

जिसने अपना चित्त गुरु के चित्त में लगा लिया, जिसके हृदय में गुरु समाहित हो गए, जिसके व्यवहार में गुरु का अनुसरण हो गया वह गुरु रस से सरोबार हो जाता हे, जिस प्रकार वृक्ष में हर स्थान पर जल ही जल रहता है ओर वह जल दृश्यमान नहीं होते हुए भी वज्ष में विद्यमान रहता है, उसी प्रकार जिसके जीवन में सद्गुरु रस है, उसका जीवन ही जीवन है। अन्य जीवन तो पंचभूतों से बना एक देह मात्र है। यह सूत्र गुरु तत्व का सारभूत तथ्य है।
दूध में निर्गुण निराकार घृत विद्यमान है, मंथन करने से वह निकल ही जाता है, पानी में घी नहीं है तो हजार वर्ष मथें तो भी घी पेदा नहीं हो सकता। तिल में तेल पहले से ही विद्यमान रहने से मथने पर निकल ही पड़ता है। बालू को हजार वर्षों तक पेलें तो भी उसमें से तेल नहीं निकल सकता। ठीक उसी प्रकार जो शिष्य हे उसमें सदगुरु रस अवश्य ही विद्यमान हे, आवश्यकता हे तो अपने जीवन में तप द्वारा, साधना द्वारा निरन्तर मंथन कर उस चेतन्य रस से अपने आप को आप्लावित करने की।
सृष्टि में अनन्त गुण है, अनन्त विद्याएं है, अनन्त कलाए हें, इसके बावजूद भी मनुष्य अपने आप को अतृप्त और शुष्क अनुभव करता हे, तो स्पष्ट है कि उसके जीवन में प्रेरणा का सागर नहीं है। अर्थात् प्रेरक से ज्ञान प्राप्त करना। जिस भाव से जीवन में प्राप्त हो, वह भाव प्रेरणा भाव कहलाता हे। प्रेरणा की साकार मूर्ति केवल सद्गुरु ही हो सकते हें। सदगुरु प्रेम की प्रतिमूर्ति ही नहीं साकार रूप होते हें जिसने गुरु से प्रेम कर लिया उसके लिए संसार के सारे प्रेम बौने हो जाते हैं, क्योंकि उसने प्रेम रस द्वारा चेतन्न्य रस का आस्वादन कर उसे अपने भीतर बसा लिया। गुरु तत्व तो प्रवाहमान तत्व हे, जो ठहरे हुए जीवन में प्रवाह ला सकता हे, इसीलिए गुरु को रसेश्वर कहा गया है, शिव स्वरूप माना गया है। जहां गुरु हे वहां रस औषधी अवश्य ही हे।
प्रवाहमान जीवन्त जल में और व्यक्तित्व में सारे दोष बहकर दूर हो जाते हैं। ये जीवन का निर्द्न्द प्रवाह ही सद्गुरु की चेतना है। जहां इस प्रवाह को अपने अंहकार, बुद्धि से रोकने का प्रयत्न किया वहीं जीवन में अनुभूति समाप्त हो जाती है। जीवन में तरलता समाप्त हो जाती है। इस निखिल रस के प्रवाह को अवरूद्ध मत होने दो इस प्रवाह में अपने जीवन को प्रवाहित करने में ही जीवन की सार्थकता है।
हर क्षण जीवन में नवीनता आवश्यक है, जहां यह परिवर्तन और नवीनता है वहां जीवन में आनन्द आता रहता है, और जीवन में जब एक बार आनन्द का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है, तब वह प्रवाह रूक नहीं सकता है। सद्गुरु कहते हें कि शिष्य तुम मेरे ‘तत्वमसि’ हो तेरा आत्मा तत्व हे और व सत् है, तुम भी मेरी तरह सत् हो मेरे भीतर जो ‘अणिमा’ सूक्ष्म तत्व हे वह स्थूल देह में तुम्हारे भीतर व्याप्त है। बीज को देखकर कोई नहीं कह सकता कि इसमें कितना विशाल वृक्ष छिपा हुआ है। गुरु का अणु सत्य ही शिष्य रूपी बीज हे। उस अणु रूप से ही महान वृक्ष बन सकता है। यदि उसमें पूर्ण श्रद्धा, साधना, तपस्या से सींचन किया जाये।
नवीनता का संचार करना और जीवन को नवीन बनाना गुरु का कार्य हे, शिष्य का कार्य विशुद्ध मन से अहंकार रहित होकर गुरु के समीप जाकर बैठ जाना है, जहां यह विश्वास और श्रद्धा विद्यमान रहती है वहां सदगुरु रस बहने लगता है, रसेश्वर शिव रस प्रवाहित होता है।
भागीरथ ने तपस्या कर गंगा को विवश कर दिया कि वह हिमालय से उतर कर भारत में प्रवाहित हो। राजा भागीरथ के इसी प्रयास के कारण, तपस्या के कारण गंगा को भागीरथी कहा गया। इस गंगा के पवित्र और तीव्र वेग को भगवान शिव ने ही अपनी जटाओं में धारण कर पूरे भारत वर्ष को आप्लावित किया, जहां एक और भगवान शिव पवित्र गंगा को धारण करने वाले हैं, वहीं दूसरी और भगवान शिव नीलकण्ठ महादेव भी कहलाये, जिन्होंने समुद्र मंथन के पश्चात् उत्पन्न विष को अपने कण्ठ में धारण किया।
गुरु का कार्य भी भगवान शिव के समान ही होता है। शिष्य के सामने हजारों-हजारों दुख है, ओर गुरु के समक्ष हजारों-हजारों शिष्य है। इन सब के दुख रूपी विष को अपने भीतर धारण करना गुरु का कर्त्तव्य है। अनादिकाल से ज्ञानरूपी सदगुरु यही तो कार्य करते आए है। ‘सम्भवामि युगे युगे’ का तात्पर्य यही है कि जब-जब संसार में अज्ञान का अंधकार बढ़ेगा ओर ज्ञान का सूर्य अस्त होने लगेगा तो सद्गुरु किसी न किसी रूप में आकर संसार के अज्ञान को दूर कर नवीन वातावरण चेतनामय वातावरण का निर्माण अवश्य ही करेंगे।
मित्रों, यह याद रखो कि प्रकृति में चाहे परिवर्तन हो जाए एक बार गुरु कृपा हुई तो वह व्यर्थ नहीं जाती, यह | कृपा शिष्य के साथ जन्म जन्मातर रहती हे, जो मंत्र तुम्हें गुरु श्रीमुख से मिला है उसे पूर्ण श्रद्धा से परम सत्य निष्ठा से जप करो। मंत्र, गुरु शक्ति और तुम एक हो, इस बात को कभी मत भूलो। मंत्र में पूज्य गुरुदेव मूर्तिमान होकर आवास करते हैं। इसीलिए गुरु मंत्र को प्रेम से गाओ, स्नेह से ध्याओं, शक्ति तो विद्युत बेग से तुम्हारे लिए कार्य करेगी ही, मेरे मित्रों! मुझे गर्व करना गुरुदेव ने ही सिखाया, स्वाभिमान, साधना की शक्ति उन्होंने ही प्रदान की, में पूज्य गुरुदेव से उतना ही निकट हूं जितना गुरु आश्रम में बेठे शिष्य अथवा कहीं और स्थान में गुरु मंत्र का जप करता हुआ उनका शिष्य। हम सब मिलकर प्रार्थना करें, हमारे इस जीवन को धन्य बना देने वाले पूज्य गुरुदेव को शत् शत् नमन करें।
साधक जब शिष्य बनता हे तो गुरु से दीक्षा प्राप्त करता हे। दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात् ही वह अपने जीवन में उच्च कोटि की साधनाओं में प्रवत्त होकर सिद्धि प्राप्त करता है। पुण्य, सफलता, श्रेष्ठता, ज्ञान, प्रेम, ऊंचा उठने की भावना, अपने आप में विद्वान बनने की क्रिया समाज में सर्वोपरि और ख्याति की क्रियायें है। इष्ट के साक्षात् दर्शन, मन की पूर्ण शांति आदि। इन सभी का समावेश अगर कहीं है तो गुरु के दक्षिण पैर में है। इसीलिए उस दाहिने पैर की सेवा, अर्चना, सुश्रुषा करना समस्त देवताओं ओर पितरों, पूर्वजों और वर्तमान में अपने पिता-माता उन सबकी पूजा करने और उनको पूर्णता देने के बराबर हे।
इसी प्रकार मनुष्य के आज्ञा चक्र में 32 बिन्दु होते हें इनमें 16 भौतिक जीवन के तथा 16 बिन्दु आध्यात्मिक होते है। गुरु का कार्य अपने शिष्य के भौतिक जीवन पक्ष को मजबूत बनाना तो है ही, इसके साथ-साथ आध्यात्मिक पक्ष को भी निरन्तर उन्नत करना आवश्यक है जिससे वे आत्म साक्षात्कार कर सकें। अपने आपको पूर्ण रूप से समझ सकें। जीवन की क्रियाओं का उद्देश्य जान सके, जीवन की गति को समझ कर सही दिशा में ले जा सकें। इन सब के साथ-साथ वे स्वयं में सिद्धियों के स्वामी बन सकें। सदगुरु की धारणा यही रहती है कि प्रत्येक शिष्य को गुरुमय ही बनाना चाहते है। इसके लिये वे विभिन्न क्रियायें करते ही रहते हैं।
साधक ही तपस्वी होता है क्यों कि साधना का तात्पर्य ही जीवन में निश्चित सिद्धान्त अपनाकर निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सदैव कर्मशील रहना है। सबसे विशेष तथ्य यह है कि तपस्वी का सम्बन्ध भगवती श्री विद्या से है ओर श्री विद्या के ही नाम ललिता, राज राजेश्वरी, महा त्रिपुर सुन्दरी, षोडशी इत्यादि है। ऋग्वेद के वृहचोपनिषद् में इस पर सुलेख है कि एक मात्र देवी ही सृष्टि की पूर्व थी और राज राजेश्वरी से ही सभी देवता प्रादुर्भूत हुए।
श्रीविद्या की उपासना से आत्मज्ञान, शोकोत्तीर्णता से युक्त भोग और मोक्ष भी सुलभ है-
श्री विद्या चारों पुरूषार्थ -धर्म, अर्थ काम, मोक्ष की दात्री है। श्री राज राजेश्वरी के आयुध है-पाश, अंकुश, इक्षुधनु और पंचपुष्प वाण। अर्थात् पाश इच्छा का प्रतीक, अंकुश ज्ञान का प्रतीक, वाण व धनु क्रिया शक्ति का प्रतीक है। श्री राज राजेश्वरी उस परम चेतन्य परब्रह्म परमात्मा से अभिन्न है। इसी को परमा विद्या, महाविद्या कहा गया है- “या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता” यही सर्व देवमयी विद्या हे। इसी को ”शक्तियासि सा भगवती परमा हि देवि” कहते हैं। विश्व में समस्त विद्याएं इन्हीं के भेद हैं। ““विद्या समस्तास्तव देविभेदा:।” मंत्रों में श्रीविद्या को श्रेष्ठ माना हे। “श्री विद्येव हि मंत्राणाम्।” राज राजेश्वरी श्री विद्या वाग्दोहरूप ओंकार का दोहन करती हे- यह शांत और शानन्तांतीता है। मंत्र और मंत्राधीना होकर सर्व मंत्रेश्वरी, सर्व यंत्रेश्वरी व सर्व तंत्रेश्वरी है, यही राज राजेश्वरी श्री लक्ष्मी का स्वरूप है। जीवन में कर्म, ज्ञान, क्रिया, भोग के साथ-साथ उपासना, साधना, विद्या, ज्ञान भी आवश्यक है और जब इन दोनों का सहयोग होता है तब व्यक्ति जीवन में सही रूप में पूर्ण बन पाता है।
नूतन वर्ष का प्रारम्भ रायगढ छतीसगढ में 2-3-4 जनवरी को विशाल शिविर में यही महान दीक्षा शक्तिपात के माध्यम से प्रदान की जायेगी इन तीन दिवसों में जीवन के तीनों ही पक्ष धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता की प्राप्ति हो सके और जीवन अहम् ब्रह्मास्मि विष्णु शिव स्वरूप बन सके। साथ ही पुराने कूड़े-करकट को हटाना, जीवन में छाये हुए अहंकार को समाप्त करना है, जीवन को नूतन स्वरूप में किस प्रकार चलाना है, क्योंकि गुरु का कार्य ही शिष्य के अंतः चक्षुओं को जाग्रत कर अंधकार का नाश करना है।
इसी क्रिया के माध्यम से शिष्य स्वयं ज्योर्तिमय श्रीलक्ष्मी युक्त हो सकता है, अपने मन, प्राण, आत्मा को जाग्रत कर सकता है।
इस क्रिया की विराटता को कुछ शब्दों में बांधना संभव नहीं है। गुरु ने आपका हाथ थामा है और गुरु आपके जीवन को शक्ति सम्पन्न सिद्धि युक्त, प्रज्ञा पुरूष बनायेंगे ही, यह गुरु का वादा है। आवश्यकता है शिष्य के संकल्प की।
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