





श्री कृष्ण जन्मोत्सव का महान पर्व जन्माष्टमी की रात्रि को अत्यधिक धूमधाम से सम्पूर्ण आर्यावर्त में ही नहीं, पूरे विश्व में मनाया जाता है। आज ही के दिन सच्चिदानन्द स्वरूप समस्त अवतारों के मूल अवतारी पूर्ण पुरूषोत्तम, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का पूर्णाविर्भव अपने समस्त अंशों सहित हुआ। यह उनकी अहैतु की कृपा है, जो उन्होंने सारस्वत कल्प में अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ इस भूमण्डल को सौभाग्यशाली व पुण्य प्रदायक बनाया।
किसी भी कल्प में आविर्भाव हुये भगवान की वस्तुतः न तो कर्मजनित, रजोवीर्यसम्भूत पंचभौतिक देह होती है, न ही प्राकृत जीवों की तरह जन्म होता है। भगवान की मंगलमय श्री देह त्रिविध मायिक देह नहीं होती है। उनका दिव्य शरीर न कभी बनता है, न कभी नष्ट होता है, उनका न जन्म होता है, न मरण होता है। हां! इतना अवश्य है कि उनकी दिव्य देह, जो नित्य भगवद् देह है, वह जन्म लेती हुई सी अन्तर्ध्यान होती प्रतीत होती है, यही कारण है, कि उन्हें अजन्मा, अविनाशी कहा गया है।
इन्हीं अजन्मा, अविनाशी की विभिन्न श्रुतियों में ऋषियों ने, योगियों ने विभिन्न विशेषणों से अलंकृत कर अपनी-अपनी ज्ञान-क्षमता के आधार पर विवेचन करने का प्रयास किया है। उन्हें सब का आदिकरण, सृष्टि स्थिति तथा प्रलय का आधार, सर्वज्ञ, अजन्मा, सर्वाधर, परिपूर्णतम, अद्वितीय, परम गूढ़, परम ज्योति स्वरूप, सर्वशक्तिमान, सर्वशक्त्याधर कहा गया है।
भगवान शिव, ब्रह्मा, नारद, व्यास वेद, भीष्म आदि असंख्य महानुभवों ने भगवान श्रीकृष्ण के पूर्ण पुरूषोत्तम होने का वर्णन कर उनकी आराधना तथा पूजा को अपने जीवन का परम सौभाग्य माना है। ‘श्रीमद्भवगद् गीता’ में स्वयं भगवान के वाक्य हैं- अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा मैं ही समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय हूं, सबका आदिकारण हूं।
समस्त जीवों का समस्त भूतों का सनातन बीज मैं ही हूं।
मैं ही सभी के उत्पत्ति का कारण हूं और मुझ से ही समस्त जगत गतिशील है।
अर्थात् मैं अजन्मा, सर्वव्यापक, समस्त भूतों में ईश्वर रूप से निवास करता हूं और स्वयं की प्रकृति से अधिष्ठित होता हुआ योग माया से आविर्भूत हूं।
श्रीमद्भगवद् गीता में अनेकों ऐसे उद्धरण हैं, जिनसे भगवान श्रीकृष्ण की विराटता व सम्पूर्णता का पूर्ण आभास होता है। गीता में श्री ‘रूद्र देव’ कहते हैं-
अर्थात् आप ही परम ब्रह्म, परम ज्योति स्वरूप हैं, आपका स्वरूप परम गूढ़ है।
इसी प्रकार ‘महाभारत’ में भीष्म पितामह ने श्रीकृष्ण के महत्त्व का वर्णन करते हुये कहा है-
अर्थात् श्रीकृष्ण ही समस्त लोकों की उत्पत्ति तथा प्रलय के आधार हैं, यह सम्पूर्ण विश्व और समस्त प्राणी श्रीकृष्ण की क्रीड़ा के हेतु है। श्रीकृष्ण ही सनातन कर्ता हैं, सभी भूतों से परे, अव्यक्त प्रकृति एवं अच्युत हैं, अतः सबके पूज्यतम हैं।
महाभारत में सर्वज्ञ देवर्षि नारद का कथन है-
अर्थात् जो लोग कमलनयन श्रीकृष्ण की पूजा नहीं करते, वे जीवित ही मृतवत होते हैं और उनके साथ वार्तालाप भी नहीं करना चाहिये।
ऐसे अनेक वाक्य विभिन्न असंख्य स्थानों पर कहे गये हैं, श्रीकृष्ण के भक्तों, संतों के जो प्रत्यक्ष अनुभव हैं, वे सर्वथा अकाट्य तथा प्रमाण स्वरूप हैं।
श्रीकृष्ण का अवतार अत्यन्त गूढ़ और जटिल बन गया है, क्योंकि विभिन्न भक्तों ने अपनी-अपनी भावना के अनुसार देखा और वर्णन किया है, कोई उन्हें चतुर्भुज नारायण का अवतार कहता है, तो कोई उन्हें समस्त देवता का सम्मिलित अंश स्वरूप कहता है, तो कोई उन्हें नारायण ऋषि का अवतार कहता है। ‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’ में स्पष्ट किया गया है जब भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ, तो उस समय चतुर्भुज नारायण पृथ्वीपति विष्णु और नारायण ऋषि लीन हो गये। इन्हीं सब कारणों से यह कहा गया है, कि जो भगवान के दिव्य जन्म और कर्म के तत्व को जान लेता है, वह शरीर त्याग के बाद भगवान में लीन हो जाता है।
अर्थात् ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन छः का नाम ‘भग’ है, और ये जिसके स्वरूप भूत होते हैं- वह भगवान हैं।
ऐश्वर्य-उस सर्ववशीकारिता शक्ति को कहते हैं, जो सभी पर अपना प्रभाव स्थापित कर सके।
धर्म-उसका नाम है, जिससे सभी का मंगल और उद्धार होता है।
यश-अनन्त ब्रह्माण्ड व्यापिनी मंगल कीर्ति ‘यश’ है।
श्री-ब्रह्माण्ड की समस्त सम्पत्तियों का जो एकमात्र मूल स्वरूप महान शक्ति है, उसे श्री कहते हैं। वैराग्य-साम्राज्य, शक्ति, यश आदि में जो स्वाभाविक अनासक्ति है, वह वैराग्य है। ज्ञान-ज्ञान तो स्वयं भगवान का दिव्य स्वरूप ही है। सर्वकाल की समस्त वस्तुओं के साक्षात्कार को ज्ञान कहते हैं।
इन सभी गुणों से सहज सम्पन्न हैं भगवान श्रीकृष्ण जिन्होंने एक आदर्श मानव की तरह जीवनयापन किया और निष्काम भाव प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया। किन्तु भगवान श्रीकृष्ण मात्र ऐश्वर्य रूप ही नहीं हैं, वे मधुर रूप भी हैं, उनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण माधुर्य का पूर्ण प्रकाश है, इसीलिये वे पूर्ण हैं और भगवान हैं।
श्रीकृष्ण में प्रकारान्तर से चौंसठ गुण बताये गये हैं। इनमें से पचास तो उच्चभूमि पर आधारित जीवों में भगवत कृपा से प्रकट हो सकते हैं, किन्तु इसके अतिरिक्त पांच गुण ऐसे हैं, जो श्री रूद्र में ही होते हैं, पांच गुण श्रीपति में प्रकट हैं।
किन्तु चार ऐसे गुण हैं, जिनका पूर्ण प्रकाट्य केवल मात्र श्रीकृष्ण में ही है। वे गुण हैं-लीला माधुरी, प्रेम माधुरी, रूप माधुरी और वेणु माधुरी इन चारों दिव्य गुणों के कारण ही श्रीकृष्ण ‘मधुरातिमधुर’ हैं।
श्रीमद् भगवत् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जिस प्रकार योगविद्या का उपदेश दिया ओर उसकी एक-एक शंकाओं का समाधान करते हुये, उसमें कर्त्तव्य युक्त कर्म की भावना से जाग्रत किया, कृष्ण द्वारा दी गई योगविद्या जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, क्रियायोग के साथ-साथ सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण का जो ज्ञान दिया, उसी के कारण आज गीता भारतीय जनजीवन का आधारभूत ग्रंथ बन गई है, जिसे आत्मसात कर जीवन को एक नई दिशा दी जा सकती है। परंतु संसार का दुर्भाग्य कि गीता के भाव को सिर्फ पढ़ने योग्य ही समझ पाये उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास हुआ ही नहीं।
भारतवर्ष में ऐसी कोई भाषा नहीं है, जिसमें श्रीकृष्ण का वर्णन न हो। जितने भी प्रसिद्ध साधु, संत हुये हैं, सभी पर श्रीकृष्ण भक्ति का प्रभाव देखने में आता है। हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत में श्रीकृष्ण पर विशद साहित्य तो है ही, हिन्दी, बंगला, मराठी, उडि़या, असमी, कन्नड़, तेलगू, तमिल आदि भाषाओं के साहित्य भी कृष्ण के गुणगान से भरे हुये हैं।
भारतवर्ष के भक्त हैं ही, साथ ही अद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक भगवतपाद आदिशंकराचार्य ने भी श्रीकृष्ण की आराधना को जीवन का सौभाग्य मान कर इतने अधिक भावपूर्ण स्त्रोतों की रचना की है, जिनका पठन कर मन श्रीकृष्ण के माधुर्य में आसक्त हो उठता है। भगवान शंकर नित्य श्रीकृष्ण की मानस पूजा करते थे, जिनका विधान उन्होंने ‘भगवत मानस पूजा’ नाम से लिखा है, इसके अतिरिक्त उन्होंने श्री कृष्णाष्टक, श्री गोविन्दाष्टक और श्री अच्युताष्टक आदि अनेक स्तोत्रों की रचना की। श्री शंकराचार्य जो ध्यान किया करते थे, वह इस प्रकार है-
अर्थात् कमलवत आसन पर सजल जलधर के समान श्याम तन वाले कमल नयन श्रीकृष्ण विराजमान हैं, उनके गले में वैजयन्ती माला, शीश पर मुकुट, हाथों में कंकण और प्रत्येक अंग में विविध आभूषण शोभायमान हैं। उनका श्रीमुख शरद चन्द्र के समान मनोहारी है, उन्होंने अपने हाथ में मुरली धारण कर रखी है, केसर युक्त चन्दन से वे श्रृंगारित हैं और उन्हें गोप तथा गोपिकाओं ने चारों तरफ से घेर रखा है।
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