





एक बार धन के देवता कुबेर एक भक्त की तपस्या से प्रसन्न हुये और उन्होंने कहा कि तुम एक वरदान मांगों। भक्त सर्वोत्तम वस्तु उपहार में चाहता था, लेकिन भगवान कुबेर ने कहा कि तुम्हें जो वस्तु प्रिय हो वह वस्तु ले जाओं और उन्होंने अपने खजाने के द्वार खोल दिये और कहा कि सांय काल तक तुम जितना ले जाना चाहो अपनी झोली में भर सकते हो। भक्त अत्यन्त प्रसन्न हुआ रत्न, आभूषण, हीरे, पन्ने, माण्क्य, मोती की जगमगाहट उसे विचलित कर रही थी कभी वह एक हीरे पसन्द करता तो कभी माणिक्य तो कभी उसकी निगाह पन्नों पर पड़ती, क्या लूं, हर चीज उसे प्रभावित कर रही थी ऐसे करते-करते दिन ढ़ल गया कुबेर के खजाने का द्वारपाल आया और वह खजाने का द्वार बन्द करने लगा।
उसने भक्त को कहा कि अब चलो कोई भी व्यक्ति यहां से कुछ लेकर जाने में समर्थ नहीं हो पाया है। आओ ये चने खालो दिन भर से तुमने कुछ खाया नहीं है। आज के जगत में व्यक्ति धन की लालसा में धन को कमाने में और अपनी व्यापारिक बुद्धि से तोलमोल करने की, लोभ की प्रवृत्ति से इतना अधिक प्रभावित हो गया है कि उसे उपरोक्त कथा में कोई सार्थकता नजर नहीं आयेगी। अपनी क्षणिक् प्रवृत्ति के पीछे इतने अधिक पागल हो जाते है कि वे निरन्तर धन और व्यापार के बारे में विचार करते रहते है। धन आर्थिक सम्पन्नता मनुष्य को बहुत कुछ दे सकती है लेकिन प्रेम प्रसन्नता का भाव प्रदान नहीं कर सकती है। धन की उपयोगिता तभी तक है जब तक आप उसे उपयोग कर सके। जब धन का उपभोग नहीं होता तो धन व्यक्ति के मन में और अधिक लालच प्रवृत्ति उत्पन्न करता है व्यक्ति एक चक्र में फंसता रहता है आखिर व्यक्ति के जीवन में धन कितना आवश्यक है? क्यों आवश्यक है? और वह उसका किस प्रकार से उपभोग करें इस विषय पर व्यक्ति को विचार करना आवश्यक है।
शास्त्रों में धर्मार्थ काम मोक्षाणां पुरूषार्थ चतुष्टयम् कह कर मनुष्य की उन्नति के लिये चार प्रकार के पुरूषार्थ बनाये हैं, जिसमें सबसे पहला पुरूषार्थ धर्म, दूसरा धर्म लक्ष्मी, तीसरा काम (सन्तान उत्पन्न करना) और चौथा मोक्ष प्राप्ति के लिये साधना आदि सम्पन्न करना है। इस प्रकार शास्त्रों में यह स्वीकर किया गया है, कि जीवन में धर्म का सबसे पहला स्थान होना चाहिये, धर्म के नियमों को मानना चाहिये और हमारे मन में देवताओं के प्रति, इष्ट के प्रति और अपने गुरू के प्रति सम्मान और श्रद्धा होनी चाहिये, जिससे कि हम धर्म के पथ को पहचान सकें, अपने कर्त्तव्यों को जान सके और कर्त्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ते हुये धर्म का पालन करते हुये लक्ष्मी प्राप्ति में सफल हो सकें।
धर्म से ही सम्पन्नता आती है, परन्तु इसके साथ यह भी आवश्यक है कि हमें सम्पन्नता के लिये कुछ विशेष साधनायें और क्रियायें सम्पन्न करने से ही हम इस भाग दौड़ की जिन्दगी में, प्रतिस्पर्धा के जीवन में, व्यापार और अन्य कार्यों के माध्यम से अर्थ संचय कर सकेगें। शास्त्रों ने देवताओ में श्रेष्ठ भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी को स्थान देकर उसकी श्रेष्ठता और उसके महत्व को सिद्ध कर दिया है। यह स्पष्ट है कि लक्ष्मी से सम्बन्धित उपासना हमारे जीवन की आवश्यक उपासना है। हम चाहे किसी भी मत के अनुयायी हों, किसी भी धर्म का पालन करते हों, किसी भी विचाराधारा से सम्बन्धित हों पर हमें लक्ष्मी की प्राप्ति और उसके महत्व को स्वीकार करना ही पड़ेगा। समाज की मान्यतायें बदलती ही रहती हैं।
एक समय ऐसा भी था जब धन को अधिक महत्व नहीं दिया गया था। धन जीवन का और विनिमय का आधार अवश्य था, परन्तु वह सब कुछ नहीं था, लेकिन आज समाज की मान्यतायें और विचार बदल गये हैं, हम समाज की ही एक इकाई हैं और समाज के साथ ही साथ हमें भी अपने आपको बदलना आवश्यक हो गया है। अतः हमें यह स्वीकार करना ही पड़ेगा, कि हमारे जीवन में पूर्णता प्राप्ति के लिये अन्य तत्वों के साथ-साथ धन का भी उतना ही महत्व है। परन्तु इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये कि धन अनैतिक कार्यों से एकत्र न हो, गलत रास्तों से धन संचय न हो और किसी को धोखा देकर या हानि पहुंचा कर हम सम्पन्न न बनें। इज्जत, मान-मर्यादा, शास्त्रीय नियमों के अनुकूल धन एकत्र करें और श्री सम्पन्न बनें।
बिना धन के धर्म का अस्तित्व आज के युग में सम्भव ही नहीं। इसीलिये धन की महत्ता सर्वोपरि है और महत्ता मानव के प्रारम्भिक काल से आज तक रही है। इसीलिये शास्त्रों में कहा गया है, कि व्यक्ति को श्री सम्पन्न होना चाहिये, श्री सम्पन्न व्यक्ति ही समाज के आभूषण हैं। केवल परिश्रम से ही धन संचय नहीं हो पाता, केवल शिक्षा प्राप्ति से ही लक्ष्मीपति नहीं बना जा सकता। हमारे समाज में चारों और सैकड़ों युवक घूमते दिखाई देंगे, जो हैं तो विभिन्न डिग्रियों से युक्त परन्तु उनमें से अधिकांश बेकार या बहुत ही छोटी तनख्वाह पर जीवन यापन के लिये बाध्य होते हैं। वे जीवन की आवश्यक वस्तुयें भी सुलभ नहीं कर पाते। मात्र परिश्रम और शिक्षा ही सब कुछ नहीं है, मात्र इनके माध्यम से लक्ष्मीपति या श्री सम्पन्न बनना सम्भव नहीं है। व्यापार में भी हम देखते हैं, कि लोग परिश्रम करते हैं, अपनी तरफ से पूरा प्रयत्न करते हैं। बड़ी से बड़ी दुकान खोल लेते हैं, परन्तु इतने पर भी धन एकत्र हो जाये यह सम्भव नहीं है, इसकी अपेक्षा हम यही देखते हैं कि जिसकी छोटी सी सुन्दर दुकान है, वह ज्यादा कमा रहा है, सम्पन्न हो रहा है, ऐसे भी निरक्षर सेठों को देखा है, जिनको भली प्रकार से चार लाइनें लिखनी नहीं आती, परन्तु वे लखपति करोड़पति हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं, कि परिश्रम और शिक्षा के अलावा हमारे जीवन निर्माण और जीवन की सम्पन्नता में भाग्य का भी बहुत बड़ा हाथ है। भाग्य होने में व्यक्ति सामान्य श्रेणी से बहुत ऊंचा उठ जाता है, भाग्य में परिवर्तन विशिष्ट साधना, हवन, विशिष्ट क्रियाओं के द्वारा गुरू सान्निध्य में ही हो सकता है। लक्ष्मी साधना की सार्थकता तभी है जब व्यक्ति उसका उपयोग कर सके। यदि कोई वस्तु का उपयोग नहीं कर सकते तो उसकी सार्थकता भी नहीं है धन की सार्थकता भी तभी तक है जब उसका उपयोग, उपभोग कर सके उसे अपना सहयोगी बना सके, धन के ऊपर मनुष्य की बुद्धि हावी रहे मनुष्य की बुद्धि पर धन नहीं इसी मार्ग के द्वारा वह वास्तव में चारों पुरूषार्थ धर्म के द्वारा अर्थ, धर्म और अर्थ के सहयोग से काम और कामना पूर्ति से उस मार्ग को प्राप्त कर सकता है जिसमें अमृत्व है परमात्मा प्राप्ति है।
सांसारिक जीवन का प्रत्येक क्षेत्र धन से जुड़ा है। धन के अभाव में गृहस्थ जीवन की व्याख्या ही अधूरी है। धन पूर्ति के उधेड़बुन में जीवन का स्वर्णिम काल बीत ना जाये इसके लिये आवश्यक है कि साधक श्रेष्ठ मुहूर्त, चैतन्य स्थल, उत्तम काल खण्ड में सद्गुरूदेव की चेतना को प्राप्त करना चाहिये। जिससे कि अभावग्रस्त, धनहीन के जीवन में भी लक्ष्मी अपने सभी स्वरूपों में सतत् रूप से स्थापित हो सके। इसी हेतु सद्गुरूदेव की जन्म भूमि जो कि हर स्वरूप में ज्योर्तिंमय चेतना से युक्त है। ऐसी दिव्यतम तपोभूमि खरटियाँ मठ में ग्यारह कुण्डीय कनकधारा लक्ष्मी मंत्रों से हवन सम्पन्न किया जायेगा। नव महालक्ष्मी युक्त रूद्राभिषेक उसी दिव्य भूमि पर सम्पन्न होगा। साथ ही रूप अनंग शक्ति दीक्षा, कामदेव चैतन्य पूर्णत्व दीक्षा, कर्ण पिशाचिनी श्रीं शक्ति दीक्षा और शाकम्भरी अष्ट लक्ष्मी दीक्षा प्रदान की जायेगी। जिससे साधक सद्गुरूदेव की तपः शक्ति चेतना को पूर्णरूपेण आत्मसात कर सके साथ ही आर्थिक सुदृढ़ता, आरोग्यता, दीर्घायु जीवन सभी लक्ष्मियों से युक्त हो सके। और अपने आपको सद्गुरूमय चेतना से आप्लावित कर सके।
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