





प्रत्येक प्रकार की साधना में अलग-अलग प्रकार के मंत्रों के उल्लेख साधना विज्ञान में हैं, प्रत्येक मंत्र जो कि वर्णमाला के अक्षरों से बना है, उसके मूल में एक बीज मंत्र अवश्य ही होता है और यही बीज मंत्र उस सम्पूर्ण मंत्र का सार तत्व, उसकी उत्पत्ति का कारण है, साथ ही उसका फल प्रदायक। जिस प्रकार बीज के अभाव में वृक्ष की कोई उत्पत्ति नहीं है, उसी प्रकार मंत्र के बीज तत्व के अभाव में साधना फल असंभव है, जिस प्रकार एक छोटा सा बीज उचित जल, खाद एवं सूर्य की ऊर्जा से प्रकाश के कारण विशाल वट वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है, उसी प्रकार बीज मंत्र रूपी मूल से सामान्य सा भक्त श्रेष्ठ साधक बनकर ही श्रेष्ठ स्वरूप में साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है।
प्रत्येक साधक के लिए जो कि साधना के क्षेत्र में सफल होना चाहता है, उसके लिए विभिन्न साधनायें तो आवश्यक है, लेकिन जब तक मन को सहज स्वरूप प्राप्त नहीं होता, श्वास पर पूर्ण नियन्त्रण नहीं हो पाता, ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाता, तब तक साधना में सफलता नहीं मिल पाती, जहां प्रत्येक साधना के लिए अलग-अलग प्रकार के बीज मंत्रों का उल्लेख है, जिनके विधि-विधान अलग-अलग प्रकार के है, लेकिन प्रश्न यह उठता है, कि कौन सा ऐसा बीज मंत्र जपा जाय, जो कि स्पष्ट रूप से बीज मंत्र ‘मंत्रराज’ हो, जिसकी सिद्धि प्राप्त होने पर सम्पूर्ण प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाय।
इस संबंध में सम्पूर्ण विवेचन के पश्चात कुछ ऐसे निष्कर्ष निकले है, जो कि साधना में सूर्य के समान तेजस्विता देने वाले हैं यह स्पष्ट है, कि सभी मंत्रों तथा बीज मंत्रों का केन्द्रीय बीजमंत्र ‘ह्रीं’ है, जिसकी साधना से मन पूर्ण रूप से चैतन्य हो जाता है, व्यक्तित्व में तेज आ जाता है, कंठ में वाक् सिद्धि प्राप्त होती है।
सामान्य ग्रंथों में दिये गये वर्णन से साधकों में यह धारणा बनी हुई है, कि ‘ह्रीं’ बीज मंत्र केवल लक्ष्मी का ही बीज मंत्र है परन्तु यह सही नहीं है, यह परम विस्फोटक, प्रभावशाली बीज मंत्र जहां एक ओर महालक्ष्मी का बीज मंत्र है, वहीं महाकाली, महासरस्वती का भी बीज मंत्र है, जिससे अलग-अलग शक्तियों की सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
शारदा तिलक ग्रंथ में कहा गया है, कि ‘ह्रीं’ बीज मंत्र का नियमित जप अपने कुण्डलिनी चक्र के केन्द्र बिन्दु से करने वाले साधक को सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। विश्वामित्र संहिता के अनुसार सिद्धान्त रूप से ‘ह्रीं’ बीज मंत्र का जप साधक के व्यक्तित्व में तेज प्रदान करने वाला मंत्र है, जो कि दूसरों के प्रभाव को अपने भीतर समाहित कर देता है।
जहां विभिन्न योगियों ने विभिन्न कारणों से इस बीज मंत्र की साधना की है, उसी प्रकार उन्हें अलग-अलग प्रकार के अनुभव एवं फल प्राप्त हुए हैं। विधि-विधान से लक्ष्मी की साधना कर बीज मंत्र ‘ह्रीं’ का नियमित रूप से जाप करें। इस जप में न तो कोई स्थान आवश्यक है और न ही विशेष समय, मंत्र जाप और साधना में निरन्तरता रखने से ही जीवन में निरन्तर उन्नति और गतिशीलता बनी रहती है।
यह साधना अत्यन्त सरल है और आर्थिक दृष्टि से आहत हुए व्यक्तियों के लिए यह साधना पूर्ण प्रभावकारी भी है। व्यापार में हर कार्य में हानि हो रही हो, नौकरी में निरन्तर बाधाएं आ रही हो, ऋण से पूर्ण रूप से छुटकारा नहीं प्राप्त हो रहा हो, तो यह साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिए।
सरस्वती को वाणी, ज्ञान तथा बुद्धि की देवी कहा जाता है। जिसे सरस्वती सिद्ध हो जाती है, उसका कार्य किसी भी प्रकार से नहीं रूकता। जीवन में सभी कार्य क्रियायें केवल और केवल सुज्ञान और सुबुद्धि के फलस्वरूप ही श्रेष्ठ हो पाते हैं। जीवन में चाहे निरन्तर वृद्धि करना हो, कार्यों को अपने अनुकूल बनाना हो, किसी को भी सम्मोहित करना हो, अपनी वाणी से अपने अनुकूल बनाना हो तो उसके लिये सुबुद्धि और सही ज्ञान होना आवश्यक है और यह सब सरस्वती और वाग्देवी के माध्यम से ही सम्भव है। इसके विपरीत कुबुद्धि और कुज्ञान के फलस्वरूप जीवन में पराभाव की स्थिति अज्ञानता के फलस्वरूप ही निर्मित होती है। राम को वन में कैकेयी द्वारा कुवचनों के फलस्वरूप ही गमन करना पड़ा। महाभारत का युद्ध द्रौपदी की हंसी और लांछन के फलस्वरूप ही हो पाया। अर्थात् जीवन में जो भी उन्नति और अवनति होती है वह श्रेष्ठ वचनों और कुभावों के फलस्वरूप ही होती है और इसी के अनुसार व्यक्ति क्रियायें करता है और वैसा ही उसे सुफल और कुफल की प्राप्ति होती है। यदि व्यक्ति सुवचन कह देता है, वे खरे उतरते है, उसके व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरों पर ऐसा पड़ता है, कि वे उसके प्रशंसक बन जाते हैं, सरस्वती सिद्ध व्यक्ति का दूसरे सामान्य व्यक्ति अनुसरण ही करते हैं।
यदि नौकरी प्राप्ति में बाधाएं आ रही हैं, परीक्षाओं में श्रेष्ठ सफलता प्राप्त नहीं हो रही हो, किसी भी विषय की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए बार-बार प्रयास करना पड़ता हो, नौकर-चाकर-सहयोगी अथवा संतान आपके कहने के अनुकूल न हो अर्थात् आपकी आज्ञा नहीं मानते हो, तो यह ‘बीज मंत्र साधना’ अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।
यदि बार-बार इन्टरव्यू देने पर भी नौकरी प्राप्त नहीं हो रही हो, तो साधक को सरस्वती ताबीज धारण कर इन्टरव्यू से पहले इस बीज मंत्र का जप अवश्य करना चाहिए। ताकि आपकी वाणी में प्रभाव उत्पन्न हो जाता है।
काली की साधना के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की भ्रान्तियां व्याप्त है, जिसके कारण कई साधक शक्ति के इस तेजस्वी स्वरूप की साधना शुद्ध रूप से नहीं कर पाते हैं, महाकाली शत्रुओं का संहार करने वाली, बाधाओं को हटाने वाली, जीवन को गति प्रदान करने वाली, भय का नाश करने वाली तेजस्वी देवी हैं, जिसकी साधना से व्यक्ति शत्रुओं पर हावी रहता है, राज्य बाधा, कार्य बाधा, दुर्घटना, भय आदि दूर होकर साधक को उच्चता की ओर ले जाती है।
जहां तक ‘ह्रीं’ बीज मंत्र का प्रश्न है, यह महाकाली का भी मूल बीज मंत्र है, जिसकी साधना उपरोक्त बाधाओं से युक्त साधक को अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए। महाकाली के बीज मंत्र का निरन्तर जप करते समय साधक के समक्ष अपना लक्ष्य हर समय स्पष्ट होना चाहिए। इस प्रकार नियमित रूप से हर समय बीज मंत्र का जप करने से साधक को शत्रुओं से किसी प्रकार की हानि सम्भव नहीं हो सकती है।
यदि साधक नित्य ‘ह्रीं’ बीज मंत्र का अनुष्ठान सम्पन्न करता है तो उसके प्रत्येक कार्य पूर्ण होते ही हैं और जीवन की बाधाओं का निवारण होकर पूर्ण भाग्योदय होता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,