





तभी हमें घर के अंदर से जोर से धम्म की आवाज आई और हम सब दौड़कर अंदर पहुंचे। हमने देखा कि उस दोस्त की माता जी जमीन पर गिरी हुई हैं और कुछ अजीब सा बड़बड़ा रही थी। हमने ऐसा दृश्य जीवन में कभी नहीं देखा था। उनको देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई उनके शरीर को निचोड़ सा रहा था। उनके मुंह से झाग निकलने लगा और आंखें बाहर निकलने सी हो गई। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बस कुछ ही क्षणों में उनके प्राण पखेरु उड़ जायेंगें। तभी मेरी नजर अपने उस मित्र अगस्त्ये पर पड़ी जिसकी आंखें भीगी हुई थी। उसे देख कर लगा कि इस घटना से वह काफी दुखी व पीडि़त है, पर अपनी माता की इस पीड़ा का उसके पास कोई इलाज न था, हम सभी मित्रों ने उनको उठा कर बिस्तर पर सुला दिया और थोड़ी देर बाद उसकी माता जी सो गईं।
बाकी सभी मित्रों के जाने के बाद मैंने अगस्त्ये से पूछा कि क्या उसकी माता जी को कोई बीमारी है। मेरी बात को सुन कर पहले तो अगस्त्ये ने टालने की कोशिश की पर मेरे जोर देने पर उसने बताया कि उन्हें मिर्गी के दौरे आते हैं। मैंने ऐसे ही पूछ लिया कि क्या उन्हें हमेशा से ऐसे दौरे आते हैं तो वह फूट-फूट कर रो पड़ा और जो कुछ उसने बताया वह एक व्यक्ति के जीवन को घोर नारकीय बनाने के लिये काफी था। उसने बताया कि पहले तो वो बिल्कुल सामान्य थी, पर दादी की मृत्यु के बाद से उन्हें ऐसे दौरे आने लगे हैं। आगे उसने मुझे जो बताया वह सुनकर मैं थोड़ा असमंजस में पड़ गया। उसने बताया कि उसकी दादी को भी ऐसे ही दौरे आते थे और जब से उसे याद है, तब से उसकी दादी को ऐसी पीड़ा से गुजरना पड़ता था। बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी उनके परिवार में कोई ना कोई हमेशा बीमार रहता था। उसके घर में बैठकर ही अजीब अंशाति सा प्रतीत होता रहा था। वातावरण में कुछ भी सामान्य नहीं था। आगे सुनकर मैं दंग रह गया कि किस प्रकार उनके पिताजी जो अपने गांव के ही जमींदार थे, आज वे एक सामान्य व्यक्ति का भी जीवन जीने योग्य नहीं हैं।
उनके जीवन को अभाव और दरिद्रता ने पूरी तरह जकड़ लिया है। कहीं भी उनके जीवन में सुख-शांति नहीं है। सफलता तो बहुत बड़ी बात रही महीने के खर्चे और किराये की व्यवस्था ही करते-करते उनको पूरा महीना लग जाता था। दिन-प्रतिदिन कर्ज बढ़ता ही जा रहा था। एक जमींदार से व्यक्ति का आर्थिक रूप से इतना नीचे आना व उसकी दादी के बाद उसकी मां को मिर्गी के दौरे पड़ना ये दोनों बातें मुझे थोड़ी खटक सी गई। विज्ञान का छात्र होने के कारण मुझे यह बात अजीब सी लगी कि भला किसी के मौत के बाद किसी और को वही बीमारी कैसे लग सकती है। मुझे लगा कि बात अवश्य ही किसी इतरयोनि शक्ति से सम्बन्धित होगी।
मैं अपने मित्र को सांत्वना दिया और उसके पूरे घर का मुआयना करने लगा, थोड़ी देर बाद अगस्त्ये को कल आने का भरोसा देकर मैं चला गया।
अगले दिन सुबह-सुबह अपना पूजन सम्पन्न कर और गुरुजी द्वारा प्राप्त विशेष यंत्र को लेकर अपने मित्र अगस्त्ये के घर पहुंचा। मैंने अगस्त्ये की माता जी को नमस्ते किया तो उन्होंने भी प्यार भरा अभिवादन दिया और कहा कि मैं तुम्हारे लिये भी नाश्ता लगाती हूं। मैंने हामी में स्वीकृति दे दी। थोड़ी देर में हम सभी नाश्ता कर चुके थे। अगस्त्ये की माता जी मेरे निकट ही बैठी थी। मैंने उनकी कुशलता की जानकारी लेने के बाद एकाएक वह यंत्र उठा कर उनके हाथों में रख दिया। ‘पाठकों की जानकारी के लिये बता दूं यह कोई सामान्य यंत्र नहीं था। बीच के समय में मैं जब भूत साधना सम्पन्न कर रहा था, तब वह यंत्र सद्गुरू कृपा से सुरक्षा हेतु वेद मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठित गुरूजी के श्री हाथों से प्राप्त हुआ था’ अब जो दृश्य सामने था वह तो पूर्व के कुछ समय के क्षणों से बिल्कुल ही विपरीत था। एकाएक वो उठ खड़ी हुई और चीखते हुये कहने लगी, ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई इस घर में घुसने की? मैं इस घर में पिछले 200 वर्षों से रह रहीं हूं और इस घर से मुझे कोई भी नहीं निकाल सकता! इतना कहकर उसने मेरा गला पकड़ने की कोशिश की पर मैंने बुद्धि का प्रयोग करते हुये उससे मुस्कुराते हुये कहा ‘माँ’ आप इन्हें क्यों सताती हैं? इन्हें सताने से आपको भला क्या मिलेगा? ‘माँ’ शब्द का सम्बोधन सुनकर पहले से वह थोड़ा सामान्य हुई और पुनः क्रोध में तमतमाते हुये कही मैं इस घर की मालकिन हूं और मैं यहीं पर रहूंगी पहले इसके सास के शरीर में थी अब इसके शरीर में, इस घर की मालकिन सदा मैं ही रहूंगी। लेकिन तू पहला वो आदमी है जिसने मुझे यहां से निकलाने का विचार बनाया। (इतरयोनि शक्ति विचार को पढ़ने और उन्हें परिवर्तित करने में पूर्णतः समर्थ होती हैं) तू चला जा यहां से, नहीं तो मैं तुझे बर्बाद कर दूंगी। खुले बाल, लाल आंखे, डरावनी मुस्कराहट और गुर्राहट उनके चेहरे पर देखकर परिवार के सभी सदस्य एक कोने में दुबक गये। अब अगस्त्ये व उसके परिवार के सभी सदस्यों के सामने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट थी कि दादी के मौत के बाद से उसकी माता जी को दौरा क्यों पड़ता है? जमींदार से आज उनकी ये दशा किन कारणों से बनी?
अपने मित्र को बाहर मिलने का इशारा कर मैं चुपचाप बाहर आना ही बुद्धिमानी समझा मैं बाहर आ गया। थोड़ी देर बाद मेरा मित्र बाहर आया जो कि बहुत ही सहमा हुआ था। मैंने उससे कहा कि हमें तुरन्त मेरे गुरूजी के यहां चलना चाहिये, इसी में सबका भला है। जोधपुर पहुंच कर हमने मालूम किया तो जानकारी मिली कि गुरूजी अगले दो दिन तक साधकों से मिलेगें। काफी इतंजार के बाद गुरूजी आश्रम आये पर हमारा मिलना संभव ना हो पाया और पूरे दिन के इतंजार के बाद अगस्त्ये व उसके परिवार वाले क्रोधित हो रहे थे। चूंकि अधिकतम साधक गुरूजी से मिलकर अपने घर को वापस जा रहे थे, हम लोग ही ऐसे थे, जिन्हें मिलने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ या दिया नही गया।
पूछताछ करने पर वहां के सेवकों द्वारा थोड़ी देर बाद, 2 घंटे बाद के आश्वासन से 2 दिन बीत गये थे, इन घटनाओं के बावजूद मेरी श्रद्धा और विश्वास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, हालांकि इस बीच मेरा और मेरे मित्र द्वारा सेवकों से नोंक-झोंक भी हो गई। पर मेरा हठ और गुरू के प्रति प्रेम ने मुझे जाने ना दिया साथ ही अन्तः मन से यह आवाज आती थी कि इस कार्य में भी कोई ना कोई हेतु है। मिलने का समय समाप्त होने के पश्चात् गुरू जी ने संध्या बेला में एक पर्ची पर मंत्र लिखकर ये निर्देश दिये कि सभी लोग रात भर साधना हाल में बैठकर इस मंत्र का जप करें। आरती के पश्चात् मैं और मेरा मित्र व उसका परिवार मंत्र जप करने बैठें कुछ समय पश्चात् अगस्त्ये की मां की स्थिति बिगड़ने लगी एक-एक कर 17 प्रेत आत्मायें उनके शरीर से चीखते-चिल्लाते हुये निकली (यह गुरू कृपा ही थी कि जिन भी आत्माओं का प्रकोप उनके परिवार पर था उन सब का शमन हुआ) यह क्रिया पूरी रात चलती रही। थोड़ी-थोड़ी देर में चीखने-चिल्लाना के साथ किसी के जाने का आभास होता।
दूसरे दिन गुरूजी दोपहर में आये और पूछे बेटा कैसा है अब? गुरूजी का यह करूणामय स्वरूप देखकर अश्रुधार स्वतः बह गयें कुछ कहना संभव ना हो पाया। आगे समझाते गुरू जी ने हुये कहा कि- बेटा जब तक आसुरी शक्ति से मुक्त नहीं होगा तब तक गुरू की बात तो समझ में ही नहीं आयेगी। इसलिये तेरे साथ ये क्रिया आवश्यक थी। इतना कहकर गुरूजी आगे की दीक्षाओं और साधनाओं का निर्देश देकर चले गये। तब से लेकर आज तक अगस्त्ये का परिवार दिन-प्रतिदिन उन्नति की ओर बढ़ता ही जा रहा है।
भूत-प्रेत से सारे घर का वातावरण विषाक्त और मलिन बन जाता है, जिस घर में कोई अप्राकृतिक मृत्यु हो, उसमें तो यह अभिशाप बन कर छा जाते हैं, कभी घर का कोई सदस्य पागल कर देते हैं, कभी कोई अपने अंदर कुत्सित व घृणित विचारों की भीड़ भरी पाता है, तो कोई अपने अंदर अत्यधिक कामोत्तेजना को भड़कता हुआ पाता है। इसी को भारतीय शास्त्रों में पितृदोष कहा गया है, जब कि कोई भी अतृप्त आत्मा अपनी भोजन सम्बन्धी, भोग व कामवासना सम्बन्धी इच्छाओं की पूर्ति के लिये किसी को भी माध्यम बना लेती हैं। ठोस देह न होने के कारण वे अपनी वासनाओं की पूर्ति करने में असमर्थ होते हैं और इसी से किसी को माध्यम बना, ऐसी आवश्यकतायें पूरी करते हैं।
जिस व्यक्ति पर ऐसे इतर योनियों का प्रकोप एक बार हो जाये उसका सारा जीवन नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है और सारा चिन्तन दूषित। ऐसे व्यक्ति को इन इतर योनियों से मुक्ति दिलाना आवश्यक होता है। पवन पुत्र हनुमान जन-जन के उपास्य देव हैं।
उनकी तीव्र शक्ति और भक्तों पर सहज अनुकम्पा कर देने की वरदायक शक्ति ने उन्हें लोक उपास्य का केन्द्र बिन्दु बना दिया है। ऐसे ही वीर अतुलित बलधामा भगवान शिव के अवतार माने गये हैं। यदि अपने ऊपर या अपने परिवार में किसी सदस्य के ऊपर व्याप्त भूत-प्रेत बाधा निवारण के लिये इतरयोनि मुक्ति बजरंग बाहु को धारण करने से ही भूत-प्रेत बाधाओ का शमन तो होता ही है साथ ही किसी भी प्रकार की आसुरी शक्तियों का प्रभाव नहीं पड़ता। और व्यक्ति प्रत्येक दृष्टि से सम्पन्न होता है साथ ही इष्ट और गुरू के प्रति श्रेष्ठ भाव निर्मित होते है।
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