





विज्ञानानन्दघन ब्रह्म का तत्व अति सूक्ष्म एवं गुह्य होने के कारण शास्त्रों में उसे अलग-अलग प्रकार से समझाने की चेष्टा की गयी है। इसलिये ‘शक्ति’ नाम से ब्रह्म की उपासना करने से भी परमात्मा की ही प्राप्ति होती है। एक ही परमात्मा तत्त्व की निर्गुण, सगुण, निराकार, साकार, देव, देवी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी शक्ति, राम, कृष्ण आदि अनेक नाम से भक्त उपासना करते हैं। रहस्य को जानकर शास्त्र और आचार्यों के बतलाये हुए मार्ग के अनुसार व्रत-उपासना करने वाले सभी भक्तों को उसकी प्राप्ति हो सकती है। उस दयासागर, प्रेममय सगुण-निर्गुणरूप परमेश्वर को सर्वोंपरि, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण गुणाधार, निर्विकार, नित्य, विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा समझकर श्रद्धापूर्वक निष्काम प्रेम से उपासना करना ही उसके रहस्य को जानकर उपासना करना है, इसलिये श्रद्धा और प्रेमपूर्वक उस विज्ञानानन्द स्वरूपा महाशक्ति भगवती देवी की उपासना करनी चाहिये। वह निर्गुणस्वरूपा देवी जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुण भाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर रूप से उत्पत्ति, पालन और संहार कार्य करती है।
उस ब्रह्मरूप चेतना शक्ति के दो स्वरूप हैं- पहला निर्गुण और दूसरा सगुण। सगुण के भी दो भेद हैं- पहला निराकार और दूसरा साकार। इसी से सारे संसार की उत्पत्ति होती है। उपनिषदों में इसी को परा-शक्ति कहा गया है। उस परा-शक्ति से ब्रह्मा, विष्णु और महेश उत्पन्न हुए। उसी से सब मरूद्गण, गन्धर्व, अप्सराएं और बाजा बजाने वाले किन्नर सब ओर से उत्पन्न हुए। समस्त भोग्य पदार्थ और अण्डज, स्वेदज, उभ्दिज्ज, जरायुज जो कुछ भी स्थावर, जगम, मनुष्यादि प्राणीमात्र उसी पराशक्ति से उत्पन्न हुए।
बहुत से सज्जन इसको भगवान की ह्लादिनी शक्ति मानते हैं। महेश्वरी, जगदीश्वरी, परमेश्वरी भी कहलाती हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, राधा, सीता आदि सभी इस शक्ति के स्वरूप हैं। माया, महामाया, मूलप्रकृति, विद्या, अविद्या आदि भी इसी के रूप हैं। परमेश्वर शक्तिमान् हैं और भगवती परमेश्वरी उनकी शक्ति हैं। शक्तिमान से शक्ति अलग होने पर भी अलग नहीं समझी जाती। जैसे अग्रिकी दाहिका शक्ति अग्रि से भिन्न नहीं है। यह सारा संसार शक्ति और शक्तिमान से परिपूर्ण है। तथा उसी से इसकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। इस प्रकार समझकर वे लोग शक्तिमान् और शक्ति की उपासना करते हैं। प्रेमस्वरूप भगवती ही भगवान् को सुगमता से मिला सकती है। इस प्रकार समझकर कोई-कोई केवल भगवती की ही उपासना करते हैं। इतिहास-पुराणादि में सब प्रकार के उपासकों के लिये प्रमाण भी मिलते हैं।
इस महाशक्तिरूपा जगत् जननी की उपासना लोग विविध प्रकार से करते हैं। कोई तो इस महेश्वरी को ईश्वर से भिन्न समझते हैं और कोई अभिन्न मानते हैं। वास्तव में तत्त्व को समझ लेना चाहिये फिर चाहे जिस प्रकार उपासना करें कोई हानि नहीं है। तत्त्व को समझकर श्रद्धा, भक्तिपूर्वक उपासना करने से सभी उस एक प्रेमास्पद परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं।
पुराण, इतिहास, शास्त्रों में इस गुणमयी विद्या-अविद्यारूपा माया शक्ति को प्रकृति, मूल प्रकृति, महामाया, योगमाया आदि अनेक-अनेक नामों से कहा है। उस माया शक्ति की व्यक्त यानी साम्यावस्था तथा विकृतावस्था दो अवस्थाएँ हैं। उसे कार्य, कारण एवं व्याकृत, अव्याकृत भी कहते हैं। तेईस तत्त्वों के विस्तार वाला यह सारा संसार तो उसका व्यक्त स्वरूप है। जिससे सारा संसार उत्पन्न होता है और जिसमें यह लीन हो जाता है वह उसका अव्यक्त स्वरूप है।
विद्या- अविद्यारूप त्रिगुणमयी यह महामाया बड़ी विचित्र है। इसे कोई अनादि, अनन्त और कोई अनादि सान्त मानते हैं तथा कोई इसको सत् और कोई इसे ब्रह्म से भिन्न बतलाते हैं। वस्तुतः यह माया बड़ी विलक्षण है इसलिये इसको अनिर्वचनीय कहा है।
अविद्या- भक्ति, पराभक्ति, ज्ञान, विज्ञान, योग, योगमाया, समष्टि बुद्धि, शुद्ध सूक्ष्म, सदाचार, सद्गुण रूप दैवी सम्पदा- यह सब इसी का विस्तार है।
जैसे ईंधन को भस्म करके अग्नि स्वतः शान्त हो जाती है, वैसे ही अविद्या का नाश करके विद्या स्वतः भी शान्त हो जाती है। इसलिये इस माया को अनादि, अनन्त भी नहीं माना जा सकता। इसे न तो सत् ही कहा जा सकता है और न असत् ही। असत् तो इसलिये नहीं कहा जा सकता कि इसका विकार रूप यह सारा संसार प्रत्यक्ष प्रतीत होता है और सत् इसलिये नहीं बतलाया जाता कि यह दृश्य जडवर्ग सर्वथा परिवर्तनशील होने के कारण इसकी नित्य सम स्थिति नहीं देखी जाती।
माया को परमेश्वरी अभिन्न नहीं कहा जा सकता, क्योंकि माया प्रकृति जड़, दृश्य, दुःख रूप विकारी है और पर-मात्मा चेतन, द्रष्टा, नित्य, आनन्दरूप और निर्विकार हैं। दोनों अनादि होने पर भी परस्पर इनका बड़ा ही अन्तर है। जिस सर्वव्यापी, अनन्त, अविनाशी, परब्रह्म, अन्तर्यामी पर-मात्मा में विद्या, अविद्या दोनों स्थित हैं। अविद्या क्षर है, विद्या अमृत है। विद्या, अविद्या पर शासन करने वाला वह परमात्मा दोनों से ही अलग है।
जैसे भी हो मूल रहस्य को समझकर परमात्मा की उपासना करनी चाहिये। मूल को समझकर की हुई उपासना ही सर्वोत्तम है। जो परमेश्वर को मूल तत्व से समझ जाता है वह उसको एक क्षण भी नहीं भूल पाता, क्योंकि सब कुछ परमात्मा ही है, इस प्रकार समझने वाला परमात्मा को कैसे भूल सकता है? अथवा जो परमात्मा को सारे संसार से उत्तम समझता है? क्योंकि यह नियम है कि मनुष्य जिसको उत्तम समझता है उसी का चिन्तन करता है यानी ग्रहण करता है।
ईश्वर की भक्ति करने से मनुष्य परमपिता परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है। इसलिये श्रद्धापूर्वक निष्काम, प्रेमभाव से नित्य-निरन्तर परमेश्वर का भजन, ध्यान करने के लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये।
मंत्र-जप, पूजा, ध्यान, रहस्य आदि का भी पुराणों में अत्यन्त श्रेष्ठ शैली से निरूपण किया गया है। नाम, धाम, रूप, लीला-ये सब चिन्मय भगवत् स्वरूप हैं, इन सबका अथवा इनमें से किसी एक का भी आश्रय ग्रहण कर लेने पर जीव के लिये कुछ कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। ज्ञान, मुक्ति आदि तो इनमें से एक-एक के सेवक हैं। अवश्य ही ऐसे वर्णनों से अपनी निष्ठा में साधकों की अनन्यता होती है और यह सर्वथा यथार्थ भी है, क्योंकि ब्रह्मतत्त्व के सिवा जब और कोई वस्तु ही नहीं है, तब किसी भी वस्तु को ब्रह्मरूप से निरूपण करने में आपत्ति ही कहां रह जाती है।
पराशक्ति त्रिपुर सुन्दरी से ही शब्द एवं वस्तुओं की उत्पत्ति हुई है। शक्ति के स्फूर्तिरूप धारण करने पर शिव ने उसमें तेजस्वरूप से प्रवेश किया, तब ‘बिन्दु’ का प्रादुर्भाव हुआ। शक्ति के शिव में प्रवेश से स्त्रीतत्त्व ‘नाद’ व्यक्त हुआ। ये ही दोनों तत्त्व-नाद-बिन्दु मिलकर अर्धनारीश्वर हुए।
यही ‘कामतत्त्व’ है। पुंतत्व श्वेत एवं स्त्रीतत्त्व लाल हैं। दोनों के संयोग से कला की उत्पत्ति हुई है। इस काम एवं कला के तथा नाद एवं बिन्दु के योग से ही सृष्टि उत्पन्न हुई। मूलतत्त्व अनन्त एवं अव्यक्त है। सृष्टि प्रत्येक विकास में उस शिवत्व का आगम है। उन शिव की आद्याशक्ति ही प्रकृति रूपा हैं। उसी शक्ति और शक्तिमान् का आदि स्त्रोत हिमालय पर शिव-शिवारूप में विराजमान हैं।
श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों ने जिस की सराहना की है, जो सबको कल्याण प्रदान करने वाली है, परम पवित्र तथा व्यवहारिक है, वही आदिम, सनातन और यज्ञमूलक शिव-शिवा संस्कृति है। इसका प्रसार-विस्तार हिमालय से कन्याकुमारी तक और सोमनाथ से कामाख्या तक 108 शक्तिपीठों, 51 महाशक्तिपीठों और द्वादश ज्योतिर्लिगों के रूप में आज हजारों वर्षों बाद तक विद्यमान है।
एक-एक देवता की शक्ति से जिस प्रकार शक्ति के विभिन्न अंगों का निर्माण हुआ था, उसी प्रकार सतीरूपा पराशक्ति शिवा के योगाग्निदग्ध शरीर के विभिन्न अवयवों ने भव ने सहकार से यत्र-तत्र गिरकर तत्तदेवता को शक्ति सम्पन्न होने का अवसर प्रदान किया। परिणामः कश्मीर से कन्याकुमारी तथा सौराष्ट्र से आसाम तक प्रसृत इस भारत-भूमि का कण-कण विराट् शक्तितत्त्व से अनुस्यूत परिलक्षित होता है। इस देश के चारों भाग शक्ति के विभिन रूपों से रक्षित किये गये हैं। उत्तरी उत्तुग भाग में परमशक्ति वैष्णों देवी, दक्षिणी दिग्भाग के कुमारी अन्तरीप में कन्याकुमारी, पूर्वदिग्भाग में कम्पिलनगर में तथा मैसूर में महिषासुरमर्दिनी, मदुरई में मीनाक्षी, हम्पी में गजलक्ष्मी, कुरूक्षेत्र, नासिक, उज्जैन तथा वरंगल में भद्रकाली, हिमाचल के काँगड़ा में चामुण्डा, चिन्तपूर्णा में छिन्नमस्ता, ज्वालामुखी में ज्वाला जी तथा नयनादेवी में नयनरूप में आदि शक्ति प्रतिष्ठित हैं। दतिया में पीताम्बरा, उज्जैन में हरसिद्धि, आन्ध्र के श्रीशैलम् क्षेत्र में भ्रमराम्बा तथा इसी प्रकार भारत के प्रसृत भू-भाग में सभी क्षेत्रों, प्रान्तों में अनेक अनेक शक्ति मन्दिर स्थापित हैं। पुराणों के अनुसार दक्षदुहिता सती ने अपने पिता के यज्ञ में जब अग्नि से अपना शरीर त्याग दिया, तब भगवान शिव उनके शव को अपने कन्धे पर रखकर उन्मत्त भाव से ताण्डव करने लगे, जिससे सर्वत्र हाहाकार मच गया। देवों की प्रार्थना कर भगवान विष्णु ने अलक्ष्य रूप में अपने चक्रायुध से सती के शव के खण्ड-खण्ड कर यत्र-तत्र गिराये। सती के शरीर के विभिन्न अवयव और उनमें धारण किये गये आभूषण मुख्य रूप से 51 स्थलों पर गिरे। यही 51 स्थल शक्तिपीठ रूप में प्रतिष्ठित हुए।
आप सुख, स्वास्थ्य, धन, मान या अपना उद्धार- जो कुछ भी चाहें, उसकी प्राप्ति का एक मात्र उपाय है- शक्ति की उपासना। भजन करने में कठिनाई नहीं व्याप्त होती और अपना तन, मन, धन – जो कुछ भी अपना कहा जाने वाला हो, सब कुछ मन से इष्ट को अर्पण कर दें। आप अपने इष्टरूपी गुरु के हो जायें। सब कार्य, सारी चेष्टा, भगवान ही अपने लक्ष्य अपने प्राणों के आराध्य बन जायें। ऐसी अवस्था में जो सुख मिलेगा, उसकी कहीं तुलना नहीं है। आप घर न छोड़े, काम न छोड़े, केवल भगवान से नाता जोड़ लें, उनके ही हो जायें। सब कार्य करते हुए गुरु चिंतन करें। तभी जीवन में पूर्णता की प्राप्ति हो सकेगी।
अपने जीवन की मलिन और दरिद्रता पूर्व स्थितियों से निजात पाने और अपने जीवन में पराशक्ति गौरी स्वरूप में लक्ष्मी के मूल तत्व को आत्मसात कर ही भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में उन्नति सम्भव हो पाती है। वही साधक जीवन में शक्ति सम्पन्न और धन-धान्य, श्री तथा अष्टलक्ष्मी से सम्पन्न हो पाता है, जो जीवन में गौरी स्वरूपा पार्वतीमय लक्ष्मी शक्ति को पूर्णरूपेण धारण करता है। अपने जीवन को पूर्ण शिवगौरीमय बनाने हेतु किन्हीं तीन पत्रिका सदस्य बनाने पर आपको यह गोष्ठ-गौरी आद्याशक्ति दीक्षा और साधना सामग्री उपहार स्वरूप प्रदान कि जायेगी।
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