





उपनिषद् का तात्पर्य है कि हम गुरू के पास बैठें करके गुरू की बात को हृदय में धारण करें। उपनिषद् का अर्थ है कि हम गुरू के पास बैठें। केवल शारीरिक दृष्टि से नहीं, आत्मिक दृष्टि से उनके पास बैठकर उनके एक-एक शब्द को सुनें। ठीक उसी प्रकार धारण कर लें, जिससे कि हम वो स्थान प्राप्त कर सकें जो जीवन में दुर्लभ है आज के परिवेश में आज के वातावरण में। आज के विचारों में लोगों के सम्पर्क के कारण आप इस चीज को समझें या नहीं समझें। महानता क्या है और सामान्यता क्या है, शायद आप नहीं समझेगें। आपको समझ में आयेगा तो महानता तक पहुंचा जायेगा।! वहां का एक अलग आनन्द है। जिसने शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया है वह समझ पायेगा कि आनन्द क्या है। जो कालिदास को पढ़ेगा, वह उसका आनन्द ले पायेगा। कि कालीदास ने कितनी अद्भुत कल्पनायें की हैं, आम आदमी नहीं समझ पायेगा।
श्वेताश्वेतरोपनिषद् की 108 उपनिषदों में श्रेष्ठ उपनिषद के रूप में गणना की जाती है। उसमें एक श्लोक है-
दधतां सदैव दधतां परिपूर्णरूपं, अज्ञान अन्ध दधतां सततं श्री देवः।
तस्यैव दुर्भाग्य भाग्यं वदतां सहितं पवित्रः स्वात्मैव कर्म भुक्ति र्न विधातृ भर्ता ।।
ऋषि ने कहा है भाग्य और दुर्भाग्य कोई चीज नहीं होती और विधाता जैसी भी कोई चीज नहीं होती। ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं है,कि पैदा होते हुए, विधाता ने आपके ललाट पर कुछ लिख दिया हो, ऐसा कहीं शास्त्रों में उल्लेख नहीं है। शास्त्रों ने कहा है कि ‘अहम् ब्रह्मास्मि् ’ हम स्वयं ब्रह्म हैं, विधाता हैं, तो दूसरे विधाता कौन से हैं, जिन्होंने आपके भाग्य में अच्छा या बुरा लिखा, ऐसा कौन सा विधाता पैदा हो गया ?
विधाता का अर्थ है ब्रह्मा, निर्माण करने वाला, निर्मित करने वाला, रचने वाला और जब विधाता है ही नहीं , तो भाग्य जैसी भी कोई चीज नहीं है। उसका निर्माण भी हम ही करते है क्योंकि यदि पढ़े लिखे हैं तो मिल्टन, शेक्सपीयर को पढ़कर समझ सकते हैं, अंग्रेजी पढ़े लिखे नहीं, तो उनके काव्य को नहीं समझ सकते। ठीक उसी प्रकार, यदि हम ब्रह्म नहीं हैं, तो भाग्य का निर्माण नहीं कर सकते वह विनाशकारी है,उसको भाग्य नहीं कह सकते। वह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे पास मकान नहीं है, यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम सफ़ल नहीं हुए या पूर्णता प्राप्त नहीं की। हमारी ईश्वर पर आश्रित होने की आदत पड़ गई है।
यह बहुत बड़ी बात कही है उस उपनिषद् ने। बाकी सब शास्त्रों ने ईश्वर के अस्तित्व को माना है। इस उपनिषद्कार ने कहा कि हम स्वयं ब्रह्म है तो फि़र विधाता कौन है ? हम स्वयं विधाता हैं, इसलिए ब्रह्म की परिभाषा इस श्लोक में की गई है कि ब्रह्म, पांच साल का प्रहलाद भी पूर्ण ब्रह्म था। शुकदेव पांच साल के थे तब भी पूर्ण ब्रह्म थे और कश्यप अस्सी साल के थे तब भी पूर्ण ब्रह्म नहीं थे। जो गुरू के समीप रह सकता है और गुरू के हृदय में प्रवेश कर सकता है वह ब्रह्म है। यह श्लोक ने परिभाषा दी है। जो गुरू के समीप रहता है शारीरिक रूप से या आत्मिक रूप से, वह ब्रह्म है और वह गुरू के हृदय में प्रवेश करे। गुरू का भी आप पर स्नेह रहे। वह तब रहेगा जब आपका कार्य होगा, जब आप नजदीक होंगे, आप उनके आत्मीय होंगे। इतने नजदीक, कि आप उपनिषद बन जाएंगे। आप उनके हृदय में उतर जाएंगे तब आप ब्रह्म बन जाएंगें।
ब्रह्म की व्याख्या ऋषि ने बिल्कुल नए तरीके से की। ब्रह्मचारी रहने को ब्रह्म नहीं कहा, शास्त्र पढ़ने वाले को ब्रह्म नहीं कहा गया और ऐसे सैकड़ों ऋषि हुए जिन्होंने विधिवत् ज्ञान प्राप्त नहीं किया, स्कूल में नहीं पढे़ और उन्हें ब्रह्म कहा गया है। विश्वामित्र सैकड़ों वर्षो तक ब्रह्म कहलाए ही नहीं। ब्रह्मार्षि नहीं कहलाए, राज ऋषि कहलाए। बहुत बाद में ब्रह्मार्षि कहलाए क्योकि वे अपने गुरू के हृदय में उतर नहीं पाए अपने अहंकार की वजह से, अलग धारणाओं की वजह से ब्रह्म ऋषि नहीं कहला पाए और बहुत बाद में जब गुरू के हृदय में उतर सके, तो ब्रह्म ऋषि कहलाए।
इसका तात्पर्य यह है कि जो गुरूदेव को अपने हृदय में उतार सकता है, चाहे जो भी हो, चाहे मैं ही हूं और उनका इतना प्रिय बन सकूं कि उनके हृदय में उतर सकूं, उनके होठों पर अपना नाम लिखवा सकूं, गुरू को याद रहे, कि यह कौन है। हजारों लाखों शिष्यों के नाम होठों पर नहीं खुदते और होठों पर नाम अंकित करने के लिए गुरू के हृदय में उतरना आवश्यक होता है। और उनके लिए असीम प्यार की आवश्यकता होती है, समर्पण की आवश्यकता होती है। और प्राण से प्राण जुड़ने की जब क्रिया होती है, तो प्राणों में उतरा जा सकता है। जब उसके बिना रह नहीं सकें तो हृदय में उतरा जा सकता है। जिसके बिना संसार सूना सा लगे उसके हृदय में उतरा जा सकता है।
हृदय में उतरने के लिए आपकी पर्सर्नलिटी, आपकी सुन्दरता, आपकी विद्वता, आपका, ज्ञान, वे सब अपने आप में गौण है। इसलिए श्वेताश्वेतरोपनिषद् में भाग्य और दुर्भाग्य की बिल्कुल नयी व्याख्या की। उसने सब कुछ आपके हाथ में सौप दिया कि आप स्वयं ब्रह्म हैं, आप स्वयं भाग्य निर्माता है,आप स्वयं दुर्भाग्य के निर्माता है, आप स्वयं उपनिषदकार है, आप स्वयं उपनिषद है, आप स्वयं गुरू के हृदय में उतरने की क्षमता रखते हैं। सारी बागडोर आपके हाथ में सौंप दी उस उपनिषद्कार ने और मैं समझता हूं कि 108 उपरिषद्कारों में से इसने बिल्कुल यथार्थ चिंतन किया है।
यह श्लोक सोने के अक्षरों में लिखने के योग्य है, इसलिये कि पहली बार एहसास हुआ कि हम सामान्य मनुष्य नहीं हैं, हम स्वयं नियंता हैं, निर्माणकर्ता हैं। मैं बहुत कुछ हूं और मैं स्वयं का निर्माण करने वाला हूं और सामान्य शरीर से प्रारम्भ हो करके बहुत ऊंचाई तक पहुंचने वाला हूं।
पैदा होते समय व्यक्ति महापुरूष नहीं होता। एक भी महापुरूष पैदा नहीं हुआ, आगे जा करके महापुरूष बने। शुरू में राम अपने आप में महापुरूष थे नहीं, न कृष्ण महापुरूष थे, न बुद्ध महापुरूष बने। राजा के पुत्र थे वे सब। शुरू में सामान्य बालक थे। वैसे ही दौड़ते थे, घूमते थे, खेलते थे। वैसे ही थे जैसे हम और आप है । बाद में जाकर उन्होंने उस चीज को समझा, जिसका मैंने अभी उल्लेख किया कि मुझे अगर कुछ निर्माण करना है और कुछ बनना है। तो मेरी बागडोर मेरे हाथ में है। जब यह भाव आपके मन में रहेगा तो यह भाव भी रहेगा कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता । भाव हो कि मैं तो अपना खुद का हूं नहीं, मैं तो किसी के हृदय में उतर चुका हूं।
जब उतर ही चुका हूं तो यह उनकी ड्युटी है कि वे मुझे उस जगह पहूंचायें। पत्नी शादी करने के बाद निश्चिन्त हो जाती है कि यह पति की ड्यूटी है कि झोंपडी में रखें, महल में रखें, गहने पहनाएं या नहीं पहनाएं, मारे या प्यार करे। वह अपना हाथ पति के हाथ में सौंप देती है। इसलिए कबीर ने कहा कि मैं राम की बहुरिया हूं। सूर ने कहा कि मैं कृष्ण की प्रेयसी हूं। इसलिए जायसी ने कहा कि मैं तो सही अर्थों में नारी हूं , ईश्वर की चेरी हूं, दासी हूं। वे सब पुरूष हैं जिन्होंने ये बातें कही और इसलिये कहीं कि इन्होंने अपने आप को ईश्वर के हाथों में सौंप दिया है और आप गाते हैं कि अब सौप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में है जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में ——–
मगर जीवन में यह भाव उतारने की क्रिया होनी चाहिए, केवल बोलने की क्रिया नही होनी चाहिए। बोलने से आप अपने आप में ही रहेंगे। करने की क्रिया से आप उनके हृदय में उतर सकेंगे। अंतर यहीं पर आता है। जब आप अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर देंगे, तो ब्रह्म बन पाएंगे। पूर्ण रूप से समर्पित करने का मतलब है कि आप अपना अस्तित्व खो दें, यह भूल जाएं कि मैं क्या हूं, तो आप कुछ प्राप्त कर पाएंगे, और जिसने खोया है उसने सब कुछ प्राप्त किया है। मैं शिष्यों के पास बैठता हूं तो एक घण्टा खोता हूं। मगर यह नहीं खोता, तो आपका प्यार, आपका समर्पण नहीं पाता। बिना खोए कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता । और खोने के लिए चिंतन नही किया जाता, उसके लिए तो अंदर का भाव होना चाहिए और अंदर के भाव के लिए संकल्प-शक्ति की आवश्यकता होती है। संकल्प शक्ति ही व्यक्ति को पूर्ण ऊंचाई तक पहुंचा सकती है। हम द्वन्द्व में जीते हैं और पूरा जीवन द्वन्द्व में बिता देते है। चाहे गृहस्थी हैं या संन्यासी हैं, पूरा जीवन द्वन्द्व में बिताते है। जीवन के अस्सी साल की उम्र में सोचते हैं, क्या करें, क्या ना करें? प्रतिक्षण आपके मन में तर्क-वितर्क चलता ही रहता है। और आप निर्णय नहीं कर पाते। लोग जहां आपको ठेलते है, आप ठेले जाते है क्योंकि आप अपने हाथ में नहीं होते।
ऐसे व्यक्ति साधारण होते है। मुट्ठी भर व्यक्ति, लाख में से एक दो व्यक्ति अपना जीवन अपने हाथ में रखते है। औरंगजेब जब राजा बना तो उसको हाथी पर बिठाया गया कि हमारे यहां पर यह परम्परा है कि हाथी पर उसको बिठाकर राजतिलक किया जाता है। औरंगजेब जब पहली बार हाथी पर बैठा तो सीढ़ी लगा करके। बैठने के बाद उसने कहा मुझे लगाम दीजिए जिससे कि मैं इसे चलाऊ जैसे घोडे की लगाम होती है, ऊंट की होती है। उससे कहा – शहंशाह-ए-आलम! हाथी की लगाम नहीं होती। वह एकदम से नीचे उतर गया। उसने कहा कि मैं ऐसी सवारी नहीं करूंगा, जिसकी लगाम नहीं होती। मैं यह सवारी नहीं कर सकता, यह सवारी मेरे काम की नहीं है।
वह जीवन भी काम का नहीं है, जिसकी लगाम आपके हाथ में नहीं है। आपका अर्थ है कि शिष्य और गुरू का एकात्म, क्योंकि आप तो अपने को समर्पित कर चुके। वह जीवन जीना बेकार है, जो आपके हाथ में नहीं वह जीवन सार्थक है जिसमें गुरू से सामीप्य हो, प्रसन्नता के साथ सामीप्य हो, पूर्णता के साथ सामीप्य हो, प्रेम के साथ सामीप्य। मजबूरी के साथ सामीप्य नहीं हो सकता, छल, कपट और झूठ के साथ सामीप्य नहीं हो सकता। यदि आपको कोई गाली दे दें, तो कोई उसे सुने या नहीं सुने, गुरू उसे सुनें या नहीं सुने मगर वातावरण में वह बात तैरती है। और आपको नींचे धारातल पर उतार देती है। आप जब भी ऐसी कोई बात करते हैं, निन्दा करते है। या गाली देते है। तो अपने आप में एक सीढी पर उतर जाते है। और जब भी आप यह विशेष चिन्तन करते है। कि आप उन मुटठीं भर लोगों में से एक बनूंगा तो नानक बनूंगा, वीर विक्रमादित्य बनूंगा, तो आप एक कदम आगे बढ़ जाते है। विक्रमादित्य भौतिक दृष्टि से एक पूर्णता प्राप्त राजा और नानक एक फ़क्कड़ दोनों की तरह जीना चाहें राजा की तरह जियें। मगर गधो की तरह काम करेंगे तो राजा की तरह जी पाएंगे। शेक्सपीयर ने कहा कि दिन में गधो की तरह जीना चाहिए और रात में राजा की तरह जीना चाहिए।
श्वेताश्वेतरोपनिषद् में कहा है कि वह चाहे बालक हो, पुरूष हो या स्त्री हो जो जीवन को अपने हाथ में रखता है या गुरू के हाथ में रखता है, वहीं सफ़ल हो सकता है। सिक्के को हम दो भागों में नहीं बांट सकते कि यह सिक्का अगला भाग है और पिछला भाग है। सिक्के के दो भाग अलग-अलग नहीं होते । एक ही सिक्के के दो भाग होते हैं। इसी तरह एक ही पर्सनैलिटी के दो भाग होते हैं जिसमें एक को गुरू कहते है।एक को शिष्य कहते है। दोनों को मिलाकर एक पूरा सिक्का बनता हैं और वही बाजार में चलता है, जीवन में चलता है। जब शिष्य गुरू में मिल जाता हैं प्रसन्नता के साथ में तो यह मिलना एकनिष्ठता की वजह से होता है। एकनिष्ठता का अर्थ है निरंतर गुरू-कार्य में संलग्न और सचेष्ट रहना। मेरा मतलब यह नहीं है कि आप मेरा काम करें। मैं तो केवल श्लोक का अर्थ स्पष्ट कर रहा हूं।
आप गुरू को देखें या नहीं देंखे, परन्तु प्रतिक्षण उनके कार्य में संलग्न रहते हैं, सचेष्ट रहते हैं, निरन्तर आगे बढ़ कर उनके कार्य करते हैं। तो मन में एक संतोष होता हैं कि मैंने वास्तव में एक क्षण को जीया है, फ़ंका नहीं है उस क्षण को। इस क्षण में मैने कुछ सृजन किया है, व्यर्थ नहीं किया है इस क्षण को। इस क्षण में कुछ रचना की है, गालिया नहीं दी हैं। इस क्षण में किसी का स्मरण किया है, किसी के हृदय में उतरने की क्रिया की है। क्षण आपका है, आप चाहें दो घंटे ताश में बिता दें, वह चाहे चिंतन करके या कोई कार्य करके बिता दें। भाग्य या जीवन तो आपके हाथ में है। सामान्य मनुष्य तो बस जीवन जी कर बिता लेते हैं। आप जाकर देख लें सड़क पर, सब सामान्य मनुष्य है। उनमें कुछ विशेषता है ही नहीं, उन्हें पता ही नहीं कि उनके आस-पास कौन रहता है ?
शिव कहां रहते हैं यह मुझे मालूम है, क्योंकि हर क्षण मैंने सृजन किया है। इस पद को प्राप्त करने के लिए तिल-तिल करके अपने खून को जलाया। जलाया है। तो आज पूरा देश,पूरा विश्व मानता है कि यह कुछ पर्सनैलिटी है। उस सृजन को करने के लिए व्यक्ति को अपने आप को जलाना ही पड़ता है। खून जल जाता है तो वापस आ जाता हैं, मांस जल जाता है तो वापस आ जाता है। मगर गया हुआ समय वापस नहीं आता है। अगर मैं कंकाल भी हो जाऊं, मांस भी गल जाए तो मांस वापस चढ़ जाएगा। मांस-चर्बी बढ़ाने वाले बहुत मिल जाएंगे, जो मिठाई खिला देंगे, मालिश कर देंगे तो मांस चढ़ जाएगा।
मगर कोई मुझे ज्ञान नहीं सिखा सकता, धर्म-शास्त्र का सार नहीं सिखा सकता, कोई भाग्य का निर्माण करके मुझे नहीं सिखा सकता, धर्म शास्त्र नहीं सिखा सकता, वह तो सब मुझे खुद को प्राप्त करना पडेगा, इसके लिए खुद को जलाना पडेगा, उसके लिए रचनात्मक चिंतन करना पड़ेगा, इसके लिए प्रेम करना पडेगा किसी के हृदय में उतरना पडे़गा और एकनिष्ठ होना पड़ेगा।
किनारे पर खडे़ होकर नदी या तालाब को तो पार नहीं किया जा सकता। आप सोचेगें कि गुरू जी भी देख लेते हैं, घर को भी देख लेते हैं और बाहर का काम भी देख लेते हैं, सब कुछ एक साथ कर लेते हैं- यह एक निष्ठता नहीं है। एकनिष्ठता का अर्थ है कि एकचित हो कर के तीर की तरह एक लक्ष्य पर अचूक हो जाना। —-और जो तीर की तरह चलता है, वह सर्वोच्चता प्राप्त करता है। और जो सर्वोच्चता प्राप्त करता हैं, उसे संसार देखता है, और जिसको संसार देखता है। उसका जीवन धन्य होता है।
और आपकी पीढि़यों, जो स्वर्ग में बैठी होती हैं वे भी धन्य अनुभव करती है। कि हमारे कुल में कोई ऐसा पैदा हुआ, जो पूरे भारत में विख्यात है पूरा भारतवर्ष इनको स्मरण करता हैं, इनकी आवाज पर लाखों लोग एकत्रित हो जाते हैं। इनकी आवाज पर लाखों लोग नाचने लग जाते हैं झूमने लग जाते हैं उन्हें भी लगता हैं कि कुछ तो है इस बालक में, कुछ है और उनको वह प्यारा अनुभव होता हैं। और व्यक्ति पहले दिन से लगाकर अंतिम दिन तक बालक ही रहता है यदि सीखने की क्रिया हो, निरन्तर आगे बढ़ने की क्रिया हो, यदि प्यार करने की क्रिया हो और वह क्रिया भी आपके हाथ में है। इस उपनिषद् में कहा गया है कि सब कुछ आपके हाथ में है आप कैसा जीवन जीना चाहते है, घटिया, रोते-झींकते हुये दुःख में अपने जीवन को बर्बाद करते हुए या अपने आप में एकनिष्ठता प्राप्त करते हुये जीवन में प्रत्येक क्षण आनन्द प्राप्त करते हुये मुस्कुराहट के साथ में, चिन्तन के साथ में और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए।
कैसा जीवन आप व्यतीत करना चाहते हैं, वह आपके हाथ में है और यही आपके भाग्य का निर्माण करने वाला तथ्य होता है। इसलिए मैं हर क्षण को रचनात्मक बनाने की ओर अग्रसर रहता हूं। यहां भी आया हूं तो इससे पहले चार पेज लिख कर आया हूं—- और जो भी लिखा है। वह मौलिक लिखा है, जो कुछ बोल रहा हूं वह मौलिक है क्योंकि मैं मौलिक व्यक्ति हूं, नकलची नकलची व्यक्ति नहीं हूं। मैं झूठन नहीं खाता हूं, मैं झूठ नहीं बोलता हूं। लोग जो बोल चुके है, वही वापस अपने शब्दों में नहीं सुनाता हूं।जो किसी ने आज तक नहीं बोला है वह प्रवचन मैं बोलता हूं। और पिछले पचास वर्षो में किसी के द्वारा कही गयी बाते मैंने नहीं सुनाई है, जो कुछ मैंने अनुभव किया है वही मैं सुनाता हूं। जो कुछ मैंने कहा है वह कालजयी है, काल भी उसे मिटा नहीं सकेगा। जो श्लोक है,उसकी व्याख्या जिसने लिखी है उस ऋषि ने की होगी और किसी ने नहीं की होगी, उसका तथ्य समझा नहीं होगा, उसका चिन्तन समझा नहीं होगा। इसलिए मैं कहता हूं कि गीता को कृष्ण के अलावा किसी ने समझा नहीं होगा। उनके श्लोको को लोगों ने समझा ही नहीं। उनकी नवीन ढंग से चिंतन व्यख्या होनी आवश्यक है। यह एक जीवन का मेरा लक्षण है, उद्देश्य है।
आपका भाग्य-दुर्भाग्य, आयु-पूर्णायु, अमरत्व और मृत्यु, पूर्णता और अपूर्णता सब कुछ आपके हाथ में है, मगर उसका बेस एकनिष्ठता है। आप जीवन में एकनिष्ठ बनें, ऐसा ही मैं आपको हृदय से आशीर्वाद देता हूं। श्वेताश्वेतरोपनिषद् बहुत ही महत्वपूर्ण उपनिषद् है और इसका भाव, विश्व आज नहीं, तो कल अवश्य ही समझेगा और जब समझेगा तो यह ग्रंथ सबसे आगे की पंक्ति में खडा होगा। इस उपनिषद् में ऋषि ने अपने सारे ज्ञान को बांध कर रख दिया है और उन्होंने कहा है कि व्यक्ति में कमी है ही और कमी रहेगी भी, कि वह समझते हुए भी नासमझ बना रहता है, जानते हुए भी अज्ञानता अपने अंदर स्थापित करता रहता है, प्रकाश की किरण बिखरने पर भी वापस अंधकार में स्वयं को ठेल देता है। ऋषि यह कहना चाहता है कि मैं समझा रहा हूं शिष्यों को, मगर शिष्य पांच मिनट के बाद फिर इस ज्ञान की किरण पर अपने अंधकार को ढक देंगे और मेरा कहा हुआ बेकार हो जाएगा। जो चिंतन मैंने प्रस्तुत किया है वह दो मिनट या पांच मिनट रहेगा और वापस इसके ऊपर रेत जम जाएगी और यह चिंतन समाप्त हो जाएगा। यह व्यक्ति का स्वभाव है और रहेगा। —–और जो इस स्वभाव को धक्का मार कर आगे निकल जाता है वह अपने आप में ऊंचाई की ओर पहला कदम रखता है।
तो ऋषि ने पहली बात यह कही कि व्यक्ति जानते हुए भी अनजान बना रहता है, क्योंकि अनजान बना रहना उसकी प्रवृत्ति है। अनजान इसलिए बना रहता है कि वह सुरक्षित है, वह कहता है मुझे इसका ज्ञान नहीं क्योंकि इससे कोई लाभ नहीं, परन्तु ऐसा कहकर, वह अपने को छलावा देता है, दुनिया को मूर्ख नहीं बना रहा है, अपने को मूर्ख बना रहा है। दुनिया जैसी कोई चीज इस संसार में है ही नहीं। दुनिया जैसा शब्द है ही नहीं, संसार जैसा शब्द है ही नहीं। देश जैसा कोई शब्द हैं ही नहीं। क्योंकि देश या संसार या विश्व ये सब व्यक्तियों के समूह से बनते हैं। ऐसा नहीं कह सकते कि यह देश है। एक नक्शा है वह देश तो हो नहीं सकता। देश के लिए आवश्यक है कि लोग हो, एक निश्चित भू-भाग पर रहने वाले देश के निवासी कहलाते हैं।आप भारत वर्ष के लोग हैं इसलिए भारतवर्ष है। भारत में कोई मनुष्य रहेगा ही नहीं तो भारत वर्ष होगा ही नहीं इसलिए देश जैसी चीज नहीं, मनुष्य जैसी चीज है। चाहे वह मनुष्य लूला हो, लंगडा हो, ज्ञानी हो, अज्ञानी हो, कैसा भी हो —-और अगर किसी बात को वह नहीं समझेगा तो यह भी नहीं समझेगा। वह अंधकार में होगा तो देश भी अंधकार में होगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में देश है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में राष्ट्र बनाते हैं। क्योकि व्यक्ति मिलकर ही अपने आपमें राष्ट्र बनते हैं।
इसलिए राष्ट्र पुरूष की कल्पना की गई है श्वेताश्वेतरोपनिषद् में राष्ट्र भू-भाग की कल्पना नहीं की गई। व्यक्ति राष्ट्र है, देश कोई चीज नहीं है,राष्ट्र कोई चीज नहीं है। आप मिल करके बैठे हैं तो समाज है। यह तेली समाज है,यह ब्राह्मण समाज है या कोई भी समाज है, तो वह समुदाय विशेष है जिसमें कई लोग हैं। एक ही तरह के काम करने वाले हैं इसलिए वह जाति या समाज है और ये ही समाज मिल जाते हैं तो देश बन जाता है। तो मूल आधार तो मनुष्य है और अगर मनुष्य अपने ऊपर अंधकार की चादर ओढ़ लेगा, तो ज्ञान आ ही नहीं सकता। मनुष्य जानबूझ कर इसलिए अनजान बना रहता है, क्योंकि इसमें कुछ प्रयत्न नहीं करना पड़ता। इसलिए देश आगे नहीं बढ़ पाता है। या तो भौतिक क्षेत्र में बढ़ जाएगा और आध्यात्मिक क्षेत्र मे पीछे रह जाएगा जैसे अमेरिका है। उसके पास अणुबम है परन्तु मनुष्यों को प्रसन्नता देने योग्य कोई चीज नहीं है। और आपने अमेरिकियों को देखा नहीं होगा-हरदम उदास, चिंताग्रस्त, तनावग्रस्त दुःखी रहते हैं। एक भी अमेरिकी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं है। मुस्कुराहट केवल शब्दकोश में रह गई वहां पर व्यक्ति एक यंत्र बन गया है वहां पर, पति -पत्नी, बेटा बेटी सभी—–।
मैंने उनके समाज को देखा है दो दो महीने । एक बार नहीं दस बार उनके यहां रहा हूं। वे सुबह पांच बजे उठते हैं, दौड़ते हैं। स्नान करते है, पत्नी भागती है,नौकरी की तरफ़। उसे चिंता नहीं है कि पति उठा या नहीं उठा और पति फि़र उठता है, खुद चाय बनाता है और भाग जाता हैं क्योंकि हरेक की अलग-अलग नौकरी है। और सप्ताह में एक बार सब मिल पाते है। संडे के दिन। तब मालूम पड़ता यह मेरे पिता है, इनका चेहरा, ऐसा है, ये मेरा बेटा है इसका चेहरा ऐसा है।
रात को कोई दस बजे आता है,कोई ग्यारह बजे आता है, कोई नौ बजे आता है, सब डिनर बाहर करते है। जीवन का वह सब आह्लाद, वह खुशी समाप्त हो जाती है क्योंकि भौतिक क्षेत्र में तो वे बहुत आगे बढ़ गए परन्तु उनका यह जो मूल ज्ञान है, वह समाप्त हो गया। और यही समाप्त हो गया तो जीवन का कोई अर्थ है ही नहीं। और अगर आध्यात्मिक क्षेत्र में आगें बढ़ गए और भौतिक क्षेत्र में पीछे रह गए तो भी बेकार हो गए। इसलिए उस भौतिकता को आध्यात्मिकता द्वारा प्राप्त किया जाए। मैं आध्यात्मिकता को धर्म के अर्थ में नहीं ले रहा हूं। आध्यात्मिकता धर्म नहीं हैं। धर्म तो एक अलग चीज है। आप मजबूर हैं कि आपने हिन्दु के घर जन्म ले लिया तो आप हिन्दू है, यदि आप मुसलमान के घर जन्म लेते तो आप मुसलमान हैं। आपके हाथ में नहीं था मुसलमान बनना या ईसाई बनना या हिन्दु बनना। यह तो एक संयोग है, चांस है कि हिन्दू के घर जन्म ले लिया। आपकी चॉइस नहीं थी।
आदमी अंधकार की चादर, ओढ़कर बहुत प्रसन्नता अनुभव करता है और उपनिषद्कार कहता है कि इसीलिए मेरा सारा कहना व्यर्थ है। आदमी समझेगा ही नहीं और समझाने की कोशिश ही नहीं करेगा और कोशिश नहीं करेगा तो मेरा चीखना चिल्लाना व्यर्थ हो जायेगा, वह अपने शिष्यों से ऐसा कहता है। ऋषि कहता है कि जीवन का उद्देश्य क्या है, और वह कहता है कि भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वोच्चता प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य है, ऊंचाई प्राप्त करना नही हैं, सर्वोच्चता प्राप्त करना है और उसने भौतिक, आध्यात्मिक दोनों शब्द प्रयोग किये हैं। भौतिकता का तुम्हारा अर्थ अगर बहुत विलासिता, दौलत, अय्याशी और फ़ाइव स्टार होटल है तो गलत है। भौतिकता का अर्थ है कि कहीं किसी के सामने हाथ नहीं पसारना पड़े और जहां जितनी जरूरत हो मुझे प्राप्त हो जाये उसे भौतिकता कहते हैं, जितनी जरूरत हो उतना प्राप्त हो जाये। लड़की की शादी के लिए किसी के आगे हाथ नहीं पसारना पडे़। उससे ज्यादा तो अपने आप में तनाव है। उसका कोई तनाव नहीं है। क्योकि आवश्यकता से ज्यादा होते ही तृष्णाएं आरंभ हो जायेंगी। एक पंखा नहीं, दो पंखे होने चाहिए। कूलर लगना चाहिए, ए-सी- लगना चाहिए। फि़र तृष्णाएं बढ़ जायेंगी और वापस चादर आ जाएगी अंधकार की। ऋषि ने कहा, सर्वोंच्चता प्राप्त करना जीवन का लक्ष्य है और सर्वोच्चता का प्रांरभ अंदर से होता है।
इसलिए युजर्वेद में कहा गया है-
जीवन की सर्वोच्चता मन है। जीवन की सर्वोच्चता मन में धारण करने की शक्ति है। जीवन की सर्वोच्चता मन में उस चिंतन को बिठाने की शक्ति है। जीवन की सर्वोच्चता उस अंधकार को परे धकेलने के क्रिया है कि मुझे वह अंधकार धकेल कर ही दूर करने का। निश्चय कर लिया जाता है कि मुझे वह अंधकार धकेल कर ही दूर किरना हैं फि़र मन में विचार आए कि यह गलत है, मुझे तो करना यह है। यह संघर्ष व्यक्ति को करना पडे़गा तो मन से लड़ना पड़ेगा। पड़ोसियों से लड़ने से और आस-पास के लोगों से लड़ने से वह मामला हल नहीं होगा। तो मन से हम कैसे लड़े? मन से लड़ने के लिये धारण शक्ति हो। ध्यान, धारणा और समाधि ये तीन शब्द हैं। मन में धारणा शक्ति हो कि मुझे सर्वोच्चता प्राप्त करनी ही है। बस एक ही लक्ष्य एक ही बिन्दु एक ही जीवन का चिंतन, एक ही विचारधारा।
और उसका आधार ईमानदारी होता है। ईमानदारी नहीं है तो सर्वोच्चता प्राप्त हो नहीं सकती। पापियों को सर्वोच्चता प्राप्त नहीं हो सकती तस्करों को या वेश्याओं को सर्वोच्चता प्राप्त नहीं हो सकती। झूठ बोलने वाले व्यापारियों या छल करने वाले व्यक्तियों को सर्वोच्चता प्राप्त नहीं हो सकती। वे हर दम मन में डरते हैं, सशंकित रहते हैं। हरदम मन में तनावग्रस्त रहते हैं। पैसा तो है पर नींद नहीं आती, ये सर्वोच्चता नहीं हैं। सर्वोच्च की परिभाषा ऋषि ने दी है कि भौतिकता और आध्यात्मिकता में परिपूर्णता प्राप्त करना और अपने आप में पूर्ण आनंद महसूस करना।
और जो करोड़पति है, उससे तो ज्यादा करोड़पति, अमेरिका के सफ़ाईकर्ता हैं। बीस लाख की गाड़ी में सफ़ाईकर्ता आती है, और सफ़ाई कर के घर से चली जाती है। अपनी आंखों से मैंने देखा है। जब मैं न्यूयॉर्क में था तो उसके घर में सफ़ईकर्ता थी। वह कैडिलैक गाडी़ में आती थी। मैं बालकनी में बैठा था। उसने झाड़ू की, बर्तन साफ़ किये, और गाड़ी में बैठकर चली गई मेरे आंखों देखे घटना है। मैं वहां एक डॉक्टर के घर में ठहरा था। मैंने कहा यह कौन है? वे बोले नौकरानी है। मैंने कहा यहां की नौकरानी अगर कैडिलैक चलाती है, तो हम तो कहीं खड़े ही नहीं हैं। वे बाले यहां तो सब ऐसा ही होता है। नाली साफ़ करने वाला अपनी गाड़ी में आता है और साफ़ करके चला जाता है।
अब कहां तुलना करोगे आप उस वैभव की? सफ़ाईकर्ता की स्टेज यह है तो व्यापारी की स्टैज क्या होगी? मगर उनके मन में फि़र भी संतोष नहीं है। तो फि़र वह जीवन का संतोष या आनंद नहीं है। जीवन का आनंद प्रेम है। जीवन का आनंद ईमानदारी है। जब तक कार्य करें, ईमानदारी के साथ करे। रात को सोएं तो मन में पूर्ण संतोष हो कि आज का दिन पूर्ण ईमानदारी के साथ व्यतीत हुआ। चोरी न करने को ईमानदारी नहीं कहते हे। ये परिभाषा गलत है। ईमानदारी का अर्थ है कि आपने आज अगर चार रोटी खाई है तो चार रोटी का हक अदा कर दिया हैं, चार रोटी खाई, तो आठ का हक अदा कर दिया, चाहे अपने घर में ही सही। मैं अपने घर में हूं और छः रोटी का हक अदा कर दूं कार्य से या जो मेरी ड्यूटी है उस प्रकार से। अगर अस्सी साल का हूं तो किसी न किसी तरह क्रियाशील बन करके। नौकरी कर रहा हूं, व्यापार कर रहां हूं तो पहली बात ईमानदारी है और एक बात ऋषि ने कही है निष्ठा।
निष्ठा का अर्थ है कि पूर्ण लगन के साथ यह मुझे कार्य करना है। यह तनाव नहीं रहे कि मैंने समय को बरबाद कर दिया क्योंकि समय वापस नहीं प्राप्त हो सकता। तुम करोड़ रूपये खर्च करके भी बीते हुय संयम को वापस नहीं प्राप्त कर सकते। आपकी आने वाली पीढियां भी ऐसा नहीं कर सकतीं। आपने कल के दिन जो काम कर लिया, वह कर लिया, उसको वापस नहीं ला सकते। समय तो अपने आप में मूल्यवान है ही। निष्ठा का तात्पर्य है कि हमने उस इच्छा को, उस समय को जो लिया और ईमानदारी के साथ, निष्ठा के साथ काम करके जी लिया।
और तीसरी चीज ऋषि ने बताई है, सर्वोच्चता को प्राप्त करने के लिये आह्लाद की रोशनी अंदर पैदा करनी पडे़गी और पहली दो चीजें नहीं होंगी तो अंदर आह्लाद भी नहीं होगा, क्योंकि अगर चादर ओढ़ी है अंधकार की, आलस्य की, तो कुछ नहीं हो सकता। और ये दोनों चीजें हो ईमानदारी और निष्ठा, तो उसके लिए बड़ा संघर्ष करना पडेगा और निष्ठा के साथ काम करना है तो मन में आह्लाद का होना आवश्यक है। मन तो आलस्य की तरफ़ बढेगा कि यह तो कहने सुनने की बात हैं। ऋषि तो यही कह रहा है कि मैं कहूंगा और आप कहेंगे कि यह सब किताबों की बात है वह पहले ही कह रहा है। कि शिष्य कहेंगे कि यूं ही कह रहा है और आप इस चीज को मन में धारण करेंगे नहीं और नहीं करेंगे तो साधारण व्यक्ति बन कर रह जाएंगे।
आप इस समाज में, देश में, गौरवान्वित नहीं हो पाएंगे और गौरवान्वित नहीं हो सकते आप, क्योंकि आपसे पहले करोड़ों लखपति हैं। चांदनी चौक में कोई इतने से खोके में भी बैठा है वह करोड़पति हैं क्योकि खोके की आज जो पगड़ी है, वह कम से कम दस लाख है। दस लाख में तो वह खोका मिलता है, सामान तो बाद में आता है। अब आप सोच लीजिए कि आप कहां पर है? तो सम्पन्नता से महानता नहीं बनती। तो तीसरी बात एक बनी कि निश्चिंतता से उस अंधकार को धकेलना ही है। निष्ठा से यह सोच लेना है कि मुझे अपने जीवन में सर्वोच्चता प्राप्त करनी ही है इन तथ्यों के माध्यम से। तो तीसरी बात कि अंधकार भगा सकते हैं आह्लाद के साथ, प्रसन्नता के साथ। कोई यह सोचे कि आज बहुत काम किया, कल आराम करेंगे, चार दिन यात्रा करके आया अब तान करके सोऊंगा, यह आलस्य के अंधकार को और बढा़येंगे।
हम बार-बार घुसते हैं उस अंधकार में। ऋषि कह रहा है, मै बार-बार तुम्हें धकेल रहा हूं बाहर और तुम वापस उसमें घुसते हो। तुम्हारे मेरे बीच संघर्ष बस इतना ही है। मैं तुम्हे निकालता हूं और तुम बार-बार वापस अंधकार की चादर ओढ़ लेते हो। इसलिए तस्मै मनः शिवसंकल्प् मस्तु। तुम्हारा मन इस चादर को हटाएगा तो यह चादर हटेगी और ऐसा करते रहोगे तो अभ्यास हो जायेगा फि़र आपको काम करने में स्फ़ूर्ति मिलेगी, फि़र आपको थकावट नहीं होगी। और चौथी बात उसने बताई कि आह्लाद से प्रसन्नता, मधुरता पैदा होगी। जो स्वयं को प्रसन्न रखता हो, जो आस-पास के लोगों को प्रसन्न रखता है, यह अपने आप में सबसे बड़ा दान है। ज्ञान दान या लक्ष्मी दान या लंगर लगाना यह तो बहुत सैकण्डरी चीज है।
पहला दान तो यह है कि हमारे अंदर आह्लाद का ऐसा स्रोत हो कि हम आस-पास के वातावरण को आनंदमय बना दें। हमारे सम्पर्क में जो आये और वह अंधकार की चादर ओढे हुए हो तो हम उसको उस जगह खड़ा कर दें जहां आह्लाद हो, आनंद हो, जहां कार्य करने की लगन हो, क्षमता हो, धुन हो। आप सोचें कि मुझे यह काम करना है, रात को सोते समय हिसाब देना है या तो मेरा मन मुझे धिक्कारेगा या मेरा मन कहेगा कि यह कार्य पूरा कर लिया आज का दिन सार्थक हो गया। यह परीक्षा तो आपको स्वयं करनी होगी।
और पांचवी चीज उसने कही है, गुरू की आज्ञा। ऋषि यह नहीं कह रहा कि शिष्य मेरा काम करे। वह कह रहा है कि फि़र कौन समझाएगा यह सब आपको? कौन बताएगा कि अंधकार की चादर तुम्हारे ऊपर आ गई है, कौन बताएगा कि आह्लाद आया या नहीं आया। तुम्हारी कौन सी परिभाषा है आह्लाद की, क्या थोड़ा सा हंसने से या मुस्कराने से आह्लाद फ़ूट गया अंदर से? उस आह्लाद की परिभाषा क्या हुई? दिन भर जो आपने कार्य किया उसका मूल्यांकन कौन करेगा?
तुम उस अंधकार की चादर को धकेल कर आगे बढ़ गये, उसका मूल्यांकन करेगा कौन? इसके लिए कोई न कोई व्यक्ति तो होना ही पड़ेगा। उस व्यक्ति को गुरू कहते हैं। यदि वह गुरू है तो वह समझायेगा कि तुम इस रास्ते पर हो, वह बताएगा कि जिंदा रहना है तो आह्लाद के साथ जिन्दा रहिये नहीं तो फि़र तुम्हारे ऊपर कोई दुनिया टिकी नहीं है। तुम्हारे बिना भी दुनिया चल सकती हैं आप मर जाएंगे तो कोई दुनिया रूकेगी नहीं, दुनिया तो चलेगी ही अगर आप आह्लादित हैं और पांचो गुणों के साथ जीवित हैं तो इस दुनिया में आप सर्वोच्चता के साथ हैं और आप प्रत्येक जीवनी को पढ़ लीजिए उस व्यक्ति में एक आग है। तड़प है, बैचनी है, आह्लाद है, आगे बढ़ने की धुन है, संघर्ष करने की क्षमता है। बर्टेण्ड रसेल काम करता था तो बीस घंटे काम करता था, आइंस्टाइन काम करता था बीस घंटे, आईस्टाइन की पत्नी जब देखती है, आठ बज गयें हैं और वह खाना खाने नहीं पहुंचा तो वह खाना परोस कर लैबोरेटरी में उसकी टेबल पर रख देती थी और वह काम में जुटा रहता था। सुबह आती तो भी वह काम में जुटा मिलता, वह कहती, क्या तुमने खाना खाया नहीं? यह काम करने की क्षमता है और इसलिये वह आइंस्टाइन बना। यों तो सैकडों पैदा हुए, सैकडों मर गए। आइंस्टाइन क्यां जिंदा रहा और दूसरे लोग क्यों मर गयें?
आइंस्टाइन को दो बार नोबेल प्राइज क्यों मिला लोगों को तो एक बार भी नहीं मिलता, इसलिए क्योंकि उनके अंदर ये पांचों बिन्दु नहीं थे। और आइंस्टाइन से सैकड़ों, हजारों साल पहले ऋषि ने बता दिया था कि यह वह रास्ता है जिस पर चलकर हम यहां पहुंच सकते है, यही हमारी मूल शक्ति है।और मै वापस ऋषि की पहली बात को दोहराता हूं कि एक मिनट बाद आप वापस उस अंधकार में डूब जाएंगे, मेरा कहना बेकार हो जाएगा। आप में भी उतनी ही क्षमता है जितनी आइस्टाइन में थी, जितनी रसेल में थी, शेक्सपीयर में थी, मिल्टन में थी, आपने उस प्रतिभा को पहचाना नहीं इस प्रतिभा के लिए पांच सीढियां हैं, जिनको मैंने आपके सामने प्रस्तुत किया। प्रसन्नता और प्रसन्नता के साथ काम करना और पूर्ण इमानदारी के साथ काम करना, लगन और एक निष्ठा के साथ काम करना और गुरू के चरणों में समर्पित होना तो पूर्णता के साथ समर्पित होना जिससे कि रास्ता बराबर दिखाई देता रहें। ऐसा न हो कि हम अंधकार में चलते रहें और सोचते ही रहें कि हम रोशनी में हैं यह बाहर सूर्य की रोशनी है, यह रोशनी नहीं। रोशनी का अर्थ है। तस्मै मनः शिव संकल्प मस्तु मन के संकल्प से रोशनी पैदा होनी चाहिए और इसका मूल आधार प्रसन्नता है, एक वातारण को बनाना है, जहां भी रहें, परिवार में रहे, घर में रहे, समाज में रहें, कहीं भी जाएं, चाहे राक्षसों के बीच जाएं, हमें आह्लाद बिखेरना है। और यह तब होगा जब हम बिल्कुल शुद्ध और पवित्र हैं, यह तब होगा जब हम बिल्कुल शुद्ध और पवित्र और दिव्य होंगे कांच की तरह। अगर उस पर धूल होगी, धूल व्यभिचार की, बदमाशी की तो यह व्यर्थ होगा और वह नुकसान आपका होगा क्योंकि आप पहली सीढ़ी पर भी खड़े नहीं हो पायेंगे, पांचवी सीढी तो आगे की बात है।
और हम यह कर सकते हैं यदि हमें कुछ बनना है तो और ऐसे आप बन सकते हैं क्योंकि मैं आपकी प्रतिभा को जानता हूं। मैंने सही व्यक्तियों का चयन किया हैं। मैं सही व्यक्ति अपने पास रखता हूं। मैं घास, पतवार को काट कर के अलग खेत से फ़ेंक देता हूं। गेंहूं की बाली को जिन्दा रखता हूं उसे खाद पानी देता रहता हूं। किसान घास-फ़ूस को इसलिए काट देता है क्योंकि पृथ्वी की जो असली चीज है उसे घास फ़ूस खा जाएगी और गेहूं की बाली ऊपर उठेगी ही नहीं और गेहूं की बाली को उठाने के लिए खरपतवार को काटना ही पडे़गा। मैं भी जो शिष्य आते हैं, उनकी निराई करता रहता हूं। मैं देखता हूं यह खरपतवार है, इनको हटा दो नहीं नहीं तो यह फ़ालतू शोषण करेगी और फि़र जिन गेहूं की बाली को मुझे उठाना है उन्हें कुछ नहीं दे पाऊंगा। क्योंकि ये सब शोषण कर लेंगे। आप मुझे प्यार करते हैं तो उतना ही प्यार मैं आपको करता हूं क्योकि मैं तुम्हें जीवन सर्वोच्चता तक पहुंचाना चाहता हूं।
इस श्वेताश्वेतरोपनिजद् के रचनाकार ने हमें सिखा दिया कि हम जमीन पर खड़ें रहकर आसमान में छेद कैसे कर सकते हें, जमीन पर खड़े होकर देवताओं के समान पूरे विश्व में कैसे वंदनीय हो सकते हैं, जमीन पर पड़े रहकर कैसे अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकते हैं। उस ऋषि की वाणी को मैं आपके हृदय में उतार रहा हूं, जिससे आपके हृदय का अंधकार दूर हो और प्रकाश बिखेरा तो प्रकाश बिखरेगा ही, ऐसा ही मै आपको हृदय से आशीर्वाद देता हूं।
सद्गुरूदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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