हटकर के आने वाली पीढि़यों के लिए और अपने शिष्यों के लिए यह श्लोक लिखा था। इस श्लोक में कोई पाण्डित्य नहीं है। इस श्लोक में शिष्यों के प्रति एक सार भूत तथ्य है, जो उन्होंने समझाया है। उन्होंने कहा है कि जीवन वह होता है जो शीर्षस्थ बिन्दु पर पहुंचा हुआ होता है और वह शीर्षस्थ बिन्दु उसको कहते हैं, जो कि इस जीवन में आप पूर्ण यश के भागी बन सकें और मृत्यु के उपरान्त भी आप यश के भागी बने ही रहें, वह जीवन कहलाता है, बाकी तो मृत्यु कहलाती है। आप जीवित हैं, और कल समाप्त हो गये, यह शीर्षस्थ व्यक्तित्व नहीं है। शरीर तो सबको बराबर दिया है, मगर जीवन काल में यश प्राप्त कर लेना, सम्मान प्राप्त कर लेना, प्रसिद्धि प्राप्त कर लेना, मन में प्रसन्नता प्राप्त कर लेना और मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की सुगंध चारों तरफ व्याप्त रहे, वह शीर्षस्थ व्यक्तित्व है। और हरि तुम्हें ऐसा बनना है, कि मृत्यु के बाद भी तुम्हारी सुगंध चारों तरफ व्याप्त रहे। 32 वर्ष की कोई अवस्था नहीं होती, आदमी पूरी तरह से पांव पर खड़ा ही नहीं होता। उस छोटे से काल में ही दक्षिण केरल में पैदा हुए एक लड़के ने पूरे भारत वर्ष का भ्रमण कर, शंकर भाष्य जैसे अद्वितीय ग्रंथ लिखें, यह सुगंध व्याप्त की, कि मृत्यु के उपरान्त भी आज तक उसकी सुगन्ध हमारे प्राणों में, हृदय में संचरित है इसलिए कि उन्होंने जीवन का अर्थ अपने ढंग से समझा।
96 प्रतिशत लोग जीवन का अर्थ उन्नति समझते हैं, कि हमारा प्रमोशन हो गया, कि हम अच्छे स्टेनो बन बए, अच्छे टाइपिस्ट बन गए, या अच्छी नौकरी कर ली, बैंक में क्लर्क बन गए। अगर तुम बैंक में नौकरी करते हो, तो इस प्रकारा पांच लाख लोग है जो बैंक में नौकरी करते हैं। यदि तुम स्टेनो हो तो 25 लाख लोग है, जो स्टेनो का काम करते हैं, तुम लखपति हो तो इस मुहल्ले में कोई घर ऐसा नहीं है, जो लखपति नहीं है एक एक कोठी डेढ़ करोड़ की होगी। तो यह शीर्षस्थ व्यक्तित्व नहीं है। शीर्षस्थ व्यक्तित्व तो वह होता है, जो ऊंचा भाल लिये गतिशील होता है, पहला सूत्र शंकर ने यही दिया कि शीर्षस्थ व्यक्तित्व होना चाहिए और उसके लिए यह आवश्यक है कि उन किरणों को जिन्हें प्रज्ञा किरणें कहते हैं और जो सूर्योदय से पहले प्राप्त होती है। उनको हम अपने नथुनों में भरें, तो दिन भर हम निश्चय ही तरोताजा बने रहते हैं, प्राणों में संचार बना रहता है और हमें एक उत्तम कोटि की युक्ति, उत्तम कोटि का ज्ञान, उत्तम कोटि का चिन्तन प्राप्त होता रहता है। यह चिन्तन, यह ज्ञान, यह ध्यान हमें स्कूलों में पढ़ाई करने पर नहीं मिलता है।
ऊर्जा जो अन्दर प्रवाहित होती है वह तो एक अद्भूत ऊर्जा होती है, वह एक ज्वाला होती है, जो निरन्तर कार्य करने के लिए तत्पर रहती है। और जो निरन्तर कार्य करता है वह जीवित व्यक्तित्व है क्योंकि प्रमाद, अपने आप में मृत्यु का पर्याय है। पाणिनी के संस्कृत के शब्दकोश में भी प्रमाद का अर्थ मृत्यु है। प्रमाद का मतलब है आलस्य और जो आलस्य से युक्त है वह अपने आप में उतने समय के लिए मर जाता है। निद्रा अलग है, प्रमाद अलग है इसलिए प्रातः काल उठने वाले का दिन एक अलग ढ़ंग से व्यतीत होता है, और सूर्योदय के बाद में उठने वाले का दिन एक बिल्कुल अलग ढंग से व्यतीत होता है जो उसकी अपेक्षा कई गुना नीचे स्तर का होता है।
इस श्लोक में दूसरा सूत्र उन्होंने दिया है, कि आंतरिक ऊर्जा बाहर से प्राप्त नहीं होती। इसके माध्यम से ही व्यक्ति में हिम्मत और चेतना, लगन और अध्ययन और अपने पूर्ण रूप से समर्पित करने की कला आती है। ऐसा व्यक्ति समाप्त नहीं होता। डेल कारनेगी ने 88 वर्ष की अवस्था मे लेखन कार्य प्रारम्भ किया, लिखना शुरु किया। और उन्होंने पांच-छः किताबे लिखी जो आज करोड़ों की संख्या में बिकती है। जब जापान के युद्ध से इंग्लैण्ड जर्जर हो गया और पर्ल हॉर्बर पर बम गिरा तो सारे इंग्लैण्ड के लोग पराजित, अपमानित और असहाय या महसूस करने लगे, उस समय 92 साल के चर्चिल खड़े हुये, प्रधानमंत्री बने और उन्होंने इंग्लैण्ड को वापस ताकतवान और जीवनवान बना दिया। आज का व्यक्ति तो सोच भी नहीं सकता, कि मैं 92 वर्ष तक जीवित रह भी पाऊंगा, मगर सारे इंग्लैण्ड वासी कहने लगे कि एक केवल चर्चिल हैं, जिसमें हिम्मत और हौसला है और वह वापस इंग्लैण्ड को पैरों पर खड़ा कर सकता है, सम्मान दिला सकता है। चर्चिल की जीवनी भी आप पढ़े तो उसने कहा है, कि प्रारम्भ से ही मेरे अध्यापक ने मुझे समझाया था कि मेरे अन्दर की ऊर्जा समाप्त नहीं हो सकती। अन्दर की ऊर्जा जीवन की श्रेष्ठता है, इसीलिए यहां बैठा आज चर्चिल का नाम भी याद कर रहा हूं, शंकराचार्य का नाम भी याद कर रहा हूं। फ्रांस का डी गॉल 90 साल का था, जब रूस ने फ्रांस पर आक्रमण किया। और फ्रांस बुरी तरह से टूट चुका था, समाप्त हो चुका था। इधर ब्रिटेन ने उस पर आक्रमण कर दिया और डी गॉल उस समय में भी सीना तान कर खड़ा हो गया कि फ्रांस को वापिस जीवित करके दिखा दूंगा। आप कल्पना करिये कि 90 साल का व्यक्ति और वह सीना ठोक कर कहता है मैं फ्रांस और पूरे देश को जीवित जाग्रत करके दिखा दूंगा और उसने करके दिखा दिया। फ्रांस पांच बड़ी शक्तियों में से एक है और उसमें सबसे बड़ा योगदान उस डी गॉल का हैं।
उनके सामने भी चुनौतियां आई होगी, मगर उनमें एक आतरिक ऊर्जा थी, एक आंतरिक चेतना थी। यह आंतरिक चेतना व्यक्ति में स्वयं पैदा होती है, इसके लिए बाहर से कोई चिंगारी प्राप्त नहीं होती। वह तो एक अध्ययन से होती है, एक आत्म चिन्तन से होती है, प्रमाद रहितता से होती है, आलस्य रहितता से होती है। शंकराचार्य ने कहा जीवन को शीर्षस्थ बनाने के लिए 12 सूत्र आवश्यक है और 12 सूत्रों के माध्यम से एक बढ़ई का बेटा लिंकन राष्ट्रपति बन सकता है, जिसने जिन्दगी भर लकडि़यां छीली, जिसने सोचा भी नहीं होगा, परन्तु लगन थी, एक आग थी, एक काम करने की धुन थी, प्रमाद नहीं था। शंकराचार्य ने कहा कि जीवन का श्रेष्ठतम् समय, या श्रेष्ठतम् क्षण वह होता है जब आप मुस्कुराते हैं। यह छोटी सी बात मेरी समझ में काफी देर तक नहीं आई थी कि शंकराचार्य जैसे व्यक्तित्व ने इस प्रकार के हल्के शब्दों का प्रयोग क्यों किया?
विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मतिः।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम्।।
उन्होंने कहा कि जब आप मुस्कुराते हैं तो आसपास का सारा वातावरण मुस्कुराते लग जाता है, और जब आप उदास होते हैं, तो आसपास का सारा वातावरण भी उदास हो जाता है, आपके सामीप्य में कोई आता है वह भी अपने आप में उदास हो जाता है और एक प्रकार से आपने उस दूसरे व्यक्ति की ऊर्जा को समाप्त किया, उसमें प्रसन्नता की जो लहर थी वह आपने समाप्त कर दी, क्योंकि चेहरे पर प्रसन्नता नहीं थी, मुस्कुराहट नहीं थी। और मुस्कुराहट कहीं से खरीदी नहीं जा सकती, मुस्कुराहट ही अपने आप में आंतरिक ऊर्जा पैदा करती है, प्रतिक्षण मुस्कुराने वाला व्यक्ति मर ही नहीं सकता, सम्भव ही नहीं है, उसको आलस्य आ ही नहीं सकता, कुछ समय तक जरूर वह मुस्कराना भूल सकता है, मगर धीरे-धीरे अभ्यास करने पर वह प्रत्येक कार्य को और कठिन से कठिन कार्य को भी मुस्कराहट के साथ पूरा कर लेता है।
जिसके पास मुस्कराहट है, उसके लिए असम्भव जैसी कोई चीज होती ही नहीं, वह यह नहीं कह सकता कि यह नहीं हो सकता, क्योंकि उसके अन्दर एक ऊर्जा पैदा होती है, ऊर्जा मुस्कराहट के माध्यम से पैदा होती है। यदि आपमें मुस्कराहट और हंसी है तो यह अपने आप में चेतना पैदा करती है। मैंने उदाहरण दिया डेलर कारनेगी का। उसने एक किताब लिखी ‘हाउ टू विन ए फ्रेंड’ यह आज की सही अर्थों में श्रीमद्भगवतगीता है। गीता का जो सार है, उससे भी उत्तम कोटि की किताब है। अर्थात दूसरों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, दूसरों को कैसे मित्र बना सकते हैं? उसने कहा- दूसरों को मित्र बनाने की कला दो बातों में छिपी है, पहली बात कि आपके चेहरे पर प्रति क्षण मुस्कराहट है, चाहे अन्दर से आप तकलीफ में हैं, तनाव में है और आसपास के वातावरण में जो जहर घुला हुआ है ही, मगर डेल कारनेगी कह रहा है आपके पास क्या है? उस वातावरण में भी अगर सांस लेकर के आपके पास मुस्कुराते है तो आप आसपास के दस गज के एरिए को वायुमण्डल को, बिल्कुल ऊर्जावान बना देते हैं, और जो आपके सम्पर्क में आता है वह भी ऊर्जावान बन जाता है।
उसने कहा यह दूसरों को प्रभावित करने की श्रेष्ठतम् कला है, आप किसी से मिलने जाएं और मरे हुए चेहरे से जाकर मिलें तो आपका आधा काम होगा ही नहीं, आप जो कहेंगे वह काम ही नहीं होगा और आप मुस्कुराहट के साथ जाएं तो काम होगा और अवश्य होगा। आपको तकलीफ है, वेदना है, पेट में तकलीफ है, आपको घाव लगा वह तो है ही, वह सहन करने की क्षमता आपमें है आपमें, मगर आपके चेहरे पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। उसने कहा फि दुनिया को जीत कैसे सकते हैं आप। आप मुस्कराहट के साथ बात करेंगे तो सामने वाले के लिए भी प्रफुल्लित वातावरण बनेगा और उस प्रफुल्लित वातावरण में वह भी कहेगा आइये, बैठिये, क्या बात है, कहां से आये हैं आप?
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
सर्वेऽत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।
और आप मरे हुए से कहेंगे कि मैं वहां से आया हूं, यह मेरी एप्लीकेशन है तो वह कहेगा-ठीक है, ठीक है रख जाओ, बाद में देख लेंगे। आप ऊर्जायुक्त व्यक्तित्व नहीं बने। आपकी मुस्कुराहट आपको तो तरोताजा रखती ही है, आप बीमार नहीं बन सकते, आसपास के लोगों को भी ऊर्जावान बनाए रखती है। यह जीवन का दूसरा सूत्र है। और ये दोनों सूत्र बता रहा हूं जो केवल शब्द नहीं है, ये पूरे जीवन के अध्याय हैं।
ये जो 12 सूत्र दिए शंकराचार्य ने, ये पूरे जीवन का एक-एक अध्याय है, पूरा जीवन इनमें समेटा हुआ है। और इन्हीं में से कुछ सूत्र लेकर डेल कारनेगी ने वह किताब लिखी और आज वह कई करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी है। आप कभी उस किताब को पढ़ें, पढें तो देखेंगे कि उसको पढ़कर ही ऊर्जावान बन जाते हैं। व्यक्तियों को आकर्षित कैसे किया जाता है, सम्मोहन कैसे किया जाता है, आपके चेहरे पर आकर्षण कैसे आ सकता है और किसी को भी अपने प्रभाव में कैसे ले सकते हैं? उसके लिए उसने कहा कि एक मात्र सूत्र निश्छल मुस्कराहट है, एक नकली मुस्कराहट नहीं है। हरदम आप मुस्कराते हुए रहे और मुस्कराते हुए बातचीत करें, सामने वाला अपने आप ही प्रभावित होगा ही। आपका उदास चेहरा आपको डुबाता है, आपके आसपास के वातावरण को भी डुबो देता है।
तीसरा शंकराचार्य ने कहा जीवन की केवल दो धुरियां हैं, एक धुरी आलोचना है, एक धुरी प्रशंसा है। आपके पास दो ही चीजें हैं, या तो आप दूसरों की गलतियों को निकालने वाले हैं, या फिर आप दूसरों की प्रशंसा करने वाले हैं। यह आपकी ऊर्जा, यह आपकी चेतना आपको इस बात के लिए बाध्य करेगी कि आप क्या करते हैं?
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एवं च।
निर्ममो निरहकारः समदुःखसुखः क्षमी।।
सन्तुष्ट सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्भक्त: स मे प्रियः।।
एक व्यक्ति दूसरों में कमियां ढूंढता रहता है, इसमें गलती क्या है, इसको डाउन कैसे करें, इसको परास्त कैसे करें, किस ढंग से इसको हम डाउनफॉल करें- एक व्यक्ति ऐसा सोचता है। और ऐसा व्यक्ति स्वयं दुःखी होता है, दूसरों को भी दुःखी कर देता है। एक व्यक्ति दूसरों में सुधार या गुण ढूंढता रहता है। प्रत्येक व्यक्ति के गुण-अवगुणों का सम्मिलन होता ही है। कोई सर्वांग गुणवान नहीं होता, कोई सर्वांग अवगुणी वान भी नहीं होता। गुणी भी होते हैं, अवगुणी भी होते हैं। हम क्या करते हैं, कि अपने चश्मे में देखते हैं, हम देखते हैं, कि यह सफेद कपड़ा नहीं पहनता इसलिए इसमें गुण नहीं है, अच्छा नहीं है, यह टोपी पहन रखी हैं, यह पागल है, टोपी क्यों पहन रखी है, यह कैसे चलता है, ठीक नहीं है।
यह आप अपने तरीके से देखते हैं, क्योंकि आप दूसरे तरीके से चल रहे हैं। आप गुण भी देख सकते हैं कि उसके चलने की क्रिया क्या है? उसकी बात करने की टकनीक क्या है? किस तरीके से बात करता है? पिकासो एक बहुत बड़ा चित्रकार हुआ है और आप विश्वास नहीं करेंगे कि इस समय उसके चित्र 30 करोड़, 40 करोड़ और 45 करोड़ डॉलर में बिकता है। प्रारम्भ में उसने जब पहला चित्र बनाया, पेरिस मे उसने चित्र बनाकर के शहर के बीचोबीच रख दिया और नीचे लिख दिया कि इस चित्र में जो भी गलतियां हों, उनके ऊपर क्रॉस कर दें, जिससे कि मैं दूसरी बार कोई चित्र बनाऊं तो अच्छा बना सकूं। शाम को वह चित्र के लिए आया तो दिख ही नहीं रहा था- क्रॉस ही क्रॉस दिख रहे थे। किसी ने मुंह पर क्रॉस बना दिया, किसी ने आंख पर क्रॉस बना दिया, कि यह आंख थोड़ी भैंगी है, यह थोड़ी तिरछी है। किसी को तिरछी आंख अच्छी लग रही थी। किसी ने कहा हाथ थोड़ा लम्बा है- वहां क्रॉस लगा दिया।
पिकासो बहुत दुःखी हो गया, उसने कहा में तो चित्रकार जिन्दगी में बन ही नहीं सकता, उसने वापस उस चित्र को थोड़ा धोया क्योंकि चित्र तो कलर से बना था और लोगों ने पेन्सिल से या कोयले से क्रॉस किया था। उस चित्र को दूसरे दिन वापस वहीं रखा- नीचे लिख दिया कि कृपा आप इस चित्र में सुधार कर लें। यह नहीं लिखा कि गलतियां निकालें। तो किसी ने होठों को ठीक कर दिया, किसी ने आंख को ठीक कर दिया वह चित्र जो पिकासो ने बनाया था, उससे बढिया चित्र बन गया।
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः।।
अब आदमी को आप किस प्रकार लेते हैं, यह आप पर निर्भर है। अगर उसको यह प्रेरित करते हैं कि गलतियां निकाले, तो आदमी गलतियां निकालने लग जाता है। आप मुझमें गलतियां निकालना चाहें, तो दो सौ गलतियां निकाल सकते हैं। मगर मुझमें दस गुण भी होंगे। आपमें, प्रत्येक में क्या गुण है वह आपको भी ज्ञान नहीं है, दूसरा आपको बता सकता है, कि तुममें यह गुण है, तुम ऐसा कर सकते हो और हिम्मत के साथ आप ऐसा कर लेंगे। मैं कह रहा हूं 92 साल का चर्चिल इंग्लैण्ड को सम्भाल सकता है, 90 साल का डी गॉल फ्रांस को वापस खड़ा कर सकता है, आहलूवालिया जो मेजर जनरल था, उसने निश्चय किया कि मैं हिमालय को सर्वोच्च चोटी पर पहुंचूंगा। लोगों ने खिल्ली उड़ाई तुम्हारी एक टांग टूटी हुई है, लकड़ी की है, तुम एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने की सोच रहे हो, पागल हो, दिमाग खराब है तुम्हारा। उसने कहा- दिमाग खराब है ही नहीं, मेरे अन्दर ऊर्जा है और मैं निश्चिन्त रूप से पहुंचकर दिख दूंगा आपको। और वह एक टांग के सहारे एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच गया। मिहिरसेन केवल 12 साल के थे और उसने कहा मैं इंग्लिश चैनल को पार करूंगा, तैर कर इंग्लिश चैनल पार करना सबसे कठिन है। लोगों ने उसके बाप को कहा- यह पागल है, तुम थोड़ा समझाओ। लड़के ने कहा- मुझे मालूम है कि मुझमें क्या क्षमता है। बाप ने भी कहा- मैं अपने बेटे की ऊर्जा समझता हूं, अगर मैं फेकूंगा नहीं समुद्र में तो तैरना सीखेगा भी क्या, क्या अपने आप में ऊंचा उठेगा और लोगों के होठों पर नाम क्या बनेगा, उच्च से उच्च कोटि का फिर बनेगा कैसे? इस में गुण है यह, मालूम है मुझे। और उसने कहा- मिहिर सेन तुम जाओ। व्हेल मछलियां खा जाएंगी, तुम डूब जाओगे, कोई बात नहीं, मेरे दो बेटे हैं, मैं समझूंगा कि मेरा एक बेटा चला गया। और तुम जिन्दा रह गए तो आने वाली पीढि़यां भी तुम्हें याद करेगी कि मिहिरसेन नाम का कोई व्यक्ति था। और 12 साल की उम्र में उसने इग्लिश चैनल को पार किया। 62 मील चौड़ी है जो इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच में है और वह गया भी और वापस भी आया। इंग्लिश चैनल को पार किया जबकि उसमें लहरें 80-80 फुट की थी, बहुत कठिन है, इंग्लिश चैनल को पार करना। इसके बाद तो कई लोगों ने पार किया।
12 साल का लड़का ऐसा क्यों कर सका? ऐसा कि बाप ने कहा यह गुण है, उसको खुद को मालूम नहीं था, कि मुझमें यह गुण है आपमें भी 80 दुर्गुण हो सकते हैं, मगर 20 ऐसे भी गुण होंगे जो आपको मालूम नहीं है, कि कैसे विकास कर सकते हैं। उन गुणों का अगर विकास करें, तो वे जो दुर्गुण है, न्यूनताएं है, उदास रहना, आलोचना करना, डरना, घबराना, भयभीत होना, कोई क्या कहेगा, सब हम पर हावी है हम क्या करें- यह जो डर है वे तुम्हें पूरा डुबो देता हैं। जब आप निर्भय हैं, निश्चिन्त हैं तो दूसरा तुम्हारा कुछ बिगाड़ ही नहीं सकता, संसार भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता तुम्हारा, पर अगर तुम्हारे मन में भी भय है कि गुरु मेरे हैं नहीं, तो गुरु होंगे भी कैसे? जब गुरु तुम्हें कह रहे हैं, कि तुम निश्चित रहो, तुम्हारे साथ मैं हूं, कोई व्यक्ति तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता, सम्भव ही नहीं हैं, हिम्मत और हौसला तुममें होना चाहिए, पुरुषार्थ तुममें होना चाहिये, मगर तुम्हें आलोचक नहीं होना चाहिए।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्ध कालेनात्मनि विन्दति।।
किसी भी व्यक्ति में गुण भी होंगे, उन गुणों को आप देखिये, और जब गुण देख लेंगे, तो मुस्कुराहट के साथ बात कीजिये। और यह बातचीत कीजिये कि दूसरे के मन पर सीधा प्रभाव हो, डेल कारनेगी ने कहा कि मुझे मकान किराये पर लेना था और एक बुढि़या का मकान मुझे पसन्द आया क्योंकि कम पैसों का था- पैसे भी मेरे पास कम थे। मकान में मैं रहना चाहता था, बुढि़या अकेली थी और बुढिया झगडालू बहुत थी, लड़ाई-झगड़ा ही करती थी, 24 घण्टे फूल भी छांटती तो फूलों को गालियां देती रहती, टहनियों को गालियां देती रहती, उसका काम ही यही था, आलोचना करना, गालियां देना, बस! उसने सोचा- इस औरत से कैसे निबटूं। एक बार तो डरते हुए कहा तो, उसने डांट कर भगा दिया। पर उसने सोचा- मुझे रहना तो इसी में है। अगर डेल कारनेगी हूं तो इसी मकान में पेइंग गेस्ट रहूंगा, बिना पैसे दिये रहूंगा, क्योंकि बुढि़या मरेगी तो मकान मुझे मिल जायेगा- पश्चिम वाला तो पश्चिम वाले के हिसाब से सोचता है। उसने अपने आप से कहा- बुढि़या चुडैल है पक्की। फाटक से अन्दर घुसने से पहले आठ तो गालियां बोलती है। फिर उसने सोचा-गालियां देती है, पर कोई गुण जरूर होगा इसके पास, ऐसा हो ही नहीं सकता। मैं गुण ढूंढ़ नहीं पाया, जिस दिन गुण ढूंढ़ लूंगा उस दिन हो जायेगा काम।
डेल करनेगी आस पास रोज घूमता रहा, अन्दर जाने की हिम्मत कर नहीं पाया, एक बार और प्रयास किया तो दूसरी बार भी फटकार मिली। पांच-सात दिन बाद उसने फिर फाटक खोली तो बुढि़या ने कहा- क्या कर रहे हो? सुबह रोज वहा दो घंटे फूलों की क्यारियों को ठीक करती थी, कोई काम तो था नहीं। डेल करनेगी नक कहा- आप मुझे अन्दर आने दीजिये, फिर चाहे धक्के मारिये, आपके पास खुरपी है, उसे मेरी खोपड़ी पर मार दीजिये, मगर पहले अन्दर आने दीजिये, बात करने दीजिये।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
बुढि़या ने कहा- अच्छा, अच्छा, लो मरो! उसने फाटक खोल दिया। डेल ने कहा आप 50 साल की है, जबकि वह 80 साल की थी। उसने कहा- मैं 50 साल की दिखती हूं? उसने कहा- 45-50 के बीच की दिखती हैं आप। अब 90 साल की बुढि़या को कोई 45 साल की कहे तो खुश तो होगी वह, नाराज तो हो ही नहीं सकती। उसने कहा- नहीं मैं नब्बे साल की हूं। आप नब्बे साल की दिखती नहीं है। मगर आप कहती होगी तो जरूर होंगी, झूठ तो आप बोल नहीं सकती, सम्भव नहीं है, मगर दिखती आप पैंतालिस, ज्यादा से ज्यादा आप पचास की। उसने कहा- तुम कहां से आये हो? वह बोला- कहां से आया हूं। मेरा तो कोई है नहीं आसरा, मैं धर्मशाला में ठहरा हुआ हूं, मगर आपको फूलों से बहुत प्रेम हैं, यह बात देखी है। वह तो मैं बचपन से मैं फूलों से बहुत प्यार करती हूं । उसने कहा- जो फूलों से प्रेम करता है, उसके मन में दया ही दया होती है। वह बोली- मैं बहुत दयालु हूं, मगर लोग बहुत दुष्ट जालिम हैं, बहुत बदमाश हैं, अड़ोसी-पड़ोसी बहुत गंदे हैं। उसने कहा-निश्चय ही हैं, मगर फूलों से प्रेम करने वाले के हृदय में दया के अलावा कुछ होता ही नहीं और यह बात मैंने देखी है कि आपके हृदय में दया ही दया है। यह बात निश्चित है। वह बोली- मैंने कुत्तों को भी कभी डण्डी नहीं मारी, फूलों को भी देखो छीलती हूं तो बहुत ढंग से छीलती हूं। इतनी सी बात करके उसने कहा- मैं जाता हूं। अच्छा बेटा! कल फिर आना तू!’
आप कहती है, तो आ जाऊंगा। और वह चला गया। दूसरे दिन फिर आया और कहा- लाओ मैं थोड़ा मिट्टी ठीक कर दूं। उसने कहा- ‘ नहीं, नहीं, तुम नहीं करोगे। वह बोला- ‘आप कहती है तो नही करता, मगर मैं सीखूंगा कैसे? आपसे ही तो सीखूंगा। यह गुण आपमें है, मुझमें तो है नहीं ऐसा। आपको देखूंगा तो मैं भी फूलों से प्यार करना सीखूंगा। प्यार करना सीखूंगा तो मुझे मालूम पड़ेगा कि मुस्कुराहट क्या होती है फिर मालूम पडे़गा कि आप 90 साल की होकर भी 45 साल की कैसे दिखती है। आप यह ज्ञान, यह गुण मुझे दीजिये, मुझे सिखाइये थोड़ा।’ ऐसी झगड़ालू स्त्री के घर में आकर वह रह ही गया। कैसे रह गया? उसने बातचीत वहां से शुरु की जहां से बुढि़या को पसन्द थी। आप बातचीत वहां से शुरु की करते हैं, जो आपको पसन्द है, बस दुर्गुण यही है। आप कहते हैं- मैं ऐसा हूं, मैं ऐसा हूं। सब कहते हैं- इसको रवाना करो, अफसर कहते हैं बस करो, अब जाओ।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरूचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।
बातचीत हमेश दूसरों के हित से पैदा की जाती है। दूसरों के गुण क्या हैं? वह क्या चाहता है? किसी ढंग से बातचीत करना चाहता हैं? क्रोध को भी आप अपनी मुस्कुराहट से अपनी बातचीत से नियंत्रित कर सकते हैं। शंकराचार्य भी यही कहते हैं। और ऐसा तब हो सकता है, जब आप निर्भय होते हैं। शंकर ने 12 सूत्र दिये थे, पहला प्रातःकाल जल्दी उठने की क्रिया। कभी आप दस बजे उठकर आप देखें, एक दिन टेस्ट तो करें और एक दिन टेस्ट तो करें कि आप पांच बजे उठकर तो देखें। देखिये दिन भर आपका कैसे बीता और वह दिन कैसा बीता। आप खुद टेस्ट करके देखिये, क्योंकि वह ऊर्जा बिल्कुल एक अलग चीज है। ऊर्जाहीन व्यक्ति तो 95 प्रतिशत हैं ही, जिनमें ऊर्जा नहीं है, हिम्मत नहीं है, हौंसला नहीं है, काम करने की धुन नहीं है, लगन नहीं है, प्रमाद है, वे जीवन को भार समझते हैं, 5 प्रतिशत व्यक्तित्व ऐसे होते हैं तो ऊर्जावान हैं, जो कहते हैं ‘मैं कर सकता हूं।’
आहलूवालिया कह सकता है कि मैं एक टांग के सहारे एवरेस्ट पर पहुंच सकता हूं, मिहिरसेन कह सकता है 12 साल की उम्र में कि मैं इंग्लिश चैलन पार कर दूंगा। चर्चिल कह सकता है कि मुझमें हिम्मत है, 90 साल का हूं तो भी जवान हूं, मैं इंग्लैण्ड को वापस खड़ा कर दूंगा। ये सब उदाहरण हमारे सामने हैं।
समोऽहं सर्वभुतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।
मगर निर्भीक का मतलब यह नहीं कि आप आक्रमक हो, आक्रमक होना ठीक नहीं है, निर्भीक होने का मतलब है, कि जो भी गलती कर दी, हो गई। ये दो टूक कह दें, कि मैं ठीक के लिए कर रहा था, हो गई गलती। आप अगर एक झूठ बोलेंगे तो उस झूठ को छिपाने के लिए दूसरा झूठ बोलना पड़ेगा और सामने वाला आपसे ज्यादा अनुभव हो तो वह प्रश्न करेगा और आपको तीसरा झूठ बोलना पड़ेगा और ऊर्जा आपकी समाप्त हो जायेगी। पहली बार में ही कह दिया गलती हो गई तो उसमें आपकी ऊर्जा भी बची रही, सामने वाले के मन में भी आया कि यह आदमी बिल्कुल विश्वासपात्र और खरा है, सही है, अपनी बात को दो टूक कहने वाला है, इस पर भरोसा किया जा सकता है, यह प्रमाद रहित है, दिन भर काम करने की क्षमता रखता है। आपको कहीं सामान पहुंचाना है, और गाड़ी है, उस पर सामान लदा हुआ है और आप है कि गाड़ी से 50 फिट दूर जाकर खड़े हो जाते हैं, आप सोचते है कि कोई चैक करेगा अपन क्यों झंझट में पड़ें, दूर ही खड़े हो जाते हैं। ऐसा है तो आपके जैसा कोई कायर और बुजदिल व्यक्ति नहीं है- चाहे आप 50 साल के हों या 60 साल के हो। उस समय तो तन कर खड़ा होना चाहिये, कोई आप चरस, गांजा, अफीम नहीं ले जा रहे, कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं, पर आप कायर हैं, बुजदिल है यह बात अन्दर से दो टूक स्पष्ट है।
आप तनकर खड़े होइये, कहिये चैक कीजिये इसमें क्या है, लाइये मैं खोल कर दिखाता हूं। आपकी निर्भीकता से दूसरा अपने आप ठण्डा पड़ जायेगा क्योंकि उसमें कुछ गलत है नहीं। आप गलत काम नहीं कर रहे हैं, तो आपको तकलीफ में होने की जरूरत है ही नहीं। आप गलत काम नहीं कर रहे हैं, तो आपको तकलीफ में होने की जरूरत है ही नहीं। पर कायर व्यक्ति 40 फीट दूर खड़ा होता है, देखता है कि वापस गाड़ी रवाना होगी तो मैं बैठ जाऊंगा। इससे ज्यादा कायरता नहीं हो सकती। आपका काम है सामान ले जाना और डरते-डरते ले जायें, इससे ज्यादा घटियापान नहीं हो सकता।
एष में सर्वधार्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्तरः सदा।।
क्यों डरते हैं आप? डरते इसलिये हैं कि अन्दर भीरूता है, कमजोरी है, बुजदिली है, निम्नता है। ऐसा व्यक्ति जिन्दगी में केवल बचाव जानता है, वह आक्रमण नहीं कर सकता और जिन्दगी में वह एक मामूली आदमी बनकर मर जाता है। आप जीवन में शीर्षस्थ व्यक्ति बनना चाहते हैं, तो भय के आधार पर नहीं बन सकते। 89 साल की उम्र में भी डेल कारनेगी ने किताबें लिखी और करोड़ों की संख्या मे बिकी, 89 साल की उम्र में पहली बार लिखी। क्योंकि किसी ने कहा कि तुम लिख सकते हो, तुममें लिखने का गुण है, बाकी दुर्गुण और होंगे पर यह गुण है कि बहुत अच्छे राइटर तुम बन सकते हो। उसने लिखना शुरू किया डरते-डरते कि कैसे में लिखूंगा, आज तक लिखा ही नहीं, कभी एक लाइन भी नहीं लिखी, लिखूंगा कैसे? पड़ोसी ने कहा- मुझे मालूम है तुम्हारे गुण, तुम इतना अच्छा बोलते हो, जो बोलते हो, वही लिख लो बस, जो तुम बात करते हो उसे टाइप कर लो, उसे ज्यो का त्यों लिख दो, और आपकी किताब में छपवा दूंगा। ‘हाउ टू विन ए फ्रेंड’ इसी प्रकार से लिखी गई। उसने कहा मैं नहीं लिख सकता, उसने कहा कोई बात नहीं, तुम मुझसे जो बात करते हो, तो मैं तुमसे प्रभावित होता हूं। तुम दूसरों को प्रभावित कर सकते हो, जो बोलते हो उसको टाइप कर लो या कागज पर लिख दो। तुम्हें अपने आपसे उसमें कुछ जोड़ना नहीं है। जो वह बोलता था वही टाइप करता गया और फिर डरते-डरते वह किताब उस पड़ोसी को दी कि देख भई यह तो ऐसे हुआ। उसने कहा- इस किताब को छपवा देते हैं। उसने कम्पनी में दी और आज वह किताब कई लाख नहीं, कई करोड़ बिक गई है।
आपकी ऊर्जा क्या हैं। आपमें क्या प्रतिभा छिपी हुई है, वह दूसरा ज्ञात कर सकता है, आपमें से। ये चार गुण हुए सबसे पहला यह कि प्रातः कालीन उस ऊर्जा को प्राप्त करने की क्रिया होनी चाहिये, आलस्य छोड़ कर खड़े होने की क्रिया होनी चाहिये, यह सबसे बड़ा गुण है, क्वालिटी है, भले ही आपको मालूम न पड़े कि ऊर्जा आपको किस समय, कितना ऊंचा उठायेगी। आपको भले ही मालूम न पड़े परन्तु समाज में जब आप जायेंगे तो लोगों को एहसास होगा, या जब 90 साल के बनेंगे तो मालूम पड़ेगा कि वह ऊर्जा बचपन की हो जो मेरे काम आई है। मां-बाप के संस्कार आज भी आपके काम आयेंगे, बाप समझदार हैं तो वह समझदारी आपमें रहेगी, बाप गम्भीर है तो गम्भीरता आपमें अपने आप आयेगी, आप प्रातः काल उठते हैं, तो आप पूरे दिन चार्ज हो जाते हैं। सांस एक अलग ढंग से लेते हैं, चार्ज एक अलग ढंग से होते हैं। दूसरा सूत्र हैं, कि आप मुस्कुराते रहें। जब आप मुस्कुरायेंगे तो आसपास में वातावरण को भी मुस्कुराहट से भर देंगे। आप मुझसे मिलेंगे तो हंसते मिलेंगे तो मैं भी आपके पास दो मिनट बैठने की इच्छा रखूंगा। आपको तकलीफ है, वेदना है, समस्या है वह आपकी है, मगर जब मुस्कुराहट का प्रहार करेंगे तो वह एकदम से समाप्त हो जायेगी। अगर ओरिजिनल मुस्कुराहट होगी तो।
निमेषे समतिक्रान्ते हरेर्ध्यानविवर्जिते।
दुस्युभिर्मुषितेनेव उच्चैराक्रन्दितुं वरम्।।
तीसरा सूत्र है कि आप दूसरों के गुण कैसे खोजते है। जैसे मैंने बताया कि डेल कारनेगी ने उस मकान में रहने के लिये उसके इंटरेस्ट से बातचीत शुरु की। लोग अधिकतर पहले अपना इंटरेस्ट बताते हैं कि मैं ऐसा हूं, मैं ऐसा हूं, मैं इतना विद्वान हूं, मैं यह हूं और इस काम से आया हूं। तो दूसरा बोर हो जायेगा, आप यह देखिये ही नहीं, आप देखिये दूसरों के गुण क्या हैं, उनको उभारते हुए बात करिये। उसको थपथपाइये, उसको तैयार कीजिये। वह दो मिनट में आपका काम कर देगा। और अगर आप कहे- ले यह काम कर, यह तुम्हारी ड्यूटी है। तो वह कहेगा-ठीक है, रख दो, देखूंगा, दोनों में अन्तर हैं। चौथा सूत्र कि आप निर्भीक हों। ज्यों ही कायरता पैदा हुई आप मर गये यों समझ लीजिये। कायरता क्यों हैं? गलती की है तो मैं स्पष्ट कह दूंगा, दूसरे को भी समझ आयेगा कि इसने जानबूझ कर गलती नहीं की। दुनिया में कोई आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकता, भगवान भी नहीं बिगाड़ सकता, यदि आप निर्भय हैं तो और निर्भय जीवन ही अपने आपमें सम्पूर्ण जीवन है।
ये चारों गुण जीवन में आवश्यक तत्व हैं जिनके आधार पर व्यक्ति उच्च पदस्थ बनता है और जीवन में अगर ऊंचे बने नहीं तो जीवन का कोई अर्थ नहीं। चाहे डेल कारनेगी ने चार लाइन ही लिखीं चाहे इन्दिरा गांधी ने बांगला देश की बनाया पर जूझी वो हिम्मत के साथ। आप कल्पना करिये एक औरत की जिसके दिल का एक वाल्व ब्लाक था, प्रारम्भ से ही, दो तो बहुत गम्भीर बीमारियां उसको प्रारम्भ से ही थीं, उसके बाद भी जब वह जवानी में आई तो पति फिरोज गांधी मर गया, फिर थोड़ी बड़ी हुई तो प्रधान मंत्री पद सम्भाला, फिर जवान बेटा मर गया- संजय गांधी। इतना मानसिक तनाव झेलने के बाद भी जूझती रहीं, हिम्मत के साथ जूझती रहीं और आज दुनिया में तीन लोगों के नाम बहादुरी से लिए जाते हैं- चर्चिल, डि गॉल और इंदिरा गांधी।
न्यू यार्क टाईम ने प्रकाशित भी किया कि इस सौ साल के इतिहास में कौन से तीन व्यक्ति निर्भीक बने, करोड़ों लोग पैदा हुए होंगे, करोड़ों लोग मर गये होंगे, मगर ये तीन व्यक्ति जुझारू थे, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। और वास्तव में इन्दिरा ने हिम्मत हारी नहीं, जीवन के अन्तिम पड़ाव पर भी जूझती रही। जिसका जवान बेटा मर जाये, वह तो अपने आप में निढाल हो जाती है, जिसका पति मर जाए, वह तो पराश्रित हो जाती है, उसने कहा- कोई बात नहीं, प्रभु की जो इच्छा होगी, होगी, मुझे जूझ करके अपना नाम ऊंचा उठाना हैं। आज इसलिये, इन्दिरा गांधी का नाम याद आ रहा है, क्योंकि निर्भीक स्त्री थी, जो करूंगी दो टूक कंरूगी, इसमें घबराहट और तकलीफ से क्या होगा?
उन बारह सूत्रों में से 4 सूत्र मैंने आपके सामने रखें- कि किसी की आलोचना नहीं करें, उसके गुणों का विकास करें, उसमे गुण ढूंढें, आप मुस्कुराएं और आसपास के वातावरण को भी मुस्कुराहट पूर्ण बनायें, अपनी ऊर्जा को जाग्रत करें और उस ऊर्जा से दूसरों को भी प्रभावित करें और चौथा आप निर्भीक बनें। आप प्रयत्न करते है उच्चता तक पहुंचने के लिये, तो उसके लिये गुरु से एकाकार होना आवश्यक है, एक भावना है जो गुरु के और आपके प्राणों से जुड़ी हुई है। जब वो है, तो आप निश्चित हैं, इसलिये आप उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित बनिये और गुरु की भी ड्यूटी है कि वह शिष्य के प्रति समर्पित बने।
मगर आप अपनी गलती को छिपाइये मत क्योकि उससे आपके प्रति विश्वास टूट जायेगा, आपमें झूठ बोलने की आदत शुरु हो जायेगी, फिर दूसरी बार और दो झूठ बोलेंगे, और आप झूठ बोलते रहेंगे, फिर तीसरी बार भी छिपायेंगे, चौथी बार भी छिपायेंगे। आपसे गलती हो गई, तो शाम को गुरु से क्षमा मांग लें कि यह अपराध मुझसे हो गया, आप बिल्कुल शान्ति से सो सकेंगे। जिसने गलती की है और सत्य बोला है वह व्यक्ति निश्चित रूप से ऊंचा उठ सकता है। ये चारों गुण अपने आप में हीरे-मोतियों से तोलने लायक है, हीरे मोतियों से भी इतना अनुभव प्राप्त नहीं हो सकता। इतना गुण यदि आप अपने जीवन में उपयोग करने लगेंगे तो अपने आप में ही आप एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व बन सकेंगे।
मेरा आशीर्वाद है कि आप अद्वितीय व्यक्तित्व बनें और इन गुणों का विकास आपके जीवन में इसी क्षण से हो, आप सभी दृष्टियों से गुरु के प्राणों में बसें और गुरु की प्रत्येक सांस में आपका नाम हो।
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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