





वृहदारण्यक उपनिषद् का यह श्लोक संसार के परम ज्ञान को स्पष्ट करता है। यह संसार अनगिनत द्वन्दों से भरा पड़ा है। कई लोक ईश्वर की खोज के लिए घर बाहर छोड कर संन्यास धारण कर लेते हैं, लेकिन वे अपने भीतर के मनुष्य को ही खो बैठते है। ये उनींद अवस्था सन्यास की भावना अत्यन्त एकाकी और दोषपूर्ण विचार धारा हे। हमारा जीवन शरीर और आत्मा स्त्री और पुरूष आदि कितने ही द्वन्दों पर खड़ा है। मानव के इन बुनियादी अधिष्ठानों के विरूद्ध विद्रोह करके संन्यासी भी सफल नहीं हो सका है। अपने पैरों को काटकर कौन इस दुनियां मे चल सका हे? अपनी आंखों को फोड़ कर कौन देख पाया है?
यह सच है कि एक संन्यासी निरकद्वन््द अवस्था में ही ब्रह्मानन्द का अनुभव करता है, इसी अनुभव के लिए उसके सारे परिश्रम होते हैं। अनेक यम, नियम, प्रत्याहार का पालन भी इसी ब्रह्मानन्द की प्राप्ति के लिए करता है। फिर भी, यह सब करते हुए भी जीवन के द्वन्द्दों को स्वीकार करना ही पड़ता है। आत्मा के अस्तित्व का साक्षात्कार दुनियां तभी पाती है जब वह आत्मा, शरीर धारण कर लेती है। स्त्रियां नो मास तक गर्भ धारण न करें तो मनुष्य पैदा केसे हो सकेगा? इतनी सरल और आसान बातें है सारे सामान्य आदमी इन्हें मानकर ही चलता है। वह अपने आप को सहज रूप में प्रकृति का ही एक हिस्सा मान लेता है। इसलिए मनुष्य प्रकृति का स्वामित्व भी स्वीकार कर लेता है।
यह सच है कि मनुष्य केवल प्रकृति की उपज नहीं है उसका आधा भाग यानि उसका शरीर प्रकृति के कितने ही नियमों से नियंत्रित रहता है। उस शरीर के द्वारा ही उसकी आत्मा का भी विकास संभव होता है। इस तरह विकसित मनुष्य प्रकृति से भी काफी बड़ा होता है, वह प्रकृति से मुख मोडकर या प्रकृति को ठुकराकर नहीं उसके अस्तित्व को स्वीकार करके ही पाता है। जीवन को केवल आत्मा या केवल शरीर मानना दोनों एकदम अलग सिरे वाली कल्पनाएं है। सर्वथा गलत विचार है इस तरह की एकांगी कल्पनाओं के कारण ही मनुष्य मानसिक रूप से विकृत होते हैं। अपना सर्वनाश कर लिया करते हैं।
पूर्णभोगी बनना शरीर की क्रिया है ओर सब कुछ छोड कर संसार से भागकर एकांत में ब्रह्म प्राप्त करने की धारणा भी गलत है। भोग युक्त जीवन में रहते हुए भी योगी बने रहना ही तो संन्यास है। केवल मनुष्य ही प्रकृति ओर परमात्मा के बीच की सर्वश्रेष्ठ कड़ी है। परमात्मा द्वन्द्रातीत है और प्रकृति को द्वन्द की कोई कल्पना तक नहीं होती उसकी कल्पना तो केवल मनुष्य ही कर सकता है। वह नदी जो प्यास से तड़पते तृष्णा को शांत करती हे गहरे पानी में उतरने पर उसकी जान भी ले लेती है।
जीवन के इन द्वन्द्दों का ज्ञान केवल मनुष्य के मन में ही जागता हे विकास की हर अवस्था के साथ यह ज्ञान सूक्ष्म और व्यापक होता जाता है। जीने की अदम्य इच्छा ओर उसके लिए हर प्राणी द्वारा जारी कोशिश मनुष्य को मिली प्रकृति की ही विरासत हे। लेकिन मनुष्य जीवन में आत्मा रथी, शरीर रथ, बुद्धि सारथी और मन लगाम है। विभिन्न इन्द्रियां घोडे हैं, उपभोग के सभी विषय उसके रास्ते है, इन्द्रियों और मन से युक्त आत्मा उसका भोकक्ता।
संन्यासी उसे ही कहा जा सकता है जो इस जीवन रूपी समर भूमि में अपने हाथ में लगाम रखें अपने मन पर बुद्धि पर नियंत्रण रखें और योगी धर्म की अपेक्षा गृहस्थ का धर्म निभाना बहुत कठिन है। हर मनुष्य की आत्मा शरीर के बंधन में बंधी पड़ी मालूम होती है, और इसी आत्म सुख की प्राप्ति के लिए यह आत्मा चाहती है कि इसी शरीर में रहकर तरल और विशाल बन जाए। जीवन के प्रति आशक्ति वास्तव में आत्म आशक्त है। हर परिवार, नौकरी, व्यवसाय यह सारे कर्म मनुष्य आत्म सुख के लिए ही करता है और जो आत्म सुख प्राप्त करने की विद्या जानता है वह संन्यासी है।
शरीर और आत्मा एक दूसरे के शत्रु नहीं वे तो एक रथ के दो पहिये है इनमें से एक भी पहिया टूट के गिर जाए तो दूसरे पर सारा भार आकर उसका संतुलन नष्ट हो जाता हे। आत्मा की उन्नति के लिए देह को कष्ट देना या देह के सुख के लिए आत्मा को बेहोशी में रखना दोनों गलत है। परमात्मा द्वारा निर्मित प्रकृति के विविध सौन्दर्य अपवित्र या अस्पर्श कैसे हो सकते है।
गृहस्थ जीवन तो वास्तव में तपस्वी जीवन है, गृहस्थी उसका यज्ञ है। प्रीति, वात्सल्य, करूणा, गृहस्थ जीवन के ऋत्विक है। निरपेक्ष प्रेम के बोल जीवन मंत्र है, सेवा, त्याग, भक्ति ये गृहस्थ जीवन के यज्ञ की आहति है।
यही मर्यादा का स्वरूप विस्तृत किया सद्गुरुदेव ने अपने पूरे जीवन में और इसी संन्यास को सार्थक बनाया। लाखों-लाखों शिष्य यही संन्यास भावना लिए अपने जीवन में निरन्तर ज्ञान यज्ञ में गतिशील हैं, उसी महान संन्यास धर्म को अनुप्राणित करने हेतु एकत्र होंगे।
शरीर भी उन्नति करे और आत्मा भी उन्नति करे देहगत सारे सुख प्राप्त हो और आत्मगत सारे सुख प्राप्त हो यह मनुष्य जीवन बुद्धि भावना और शरीर के त्रिवेणी संगम का नाम है।
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