





सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत।।
अर्थात् सारे व्यक्ति रोग-शोक से रहित हों, सब लोग अपने जीवन में प्रसन्नता का अनुभव करें और स्नेह में निरन्तर वृद्धि हो, दुःख का सदैव नाश होता रहे। इन क्रियाओं की प्राप्ति हेतु मंजुल महोत्सव में आप आमंत्रित हैं।
संसार में इच्छा, ज्ञान और दिव्यचेतना जिसे शारीरिक देह कहा गया है, इन तीनों ही स्वरूपों में पूर्ण मिलन से ही सभी कार्य संपन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक स्वरूप में संसार में सुखी जीवन के लिए बुद्धि, धन और स्वस्थ शरीर की रक्षा तथा निरोगता के लिए महाशक्ति के तीनों रूपों की उपासना करने का विधान बताया गया है।
जगद्गुरु शंकराचार्य, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, राम कृष्ण परमहंस आदि सभी शक्ति के परम उपासक थे। दशम गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने शक्ति-उपासना से ही मुगल शासकों को परास्त किया था। जिस प्रकार परब्रह्म परमात्मा एक होने पर भी प्रयोजन वश ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों रूपों में स्थित हैं, ठीक उसी प्रकार आदि शक्ति भी प्रयोजन वश तीनों रूपों वाली हैं। वे तीनों ही एकाकार स्वरूपों में स्थित हैं। जो महाकाली हैं, वही महालक्ष्मी हैं और जो महालक्ष्मी हैं वही महासरस्वती हैं, हां कार्यभेद से नाम और रूप में अंतर है।
माता वैष्णो देवी आदि शक्ति का मूल स्वरूप हैं, इस शक्ति का कोई ओर-छोर नहीं है। इस शक्ति का अवतरण असुरों के संहार के लिए, सृष्टि के रचियता, पालनकर्त्ता और संहार कर्त्ता की सामूहिक शक्तियों के संयोजन से हुआ है। इस शक्ति में सृष्टि के निर्माण कर्त्ता ब्रह्मा ने महासरस्वती रूप प्रदान किया, पालनकर्त्ता विष्णु ने महालक्ष्मी का तथा संहारकर्ता भगवान सदाशिव महादेव ने महाकाली की चेतना का प्रार्दुभाव किया।
वामन पुराण के जिस प्रसंग में देवी का महिषासुर के साथ युद्ध का वर्णन हुआ है, उस एक ही प्रसंग में देवी को दुर्गा, कात्यायनी, सरस्वती, अम्बिका, परमेश्वरी, कौशिक, विन्ध्यवासिनी, महेश्वरी संज्ञाओं से संबोधित किया गया है। वही उमा, गौरी, सती, चण्डी, काली और पार्वती भी हैं। कटरा जम्मू से 14 कि0मी0 की दूरी पर त्रिकुट पर्वत की गुफा में तीनों ही शक्तियां पिण्डियों के स्वरुप में अवस्थित हैं। सर्व कार्यसिद्धि के लिए तीन रूप धारण किए हुए हैं। ये तीनों ही शक्तियां भले ही आदि शक्ति का स्वरूप हैं किन्तु महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के स्वरूपों का समवेत नाम ही माता वैष्णों देवी कहलाता है।
मार्कण्डेय पुराण और वाराह पुराण में इसी को वैष्णवी की संज्ञा दी गई है। जिस तरह भगवान शिव की चेतना के फलस्वरूप भक्त के श्यति पापम् स्वरूप में काशी, भारत का मुख्य तीर्थ बना। ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्रादि देवताओं की तपोभूमि तथा श्रीकृष्ण के गीता उपदेश से कुरूक्षेत्र तीर्थमय स्थान को प्राप्त हुआ। ठीक उसी तरह दस महाविद्याओं के पूर्ण स्वरूप में सांसारिक व्यक्ति को अभय और शक्ति प्रदान करने में माता वैष्णो देवी प्रमुख रूप में अवस्थित हैं। सांसारिक जीवन में भी विपरीत परिस्थितियां आने पर समय-समय पर महाशक्ति की आराधना कर उसके भिन्न भिन्न स्वरूपों को धारण कर, दुष्टों का नाश और भक्तों की रक्षा करने में यह आद्या-शक्ति ही समर्थ होती है और साधक को शक्ति से संचारित भी करती रहती है।
अपने जीवन की मलिनता और जीवन की विविध चिंताओं तथा जीवन की प्रगति में आने वाले अवरोधों को समाप्त करने के लिए किसी विशिष्ट शक्ति की आराधना, वंदना, संकल्प शक्ति की क्रिया साक्षीभूत गुरु के सानिध्य में और उनके निर्देशन तथा आशीर्वाद के साथ जब परिक्रमा और पूजा अर्चना सम्पन्न की जाती है तो वही वास्तव में तीर्थ यात्रा कहलाती है। तीर्थ के माध्यम से ही जीवन की इन विविध चिंताओं से मुक्त होना और मुक्त होकर नागपाश रूपी व्यथाओं से अपने आप को तार सके जिससे जीवन सभी भौतिक सुखों से युक्त हो सके और सांसारिक शक्तिरूप में गुरु का आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त हो सके और आध्यात्मिक स्वरूप में दैवीय शक्ति का सानिध्य प्राप्त होने से जीवन निश्छल और निर्विघ्न और निष्कंटक व्यतीत होता है।
आस्तिक व्यक्ति इन्हीं त्रि-शक्तियों को प्राप्त करने के लिए जीवन में अनेक तरह के व्रत-उपवास, पूजा-अर्चना, ध्यान-साधना अपनी बुद्धि के अनुरूप समय समय पर करता रहता है और साथ ही अनेक पवित्र नदियों में स्नान-दान, तप आदि क्रियायें भी करता है। इतना सब कुछ करने के बाद भी जीवन में यथार्थ रूप से किसी भी तरह से अनुकूलता नहीं आती और जीवन अनेक-अनेक उलझनों और विसंगतियो से घिरा रहता है।
आस्तिक रहते हुए भी वह चिंतन, आत्मियता और देह भाव और उन शक्तियों की क्रियायें जीवन में स्थापित नहीं हो पाती क्योंकि उसे सही सद्गुरु रूपी तपस्वी का सानिध्य और मार्गदर्शन नहीं मिलता। इसलिए अनेक तरह की क्रियायें करने के बाद भी जीवन में केवल अवसाद, दुःख, पीड़ा, दीनता जैसे अन्धकार का भाव स्थायी रूप से बना रहता है। और जीवन में चिंताओ का विस्तार देह की वृद्धि के साथ साथ बढ़ता रहता है।
ठीक इसके विपरीत श्रेष्ठमय अवसर और दिव्यता तथा तेजमय सद्गुरु का सानिध्य हो तो पूजा-अर्चना, ध्यान साधना, स्नान-दान, तपयुक्त धार्मिक यात्रा का कोटी-कोटी अक्षुण्ण लाभ साधक को जीवन में मिलता ही है क्योंकि साधक अपने जीवन को सुस्थिति में निर्मित करना चाहता है। साथ ही गुरु का कर्त्तव्य हो जाता है कि वह अपने शिष्य के जीवन की दीनता और सड़ी गली स्थितियों से निजात दिला सके। संकल्प वान् साधक के पास गुरु की ज्ञान शक्ति और चेतना का भाव साथ रहता हैं।
सात्विक साधक जीवन के मनोरथों को पूर्णरूपेण प्राप्त करने के लिए माता वैष्णों देवी की भक्ति अवश्य ही करता है। जीवन में अनेक विपत्तियों के समाधान में शक्ति स्वरुपा वैष्णों देवी ही पूर्णरूपेण सहायक होती है। मनुष्य देह हर रूप में भौतिक सुखों से श्रेष्ठता को प्राप्त हो सके, इसके लिए बुद्धिमान व्यक्ति आद्या शक्ति और भैरव को पूर्णरूपेण धारण कर अपने जीवन को सौभाग्यशाली बनाने की ओर अग्रसर होता है। इसी हेतु सद्गुरुदेव के सानिध्य में माता वैष्णों देवी की यात्रा कर त्रि-शक्ति को पूर्णरूपेण आत्मसात करने की क्रिया संपन्न की जा सकेगी। अक्षय तृतीया के श्रेष्ठमय दिवस 04 मई को वैष्णों देवी मंदिर प्रागंण में अक्षय धन लक्ष्मी दीक्षा, अप्सरा अनंग दीक्षा को आत्मसात कर सकेंगे। साथ ही साथ शत्रु पीड़ा हरण संहार दीक्षा और शंकराचार्य प्रणित त्रि-पिण्ड शक्ति दीक्षा, भैरव मंदिर में प्रदान की जायेगी।
थोड़ा कष्ट सहन करने वाला ही अपने जीवन में अनुकूलता और श्रेष्ठता ला सकता है। लाखों लाखों भक्त माता वैष्णों देवी की यात्रा करते हैं तो निश्चित रुप से यह पवित्र तीर्थ स्थान अवश्य ही प्रज्ञा और चैतन्य युक्त ही है और यह आप भली-भांति जानते भी हैं। जिसको अपने जीवन की नारकीय स्थितियों को समाप्त करना है, उसके पांव ठिठक नहीं पाते और वह यात्रा में सामान्य सी असुविधा को भुला देता है, क्योंकि उसका लक्ष्य उस त्रि-शक्ति शत्रुहन्ता महाकाली, ज्ञान रूपी सरस्वती और जीवन को हर दृष्टि से वैभवशाली बनाने में सहायक महालक्ष्मी को पूर्णरूपेण आत्मसात करने का चिंतन जो होता है।
केवल कटरा में ही पंजीकृत साधकों के लिए ही ठहरने और भोजन की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा हॉल (Hall) में ही संभव हो सकेगी। कटरा से माता वैष्णों देवी और भैरव मंदिर तक की यात्रा केवल पैदल ही होगी।
बेटियां, माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली न आएं। बीमार, असक्त, क्लीष्ट रोगी इस शिविर में भाग नहीं लें।
3 मई 2014 शनिवार को कटरा पहुँचना अनिवार्य है। रात्रि में विश्राम की व्यवस्था की गई है।
4 मई 2014 को प्रातः से पूर्व ही भोर काल में माता वैष्णो देवी की पद यात्रा प्रारंभ होगी।
अक्षय तृतीया के दिव्यतम अवसर और शंकराचार्य बोधित्सव दिवस पर मध्याहन्तः समय पर जब सूर्य पूरी तेजस्विता से साधकों के साथ-साथ माता वैष्णों देवी को आलोकित कर रहा होगा ऐसे प्रकाश पर्व के अवसर पर अक्षय धन लक्ष्मी दीक्षा, और अप्सरा अनंग दीक्षा प्रदान की जायेगी।
दिन में भोजन की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा माता दरबार के पास ही की गई है। आप सभी को गुरु प्रसाद को ग्रहण करना अनिवार्य है।
सांध्य बेला में भैरव मन्दिर प्रांगण में पूजा-अर्चना ध्यान के साथ शत्रु पीड़ा हरण संहार दीक्षा और शंकराचार्य प्रणीत त्रि-पिण्ड शक्ति दीक्षा प्रदान की जायेगी।
दर्शन, पूजा और दीक्षा प्राप्त करने के साथ ही अपनी स्वयं की व्यवस्था से सीधे घर को प्रस्थान करेंगे जिससे की जो दिव्यता आपने प्राप्त की है उसका पूरे जीवन भर श्रेष्ठ लाभ प्राप्त होता रहे।
शुल्क राशि कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर अथवा गुरूधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा कराएं अथवा ड्राफ्रट भेजे या सीधे खाता में जमा कर पंजीकरण (Registration) करा सकते है।
(दीक्षा न्यौछावरः 4100/-)
न्यौछावर राशि भेजने के लिए आप ‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’, ‘Pracheen Mantra Yantra Vigyan’ Jodhpur के नाम का ड्रॉफ्रट अथवा आप चाहे तो उक्त राशि स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यू-आई-टी-, जोधपुर ‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’ खाता क्रमांक 31763681638 अथवा स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यू-आई-टी-, जोधपुर
‘कैलाशचन्द्र श्रीमाली’ खाता क्रमांक 31706102525 में भेज कर भी लाभ प्राप्त कर सकते है। उक्त नाम से अपने वहां की बैंक शाखा में जमा करवा कर PAY IN SLIP की कॉपी भिजवा सकते हैं। पंजीकरण शुल्क आप सीधे अपने वहां के बैंक में जमा करा सकते हैं। बैंक ट्रांसफर का चालान नं- sms अथवा फैक्स करने पर पंजीकरण स्वीकार कर लिया जाएगा।
आप प्राचीन मंत्र-यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन न- 0291-2517025, 0291-2517028 अथवा मोबाइल नं- 07568939648, 08769442398 पर सम्पर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
माता वैष्णों देवी की यात्रा में प्रतिदिन साठ से सत्तर हजार भक्त पहुँचते हैं इसीलिए माता वैष्णो देवी शाईन बोर्ड द्वारा ऑनलाईन बुकिंग की ही व्यवस्था निर्दिष्ठ की गई है। इस हेतु मनोकामना भवन में स्वयं भक्त द्वारा ही इस वेब साईट पर www.matavaishnodevi.org बुकिंग करानी है और यह बुकिंग यात्रा दिवस से 30 दिन पूर्व ही खुलती है। आपके स्वयं के द्वारा बुकिंग कराने पर ही आपको समय पर रहने और सोने की व्यवस्था उपलब्ध हो सकेगी।
शाईन बोर्ड द्वारा अनेक स्थानों पर सार्वजनिक सुलभ शौचालय और स्नानघर बनायें गये हैं। उनका सही रूप से उपयोग करें। स्नान कर अजपा रूप में ‘ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ और जय माता दी, जय माता दी का उच्चारण करते रहे। माता वैष्णो देवी त्रि-पिण्ड के दर्शन पूर्ण श्रद्धा और आकांक्षा पूर्त्ति स्वरूप में अपने हृदय भाव में उस शक्ति को आत्मसात कर सकें और अपनी कामना लेकर सद्गुरुदेव से दीक्षा प्राप्त करें। जिससे जीवन के डर-भय न्यूनतायें और अभाव समाप्त हो सकें।
माता वैष्णो देवी दर्शन और गुरुदेव द्वारा शक्तिपात दीक्षा के साजुज्य को आत्मसात करने के बाद भगवान श्री भैरव बाबा की आभा को शक्ति स्वरूप में संचित कर सकें इस हेतु भैरव दर्शन और दीक्षा प्रदान की जायेगी।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,