





अहं हुतात्यां हविष्यति नित्याय
सत्याय हूतात्मकाय, चैतन्याय भव्याय
परात्पराय, शुद्धाय बुद्धाय निरंजनाय,
नमस्तु नित्यं गुरु शेखराय।
नित्य, सत्य, हुतात्म, चैतन्य, भव्य, परात्पर, शुद्ध, बुद्ध एवं भव्य गुरु को हम सब प्रणामांजलि समर्पित करते हैं।
यह फाल्गुन मास और यह दिन जिसे हम होली के नाम से विभूषित करते हैं या कहते हैं ये अत्यंत महत्वपूर्ण और चैतन्य है। होली शब्द बहुत बाद में हुआ, पहले तो शब्द था हुतात्मा। ‘हुतात्मा इति होली’ जो मन में तरंग पैदा कर सके उसे होली कहते है और जो अपने मन में तरंग पैदा कर सके उसके अंदर ही एक जागृति होती है, एक चैतन्यता पैदा होती है। जो अपने आप में एक लहर पैदा कर सके, एक खुशी पैदा कर सके, एक प्रसन्नता पैदा कर सके, उसे हुतात्मा या होली कहा गया है।
हुतात्मा का अर्थ है कि जो कुछ हमारे अंदर है जो दबा हुआ है, प्रसन्नता, आहलाद, खुशी वह सब बाहर निकलने की क्रिया और स्पष्टता के साथ बाहर निकलने की क्रिया को होली कहते हैं और कई हजार वर्षों से हम होली मनाते आ रहे हैं। कोई यह नहीं है कि हिरण्यकश्यप पैदा हुए या होली को जलाया उसी से होली का पर्व बना। होली का तो पुराणों में भी वर्णन है और किसी भी दिन होली मना सकते हैं मगर आवश्यक है कि हमारे चेहरे पर प्रसन्नता या आहलाद पैदा करने वाला हो और हम अंदर एक आहलाद पैदा करें। और यह जो होली का महीना होता है, वंसत प्रारम्भ हो जाता है, पतझड़ खत्म हो जाता है, पीले पत्ते जो होते हैं पेड़ों के, सब पत्ते झड़ जाते हैं, नई कोपलें आ जाती हैं, ना गर्मी होती है, न सर्दी होती है, न बरसात होती है, एक बंसत ऋतु बहने लगती है, धान की कटाई हो जाती है और किसान फ्री हो जाते हैं और सब लोगों में प्रसन्नता आ जाती है। किसान खुश हो जाते हैं कि मेरे घर में धन आ गया, गरीब आदमी खुश हो जाता है कि अब कोई सर्दी गर्मी नहीं है, आम आदमी प्रसन्नता का अतिरेक करता है कि मेरे अंदर एक आनंद, जोश और जवानी है। इन सारी क्रियाओं को लेकर जो शब्द बना वह होली है।
होली किसी चीज को जलाने की क्रिया मात्र नहीं है। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को जला दिया इसलिए होली नहीं है। होली तो उससे भी पहले की एक क्रिया है, जब मन में एक तरंग पैदा की जा सकती है। और होली के दिन भी आपके अंदर तरंग पैदा नहीं हो सकती तो साल भर फिर पैदा हो भी नहीं सकती। इस समय भी एक लहर, हिलोर, खुशी पैदा नहीं हो सकती तो फिर जिंदगी में पैदा होगी भी नहीं। फिर तो बेकार जीवन है और ऐसे बेकार जीवन जीने वाले करोड़ों हैं या 100 में से 98 तो हैं ही जिनके जीवन का कोई उद्देश्य ही नहीं, लक्ष्य ही नहीं है। केवल स्वार्थमय हैं। और स्वार्थमय जीवन कोई जीवन होता ही नहीं। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि आप परमार्थी बन जाएं। मगर ऐसा तो कहता हूं कि स्वार्थी भी न बनें। बिल्कुल बीच में खड़े रहेंगे तो आपके चेहरे पर प्रसन्नता प्राप्त हो पाएगी। स्वार्थी आदमी के चेहरे पर प्रसन्नता नहीं आ सकती और परमार्थी आदमी के चेहरे पर भी प्रसन्नता नहीं आती। साधु संन्यासी के चेहरे पर प्रसन्नता आ ही नहीं सकती। अगर सही अर्थों में साधु है तो बिल्कुल गंभीर रहेगा। बाहर आएगा ही नहीं क्योंकि कुछ अंदर है ही नहीं उसके। हिलोर ही पैदा नहीं हो सकती।
और स्वार्थी आदमी भी हरदम एक ही बात सोचेगा कि मैं कैसे दूसरे को लूटूं, कैसे छीनूं। उसके मन मे भी हिलोर नहीं पैदा हो सकती। इन दोनों के बीच में खड़े होने की क्रिया को होली कहते हैं। जहां मेरे मन में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं है, लालच नहीं है, वहां घर लुटाने की क्रिया भी नहीं है और आपके सामने ऐसा सद्गुरु, ऐसा गाइड है, जो आपके अंदर हुतात्मा जाग्रत कर सके। इसलिए गुरु को हुतात्मा कहा गया है। इसलिए होली को भी हुतात्मा कहा गया है। अंदर जो ईश्वर का वास है, उसे भी हुतात्मा कहा गया है। अंदर जो अग्नि है, जठराग्नि, उसे भी हुतात्मा कहा गया है। हुत का अर्थ है आहुति देना, आहुति देने का अर्थ है कि जो बाहर प्रसन्नता की चीज है उसे अंदर लेना और उसे व्यक्त करना। यों तो जीवन में दुख, तनाव और अवसाद रहेंगे ही, मगर हकीकत में देखा जाए तो इस संसार में तनाव जैसी कोई चीज है ही नहीं। दुख, जैसी कोई चीज है नहीं, भगवान ने बनाई ही नहीं है। दुख केवल हम एहसास करते हैं, हम एहसास करते हैं कि मैं बहुत टैन्शन में हूं। क्या टैंशन है? आज नहीं तो कल उसका समाधान निकल जाएगा, परसों समाधान निकल जाएगा। निकलेगा ही निकलेगा।
तनाव हम स्वयं क्रिएट करते हैं। हम अपने आप में खुद दुखी बनते हैं, कल क्या होगा, लड़की बीस साल की हो गई अब क्या होगा, परसों क्या होगा, लड़का नहीं कमा कर देगा तो क्या होगा, मैं मर जाऊंगा तो पीछे क्या होगा। होगा जब होगा, अभी से क्यों तनाव करना। हम व्यर्थ में दुखी होते हैं। इसलिए दुख का कारण हम खुद हैं, तनाव का कारण भी हम खुद हैं। प्रभु ने तनाव नहीं बनाया है। उन्होंने दुःख भी नहीं बनाया, उन्होंने वेदना भी नहीं बनाई, उन्होंने कष्ट बनाया ही नहीं। क्रिएट हमने किया है। उस सारी नेगेटिविटी को समाप्त करने की क्रिया को होली कहते हैं। हम होली का अर्थ गुलाल डालना, रंग डालना और कीचड़ डालना समझ बैठे हैं या तो फूहडों की, गवारों की, अनपढ़ लोगों की, जिनको ज्ञान चेतना नहीं है, उनकी एक क्रिया है व्यक्त करने की। बाकी हमारे शास्त्रों में, ठीक ऋवेद में भी होली का वर्णन है और वहां से लगाकर चाहे संन्यासी है, गृहस्थ है, कृष्ण है, राधा है, कृष्ण-गोपियां है, राम और सीता हैं होली उन्होंने भी खेली, होली उत्सव उन्होंने भी मनाया, मगर उसमें एक शालीनता है, सभ्यता है, संस्कृति है, चेहरे पर एक उत्साह है, एक प्रसन्नता है और अगर इस दिन तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता नहीं आती तो बाकी के तीन सौ चौसठ दिन भी नहीं आ सकती। तुम उसी में जलते रहोगे, जो कि तुम अपने अंदर क्रिएट करते हो और जो क्रिएट करते हो वही वापस ओढ़ते हो। मैला कपड़ा आप नहीं धोओगे तो मैला कपड़ा वापस पहनना ही पड़ेगा।
जीवन में नवीनता होगी तभी प्रसन्नता आ सकती है। प्रत्येक दिन सूर्य नवीन तरीके से उगता है, और जहां सूर्य आज उगा है वहां से कल उग ही नहीं सकता। यानी वहां पर आज सूर्य पूर्व दिशा में 352 डिग्री पर उगा है तो कल 353 डिग्री पर उगेगा। 352 डिग्री पर नहीं उग सकता क्योंकि सूर्य का विस्तार इतना लंबा चौड़ा है। जब सूर्य एक जगह से नहीं उग सकता तो आप भी एक जगह स्थिर नहीं रह सकते। अगर आप स्थिर रहते हैं और दुःख में ही रहते हैं, तो दुख आप क्रिएट करते हैं। यदि कोणार्क जाएं तो वहां सूर्य मंदिर की विशेषता क्या है? आपने कोणार्क को देखा होगा भुवनेश्वर के पास में। उसमें 365 छोटी-छोटी बारियां हैं। और आप देखेंगे कि एक दिन इस बारी में से किरण अंदर जो सूर्य है उस पर सीधी पड़ती है तो अगले दिन अगले झरोखे से ही सूर्य की किरण पड़ेगी। इसका मतलब इतना डिफरेंस सूर्य के उगने में हुआ। इसलिए सूर्य मंदिर है वो वहां। उन पत्थर की मूर्तिर्यों को देखने की आवश्यकता नहीं। वे कितने उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे जिहोंने इस बात को सिद्ध किया। जब सूर्य एक जगह से नहीं उगता, तो आप भी एक जगह पर स्थिर नहीं रह सकते और अगर रहते हैं तो इसका मतलब आप तनाव में हैं, वह तनाव आपका स्वयं का बनाया हुआ है। हाय मैंने दो घंटे ज्यादा काम कर लिया आज ग्यारह बजे तक, तो मैं दुखी हूं, आज उसने मुझे गाली दे दी तो मैं दुखी हूं। अरे गाली दी तो उसका मुंह गंदा हुआ, चांद पर थूकेगा तो उसके चेहरे पर पड़ेगा, फिर आप क्यों दुखी और तनाव ग्रस्त होते हैं? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप संन्यासी बन जाएं, मैं यह भी नहीं कह रहा कि आप बिल्कुल भोगी बन जाएं। आप बीच में खड़े रहें। जो कुछ हो रहा है, हो रहा है। आप नहीं भी चाहेंगे तो भी होगा, आप चाहेंगे तो भी होगा।
दुख को ही आप पकड़ते हैं, सुख को आप पकड़ते ही नहीं। मैं आपके चेहरे को देखकर प्रसन्नता व्यक्त करता हूं तो यह सुख है और मैं कहूं कि ये कहां से आ गए उठकर के तो मैं दुखी हो जाऊंगा। आप कह सकते हैं कि पैंट पहने तो बहुत अच्छे लगेंगे। पैंट सूट पहना होता तो बहुत सुखी होता, धोती पहनी है तो बहुत दुखी हूं। ये सब दुख आपके स्वयं के कारण हैं। हमारे जीवन में सुख-दुख, हर्ष-विषाद, आहलाद, पूरी सब्जी हलवा सब हैं। खाली पूरी तो नहीं खा सकते, खाली हलवा भी नहीं खाया जाएगा। सब रंग गुलाल तो एक अभिव्यक्ति है, अंदर तुम्हारे एक आनंद है, तो होली है। मुठ्ठी भर गुलाल डालने से होली नहीं हो पाएगी, वह प्रसन्नता आ ही नहीं सकती जीवन में अगर अंदर से एक आनंद का प्रवाह न हो। इसीलिए जीवन का प्रत्येक पल किसी का होकर के बिताना चाहिए या किसी को अपना बनाकर के बिताना चाहिए। उसको होली कहते हैं। इनमें से एक काम करना पड़ेगा, या तो आप किसी के हो जाएं, जब हो जाएंगे तो आप स्वार्थ से परे हट जांएगे। फिर आप में खुद का स्वार्थ नहीं रहेगा। या किसी को अपना बना लें तो भी आप स्वार्थ से परे हट जाएंगे कि आपने किसी को अपना लिया। दोनों स्थितियां में आप खड़े हैं। अब यह तो आपके हाथ में है कि आप या तो हुतात्मा हो जाएं या स्वार्थ में पड़े रहें।
हुतात्मा माने गुरु, हुतात्मा माने कृष्ण, हुतात्मा माने ईश्वर, हुतात्म माने आपका शरीर, आपके उच्च विचार, आपका चिंतन। आप अपने विचारों को नेगेटिव थिंकिंग में डालिए, आपको कोई रोकने वाला नहीं। आप पॉजीटिव थिंकिंग में डालिए, तो भी आपको कोई रोकने वाला नहीं। मैं चौदह-पंद्रह साल का था तो मेरे पिताजी मर गए, तो भी चार छः महीने दुखी हुए उसके बाद जिन्दगी चलती रही और वे आज तक जिंदा रहते तो भी जिन्दगी चलती। संन्यासी था तब भी ठीक था, आज गृहस्थ हूं तो भी ठीक है। आज स्वस्थ हूं तो भी ठीक है, और पूर्व में छः महीने तक बीमार पड़ा रहा तो भी ठीक था। यह तो शरीर है, सुख भी आएगा, दुख भी आएगा। हम एहसास क्या करते हैं सब उस पर निर्भर है और जो हम एहसास करते हैं वही क्रिया हमारे शरीर को नेगिटिव या पॉजीटिव थिंकिंग में लाएगी और उसी से हमारा पूरा साल कटेगा। होली अपने आप में एक विश्लेषण करने की क्रिया है, सोचने की क्रिया हैं, चिंतन करने की क्रिया है कि मुझे यह साल कैसा बिताना है, रोते हुए, कलपते हुए, दुख देते हुए या प्रसन्नता के साथ मुस्कुराते और छलछलाते हुए। क्षण भर रूक कर या सोचने की क्रिया होली है क्योंकि सारे काम निपट चुके होते हैं इस समय। फसल कट चुकी होती है, वसंत ऋतु आ चुकी होती है, आर्थिक वर्ष खत्म हो चुका होता है, सर्दी कम हो जाती है, पतझड़ खत्म हो जाती है। तब भी आप गर्मी में तपते हुए जैसे रहें तो आपकी इच्छा है।
यह जीवन का लक्ष्य है-प्रसन्न होना, जिसे हम नहीं समझ पा रहे हैं और होली उसे समझने की क्रिया है। आज अगर होली है और आपके चेहरे पर जो महीने भर पहले की रेखाएं थीं, विषाद की वे रेखाएं अगर कल भी सवेरे मैं आपके चेहरे पर देखूंगा तो मैं आपको मरा हुआ ही समझूंगा, मैं आपको सजीव कहां से देखूंगा, जिंदा आपको देखूंगा कहां से। कुछ चेंज आपमें आएगा तो होली का अर्थ है, वरना व्यर्थ है। अंदर जो कुछ है वह चेहरे पर दिखाई दे जाता है। चेहरा देखकर पता लग जाएगा कि यह आदमी भला है या धोखे बाज है इसमें प्रसन्नता की अभिव्यक्ति है या नहीं है। होली का अर्थ है हम बदलें, हममें नवीनता आए। जैसा कि मैंने पहले कहा—-नित्याय सत्याय हुतात्मकाय—— इसका अर्थ है कि नित्य हम नवीन बनें, नित्य हम सत्य बनें, नित्य हम शुद्ध बनें, नित्य हम हुतात्मा बने और मैं आपको कहता हूं कि नित्य आप घोर स्वार्थी बने और मैं ही कहता हूं कि नित्य घोर परमार्थी बनें। मैं आपको घोर साधु भी नहीं बना रहा हूं, और घोर गृहस्थ भी नहीं बना रहा हूं और इस प्रकार के विचार भारत वर्ष में कोई स्पष्ट कर भी नहीं पाता। या तो कहेगा तू संन्यासी बन, या तुमसे छीनेगा या मूर्ख बनाएगा। ऐसा न मेरे मानस मे है, न रहा है जिन्दगी में। जो जिन्दगी मे शुरु से फक्क्ड़ है, भगवान कृष्ण भी फक्क्ड़ थे तो थे। अब आप उनको अच्छा कहे या बुरा कहे। राम को आप अच्छा कहे या बुरा कहे यह तो आपके चिंतन और विचार की बात है। आप मीरा को अच्छा कहे या बुरा कहे यह आपका चिंतन है।
मीरा तो अपने आपमें निश्छल भाव से बढ़ती जा रही थी राजमहल से, उस समय में, राणासांगा के समय में, उतरी तो उतर गयी और आप अपने ऊपर सौ-सौ बंधन बांधते रहते हैं कि यह हो जाएगा तो क्या होगा। अरे होगा जो हो जाएगा। अच्छा होगा या बुरा होगा उस समय देख लेंगे। कल की चिंता को आप इस समय क्यों झेल रहे हैं? होली यह चिंतन करने के लिए है। अब आप तनाव में है तो आपके तनाव को मुझे झेलना पड़ता है। आप पूछते हैं कि आप तनाव में हैं, क्या कारण है? आप मुस्कराते हैं तो अपने आप मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाएगी। गुरु को हुतात्मा बनना पड़ता है। हुतात्मा का अर्थ जहर भी है और हुतात्मा का अर्थ अमृत भी है, अगर आप पाणिनी की व्याकरण देखें तो 365 अर्थ है हुतात्मा के और दिन भी एक वर्ष में हमारे पास 365 ही हैं। बड़ी एक लिंकिंग है, एक सीधा कनेक्शन है। इसलिए होली के अवसर पर मैं आपको आशीर्वाद दे रहा हूं कि आप मुझसे पूरी तरह जुड़ जाएं या बिल्कुल कट जाएं। मैं आपको दोनों जगह छोड़ रहा हूं- या जुड़ जाएं या बिल्कुल कट ऑफ हो जाएं। मुझे कोई दुख, कोई विषाद नहीं होगा। लाखों लोग कटे तब भी कोई विषाद नहीं होगा। लाखों लोग जुडे़ तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा। न उसमें सुख या दुख हुआ, न इसमें सुख या दुख है। यह तो पानी है, गंगा का पानी जो बह गया, अब गया तो गया। इसी पृथ्वी लोक में मेरा जितना काम है मैं करूंगा, जब पृथ्वी लोक में मेरा काम समाप्त हो जाएगा, मैं किसी और लोक में चला जाऊंगा, उस लोक में भी बीस साल, चालीस साल, पचाल साल काम करूंगा। वहां भी जब मेरा काम समाप्त हो जाएगा मैं किसी और लोक में चला जाऊंगा। सैकड़ों लोक हैं-ब्रह्म लोक है, रूद्र लोक है, विष्णु लोक है, शुक्र लोक है। यह पृथ्वी लोक है।
कभी कोई समझेगा। आज नहीं तो दो हजार साल बाद समझेगा। और मुझे इस की आवश्यकता भी नहीं कि लोग समझे मुझे! मैं इस बात के लिए परेशान भी नहीं हूं। इस बात का चिंतन करता ही नहीं हूं मैं। नहीं समझेंगे तो घर वाले भी नहीं समझेंगे और समझेगा तो दूर बैठा ईश्वर भी समझ लेगा। जब भीष्म शर शैय्या पर पड़े थे, तो एक हजार तीर लगे थे, उनके खून बह रहा था। कृष्ण गए मिलने के लिए तो भीष्म ने कहा- कृष्ण! मुझे सब कुछ समझ आ रहा है, बस एक बात समझ नहीं आ रही है कि कौन सी क्रिया है जिसके कारण मेरा पूरा शरीर बाणों से छिदा हुआ है, खून बह रहा है और मेरा सारा शरीर अशक्त है, रूग्ण है। मैंने तो जिन्दगी में कोई पाप किया ही नहीं। फिर यह स्थिति, यह अशक्तता क्यों आई? तो कृष्ण ने वहां पर कहा भीष्म को- दो कारण हैं कि तुम्हारे शरीर को इतना कष्ट भोगना पड़ रहा है। एक तो तुमने कौरवों के सारे दुख और पापों को अपने ऊपर ओढ़ा, जो कि गलत थे। उनके पापों को ओढ़ने का भी फल तुम्हारे शरीर को मिल रहा है क्योंकि तुमने उन्हें ओढ़ा। और दूसरा पच्चीस जन्म पहले तुमने एक जीवित सांप को उठा कर एक झाड़ी पर फेंक दिया था जहां पर कांटे थे, उसका पूरा शरीर छिद गया था, वह पाप तुम्हें आज भोगना पड़ रहा है।
जो आज हम कर रहे हैं, क्या हमें नहीं भोगना पड़ेगा? और कृष्ण ने कहा- कौरवों के सारे पापों को भी तुमने ओढ़ा। द्रौपदी नंगी होती रही और तुम देखते रहे, वह पाप तुमने ओढ़ा, उसका फल भी तुम्हें भोगना पड़ रहा है। तो शिष्यों के पापों का फल भी गुरु को भोगना ही पड़ता है। तुम्हारे पापों का फल भी मुझे भोगना पड़ेगा, क्योंकि तुमसे मेरा कोई लिंक है। यों मैंने तो कोई पाप किए नहीं, पाप मैं करता नहीं। डांट देता हूं फिर शांत हो जाता हूं, मैं छल करता नहीं, पाप करता नहीं। अब आप मुझे छली कहें, झूठा कहें, धोखेबाज कहें, भला कहें, नित्याय, सत्याय जो चाहे आप कहें। यह आपकी मर्जी। मैं अपने आप में स्पष्ट हूं। और जिस दिन तुम्हारी आंखें खुलेंगी तो वो चीज तुम्हें दिखाई देगी नहीं, जो तुम देखना चाहते हो। मैं कभी मन से बीमार होता नहीं हूं, शरीर से कभी होता भी हूं तो उसका कारण मैंने तुम्हें उदाहरण देकर समझा दिया। होंगे शिष्यों के पाप-उनका छल मैंने अपने ऊपर लिया होगा, उन्होंने पाप किए तो मुझे ओढ़ने पडेंगे क्योंकि तुम मेरे आश्रय हो। और आप शुद्ध, सात्विक, प्रसन्न रहेंगे तो मुझे भी प्रसन्नता मिल जाएगी, आपके मन में न्यूनता होगी तो मुझे भी न्यूनता मिल जाएगी। मैं अपनी जगह स्थिर खड़ा हूं और बराबर देखता जा रहा हूं, कौन कैसे कर रहा है क्या कर रहा है। बिल्कुल आंखें मेरी खुली हुई हैं। कहीं मेरे मन में संशय है ही नहीं।
यह होली का पर्व है और हम शालीनता के साथ में मुस्कुराते हुए और गुरु आज्ञा का पालन करते हुए साधनाएं सम्पन्न करें, गुरु जो काम दें वह करें और मस्ती के साथ इस पर्व को मनाएं और वास्तव में जो होली का अर्थ है, उसे चरितार्थ करते हुए चेहरे पर मुस्कुराहट लाएं, मन में आनंद की हिलोर पैदा करें, जो 365 दिन हमारे अंदर बनी रहे, 365 दिन हम काम कर सकें, उसी आनंद में, उसी खुमारी में उसी मस्ती में, वह जीवन है। और अगर आप गुरु के प्रति कोई काम करते हैं तो उसमें मेरा कोई निजी स्वार्थ या लाभ है नहीं, दो पूड़ी से तीसरी पूड़ी मैं खा नहीं पाऊंगा। मगर आप अगर मेरे ज्ञान को सुरक्षित रखते हैं और उसके प्रसार में सहायक होते हैं तो आने वाली पीढ़ी याद रख पाएगी कि यह चीज थी जो हमें ओरीजनल मिल पाई। आज तक मालूम ही नहीं कि होली का वास्तविक अर्थ क्या है। कौन स्पष्ट करेगा? पिछले 2000 वर्षों में बताइए किसने स्पष्ट किया? नहीं ज्ञान स्पष्ट होगा तो आरिजनैलिटी नहीं आ पाएगी। कहीं पर और मेरे इन विचारों को आप पन्नों पर उतार देंगे या सुरक्षित रख पाएंगे तो ये पश्चिम वाले, वे जो हिंदी नहीं जानते हैं वे इस ज्ञान को समझ पांएगे। आप ऐसा करते हैं तो आपको ही सारा श्रेय मिले मुझे तो एक परसैंट भी न मिले। और आप गुरु कार्य करते हैं तो आपके खुद के पाप समाप्त होते ही है, पुण्य उदय होता ही है, पूरा जीवन सुखी होता ही है और चेहरे पर मुस्कुराहट आती ही है, इसमें कोई संदेह नहीं।
और कभी आप गुरु का अभिवादन करें तो मुस्कुराते हुए तालियां बजाएं। मुस्कुराहट नहीं है तो मैं भी सोचता हूं ये जिंदा हैं या मरे हुए हैं। ताली बजाने का अर्थ होता है सामने वाले को साधूवाद देना और अपने मन की प्रसन्नता को वहां तक पहुंचाने की क्रिया-एक सहज क्रिया और हाथ जोड़ने का अर्थ होता है कि मैं कर्म और धर्म दोनों को मिलाकर आपकी प्रार्थना करता हूं, आपके सामने सिर झुकाता हूं, यह दायां कर्म प्रधान हाथ है और यह बायां धर्म प्रधान हाथ है। कहा गया है कि धर्म करें तो चुपचाप करें पता ही नहीं चले। कर्म करें तो दिखाई दे। और दोनों हाथों को मिलाकर हाथ जोड़ने का अर्थ ही यह है कि मैं दसों इन्द्रियों के साथ प्रसन्नता व्यक्त करता हूं और धर्म कर्म के साथ आपको साधुवाद देता हूं! इसलिए देवता को या गुरु को नमन करें तो प्रसन्नता के साथ करें। और जीवन में प्रसन्नता को उत्पन्न करने का जो पर्व है उसे होली कहते हैं। और जैसी की परंपरा है हर वर्ष होली उत्सव जोधपुर में मनाया जाता है। प्रत्येक स्थान का अपने आप में एक महत्व है। हरिद्वार में इतनी भीड़ और इतनी रेलमपेल, इतने जेबकतरे, इतने भले, इतने साधु, इतने गृहस्थ होते हैं फिर भी हरिद्वार का अपना एक महत्व है। धक्का मुक्ती खाते हुए भी हम कुंभ में जाते हैं, तकलीफ पाते हैं, आग लग जाती है, पुल, टूट जाते हैं, सैकड़ों लोग मर जाते हैं, फिर भी हम जाते हैं, कुंभ में क्योंकि उस स्थान का एक महत्व है। ठीक इसी प्रकार से जोधपुर का अपना एक महत्व है क्योंकि इस स्थान पर कम से कम चार पांच करोड़ मंत्र जप हुआ होगा साधकों के द्वारा पिछले बीस-तीस वर्षों में। इसलिए तपस्या भूमि है, एक तरह से आपकी गुरु भूमि है, आपकी साधना स्थली है। और इस होली के शिविर को होली शिविर न कह कर, इसका नाम मंजुल महोत्सव रखा है। और मंजुल का अर्थ है कि हम शरीर से ही नहीं मिलें, गुरु से मन से मिलें और मन से मिलना अपने आप में बहुत कठिन होता है क्योंकि मन भटकता रहता है और जब तक गुरु से मन से जुड़ेंगे नहीं तब तक चेहरे पर प्रसन्नता, ओज, आनंद की उपलब्धि नहीं आ सकती।। और अगर आनंद और हर्ष नहीं है तो मेरे हिसाब से जीवन एक पशु के समान है या यों समझ लीजिए हम जीवन को बोझे के समान ढो रहे हैं, बस चला रहे हैं।
जब मन पर ही नियंत्रण नहीं तो गुरु पर नियंत्रण कैसे होगा आपका। गुरु से मन से नहीं जुड़े, तो कैसे आप कुछ प्राप्त कर सकते हैं? जब मन ही नियंत्रण में नहीं होगा तो आपका अपने परिवार पर नियंत्रण कैसे होगा? सब आदमी कर सकता है संसार पर, पर मन पर नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि मन बड़ा चंचल होता है, मन चोर होता है, मन भागने वाला होता है और मन वह सब कुछ करवाता है जो हम नहीं चाहते हुए भी करते हैं या चाहते हुए भी नहीं कर पाते। मन चोर बनाता है, मन धोखेबाज बनाता है, मन विश्वास घाती बनाता है, मन धार्मिक बनाता है, मन देवता बना देता है और मन राक्षस बना देता है और इस मन को गुरु के साथ जोड़ने की क्रिया को मंजुल कहते हैं। मन को गुरु के साथ जोड़ने की क्रिया, शरीर को गुरु के साथ जोड़ने की बात नहीं कर रहा हूं। यह पहली बार आपको बता रहा हूं कि हम अपने मन को गुरु के साथ जोड़ें। और जब जोडेंगे और मन जुड़ेगा, तो हम मनुष्य कहलाएंगे। अभी तक मनुष्य नहीं हैं। मनुष्य तो एक अलग क्रिया है और एक ऐसी क्रिया है कि देवता भी मनुष्य शरीर धारण करते के लिए लालायित रहते हैं। और जितने देवता हुए हैं, विष्णु, रूद्र, ब्रह्मा और बाकी सबने मनुष्य देह धारण की-कभी कृष्ण के रूप में धारण की, कभी राम के रूप में धारण की, कभी बुद्ध के रूप में, कभी चैतन्य के रूप में। और सभी देवताओं और अप्सराओं ने भी मनुष्य देह धारण की क्योंकि मनुष्य शरीर अपने आपमें श्रेष्ठतम स्थिति है जिसके माध्यम से हम आनंद की उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं। देवता हंसते नहीं, क्योंकि उन्हें हंसने की क्रिया मालूम नहीं, देवता रोते भी नहीं क्योंकि उन्हें रोने की क्रिया मालूम नहीं, उनको सुख की अनुभूति नहीं होती, उन्हें दुख की अनुभूति नहीं होती। न राक्षसों को सुख की अनुभूति होती है न दुख की। तो संसार में श्रेष्ठतम वर्ग मनुष्य कहा गया है और मनुष्य कब बनता है? जब मन है तो मनुष्य बनता है, अन्यथा पशु बनता है। और पशु कई तरह के होते हैं हाथी भी पशु है, घोड़ा भी पशु है, गधा भी पशु है और 25 हजार का एक कुत्ता पशु है।
मंजुल का अर्थ है कि इस होली के अवसर पर आपका और मेरा हृदय जुड़ जाना चाहिए। अब नहीं जुड़ा तो फिर पांच सौ साल भी नहीं जुड़ पाएगा। जैसा मैंने पहले कहा होली का मतलब यह नहीं है कि हमने उपले लगाकर या लकड़ी लगाकर होली जला दी। जलाने की यह क्रिया नहीं है। जलाने का अर्थ है कि अंदर जो हमारे विकार हैं, उनकी हम आहुति दें और अपने आपको गुरु के प्रति समर्पित करें। अदंर हमारे हुतात्मा है और गीता में कृष्ण ने कहा है- अहं हुतात्मा हविष्यति स पूर्वां ज्ञान मेव च मैं हुतात्मा बनकर के अपने हविष्यान को आपके हृदय में समर्पित करूं। और आप अपने आपको पूर्ण आहुति बनाकर के मेरे हृदय में अपने आपको समर्पित करें उसे होली कहते हैं। आप अपने आप को पूर्णतः समर्पित कर दें आप अपने पास कुछ रखें नहीं फिर माइंड में कुछ नहीं होता।
फिर जो आज्ञा दी जाए वह पालन हो। आपका फिर यह कर्त्तव्य है कि आप मेरी आज्ञा का पालन करें और मेरा कर्त्तव्य है कि मैं आपकी समस्याओं को दूर करूं। इसलिए यह मंजुल महोत्सव है। मामूली उत्सव भी नहीं महोत्सव है और इसी महोत्सव में आपको जीवन के सारे रंग, सारे आयाम देख लेने हैं- हंसी, खुशी, प्रसन्नता, छलछलाहट, एक दूसरे से जी भर कर भेंट करने की क्रिया, अपनी समस्याओं को गुरु को बता कर उन्हें दूर करने की क्रिया। यह सब इस होली के दिन होना चाहिए। और देवता क्यों मनुष्य शरीर धारण करते है? उन्हें क्या जरूरत है? हम देवता बनना चाहते है और वे मनुष्य शरीर धारण करते है। यह विपरीत क्रिया क्यों है? विपरीत क्रिया इसलिए है कि साधनाएं और दीक्षाएं केवल मनुष्य शरीर को ही प्राप्त हो सकती है। देवताओं को प्राप्त नहीं हो सकती। देवता दीक्षा ले ही नहीं सकते, संभव ही नहीं है, देवता साधना भी नहीं कर सकते। ऋषि कर सकते हैं, ऋषियों ने साधनाएं की जो मनुष्य थे। हम ऋषियों की संतान हैं, वशिष्ठ के गोत्र के हैं, गौतम के गोत्र हैं, जिस भी ऋषि की संतान है, हम मनुष्य हैं इसलिए साधना कर सकते हैं, यह अवसर हमें मिला है, मनुष्य हैं इसलिए साधना कर सकते हैं, यह अवसर हमें मिला है, मनुष्यों को ही मिला है। देवताओं को भी नहीं मिला, राक्षसों को भी नहीं मिला। हम ही साधनाओं के माध्यम से सफलता पा सकते हैं क्योंकि हम मनुष्य हैं।
और साधनाएं कोई ऐसी चीज नहीं है, कि आप एक क्षण में ही सब कुछ प्राप्त कर लें। और सब प्राप्त कर भी सकते हैं यदि आप मंजुल बन जाएं तो। एक क्षण में ही प्राप्त कर भी सकते हैं यदि आपका अपने मन पर नियंत्रण हो तो। और मन की जो इंद्रियों हैं, वे भागती रहती हैं और गीता में कहा है कि एक रथ के चारों ओर घोड़े बंधे हैं एक उत्तर, एक पूर्व, एक पश्चिम और एक दक्षिण। और आप एक घोड़े को पकड़ें तो दूसरा उधर भाग जाएगा। मन भी ऐसे ही भागता है कभी विषय वासना में भाग जाएगा, कभी पत्नी की ओर भाग जाएगा। सब घोड़े एक दिशा में बढ़ें और एक दिशा में बढ़ने की क्रिया को साधना कहा गया है, दीक्षा कहा गया है और अपने आप में पूर्ण होने की क्रिया कहा गया है जिससे हम आनंद उठा सकें। हम मनुष्य बन सकें, आनंद उठा सकें और जो कुछ चाहें बन सकें, इसे मजुंल कहा गया है। सुखी बन सकें और उस सबके लिए यही एक क्षण है जिसे होली कहा गया है। समझें तो यह दिन अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं और नहीं समझे तो एक सामान्य उत्सव होकर रह जाएगा, आप आए, बैठे, चले गए, उपलब्धि कुछ नहीं हो पाई और मेरे मन में कसक रह गई कि इन्होंने कुछ लिया ही नहीं, आपके मन में भी कसक रह गई कि आप कुछ प्राप्त कर ही नहीं पाए।
गलती आपकी भी नहीं है, गलती मेरी भी नहीं है। बस मन का जुड़ाव नहीं हो पाया। जो मैंने कहा वह आपने किया नहीं और अपनी बुद्धि को वहां पर भी लागू करते रहे। यह लागू करने की जो क्रिया है वह आपकी बुद्धि है, तर्क है। इसलिए मैंने कहा कि मन भागेगा, आपका और अगर मैंने कहा कि इस मन को एक दिशा में बहना है तो फिर आपको ऐसा करना ही है और ऐसा मैं कोई काम कहूंगा ही नहीं जो आपके खिलाफ होगा। घर बुलाकर मैं आपका अपमान कर भी नहीं सकूंगा और आपको न्यून दिखा भी नहीं पाऊंगा और अगर आपका मेरे प्रति समर्पण है और विश्वास है तो यह संभव भी नहीं कि संसार में कोई आपके सामने खड़ा हो सके और आपसे आंख मिला सके, ऐसा कभी होने ही नहीं दूंगा। होली के ये दिन, मस्ती के हैं, आनंद के हैं, उल्लास के हैं, जोश के हैं, जवानी के हैं और नब्बे साल का भी जवान हो सकता है और बीस साल का भी वृद्ध हो सकता है। जवानी का अर्थ यह नहीं है कि बीस से चालीस साल तक ही जवानी होती है। जवानी का अर्थ है कि जोश हो, वह जवानी है। उमंग हो, वह जवानी है। हुलस कर मिट जाती है वह जवानी कहलाती है। आकाश से उतरी एक बूंद जो लपक कर धरती को छू लेती है वह जवानी कहलाती है। जवानी का कोई टाइम नहीं होता, कोई उम्र नहीं होती, कोई समय नहीं होता।
और मिलने का कोई क्षण नहीं होता कि चार बजे मिलना है, छः बजे मिलना है। नदी अगर मुहुर्त निकालती रह जाएगी फिर समुद्र से नहीं मिल सकती। कोई मुहुर्त होता ही नहीं। इसलिए जो मुहुर्त देखकर कुछ करते हैं वे सब झूठे हैं, व्यर्थ हैं। मुहुर्त जैसी कोई चीज होती ही नहीं। जब मन में तरंग उठी, आप उठे मिल लिए, कर लिया काम, साधना कर ली, सिद्धि कर ली, सफलता प्राप्त कर ली, देवता बन गए। जो कुछ बनना चाहें, फिर बनें तो सही आप। कुछ तो बने आप! राक्षस बने तो घोर राक्षस बनें, दो हजार लोगों को मारकर अंगुली माल डाकू बनें पर अद्वितीय बनें। मैं यह तो कहूंगा कि मेरा शिष्य तीन हजार लोगों को मार चुका है, एक हिटलर बन चुका है वापस। यह तो गर्व से कह सकूं। पर वह भी आप नहीं होने देते। वह गर्व भी मुझे नहीं लेने देते और साधना सिद्धि में सफलता प्राप्त करके भी मुझे गर्व नहीं लेने देते। तो फिर मेरा जीवन तो बेकार गया। आप क्षण को पहचाने, गुरु को पहचाने और गुरु से हृदय से जुड़े। होली को मंजुल महोत्सव कहा गया है और मंजुल का अर्थ है एक जुड़ने की क्रिया, एक परिवर्तन की क्रिया। जो कुछ भी आपके चेहरे पर उदासी, तनाव, चिंता, थकावट है उन सबको एक गठरी में बांध कर मेरे पास जमा करा दीजिए, शिविर से वापस घर जाएं तो बेशक वापस ले लीजिए, मुझे कोई आपत्ति नहीं। पर जब तक मेरे साथ हो, होली महोत्सव में कम से कम मुझे तो दुखी मत करिये।
मैं मुस्कुराना चाहता हूं और आप मुझे दुखी करना चाहते हैं। आप उदास चेहरा लेकर मेरे सामने आ जाते हैं। मैं उदास रहता ही नहीं। जो कुछ बात होती है साफ-साफ कह देता हूं कि भाई ऐसा है, इच्छा है तो करो नहीं तो तुम्हारी मर्जी। कोई बात मैं अपने माइंड में रखता ही नहीं। तुमने मुझे कहा कुछ, मैंने सुन लिया, बस खत्म। होली का पर्व हो, जोधपुर स्थान हो और गुरु सामने हो उससे चौथी, पांचवी चीज आपको चाहिए ही क्या? कुछ है ही नहीं इसके अलावा। जब आपको सामने सब कुछ देने वाला बैठा है, फिर आपको चिंता की आवश्यकता ही क्या है? आप समझेंगे तो तीन लाइनें ही बहुत हैं और नहीं समझेंगे तो मैं जिन्दगी भर आपके सामने चीखता चिल्लता रहूं तब भी कुछ नहीं हो पाएगा और ठोकर लगेगी तो एक बार ही बहुत है जागने के लिए। नहीं ठोकर लगेगी, तो दस हजार साल तक भी कुछ नहीं होगा। राम, वशिष्ठ से लेकर आज तब समझाते आए है पर आदमी वही का वही रहा है। कुछ उनमें अच्छे बने रामकृष्ण परमहंस बने, विवेकानंद बने, चैतन्य महाप्रभु बने, बुद्ध बने। बने, यह नहीं कि नहीं बने, पर क्षणिक बने, कुछ ही बने। और मैं पूरे एक समूह को बनाना चाहता हूं, यही डिफरेंस है। उन्होंने केवल आठ दस शिष्यों को बनाया। मैं सैंकड़ों शिष्यों को ऐसा बनाना चाहता हूं।
मेरा और आपका संघर्ष इस बिंदु पर है कि आप जो हैं, वैसे के वैसे बने रहना चाहते है और मैं आपको बिल्कुल वैसा बनाना चाहता हूं कि इस प्रकार का कोई बने ही नहीं। आप अद्वितीय बनें और मैं आपको ऐसा बनाकर छोडूंगा ही, यह मेरी धारणा है, यह मेरा दृढ़ निश्चय है और मुझे अपने आप पर कान्फीडेंस है। और आप अद्वितीय तब बनेंगे, जब आप पूर्णता के साथ वे साधनाएं करें जो मैं आपको दूं और उन क्षणों का पूर्ण लाभ उठाएं जो कि साधनाओं के लिए श्रेष्ठ हैं। होली के दिवस तांत्रोक्त दिवस कहलाते हैं, पूर्णता के दिवस कहलाते हैं, ये सम्पूर्णता के दिवस कहलाते हैं। और प्रत्येक गुरु अगर वह सही है तो पूरी रात साधनाओं में व्यतीत करता है, सोता नहीं वो पूरी रात। दिन में तो क्रिया कलाप करता है, गुरु है तो शिष्यों से मिलेगा, काम करेगा, मगर पूरी रात साधना में व्यतीत करता है क्योंकि वह जानता है कि ये क्षण वापस पूरे साल भर बाद मिल पाएंगे। होली के दिनों का महत्व इसलिए है कि हम इन क्षणों का पूरा लाभ उठाएं, साधनाओं के माध्यम से। मैं यह चाहता हूं कि एक-एक क्षण साधनाओं में व्यतीत हो आपका। आप पूर्णता और अद्वितीयता प्राप्त कर कर सकें, गुरु के सानिध्य में बैठ सकें और पूरे शरीर के रोम-रोम को देवमय बना सकें और अपनी मनुष्यता को इतनी ऊंचाई तक पहुंचा सकें कि मैं आप पर गर्व कर सकूं। खाना आप भी खाते हैं, खाना मुझे भी खाना पड़ता है, पानी आप भी पीते हैं, पानी मुझें भी पीना पड़ता है, मगर आपको मैं साधना करने को कहता हूं और आप करते नहीं है। मैं अपने मन पर नियंत्रण करके करता हूं क्योंकि मुझे मालूम है कि इस क्षण की क्या उपलब्धि है, यह होली का पर्व कितना मूल्यवान है और मैं जानता हूं कि साधनाओं के माध्यम से कैसे सब अनुकूल बन सकता है।
इसलिए होली कोई सामान्य दिन नहीं है, यह गप्पें मारकर बिताने का दिन नहीं है, यह है तो लपक करके, बढ़ करके उन सब साधनाओं को गुरु से ले लेने का दिन है, जिन्हें सम्पन्न कर आप अद्वितीय बन सकते हैं, श्रेष्ठता प्राप्त कर सकते हैं और मैं चाहता हूं कि आप वे साधनाएं मुझसे प्राप्त करें चाहे वे धन से संबंधित हों, चाहें कोई भी हों। जो भी गुरु देना चाहें और जो भी आप लेना चाहें होली महोत्सव के दिन अवश्य लें। यों तो बार-बार और रोज आप खाएंगे तो रोज पेट खाली होगा। एक दिन खाने से तो पूरी जिंदगी व्यतीत नहीं हो पाएगी। रोज खाने की क्यों जरूरत है। आपने साधना की, फिर दिन भर झूठ बोला, गलती की, अच्छा किया, बुरा किया तो वह साधना करनी पड़ेगी। परन्तु धीरे-धीरे कोई क्षण तो ऐसा आएगा जब आप उस ऊंचाई पर पहुंच जाएंगे जहां आप पहुंचना चाहते हैं क्योंकि आप मनुष्य हैं और साधना कर सकते हैं। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मनुष्य बनना सामान्य बात नहीं है, मनुष्य बनने के बाद गुरु मिलना भी सामान्य बात नहीं है, गुरु के मिलने के बाद भी ऐसा समय मिलना भी सामान्य बात नहीं है, जब आप उच्च कोटि की साधनाएं कर सकें। तीनों का लाभ आप उठा पाएं तो होली के क्षण आपके लिए सार्थक हो सकेंगे और मेरे लिए बहुत प्रसन्नता और अहलाद के क्षण हो सकेंगे कि मैं आपको कुछ दे पाया और आप कुछ प्राप्त कर पाए। यह प्रसन्नता है, यह आनन्द है, यह आहलाद है जिसे होली कहा गया है। शालीनता के साथ जितनी मस्ती, हंसी, खुशी, विनोद, आनन्द लेना चाहें आप, मैं आपके साथ हूं हर क्षण और आपके चेहरे पर खुशी लाने की ही कोशिश करूंगा, देने की कोशिश करूंगा जो आपको आज तक प्राप्त नहीं हुई वे साधनाएं, वे दीक्षाएं और वह जीवन की पूर्णता।
आवश्यकता है कि आप लें, मुझसे प्राप्त करें और इस होली के पर्व पर भरपूर लाभ उठा पाएं। और आप साधनाएं सम्पन्न करते हैं तो देवताओं को साक्षी करके सम्पन्न करते हैं कि फिर सफलता तो प्राप्त होगी ही। और आप कहते हैं हमने देवताओं को नहीं देखा और शास्त्र कहते हैं सूर्य और चन्द्र प्रत्यक्ष देवता हैं जिन्हें आपने भी देखा हैं मैंने भी देखा है। बाकी इन्द्र को आपने देखा नहीं, मैंने भी नहीं देखा है। विष्णु को आपने शायद देखा नहीं, शंकर को आपने नहीं देखा। मगर सूर्य को आपने देखा है, मैंने भी देखा है, चन्द्रमा को आपने देखा है मैंने भी देखा है। अग्नि देवता, वातो देवता, सूर्य देवता, चंद्रमा देवता, वसो देवता, रुद्रा देवता तो यजुर्वेद ने कहा ये देवता हैं प्रत्यक्ष, इनको हम देख रहे हैं और इनकी साक्षी में हम साधना सम्पन्न करते हैं। तभी जल लेकर हाथ में संकल्प करते हैं, तभी दीपक प्रज्जवलित करते हैं। होली के बहुत ही अद्वितीय क्षण होते हैं चाहे आप संगीतकार हों, चाहें साधक हों, चाहे आप देवता बनना चाहते हो। आप जो करना चाहते हैं वो अवश्य होगा। जो असंभव कार्य है उसे भी इन क्षणों में साधनाओं के द्वारा पूर्णता दी जा सकती है। आपके पुत्र नहीं है वह तो हो सकता है, आप लखपति बनना चाहते हैं तो बन सकते हैं, विधाता ने आपका खाली छोड़ दिया भाग्य तो उसको भी भर सकते हैं क्योंकि ये ऐसे क्षण प्रभु ने बनाए है। बस उन क्षणों का महत्व बताने वाला चाहिए। जो गुरु होता है वह बता सकता है कि ये क्षण तुम्हारे लिए मूल्यवान हैं।
आप मेरे बेटे हैं यह मैं स्वीकार करता हूं और आपका मार्ग दर्शन करना मेरा कर्त्तव्य है। आप मेरी बात सुनते है, नहीं सुनते हैं, सपूत हैं या कपूत हैं पर पूत जरूर हैं- चाहे कपूत हों या सपूत हों। पूत तो हैं इसमें कोई संदेह नहीं है मगर मैंने कहा कि आप इस दिन कम से कम मेरी आज्ञा मानें और साधना करें और बाकी 364 दिन मैं आपकी आज्ञा मानूंगा। मगर साधना करें तो दृढ़ता के साथ करें, विश्वास के साथ करें और होली का प्रत्येक क्षण साधनात्मक और दीक्षात्मक बने और जो क्षण बचें उनको गुरु के साथ आनन्द, उमंग, उत्सव और मधुरता से व्यतीत करें। दोनों काम करें – साधनाएं भी करें, पूरा आनन्द भी लें और आनन्द तब पूर्ण प्राप्त होगा जब आप जो कुछ मैं दूं उसे स्वीकार कर लें, अन्यथा रह जाएगा सब! और साधना करें तो शास्त्रेचित ढंग से करें। फिर उसमें कहीं कोई अपूर्णता न रहे। पूरे विश्वास और दृढ़ता के साथ साधना करें। अर्जुन ने कहा- कृष्ण मेरा धनुष क्यों नहीं उठ रहा है, तो कृष्ण ने कहा- तुम साधक हो ही नहीं, तुम गुलाम हो, तुम दास हो, तुम मोह ग्रस्त हो, तुम सोच रहे हो ये मेरे दादा हैं, काका हैं, यह मेरा मित्र है, यह कृष्ण मेरा सारथी है। तुम मोहग्रस्त हो गए हो। साधक का कोई मां-बाप, भाई-बहन नहीं होता, केवल एक लक्ष्य होता है अपने गंतव्य स्थल तक, तुम अपने लक्ष्य को भूल रहे हो इसलिए तुम गांडीव नहीं उठा पा रहे हो।
कृष्ण ने भी साधक शब्द प्रयोग किया। कृष्ण ने कहा तुम अपने शरीर को साधने की क्रिया कर ही नहीं सकते, मैं भले ही सौ अवतार धारण कर लूं तो भी तुम साधक नहीं बन सकते। जब तक तुम शरीर को साधोगे नहीं, मेरे सामने साधक बन कर खड़े नहीं हो पाओगे, जब तक तुम मेरे हृदय से अपना मन जोड़ोगे नहीं तब तक तुम साधक नहीं बन पाओंगे और तब तक मैं कुछ तुम्हें दे भी नहीं पाऊंगा। मैं भी आपसे यही कह रहा हूं कि जब तक आप अपने मन को हुतात्मा नहीं बनाएंगे, जब तक गुरु से जोड़ेंगे नहीं तब तक आप जीवन में कुछ प्राप्त भी नहीं कर पाएंगे। मैं देना भी चाहूं तो भी आप ग्रहण कर नहीं पाएंगे। और हुतात्मा होने का, गुरु से जुड़ने का अद्वितीय समय होली है, एक ऐसा समय है जब कि आप आने वाले पूरे वर्ष को अपने लिए अद्वितीय बना सकते हैं। आपके पाप समाप्त हो सकें, आप साधनाएं सम्पन्न कर सकें, आपके पुण्य उदय हो सकें, आप सुखी हो सकें, आपके चेहरे पर मुस्कुराहट आए, आनन्द आए, एक मस्ती आए, ऐसा ही मैं आशीर्वाद देता हूं, ऐसी ही कल्याण कामना करता हूं और अपने हृदय में आपको बिठाता हुआ, आपके सिर पर वरद हस्त रखता हुआ एक बार पुनः आशीर्वाद देता हूं।
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरान्द जी
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