





मनुष्य जीवन को सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है और इसका मुख्य कारण यह है, कि जहां अन्य योनियों में चेतना की सर्वोच्च स्थिति प्राप्त नहीं की जा सकती, वहीं मानव योनि में यह सहज ही सम्भव है। स्वयं कृष्ण ने गीता में भी कहा है।
सभी शरीरों में मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्य शरीर है। इसके पीछे जरूर ही कोई गूढ़ चिन्तन है, क्योंकि यही बात राम ने कही, यही बात बुद्ध ने कही और यही बात महावीर और अन्य लोगों ने कही। यह इसलिये क्योंकि हर योनि की अपनी सीमा होती है। चाहे वह पशु की हो, वृक्ष, पक्षियों की हो या चाहे फिर देवों की ही क्यों न हो? क्योंकि देवता भी अपने आप में पूर्ण नहीं हैं, वे भी काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार में डूबे रहते हैं। वे भी दूसरों की प्रगति से जलते हैं और उन्हें हानि पहुंचाने की चेष्टा करते रहते हैं। देवों के राजा इन्द्र में भी यह गुण है, तो अन्य देवताओं का कहना ही क्या—-?
और सबसे बड़ी बात तो यह है, कि देवता अपने ऐश्वर्य, सिद्धियों एवं अहं में डूबे हुये आगे बढ़ने की बात ही भूल जाते हैं। वे इन थोड़ी सी उपलब्धि को ही पूर्णता समझ कर वहीं के वहीं अटके रह जाते हैं। जबकि मनुष्य के पास वह चेतना होती है, कि वह अपनी कमियों और विकारों को पहचान कर उन्हें दूर करता हुआ देवत्व की स्थिति भी पार करता हुआ ब्रह्मत्व प्राप्त कर सकता है।
यह पूर्णता की स्थिति मानव तभी प्राप्त कर सकता है, जब वह इच्छा रहित हो, जब वह पूर्णतः संतोष युक्त हो और इसलिये हमारे शास्त्रों ने धर्म, अर्थ एवं काम को मोक्ष से पहले स्थान दिया है। उन्होंने इन तीन पुरूषार्थों को पहले मान्यता दी है, क्योंकि वे मानते थे, कि व्यक्ति अपनी इच्छाओं को भोग कर तृप्त हो तब निर्विकार बन सकता है। विश्वामित्र ने अपने इच्छाओं का दमन किया तो मेनका द्वारा मोहग्रस्त हुये। शंकराचार्य ने अपनी इच्छाओं का त्याग किया, तो उन्हें छः महीने तक परकाया प्रवेश कर गृहस्थ सुख भोगना ही पड़ा और मत्स्येन्द्र नाथ को तो त्रिया राज्य में पूरे दो वर्ष बिताने पड़े और प्रथम तीन पुरूषार्थों को सम्पन्न करने के पश्चात् ही वे उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर सके, मोक्ष के अधिकारी बन सके।
इसलिये अगर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता हुआ धन, वैभव प्राप्त कर अपनी सभी इच्छाओं को पूर्ण करता है, तभी वह चौथे विकल्प को भी प्राप्त कर पाता है, क्योंकि इसके अतिरिक्त दूसरा रास्ता नहीं है। इच्छाओं की पूर्ति हो, इसके लिये व्यक्ति के पास निम्न स्थितियां होनी आवश्यक है।
1- निरोग एवं स्वस्थ देह,
2- आकर्षक एवं सम्मोहक व्यक्तित्व,
3- पूर्ण वैभव एवं धन, समृद्धि
4- सभी बाधाओं एवं मानसिक क्लेशों का अन्त।
अगर चारों स्थितियां मानव जीवन में समाहित हो जायें, तो व्यक्ति निश्चित ही बिना किसी परेशानी के उच्चता की ओर अग्रसर होता रहेगा, सभी प्रकार से संतुष्ट जीवन जी सकेगा और जीवन की सर्वोच्चता को भी प्राप्त कर सकेगा। जो इच्छा हो वह सध जाये, उसे ही साधना कहते है और ऐसी ही एक अनिर्वचनीय एवं दिव्य साधना है ‘विश्वकर्मा ब्रह्मा साधना’ जिसके बल पर ये चारों ही स्थितियां साधक को प्राप्त करना सम्भव है।
ब्रह्मा ही सृष्टि के रचयिता है। उन्होंने ही विचार शक्ति से सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है, इसमें व्याप्त सभी धन सम्पदाओं के वे स्वामी हैं, उनकी साधना करने से व्यक्ति खुद भी अत्यधिक धनवान, ऐश्वर्ययुक्त एवं समृद्धिवान बन जाता है। उसके जीवन में धन से सम्बन्धित कोई भी न्यूनता नहीं रहती और वह अपनी हर इच्छा को पूर्ण कर सकने में समर्थ हो पाता है। वहीं विश्वकर्मा, जो देवताओं के शिल्पकार हैं, जो सृष्टि के निर्माण में ब्रह्म के सहायक हैं और सही अर्थों में ब्रह्मा के ही अंश हैं। जो भौतिक जीवन के आधार हैं। इनके द्वारा ही जीवन में सुन्दर भवन, वाहन, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है।
जब-जब भी देवताओं पर कोई विपदा आई, जब-जब भी देवतागण किसी परेशानी में उलझे है, उन्होंने ब्रह्मा से ही परामर्श लिया, ब्रह्मा द्वारा ही उन्हें अपनी परेशानियों को दूर करने की युक्ति भी प्राप्त हुई। इसलिये जो व्यक्ति यह साधना सम्पन्न कर लेता है, उसके जीवन में हर प्रकार की राज्यबाधा, शत्रुबाधा, रोग आदि दूर हो जाते है और वह इन सभी पर विजय प्राप्त कर आगे की ओर अग्रसर होता रहता है।
जब ये सभी स्थितियां व्यक्ति के जीवन में आ जाती है, तो वह अपने जीवन को मौज, मस्ती और आनन्द के साथ जी पाता है। उसके जीवन में कोई भी किसी भी तरह की न्यूनता नहीं रह पाती। फलस्वरूप उसकी समस्त इच्छायें पूर्ण होती हैं। वह इच्छाओं को दबाने की अपेक्षा उनको पूर्णता प्रदान करता है और भुक्ति में ही मुक्ति है के कथन को चरितार्थ करते हुये अन्त समय में ब्रह्मत्व का उपलब्ध होना जिसका सीधा-सादा अर्थ है, पूर्ण रूप से इच्छा रहित स्थिति, विचार शून्य स्थिति।
जो चार स्थितियां स्पष्ट की गई है, वे सभी भौतिक श्रेष्ठता देने वाली हैं, जो व्यक्ति के सांसारिक पक्ष में मदद करती है। परन्तु इस साधना में तो कई उच्च श्रेणी के योगियों ने ब्रह्मा की ही भांति नवीन सृष्टि निर्माण की स्थिति को प्राप्त किया है। अमरत्व को प्राप्त किया है। अतः हर हाल में यह साधना अद्वितीय है, जहां यह गृहस्थों के लिये सदुपयोगी है, वहीं योगियों संन्यासियों के लिये भी इसका उतना ही महत्व है। इस साधना के बल पर ही ब्रह्मा के मानस पुत्र वशिष्ठ ने काम और क्रोध पर पूर्ण विजय प्राप्त कर, उन दोनों को अपने चरण दबाने के लिये विवश कर दिया था और वशिष्ठ सर्वत्र ब्रह्मर्षि के रूप में सुविख्यात हुये।
जाम्बवंत ने इसी साधना के बल पर अमरत्व को प्राप्त किया और अतुलनीय सम्पदा के स्वामी बने। यह साधना अभी तक गोपनीय रही है, क्योंकि इसके द्वारा जो उपलब्धियां प्राप्त होती हैं, वे असाधारण हैं, चाहे भौतिक क्षेत्र में हो या आध्यात्मिक क्षेत्र में इनके दुरूपयोग से बहुत अधिक अनिष्ट सम्भव है।
यह साधना एक दिवसीय है और यह तांत्रोक्त साधना है। साधक को मानसिक रूप से गुरू से आज्ञा लेकर इस साधना को सम्पन्न करना चाहिये।
किसी भी चतुर्दशी अथवा रविवार को प्रातः 4 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो, सफेद धोती धारण कर सफेद आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करक बैठें।
इसके उपरान्त अपने सामने श्वेत वस्त्र से ढंके बाजोट पर विश्वकर्मा यंत्र स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन करें और घी का दीपक लगायें। फिर यंत्र की दायीं ओर चावल की ढ़ेरी बनाकर उस पर एक ब्रह्म विरोचन स्थापित कर, उसका भी संक्षिप्त पूजन करें।
ब्रह्मा का ध्यान करें-
इसके पश्चात् ब्रह्मत्व माला से निम्न मंत्र की 8 माला मंत्र जप 3 दिन तक करें ।
साधना पूर्ण होने पर समस्त पूजन सामग्री को किसी जलाशय में प्रवाहित कर दें। साधक को शीघ्र ही अनुकूल प्रभाव अनुभव होने लगते हैं और उसके जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की स्थितियों का पूर्ण समावेश होता है। जिसके फलस्वरूप वह अपने जीवन में हर प्रकार की सफलता प्राप्त कर भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक श्रेष्ठता भी प्राप्त करता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,