





चार धामों में रामेश्वरम् दक्षिण दिशा का धाम है। जो कि एक समुद्री दीप है। पूर्व में यह स्थान भूमि से मिला था परंतु प्राकृतिक घटना के कारण वर्तमान में भूमि से अलग होकर एक दीप बन गया है। चारों तरफ समुद्री वातावरण होने के कारण शांति और मनोहर दृश्य देखने को मिलता है। यही कारण है कि रामेश्वरम् में ध्यान-योग, समाधि की विशेष अनुभूति प्राप्त होती है।
रामेश्वरम् से 19 किलोमीटर दूर धनुष्कोटि जहां पर भगवान राम ने सेतु का निर्माण करवाया था। यह स्थान हिंद महासागर व बंगाल की खाड़ी का मिलन स्थल है। वाल्मिकि रामायण में वर्णित है कि सेतु देवीपत्तन से दर्भशयन तक चौड़ा और 100 योजन लम्बा था। पर वर्तमान में यह 35 किमी ही दिखता है। पहले इस स्थान का नाम रामनाद था, विभीषण की प्रार्थना पर भगवान राम ने सेतु को अपने धनुष से तोड़ा था, उस दिन से इस स्थान को धनुष्कोटि कहा जाता है।
रामेश्वरम् प्राचीन समय से भगवान शिव का विहार स्थल रहा है। भगवान राम के यहां आने से पूर्व इस स्थान पर ‘अगस्त्येश्वर शिवलिंग’ था। जो आज भी वहां पर मौजूद है। और यह भूमि महर्षि अगस्त्य का तपोस्थली रही है। जिसका वर्णन पुराणों में मिलता है। ‘अगस्त्येश्वर शिवलिंग’ से भी प्राचीन ‘अनादि शिवलिंग’ यहां पर स्थापित था। जो अनन्त काल से विद्यमान था, जिसका कोई वर्णन या लेख देना संभव नहीं है। इस तथ्य का विवेचन करने का तात्पर्य यही है कि रामेश्वरम् में अनन्त काल से भगवान शिव की पूजा, अर्चना, आराधना, अभिषेक होता रहा है। निश्चित रूप से यह स्थान भगवान महादेव को समर्पित है।
भगवान श्रीराम का जीवन अत्यन्त दुःखों से भरा था। जन्म के कुछ समय पश्चात् शिक्षा ग्रहण करने के लिये वे वाल्मिकि आश्रम में रहे। अत्यन्त कठिन परिश्रम से धनुष विद्या में पारंगत होकर वे अयोध्या लौटे, परंतु पारिवारिक मतभेद के कारण पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के लिये वनवास में जाना पड़ा। एक राजकुमार के लिये वनवास का जीवन कितना संघर्ष से भरा होता है। यह एक सामान्य मानव की कल्पना से परे है। जब वे पंचवटी आश्रम में थे, तब रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया और उन्हें लंका के अशोक वाटिका में रखा। कहा जाता है कि रघुवंश कुल के समस्त पाप-दोष के फलस्वरूप आसुरी प्रवृत्ति रावण का प्रादुर्भाव राम के जीवन में हुआ था। जिसके संहार के लिये राम ने भगवान शिव की आराधना सेतुबंध निर्माण से पहले और माता सीता को लंका से लाने के पश्चात् रावण के वध से लगा ब्रह्महत्या के दोष का शमन करने के लिये रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग स्थापित किया था। ऐसा वर्णन पुराणों में मिलता है।
जब भगवान राम सीता को ढूंढते हुये रामनाथपुरम् पहुंचे तो सामने विशाल समुद्र को देखकर चिंतित हुये। तब वे हनुमान को कैलाश पर जाकर भगवान शिव से उपाय का आग्रह करने के लिये आज्ञा प्रदान की। भगवान शिव के द्वारा प्राप्त विशेष साधना और यंत्र से राम ने तीन दिन तक दर्भशयन में साधना सम्पन्न की। जिसके उपरांत नल-नील के माध्यम से सेतु का निर्माण हो पाया। साथ में ही समुद्र देव की उपासना पर जब वे प्रकट ना हुये तो राम के क्रोध की सीमा ना थी। और ब्रह्मास्त्र शक्ति के प्रयोग के द्वारा समस्त समुद्र को सुखाने के लिये तैयार हो गये इस पर समुद्र देव ने प्रकट होकर उनकी मदद का वचन दिया और मानव कल्याण के लिये जल को ना सुखाने का आग्रह किया। इस प्रकार यह बात बहुत कम लोग ही जानते हैं कि महादेव की कृपा से ही सेतु का निर्माण संभव हो पाया।
रामसेतु सिर्फ एक पुल ही नहीं जिस पर चलकर राम अपनी सेना सहित लंका पहुंचे। यह वह पावन पवित्र स्थल है, जिसके दर्शन से साधक और भगवान, इष्ट, गुरू के बीच में एक प्रेममय सेतु निर्माण होता है जिस पर चलकर प्रत्येक व्यक्ति भगवान राम की भांति जीवन में आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करता हुआ मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। नर से नारायण, शव से शिव, पुरूष से मर्यादा पुरूषोत्तम बनने की क्रिया इष्ट, गुरू, परमात्मा के साथ निरन्तर जुड़ाव के भाव को प्राप्त करना तो प्रेममय सेतु निर्माण से ही प्रारंभ होता है।
अर्थात् सेतु, रामेश्वरम् और गन्धमादन पर्वत का स्मरण, पूजन, चिंतन करने से सारे पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। सेतु बन्ध का दर्शन करने से गुरू-परमात्मा-इष्ट से एक सेतु का भाव अर्थात् जुड़ाव का भाव निर्मित होता है। जिससे हमेशा गुरूत्व शक्ति का बोध होता है। स्थिरता और धैर्य की प्राप्ति होती है। अच्छाई के साथ बुराई का भी विकास होता है।
धर्म के साथ किसी ना किसी रूप में थोड़ा बहुत अधर्म का भी विकास होता है। ऋषि प्रवृत्तियों के साथ, राक्षस प्रवृत्तियों का भी विकास होता है। इसी रूप में भगवान राम के अवतरण में ये सारी स्थितियां विद्यमान थीं। समाज थोड़ा बिखरने लगा था। गुरूकुल व्यवस्था थी तो उसके साथ-साथ थोड़ी राक्षसी वृत्तियां भी बढ़ रही थी, कई स्थितियों में शक्ति का प्रदर्शन बुरी वृत्तियों को नाश करने बजाय उनके विकास में होने लग गया था। इसी को त्रेता युग कहा गया है। जब भगवान राम ने पुरूष रूप में अपना प्रकटीकरण किया और प्रथम बार उन सब लीलाओं को एक चमत्कार के रूप में नहीं अपितु एक वीर और योग्य पुरूष के रूप में प्रकट किया जो कि प्रत्येक मनुष्य में अवश्य ही होने चाहिये यदि वह अपने जीवन में उन्नति मार्ग पर बढ़ना चाहता है। राम के जीवन में एक भी ऐसी घटना नहीं है जो कि विशेष चमत्कारों या ऐसा कार्य हो जो कि मनुष्य के लिये अचरज भरे हों।
पूरी मर्यादा आदर्श के साथ सारे गुणों का राम ने विकास किया। राम का पूरा चरित्र मर्यादा के साथ आसुरी प्रवृत्तियों पर देव प्रवृत्तियों की विजय को दर्शाता है। यही स्थिति वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में है। आसुरी शक्तियों का वृद्धि हो रहा है और देव शक्तियां विलुप्त होती जा रहीं हैं। पाप-ताप, दोष, बाधा, परेशानी, कठिनाई, रोग, कलह, चिंता, धोखा, अधर्म, झूठ इन्हीं के बीच मानव जीवन सीमित हो गया है। व्यक्ति आज इतना पंगु (लाचार) हो गया है कि जन कल्याण के बारे में सोचना दूर वह अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर पा रहा है। कभी बच्चों की फीस की चिन्ता, पत्नी की बीमारी का बोझ, बूढे़ माँ-बाप की देखभाल, व्यापार में बढ़ती तकनीकी का ज्ञान, नौकरी में प्रमोशन और वर्तमान में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की लड़ाई साथ में भौतिक पदार्थो की महंगाई, आखिर में इन परिस्थतियों में एक सामान्य व्यक्ति जाये तो कहां। ऐसे में उसे गुरू या इष्ट का सहारा ही शेष रह जाता है।
भगवान राम की तरह प्रत्येक साधक का जीवन सुन्दर, स्वच्छ, मर्यादा से पूर्ण, ऐश्वर्यवान, धन-सुख-समृद्धि-राजयोग से युक्त हो सकता है। यदि वह सद्गुरू द्वारा बताये हुये मार्ग का अनुसरण करे, और उनके आवाह्न पर अपने जीवन का नव निर्माण करने के लिये प्रत्येक परिस्थिति से जूझते हुये उनके निकट पंहुचने में सफ़ल हो, ऐसे ही शिष्य जीवन में श्रेष्ठता को प्राप्त कर पाते हैं। इसी हेतु नववर्ष पूर्ण लक्ष्मी वृद्धि साधना महोत्सव 26-27 दिसम्बर को रामेश्वरम् में सम्पन्न होगा। नूतन वर्ष की चैतन्यता को भगवान राम के लीला व तप स्थली में समुद्र स्नान के बाद सभी चौबीस तीर्थ कुण्ड के जल से साधकों का अभिषेक सद्गुरूदेव के सानिध्य में होगा साथ ही महामृत्युजंय अभिषेक, नवग्रह चैतन्य, श्री सूक्त युक्त नव चण्डी हवन, विघ्नहर्ता गणपति दीक्षा, काल भैरव दीक्षा, मीनाक्षी धन लक्ष्मी दीक्षा के साथ योगा, प्राणायाम, प्रवचन की श्रेष्ठतम क्रियायें सम्पन्न होंगी।
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