





उनके नटखटपन से सभी हार मान जाते थे। इसके बाद कुछ समय के लिए वे बिल्कुल शान्त और स्थिर हो जाते। कभी-कभी माँ उनकी शरारत से ऊब कर कह उठती-मैने शिव से एक पुत्र माँगा और उन्होंने अपना दानव भेज दिया। बालक नरेन्द्र के हृदय में साधुओं के प्रति एक विशेष प्रकार की आसत्तिफ़ थी। उनके द्वार पर जब भी कोई साधु उपस्थित होता, वे फूले न समाते और कुछ न कुछ दे देते। एक दिन एक साधु आया। नरेन्द्र एक नयी धोती पहने हुए थे। उन्होंने तुरन्त ही उसे खोल कर साधु को भेंट कर दी। अब जब भी कोई साधु संत द्वार पर आता नरेन्द्र को कमरे में बन्द कर दिया जाता। परन्तु इससे क्या हुआ? कमरे की एक-एक चीज वे खिड़की से बाहर उस साधु को भेट स्वरूप फेंकते जाते।
उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा के लिए पाठशाला भेजा गया। पाठशाला में तो विभिन्न वर्गों के विद्यार्थी स्थान पाते है। नरेन्द्र ने शीघ्र ही सभी से अपनत्व स्थापित कर दिया। शिक्षक के मुँह से जो भी शब्द निकलते वे उनके मस्तिष्क में अमिट रूप से अंकित हो जाते। किसी भी पुस्तक को एक बार पढ़ना उनके लिए पर्याप्त था। वे पुस्तक की सारी बातों की आवृत्ति पुनः कर सकते थे।
सात वर्ष की उम्र में ही उन्होंने मुग्धबोध नामक संस्कृत व्याकरण तथा रामायण और महाभारत के अनेक उद्धरण याद कर लिये। एक बार उनके घर पर रामायण गाते हुए कुछ साधु भिक्षाटन के लिये आये। नरेन्द्र ने उनके गाये हुए रामायण के दोहों और चौपाइयों मे अनेक अशुद्धियाँ निकाली। लोग यह देखकर विस्मित रह गये। अपने शक्तिशाली मस्तिष्क के साथ-साथ नरेन्द्र ने भावुक हृदय भी पाया था। उनके हृदय में अपने मित्रों के प्रति अगाध स्नेह था। वे तन मन धन से उनकी मदद करने के लिए सदैव तैयार रहते थे।
नरेन्द्र के मित्र सुरेन्द्रनाथ के यहाँ बैठक थी। वहाँ श्री रामकृष्ण भी आमन्त्रित थे। नरेन्द्र ने उस अवसर पर एक भजन गाया था और रामकृष्ण ने इसे बहुत तन्मयता से सुना था। उन्होंने गद्गद् कंठसे नरेन्द्र के गीत की सराहना की थी और उन्हें दक्षिणेश्वर आने हेतु आमंत्रित किया था। प्रोफेसर की बात सुनकर नरेन्द्र ने सोचा, ‘मुझे दक्षिणेश्वर जाकर श्री रामकृष्ण से अवश्य ही मिलना चाहिए। कौन जाने इससे मेरे मन को शान्ति मिल जाये। उन्होंने श्री सुरेन्द्रनाथ मित्र के साथ दक्षिणेश्वर जाने का निश्चय कर लिया। इस यात्र के साथ ही नरेन्द्र के जीवन में एक नये अध्याय का आरम्भ हुआ।
दक्षिणेश्वर का काली मन्दिर – इसके सभाकक्ष का मुख्य द्वार खुला हुआ है। द्वार पर आते ही श्री रामकृष्ण पर दृष्टि पड़ती है । बीच कमरे में चटाई पर बैठे हुए वे अपने शिष्यों के साथ विचार-विनिमय कर रहे हैं। रामकृष्ण उसे देखते ही पहचान गए। इस विद्यार्थी को उन्होंने पहली बार एक सभा में देखा था। और इसके गीत सुने थे। हाँ, वही रूप साधारण कद, गौर वर्ण का हृष्ट-पुष्ट शरीर, भोले-भाले मुखमण्डल पर शतदल के समान प्रस्फुटित दो सौम्य नयन। अपने वस़्त्र और शरीर से बिल्कुल लापरवाह सा, जैसे बाह्य संसार से उसका कोई संबंध नहीं, आँखे कुछ खोई-खोई सी, अर्न्तमन के विचारों में उलझी हुई।
रामकृष्ण को आश्चर्य हुआ भला कलकत्ता जैसे नगर के भौतिकवादी परिवेश से यह अलौकिक व्यक्तित्व कैसे निकल आया। किन्तु उनकी सूक्ष्म दृष्टि से यह बात छिपी नहीं रही कि यही वह व्यक्ति है जिसके लिए उनकी आत्मा विकल है। यही उनका निकटतम शिष्य बनेगा और उनकी वाणी को अमर करेगा। सामने चटाई बिछी हुई थी। रामकृष्ण ने आगन्तुकों से बैठने को कहा, वह युवक अपने मित्रों के साथ रामकृष्ण के सामने बैठ गया, फिर रामकृष्ण ने उसे गीत गाने को कहा, युवक ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से दर्द भरे स्वर में कुछ भजन गाये। भजन सुनते-सुनते रामकृष्ण अत्यंत ही भाव-विभोर हो उठे, वे अपने को किसी प्रकार भी रोक नहीं पाये और धीरे-धीरे भाव की तन्मयता में इतने खो गये कि उन्हें बाह्य जगत् का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा, एक प्रकार से अलौकिक आनन्द में डूब गये।
रामकृष्ण को कठिन योगाभ्यास से अपूर्व दैवी शत्तिफ़ मिली हुई थी। ये चाहते थे कि संसार के कल्याणर्थ इस शक्ति का प्रयोग हो। इसी कार्य के लिये वे नरेन्द्र को प्रशिक्षण दे रहे थे। एक दिन उन्होंने नरेन्द्र को पंचवटी में बुलाया और कहा – ‘मैने अनेक आध्यात्मिक अभ्यासों के द्वारा अपने को पूर्ण रुप से अनुशासित कर अलौकिक शक्तियां प्राप्त कर ली। लेकिन वह मेरे किस काम की है? मैं अपना तन तो ठीक से ढँक नहीं सकता। इसलिए माँ की अनुमति से मैं उन्हें तुम में डाल देने को सोच रहा हूँ। ‘उनसे’ मुझे ज्ञात हुआ कि तुम्हे ‘उनके’ लिए काफी काम करने होंगे।
मैं उन्हें नहीं चाहता। पहले मुझे ईश्वर की ही साधना करने दीजिए। सम्भव है इसके बाद मुझे ज्ञान हो की मुझे उन शक्तियों कि आवश्यकता होगी या नहीं। यदि मैं उन्हें अभी स्वीकार करता हूँ तो शायद मैं अपना आदर्श भूल जाऊँ और उन्हे स्वार्थपूर्ण प्रयोग कर क्लेश का भागी बनूँ। शिवरात्रि के दिन नरेन्द्र तथा उनके साधक मित्रों ने उपवास किया और पूजा, प्रार्थना तथा चिंतन में व्यतीत करने का निश्चय किया। पूजा-अर्चना के बाद ध्यान लगाने का समय आया। नरेन्द्र और सिर्फ एक व्यक्ति काली के साथ था। दिनोदिन विकसित होने वाली अलौकिक आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा लेने का विचार अचानक नरेन्द्र के हृदय को उद्वेलित करने लगा। ध्यानावस्थित होने के पूर्व नरेन्द्र ने काली से कहा- कुछ मिनट बाद मुझे स्पर्श करना।’
काली ने अपने अनुभव का वर्णन करते हुए कहा कि उसने कितना भी अपने को स्थिर करने का प्रयत्न किया, पर सफल नहीं हो सका। इसे सुनकर नरेन्द्र का जिज्ञासु हृदय बड़ा ही तृप्त और संतुष्ट हुआ। वे सोचने लगे, तो क्या मुझमें भी वही शक्ति आ गयी जो गुरूदेव में है। वे प्रसन्न होकर गुरूदेव के पास दूसरे कमरे में गये। गुरूदेव ने क्रुद्ध स्वर में कहा- तुम अपनी शक्ति को बिना पूर्ण रूप से संचित किये व्यय कर रहे हो। पहले एकत्र करो फिर समझोंगे कि किस काम में और किस प्रकार इसका व्यय करना हैं। दिन धीरे-धीरे काल के पर्दे में ओझल होते जा रहे थे। नरेन्द्र के लिए पूजा, ध्यान और समाधि के अतिरिक्त गुरूदेव की सेवा का कार्यक्रम बढ़ता जा रहा था।
रामकृष्ण अपने जीवन के अंतिम दिनों में क्षीण स्वर और संकेत से ही बातें कर सकते थे। ऐसे कष्टदायक दिनों में वे भाव-विह्नल होकर प्यार से अपने शिष्यों की पीठ पर हाथ फेरते और कहते है कि मेरे बाद नरेन्द्र तुम लोगों की देख-रेख करेगा। तुम्हें शिक्षा देगा। महासमाधि के तीन चार दिन पूर्व उन्होंने नरेन्द्र को पास बुलाया। फिर उनकी आंखों में प्यार से कुछ देर तक देखने के बाद समाधिस्थ हो गये। नरेन्द्र को लगा जैसे उनके शरीर में बिजली छू गयी, जैसे कोई चीज तीक्ष्ण रूप से शरीर में प्रवेश कर गयी। नरेन्द्र उस संवेग को सहन नहीं कर सके और अचेत हो गये। जब उनकी चेतना लौटी तो उन्होंने देखा गुरूदेव के नेत्रें से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित हो रही है। वे बोले- ‘ए नरेन्द्र, आज मैंने तुझे अपना सब कुछ दे दिया_ अब मैं सिर्फ एक फकीर हूँ जिसके पास कुछ भी नहीं हैं। इस शक्ति से तुम संसार में असंख्य अच्छे कार्य करोंगे—-।
इस शक्तिदान के पश्चात् गुरू और शिष्य में मानो कोई भेद नहीं रहा। दोनों ही एकरस हो गये। रामकृष्ण जैसे योगी को इतने सशक्त रूप में आकर्षित करने वाला यह विद्यार्थी नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानन्द के नाम से जगत-विख्यात हुआ। रामकृष्ण के जीवन में नरेन्द्रनाथ के प्रवेश में भारत का एक नया इतिहास आरम्भ हुआ था।
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