





महाशिवरात्रि तो आदि देव भगवान शिव के उल्लास का पर्व है पुराणों में ऐसी कथा आती है कि इसी दिवस पर जब भगवान शिव का मां भगवती से विवाह सुनिश्चित हुआ, उस अवसर पर पाणिग्रहण के समय परम्परा अनुसार भगवान शिव के पिता का नाम पूछा गया। सभी देवता विस्मृत होकर एक दूसरे का मुंह देखने लग गए, तब ब्रह्मा ने कहा कि मैं इसका पिता हूं। पितामह का नाम पूछे जाने पर भी विष्णु ने अपना परिचय दिया और इससे भी ऊपर जब प्रपितामह का नाम पूछा गया तब सभी देवताओं द्वारा निरूतर हो जाने पर भगवान शिव ने ही मौन भंग किया-‘ इन सभी का प्रपितामह मैं ही हूं।’
भगवान शिव के मुख से कहे गए ये वचन उनके अनादि होने का साक्षात् प्रमाण है। भगवान शिव से अधिक पूज्य कौन अन्य देव या देवी हैं? औदार्य, सरलता, क्षमा, करूणा और ऐश्वर्य के अधिपति भगवान शिव के समान कोई भी अन्य देवतत्व नहीं हैं। योग और भोग को एक साथ धारण करने की सामर्थ्य किसी भी अन्य देव में तो नहीं। अर्द्धनारीश्वर स्वरूप ही भगवान शिव का यथार्थ परिचय है। विष पान कर लेने की घटना ही, भगवान शिव की जन-जन के मानस में अपनी पहुंच बनाए हुए है और वे ही तो हैं जो गुरु रूप में धरा पर अवतीर्ण होते हैं। गुरु साक्षात् भगवान शिव ही कहे गए हैं।
भगवान शिव के समक्ष तो प्रत्येक दिवस चैतन्य है, प्रत्येक क्षण आनंदित, प्रत्येक क्षण तरंगित व उल्लसित है और इसी से आशुतोष की संज्ञा से विभूषित है। वर्ष में कभी भी पूर्ण विधि-विधान से, किसी भी अवसर पर शिव पूजन कर लिया जाए तो उसका फल प्राप्त होता ही है, लेकिन प्रत्येक माह की त्रयोदशी विशेष चैतन्य दिवस होती है, जो शिव रात्रि की संज्ञा से विभूषित है और इन्हीं शिवरात्रियों से सबसे अधिक पावन शिवरात्रि है ‘महाशिवरात्रि’ फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी है, जो इस वर्ष 16,17,18 फरवरी को है। भगवान शिव सदैव आनन्द मग्न हैं और शक्ति स्वरूपा मां भगवती पार्वती इस जीवन में आनन्द और सरसता की साकार मूर्ति हैं। इनके परस्पर मिलन से सम्पूर्ण प्रकृति इस पावन पर्व पर अपने पूर्ण श्रृंगार के साथ नृत्य कर उठती है और इसी से साधना का यह पावन पर्व दुर्लभ अवसर बन जाता है। सम्पूर्ण रूप से प्रकृति का अणु-अणु चैतन्य होकर साधक को उसका मनोवांछित फल प्रदान करने के लिए तत्पर हो जाता है, जिससे साधक स्वयं शिव स्वरूप होने की क्रिया में आगे बढ़ जाता है।
एक बार माता पार्वती जी की जिज्ञासा पर भगवान शिव जी ने बताया कि फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी, शिवरात्रि कहलाती है। जो उस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है। मैं वस्त्र, धूप, अर्चन तथा पुष्पादि समर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता, जितना कि शिवरात्रि व्रतोपवास से-
ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी की रात्रि को आदिदेव भगवान् श्रीशिव, करोड़ो सूर्यो के समान प्रभाव वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।
पप्रकल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मा जब अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उदभिज्ज एवं देवताओं आदि की सृष्टि कर चुके थे, एक दिन स्वेच्छा से घूमते हुए क्षीरसागर पहुंचे। उन्होंने देखा भगवान् नारायण शुभ्र, श्वेत सहस्त्रपुणमौलि शेष की शय्या पर शांत अधलेटे हुए हैं। भूदेवी, श्रीदेवी, श्रीमहालक्ष्मी जी शेषशायी के चरणों को अपने अंक में लिये चरण-सेवा कर रही हैं। गरूड़ नन्द, सुनन्द, पार्षद, गन्धर्व, किन्नर आदि विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़े खड़े हैं। यह देख ब्रह्माजी को अति आश्चर्य हुआ। ब्रह्माजी को गर्व हो गया था कि मैं एकमात्र, सृष्टि का मूल कारण हूं और मैं ही सबका स्वामी, नियन्ता तथा पितामह हूं। फिर यह वैभवमण्डित कौन यहां निशि्ंचत सोया है?
श्री नारायण को अविचल शयन करते हुए देखकर उन्हें क्रोध आ गया। ब्रह्माजी ने समीप जाकर कहा- तुम कौन हो? उठो? देखो, मैं तुम्हारा स्वामी, पिता आया हूं, शेषशायी ने केवल दृष्टि उठायी और मन्द मुस्कान से बोले- वत्स! तुम्हारा मंगल हो। आओ, इस आसन पर बैठो। ब्रह्माजी को और अधिक क्रोध हो आया, झल्लाकर बोले- मैं तुम्हारा रक्षक, जगतपितामह हूं। तुमको मेरा सम्मान करना चाहिये।
इस पर नारायण ने कहा- जगत मुझमें स्थित है, फिर तुम उसे अपना क्यों कहते हो? तुम मेरे नाभि-कमल से पैदा हुए हो, अतः-मेरे पुत्र हो। मैं ड्डष्टा, मैं स्वामी हूं दोनों में यह विवाद होने लगा। श्रीब्रह्माजी ने ‘पाशुपत’ और विष्णुजी ने ‘महेश्वर’ अस्त्र उठा लिया। दिशाएं अस्त्रें के तेज से जलने लगीं, सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी थी। देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान् विश्वनाथ के पास पहुंचे। अन्तर्यामी भगवान् शिवजी सब समझ गये। देवताओं द्वारा स्तुति करने पर वे बोले- मैं ब्रह्मा-विष्णु के युद्ध को जानता हूं। मैं उसे शांत करूंगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर सहसा दोनों के मध्य में अनादि, अनन्त- ज्योर्तिमय स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए।
शिवलिंगतयोदभतः कोटिसूर्यसमप्रभः।
महेश्वर, पाशुपत दोनों अस्त्र शांत होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गये।
यह लिंग निष्कलंक ब्रह्म, निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। श्रीविष्णु और श्रीब्रह्माजी ने उस लिंग (स्तम्भ) की पूजा अर्चना की। यह लिंग फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुआ तभी से आज तक लिंग पूजा निरन्तर चली आ रही है। श्रीविष्णु और श्रीब्रह्माजी ने कहा- महाराज! जब हम दोनों लिंग के आदि अन्त का पता न लगा सके, तो आगे मानव आप की पूजा कैसे करेगा? इस पर कृपालु भगवान शिव द्वादशज्योतिर्लिंग रूपेण में विभक्त हो गये। महाशिवरात्रि का यही रहस्य है। (ईशान संहिता)
भगवान शंकर की पूजा, साधना, अर्चना, अभिषेक सम्पन्न करने हेतु हर साधक तत्पर ही रहता है, क्योंकि भगवान शंकर तेजोमय समस्त श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करने वाले समस्त द्रव्यों के स्वामी एवं विद्या आदि के कारण हैं, अज्ञेय और अगम्य हैं, तथा सभी के लिए सर्वत्र कल्याणकारक हैं- भगवान सदाशिव, जो भोले नाथ भी हैं, रसेश्वर भी हैं, नटराज भी हैं, शक्ति से सदैव युक्त हैं। सृष्टि की उत्पत्ति से संहार तक केवल शिव ही शिव हैं। चाहे सगुण रूप से मूर्तिमान रूप में उपसना की जाये अथवा निर्गुण रूप में शिव लिंग रूप उपासना की जाये, वे तो केवल बिल्व पत्र और अविरल जलधारा, दुग्ध धारा से प्रसन्न होने वाले देव हैं और ऐसे देवों के देव महादेव की उपासना, साधना और अभिषेक के लिए महाशिवरात्रि से महान कोई पर्व नहीं हो सकता।
सौर, गणपत्य, शैव, वैष्णव और शाक्त- प्रधानतः इन्हीं पांच सम्प्रदायों में विराट् हिन्दू-समाज विभक्त है। इनमें से जो जिसके उपासक होते हैं, वे अपने उस इष्टदेव को छोड़कर अन्य की उपासना प्रायः नहीं करते, परन्तु शिवरात्रि व्रत की महिमा निराली है। शास्त्र में भी ऐसा ही वर्णित है, तथा इसी विधान का आज तक पालन होता आया है कि सम्प्रदाय-भेद को त्याग, सभी मनुष्य इसका पालन करते हैं और इसके फलस्वरूप भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करना चाहते हैं।
भगवान सदाशिव देवों के देव महादेव हैं, जिनकी पूजा कृपा तले यह चराचर विश्व गतिशील है भगवान शिव को औघड़दानी कहा गया है, जो कृपा कर अपने भक्तों को सदैव अभय वर एवं सामर्थ्य प्रदान करते हैं। भगवान शिव ही एक मात्र गृहस्थ देव हैं जिनकी पूजा पूरे परिवार सहित की जाती है। भगवान शिव के परिवार में मां पार्वती, पुत्र गणेश एवं कार्तिकेय तथा वाहन नन्दी सम्मिलित हैं।
महाशिवरात्रि, भगवान शिव की पूजा अभिषेक करने हेतु विशेष दिवस है। सृष्टि में शिव लिंग की उत्पत्ति महाशिवरात्रि की रात्रि को ही हुई थी और इसी रात्रि को भगवान शिव ने भगवती पार्वती का वरण किया था, इसलिए इसे शिवगौरी दिवस भी कहा जाता है। यह पर्व मस्ती, उल्लास और आनन्द का पर्व है। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति को, बाल, युवा, वृद्ध, गृहस्थ, योगी, संन्यासी, स्त्री, पुरूष सभी को शिव साधना, अर्चना एवं अभिषेक करना चाहिए।
द्वादश ज्योतिर्लिंग अमर कंटक की दिव्य तपोभूमि पर शिवगौरी शक्ति महाशिवरात्रि महोत्सव 16,17,18 फरवरी 2015 को नर्मदा के उद्गम स्थल कपिल धारा की तेजमय चैतन्य भूमि पर सम्पन्न होगा।
प्रत्येक साधक की इच्छा होती है कि वह अपने भौतिक जीवन को पूर्ण आनन्द और सुखों से भोगे परन्तु आज के इस वातावरण में ऐसा मुश्किल तो है परन्तु नामुमकिन नहीं। जिस तरह निरन्तर प्रयास करने से सफ़लता प्राप्ति होती है उसी तरह मनुष्य को भी निरन्तर गतिशीलता बनाई रखनी चाहिये। अपने गुरुरूपी इष्ट का ध्यान चिंतन बराबर रहे, जिससे शक्ति का प्रवाह प्राप्त होता रहे। सम्पूर्ण भारत वर्ष में पूर्ण श्रद्धा और आनन्द के साथ महाशिवरात्रि का पर्व पूर्ण हर्षोल्लास से मनाया जाता है क्योंकि महाशिवरात्रि की अपनी अलग महत्वता है।
सदाशिव महादेव के सर्व प्रिय दिवस फ़ाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी महाशिवरात्रि, जब सम्पूर्ण सृष्टि प्रफुल्लित हो उठती है। ऐसे ही पावन पर्व पर अपने भौतिक जीवन में नवीन नूतन परिर्वतन के लिए और अपने जीवन में पूर्ण शिवगौरी सौभाग्य को निर्मित करने हेतु पूज्य सद्गुरुदेव और वन्दनीय माता जी के सानिध्य में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल और द्वादश ज्योतिर्लिंग में अमरकंटक की दिव्य तपोभूमि पर शिवगौरी शक्ति महाशिवरात्रि महोत्सव 16,17,18 फ़रवरी 2015 को प्रत्येक साधक द्वारा स्वयं रूद्राभिषेक और शिव-गौरी अखण्ड सौभाग्य शक्ति दीक्षा, साधना, अर्चना की क्रिया सम्पन्न होगी। जिससे आने वाला नूतन विक्रम सवंत् आपके लिए पूर्ण फ़लदायक और उन्नति युक्त हो सके और आप अपनी इच्छाओं को पूर्णता दे सकेंगे।
शिविर स्थलः ज्योर्तिलिंग नर्मदा उद्गम स्थल अमर कंठक (म-प्र)
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