





यह बात यहां अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हम यह पहचान सकें कि कौन हमें सहयोग प्रदान कर सकता हे, किसकी शक्ति हमें प्राप्त हो सकती है, यदि कोई शत्रु बाधा पहुंचाने का प्रयास कर रहा है, तो उस पर रोक केसे लगाई जाये। जहां तक जीवन में सहयोगी एवं दिशा प्रदायक का सम्बन्ध है, गुरू को ही सभी शास्त्रों में सबसे बड़ा सहयोगी व मार्गदर्शक कहा गया है। गुरू द्वारा शिष्य को सदेव उसकी उन्नति का ही मार्ग प्राप्त होता है। गुरू की शरण में आकर तथा पूर्ण श्रद्धा से की गई कोई भी साधना निष्फल नहीं हो सकती।
गुरू के पश्चात् सबसे बड़ा सहयोगी परिवार है और परिवार मे भी जो पूर्वज है, उनका स्थान उच्च माना गया है। जीवित रहते हुये आपस में कई बार मत-भेद्, मनमुटाव एवं विरोधाभास होता है, परन्तु मृत्यु के पश्चात यह सब स्थितियां समाप्त हो जाती हैं। जिस प्रकार माता-पिता सदैव यही चाहते हैं कि उनकी संतान उनसे अधिक श्रेष्ठ जीवन जी सके, उसी प्रकार हमारे पूर्वज भी यही चाहते हैं कि उनकी संतान अपने जीवन में सम्पूर्ण रूप से सुखी होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत कर सके।
गीता में लिखा गया है कि व्यक्ति के शरीर का अन्त होने से ही उसका जीवन समाप्त नहीं होता है, वह तो नये वस्त्र धारण करने की प्रक्रिया सम्पन्न कर लेता है। स्थूल शरीर को त्याग कर सूक्ष्म शरीर से सबको देख सकता हे। यदि उसे उचित भावना एवं पूजा, आवाहन प्राप्त नहीं होता हे तो वह जीव अत्यन्त निराश होता है। यदि पितरों की श्रद्धा पूर्वक पूजा, ध्यान एवं आह्वान किया जाये तो वे उसके प्रत्येक कार्य में सहयोगी बनते हैं, उस व्यक्ति के जीवन की सभी चिंतायें एवं समस्यागयें उसके जीवन से दूर ही हो जाती है। इसीलिये पूजा, यज्ञ, हवन और पूजन कार्य में अपने पितरेश्वरों का ध्यान किया जाता है।
पितर योनि भौतिक जीवन से अधिक शक्तिशाली, प्रभावकारी एवं सामान्य नियंत्रण से परे है। भोतिक जीवन में जो रूकावटें तथा गतिविधियों पर नियन्त्रण रहता है, इसी कारण से पितरों की शक्ति सूक्ष्म शरीर होने के कारण अत्यन्त विशाल बन जाती हे। वे शक्ति एवं सिद्धि के निश्चित स्वरूप बन जाते हैं।
उत्तम होने के कारण स्वास्थ्य, वायु, गर्भ आदि कार्यों के नियंत्रक बन जाते हैं। वे अपनी शक्ति से आने वाली घटनाओं को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं, यदि उनकी पूर्ण कृपा रहती है, तो वे अपनी संतानों को ऐसा मार्ग दिखा सकते हैं, जिसमें कम से कम बाधाये हों, ऐसा कार्य करने को प्रवृत्त कर सकते हैं जिससे सम्पूर्ण उन्नति हो, व्यक्तित्व में तेज उत्पन्न कर सकते हैं, जीवन में रस, माधुर्य एवं सौन्दर्य घोल सकते हैं। उनके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता है, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि वे पूर्ण रूप से प्रसन्न हों।
पितरों को पूर्ण रूप से अपने अनुकूल बना कर प्रत्येक कार्य में सहयोग प्राप्त करने हेतु विशेष साधना की आवश्यकता हे। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध दिवसों के समय में वायु की गति एक विशेष प्रकार की रहती है, आकाश में तारा-मण्डलों का एक विशेष समूह बनता है और यह सिद्ध हो चुका है, कि इस समय पूर्णतः पितरेश्वर सूक्ष्म शरीर से इस पृथ्वी लोक पर अपनी पूर्ण गति से विचरण करते हैं। यदि इस समय कोई साधक पूर्ण विधि-विधान सहित पितरेश्वर साधना व दीक्षा प्राप्त करे, तो उसे अन्य समय की अपेक्षा अधिक सरलता से पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है।
ब्रह्मपुराण के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं ओर वे अपनी वंशजों, संतानों अपने प्रियजनों से पिण्डदान लेने के लिए पृथ्वी लोक में आ जाते हें सूर्य के कन्या राशि में आने पर वे आकाश लोक के बाहर आ जाते हैं तथा अमावस्या तक वहीं ठहरते हें इन सोलह दिनों तक पितरों का तर्पण एवं विशेष तिथि को श्राद्ध अवश्य करना चाहिये।
पुराणों के अनुसार जहां पितर व्रत पूर्ण नहीं किया जाता है उन कुलों में शूरबीर यशस्वी लोग उत्पन्न नहीं होते हैं। उनका जीवन रोग शोक, कायरता, चिंता आदि से युक्त रहता है। वे पूर्ण आयु नहीं प्राप्त करते तथा अकाल मृत्यु से ग्रस्त रहते हैं। अत: अपने कुल की वृद्धि के लिए व्यक्ति को पितृ श्राद्ध श्रद्धा पूर्वक अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।
श्राद्ध से प्रसन्नध होकर पितृगण अपने वंशजों, संतानों तथा प्रियजनों को आयु, धन, विद्या, ऐश्वर्य, मोक्ष, सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य को पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, अन्न, द्रव्य आदि सुख प्राप्त होते है।
सामान्यतः: देखा गया हे कि श्राद्ध पक्ष में लोग किसी ब्राह्मण पंडित को बुलाकर श्राद्ध कर्म सम्पन्न करवा देते हैं। और अपने कर्तव्य का इतिश्री मान लेते हैं। वास्तव में व्यक्ति को मांत्रोंक्त साधना के द्वारा श्राद्ध क्रिया सम्पन्न करना चाहिये। इसका विधान जटिल नहीं है।
चार ऋणों में महत्वपूर्ण पितर ऋण जिससे मुक्त हुये बिना ना तो आध्यात्मिक सफलता मिल पाती है ना ही गृहस्थ सुख समृद्धि, ऐश्वर्य, आज्ञाकारी संतान की प्राप्ति हो पाती है। साधक यज्ञ से देवता, स्वाध्याय और तपस्या से ऋषि तथा परोपकार से मनुष्य ऋण से मुक्त तो हो जाता है। लेकिन ऐसी कोई क्रिया नहीं कर पाता जिससे वह पितर ऋण से मुक्त हो सके। कुछ लोग पंडितो, पुरोहितो से पूजन करवाकर या कुछ ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन पितरों की मुक्ति और उनके कोप से आपका बचाव नहीं हो पाता। जिसके परिणाम स्वरूप जीवन उन्हीं मलिन शक्तियों (प्रेतादि आत्माओं) और दूषित वातावरण में पिस कर रह जाता है। इन्हीं कारणों से जीवन की प्रगति में बाधा, गृह कलह-क्लेश, पुत्र-पुत्रियों में संस्कार का अभाव, हमेशा रोग ग्रस्त रहना, पिता-पुत्र, भाई-भाई में घोर तनाव के कारण लड़ाई -झगडे होना आदि बाधायें उत्पन्न होती हैं। यदि साधक सद्गुरूदेव के निर्देशन में साधना सम्पन्न करें और महालय सर्व पितृ दोष मुक्ति विष्णु भक्ति दीक्षा प्राप्त कर पितर प्रकोपों से पूणरूपेण सुरक्षित बन सकता है। जिससे पूर्वजों का आशीर्वाद तो प्राप्त होता ही है साथ ही पितु ऋण से मुक्त होकर साधक भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और सुख-समृद्धि, धन-धान्य, पारिवारिक सामंजस्य बनने से प्रगति की ओर अग्रसर होता है।
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