





महर्षि शुकदेव के इस श्लोक में आज के शिविर द पी का पूरा अर्थ, चिन्तन समावेश है। महर्षि शुकदेव के पिता को जब कोई संतान नहीं हुई ओर वो बडे ही व्याकुल, परेशान थे। जीवन में अगर पुत्र ही नहीं हुआ तो ऐसे मैंने जीवन में कौन से पाप किये कि मैं अपने वंश को आगे नहीं बढा पा रहा हूं।
क्योंकि मनुष्य जन्म का ऋण देवताओं की पूजा, अर्चना, तपस्या करने से पूर्ण होता है, पितृ ऋण पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण करने से पूर्ण होता है। अमरनाथ की गुफा और अमरनाथ के बारे में आपने सुना होगा। कश्मीर में श्रीनगर से आगे पहलगांव ओर उससे आगे अनंतनाग और अनंतनाग के आगे एक श्रेष्ठतम स्थान पर है अमरनाथ, जहां बर्फ का शिवलिंग स्वतः निर्मित होता हे, श्रावण की पूर्णिमा को वहां हजारों लोग जाते हैं।
एक बार पार्वती ने भगवान शिव को पूछा कि मुझे पांच रहस्य समझाइये। पहला रहस्य तो है यह कि क्या व्यक्ति अमर हो सकता हे?
मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता हे?
ओर कर सकता हे तो कोन से मंत्र से, कौनसी विद्या से ओर कोन से तंत्र से?
क्या एक दरिद्र व्यक्ति जिसके भाग्य में विधाता ने दरिद्रता लिख दी हो, कया वो सम्पन्न ओर ऐश्वर्यवान बन सकता है, कुबेरपति बन सकता है? और अगर बन सकता हे तो कोन से मंत्र से बन सकता है? विधाता के लिखे हुये को कौन से मंत्र से टाला जा सकता है?
और यदि जीवन में अत्यन्त पाप और दुष्टता की हो, फिर भी क्या आपकी सायुज्यता, निकटता प्राप्त हो सकती हे? और क्या आपके दर्शन हो सकते हैं? ओर अगर हो सकते है तो कौन से मंत्र से, कोन सी साधना से? भगवान शिव ने कहा इन प्रश्नों के उत्तर मेरे अलावा संसार में कोई और दें भी नहीं सकता। में बाकी प्रश्नों के उत्तर तो तुम्हें दे सकता हूं, मगर अमर होने या मृत्यु पर विजय प्राप्त होने के प्रश्न का उत्तर मैं तुम्हें अभी नहीं दूंगा। पार्वती ने कहा – अगर उत्तर देना ही हे तो पांचों ही उत्तर दीजिये। एक प्रश्न का उत्तर दें और एक प्रश्न का उत्तर नहीं दे, ऐसा नहीं। आप मुझे उस विधि को भी बतायें, जिस विधि से व्यक्ति पूर्ण मृत्यु को विजय प्राप्त कर सकें, जिस विधि से “फरवरी ‘ 2016 पूर्ण दरिद्रता पर विजय प्राप्त कर सकें। जिस विद्या से अपने दुर्भाग्य को समाप्त कर सौभाग्य को प्राप्त कर सकें। जिस विधि से अपनी पूर्ण बीमारियों को, रोगो को समाप्त करके, अपनी पूर्ण आयु लाभ प्राप्त कर सकें और पाँचवी, जिस विधि से आपक साक्षात् दर्शन कर सकें।
और उससे बड़ा सौभाग्य क्याम होगा कि –
पुष्पदंत रचित “शिवमहिम्न स्तोत्र ” में कह रहे हैं कि संसार में भगवान शिव के दर्शन से बड़ा तो कोई दर्शन ही नहीं हैं। एकदम श्मशान में बैठे हुये निश्छल, निर्भीक, कुछ बात की परवाह नहीं, चेहरे पर असीम अखण्ड शांति और वहां पर भी बेठे हुये पूर्ण प्रसन्नता के साथ में ओढरदानी, कुबेरपति, भवानी और दसों महाविद्याओं के पति भगवान शिव के अगर दर्शन प्राप्त हो जाये तो जीवन में और कया चाहिये?
जीवन में इसलिये तो नहीं पैदा हुये हैं कि हम केवल जिंदा रहे, सांस लें, रोटी खायें, मर जायें। जिन्दगी के कुछ और भी मूल आयाम है। मूल रूप से है जिसको हम नहीं पहचान पाते और इसलिये नहीं पहचान पाते क्योंकि तुम्हारे अन्दर अंधकार बहुत है। बाहर के अन्धकार को तुम दूर कर सकते हो, मोमबत्ती लगाकर के, रोशनी लगाकर के, बल्ब लगा के ट्यूब लाईट लगा कर, मगर कभी भी तुमने यह नहीं सोचा कि बाहर के अंधकार को मिटाने के साथ-साथ अन्दर के अंधकार को भी मिटाओ। ऐसा कभी तुमने सोचा नहीं, तुमने सोचा कि में शादी केसे करूं? तुमने सोचा कि मैं संतान कैसे उत्पन्न करूं? तुमने सोचा कि मैं पैसे केसे इकट्ठा करूं? तुमने इसके अलावा दूसरा कोई चिंतन ही नहीं किया? कभी भी जिन्दगी में ऐसे प्रश्न आपके मन में उत्पन्न नहीं हुये। पार्वती ने प्रश्न उठाया कि किस प्रकार आम आदमी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता हे? उसने तो उठाया, तुमने कभी गुरु के सामने प्रश्न नहीं उठाया।
ये तो स्वयं शिव ने कहा है कि जहां अज्ञान का अंधकार बहुत घना हो जाये। तो व्यक्ति अपने जीवन में किसी के दर्शन नहीं कर सकता, अपने आप के भी दर्शन नही कर सकता। उस अज्ञान के अंधकार को केवल, कितना ही घना अंधकार हो, सूर्य की केवल एक किरण निकलती है और सूर्य की एक किरण पूरे पृथ्वी मण्डल पर अंधकार को दूर कर देती है। तुम्हारा मन तो छोटा सा मन है, छोटा सा शरीर है, पांच फुट का शरीर है, उस पांच फुट के शरीर में एक फुट का अंधकार होगा, दो फुट का अंधकार होगा, मगर उस दो फुट के अंधकार को दूर करने के लिये भगवान शिव ने कहा है-
तुम गुरु रूपी ज्ञान की एक शलाका जलाओं, अगर तुम्हे उस अंधकार को दूर करना है और अगर नहीं करना हे तो फिर तुम्हारी उन कीड़े मकोडो से ज्यादा वैल्यु नहीं है। बस यह है कि तुम मनुष्य हो ओर मनुष्य होना कोई बड़े गौरव की बात नहीं है। मनुष्य होना कोई सौभाग्य की बात भी नही है मनुष्य हो करके ईश्वर के दर्शन कर लेना सौभाग्य की बात हे। मनुष्य “फरवरी ‘ 2016 हो करके उन क्षणों को, उन चिन्तनों को, उन विचारों को, उन धारणाओं को प्राप्त करना गौरव की बात हे। पैदा होना अर्थात् जन्म लेना तो एक घटना है, जैसे एक हाथी का बच्चा पैदा हो गया, एक घोड़े का बच्चा पैदा हो गया, एक मनुष्य का बच्चा पैदा हो गया, वह तो एक घटना हुई। अब वह घटना हे या दुर्घटना? यह तो एक सामान्य तथ्य हे। इसके लिये कोई स्कूल, कॉलेज में ट्रेनिंग की जरूरत नहीं है। वह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है उसमें कोई तुमने बहुत बड़ा कार्य नहीं किया है और न भगवान ने तुम्हारे ऊपर कोई बहुत बडी कृपा कर दी है, न तुमने ईश्वर पर बहुत बड़ी कृपा कर दी है। यह तो एक रसायन क्रिया है, इस रसायन क्रिया के माध्यम से तुम्हारा जन्म हुआ। मगर जन्म लेने के बाद क्या ज्ञानांजन शलाकया। क्याज तुमने प्रयत्न किया ज्ञान की शलाका जलाने का और यदि ज्ञान की शलाका जलाने का कभी सोचा नहीं तो ये जीवन भी तुम्हारा व्यर्थ चला जायेगा और जा रहा है। इसमें तुमने कभी चिंतन नहीं किया, कभी विचार नहीं किया और किस प्रकार से एक किरण पूरे अंधकार को दूर कर सकती है, और शिव कह रहें है कि केवल गुरु का एक दर्शन, शलाका जलाने की तो बात की है।
अगर सूर्य को हम देख ले तो अंधकार मिट जाता है। बुझाये हुए दीये को अगर मोमबत्ती से लगा ले, माचिस से लगा ले, ज्योति को देख ले तो अंधकार दूर हो जाता है, 2 फुट के घेरे में और केवल गुरु के दर्शन कर लें और दर्शन करने के लिये तुम्हारे अंदर की रोशनी के माध्यम से दर्शन कर लें, इन आंखों से तुम दर्शन नहीं कर सकते। इन आंखों से तुम देख भी नहीं सकते, इन आंखों में ताकत, क्षमता हे ही नहीं। आम आदमी को ही तुम नहीं पहचान सकते। एक जेब कततरा तुम्हारे पास बैठा है और जेब काट के चला जाता हे। तुम उसको भी नहीं पहचान सकते तो गुरु को कहाँ से पहचानोंगे। तुम्हारी आंखों में वो ताकत है ही नहीं कि जेब कतरों को पहचान सको, एक विश्वासघाती बेठा है, धोखेबाज बेठा है, झूठ बोलने वाला बैठा है, तुम उसके साथ बैठे हो दो घंटे से गप्पे लगाते हो। तुम उसका बेरिफिकेसन नही कर सकते कि ये झूठ बोलने वाला है, धोखा देने वाला हे, छल करने वाला हे, पाखण्डी है, ढोंगी है या जेब कतरा है या कया है? चोर है और तुम नहीं पहचान सकते। एक घटिया इंसान को ही नहीं पहचान सकते तो गुरु को कहां से पहचान सकते हो। गुरु तो बहुत बड़ी चीज है और गुरु को, भगवान शिव ने कहा कि, एक क्षण देख लें, जी भर के देखने का मतलब होता है कि-
पूर्णता के साथ में तुम्हें ज्यों ज्यों देखता रहूं, त्यों त्यों तुम हृदय में उतरते जाओ और जिस प्रकार से एक-एक इंच सरकता है, उस प्रकार से आप मेरे पूरे शरीर में उतर जायें, वह दर्शन कहलाता है। दर्शन का मतलब हे एकदम से धीरे-धीरे, एकदम से समग्र रूप से नहीं। धीरे-धीरे पूरे शरीर में जेसे अमृत के प्याले को पी लेना है उसी प्रकार गुरु को पी लें, अपने शरीर में उतार दें। रग-रग में, रेशे-रेशे में उसका समावेश कर लें।
ओर जब ऐसा होता है तो चक्षु अपने आप बंद हो जाते है। चशक्षुरून्मीलितं येन क्योंकि बाहर की चीजें बंद हो जाती है ओर जब अंदर प्रकाश हो जाता है तो बाहर कोई नहीं दिखाई देता और फिर ये छल, झूठ, कपट अपने आप में बहुत बडी बात नहीं लगती। तुम झूठ, छल, कपट करो, में तुम्हें मना नहीं कर रहा हूं। कोई धोखेबाज है तो धोखेबाज के साथ धोखा करिये, जेब कतरा हैं तो उसको थप्पड़ मारिये। में ऐसा नहीं कह रहा हूं, तुम बिल्कुल गाय ओर भैंस की तरह बन जाओ। मगर में कह रहा हूं कि यदि तुम चाहो तो केवल गाय बन कर ही जिन्दगी में जी लो। उसके अलावा कभी कभी मनुष्य बनने की कोशिश कर लो। मैं कहता हूं तुम 45 साल 60 साल में 5 मिनट के लिये मनुष्य बनो और अवश्य बनो। मनुष्यता में तुम देखो कि गुरु क्या होता है। उस मनुष्यता में स्वयं भगवान शिव कहीं न कहीं दिखाई दे जायेंगे, भगवान विष्णु दिखाई दे जायेंगे, भगवान बुद्ध दिखाई दे जायेंगे, जगदम्बा दिखाई दे जायेगी, जब दिखाई देगी तब तुम मनुष्य बन सकोगे। जब तक तुम पशु बने रहोगे तब तक वे प्रसन्न नहीं हो सकते। तब तक हजार मंत्र जप करने से भी कुछ नहीं हो सकता। तुम्हारे अंदर ज्ञान का प्रकाश नहीं है, अंदर प्रकाश होगा तो बाहर की आंखे बंद होगी। फिर बाहर छल, है झूठ, कपट नहीं होगा। तुम छल, झूठ कपट लोगों से भी कर रहे हो, गुरु से भी कर रहे हो और तुम जब तक करते हो तो में तुम्हारी बहुत चालाकियां, बहुत धूर्तता, देखता रहता हूं और जब यह देखता हूं तो मन में बड़ा दुःख भी होता है ओर बड़ा आश्चर्य भी होता है। बहुत छोटी-छोटी घटनाओं पर तुम मुझसे झूठ बोल लेते हो। तब मेरे मन में बडा विचलन होता है। कि ये फिर ऐसा संसार का कौन सा कोना होगा जहां कभी सत्य बोलने की हिम्मत करेंगे। आखिर संसार में ऐसा एक व्यक्ति तो मिले जो अपनी बात सब कुछ खोल कर कह दें।
हममें पति-पत्नी में बहुत मतभेद होते हैं, मतभेद भी होते हैं, प्रेम भी होता हे, स्नेह भी होता है। मगर भगवान का एक विशेष स्थान है, हमने कसम खाई हुई है पिछले पचास साल अगर कभी कोई बात हुई तो वहां आप जाकर कह देंगे तो बात मान लेंगे और मुझे मन्दिर में ले जाकर बोलिये तो मैं कहता हूं कि इसका जवाब नहीं दूंगा। अगर मैं नहीं उत्तर देना चाहता तो जवाब नहीं देता हूं और बाहर जाकर कहता हूं कि मैंने ऐसा नहीं किया। इसका कारण यह है कि कोई एक ऐसी जगह होनी चाहिये जहां हम सत्य बोल सकें, हिम्मत के साथ, दृढ़ता के साथ। अगर हम गुरु के सामने ही झूठ बोलने लग जायेंगे, छल करने लग जायेंगे तो फिर तुम्हारी अपनी जिन्दगी में वो कौन से कोना, वो कौन से स्थान होगा जहां तुम अपनी घटिया बात, अपनी कटु बात भी सत्यता के साथ कह सकोगे या तुम कह सकोगे कि मैंने सत्य बोला, कहाँ बोलोगे? कौनसी जगह होगी? और तुम जो कह रहे हो, सत्य बोल रहे हो क्या? तुम लोगों की जो आपसी बात है वह सत्य नहीं है। वह केवल चापलूसी है।
मैं आपसे कह रहा हूं आप बहुत अच्छे हें, बहुत सुन्दर हैं, आप आये मुझे बहुत खुशी हुई ये सब चापलूसी हे। में आपको मिला मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। हुई या नहीं हुई? यह मेरा अन्दर का हृदय का ज्ञान ज्ञानांजन शलाकया जब ज्ञान रोशनी होगी तो ज्ञान की रोशनी में अपने आप मेरा चेहरा बोल देगा। कोई एकदम हमारा परिचित मिलता है तो चेहरे पर खुशी, प्रफुल्लता छा जाती है। एकदम ऐसा लगता है कि सब कुछ भूल जाते हैं। उसका हाथ पकड लेते हें, मिल लेते हें, एकांत में बैठ कर बाते करने लग जाते हैं और कई लोग ऐसे आते हैं जो मतलब कि दरवाजा खोलते हैं तो यह सोचते है यह साला कहां से मुर्दा, यहां कहां मर गया। ठेठ आठ बजे रात को ही मरना था और आप कहते हैं अच्छा आइये-आइये साहब! बहुत खुशी हुई, वेलकम बैठिये, अरे! आपको कोई तकलीफ तो नहीं हुई। आप आयें और आप जब भी आये, तो हमारे लिये सोभाग्य की बात हे, बैठिये ड्राइंग रूम में, मैं तो आपके इंतजार में ही था, सुबह बहुत याद किया आपको, आप आइये। यह सब चापलूसी है। अन्दर तो बहुत दुःख है कि साला आठ बजे खाने का तो टाईम हुआ घर में, परिवार के साथ खाना खायेंगे या इस आदमी के साथ बेठकर बेकार ही बात करेंगे। यह सत्य नहीं है और हम जो कह रहें हैं तो वह खुश हो रहा है कि शायद मेरी याद आई होगी। अब तुम्हारी याद काहे के लिये आयेगी भाई! क्यों आयेगी भाई। तुमने ऐसे कौन से महान् कार्य मेरे ऊपर किये है। मगर कभी-कभी चापलूसी दिखानी पड़ती हे, तुम्हारा जीवन चापलूसीमय बन गया है। चोरी करते-करते आदमी फिर चोर बन ही जाता है, फिर वो चलते हुये भी चोरी कर लेता है। मेरे यहां मेरे एक परिचित हैं, वो अपनी जिन्दगी में शायद् एकाध बार सत्य बोल गये होंगे। में नहीं कह सकता, कभी बोलें। वह यहां सोजती गेट से आयेगा, उससे पूछो कहां से आया? जालोरी गेट से आया हूं अब उसमें कोई फर्क नहीं पड़ा कि तुम सोजती गेट से आये हो या जालोरी गेट से आये पर कहेगा सत्य नहीं। और में पूछता हूं, तुम कहां जाओगे, जायेगा वह रातानाडा, वो कहेगा मैं तो यार थोड़ा शास्त्री नगर जा रहा हूं, थोड़ा काम है। फिर इधर से घूम कर भले ही जायेगा उधर ही।
मैं उसे कहता हूं कि तुम कभी सत्य भी बोलोगे। गुरु जी! अब क्या है कि अब आदत ही ऐसी पड़ गई है, सत्य बोलता हूं तो बहुत पेट फूलने लग जाता है और ऐसा मन में लगता हे कि सब बहुत गड़बड़ हो गया है। झूठ बोलता हूं तो मन प्रफुल्लित रहता है, खुश रहता है कि बस ठीक हे। हेबीट पड़ गई है। मैं कहता हूं कि तुम झूठ ऐसे आसानी से बोल लेते हो, इतनी चतुराई से कि में भी कभी-कभी नहीं पकड़ पाता और मन में बड़ा सोचता हूं कि यदि झूठ का कभी कोई प्रवचन हो तो मैं इनको गद्दी पर बिठाऊं और इनसे प्रवचन करवाऊं। यह मुझसे अच्छा प्रवचन कर सकते हैं ओर तुम निश्चित रूप से बहुत झूठ इतनी सत्यता से बोल सकते हो कि आश्चर्य होता है। मैं अगर झूठ बोल रहा हूं। यह हकीकत नहीं है। मेरी आंखे कुछ और बोलेगी, मेरा चेहरा कुछ और बोलेगा, होंठ कुछ और बोलेंगे।
ये तुम्हारी न्यूनता है इससे ज्यादा घटियापन नहीं हो सकता। इसलिये कि तुम अभी ज्ञानांजन शलाकया अर्थात अभी अंदर ज्ञान का प्रकाश फैला नहीं और क्यों नहीं फैला? इसलिये कि तुमने कभी, गुरु के पूर्णता के साथ दर्शन नहीं किये। तुमने मां-बाप, भाई-बहन के दर्शन तो किये, महात्मा के भी दर्शन किये, नारायणदत्त श्रीमाली के भी दर्शन किये, पर नारायणदत्त श्रीमाली के साथ-साथ एक गुरु है उनके दर्शन नहीं करोगे, तब तक अंदर ज्ञान का प्रकाश नही फैलेगा। जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं फैलेगा तो मूल स्वरूप जो भगवान शिव हैं, जो ब्रह्मा है, जो विष्णु-महेश है, जो रुद्र है, जो चामुण्डा है, जगदम्बा है, उनके दर्शन फिर नहीं हो सकेंगे, क्योंकि प्रभु तो कह रहें हैं कि
तुम्हारी बाहर की आंखे बंद होगी, तो दिखाई देगा। आंखों से दिखाई नहीं दे सकते वो। तो फिर क्या होगा, क्यों कह रहे हैं?
चक्षुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः इसलिये मैं गुरु को प्रणाम करता हूं कि वो बाहर की आंखे बंद करने में समर्थ हें।
इसलिये मैं गुरु को प्रणाम करता हूं कि वो अंदर की रोशनी देने में और अंदर की रोशनी पैदा करने के लिये तुम्हें गुरु की पूजा करने की जरूरत नहीं है, ऐसा शिव ने कहा भी नहीं है। उनको अबीर चढाने की जरूरत नहीं है, नारियल फोड़ने की जरूरत नहीं है, ऐसा शिव ने कहा भी नहीं है। उनको अबीर चढाने की जरूरत नहीं है, नारियल फोड़ने की जरूरत नहीं है और एक किलो प्रसाद लाकर देने की भी जरूरत नहीं हैं। तुम्हें प्यार, प्रेम ओर स्नेह, अटेचमेन्ट के साथ गुरु को अपने हृदय में, अपने प्राणों में उतारने की बात है। अगर तुम्हें कभी जीवन में मौका मिल जाये और उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिले तो अपने आंसुओं से चरण धोने की कोशिश करो। पानी से नहीं पानी से हर एक टुच्चा आदमी भी धो लेगा। फिर तुम में और उसमें कुछ अन्तर नही रहेगा। आंसुओं से चरण धोइये और अपने आप को पूर्णता के साथ समर्पित कीजिये, ऐसा जिंदगी में क्षण आये। पूरी जिन्दगी में अगर कभी ऐसा एक क्षण भी आ गया, उसी दिन तुम्हारी रोशनी जल जायेंगी, उस दिन अंदर अंधकार हट जायेगा, उस दिन तुम्हें अनिवर्चनीय दृश्य दिखाई दे जायेंगे।
क्योंकि आंख बंद होते ही तुम्हे हिमालय के दर्शन दिखाई देंगे। अंदर रोशनी होगी और अंदर रोशनी होगी तो तुम्हें मेरे साथ बिताये हुये वो क्षण याद आयेंगे। इस जीवन के भी पिछले जीवन के भी और उससे पिछले जीवन के भी तब तुम्हें मालूम पडेगा कि तुम्हारा मेरा क्या सम्बन्ध हे? तब तुम को मालूम पडेगा कि मेरी आवाज पर तुम क्यों दौड़े आते हो, यह बात मैं कई-कई बार तुम्हें कह चूका हूं और मेरे अलावा कोई दुनिया में कह अर नहीं रहा है ये बात कोई नहीं कह रहा है। मैं इसलिये कह रहा हूं कि मैं ठोक बजाकर बात कहने में हिम्मत रखता हूं इसलिये कहता रहता हूं कि यह प्रामाणिक है ओर प्रामाणिकता के साथ कर सकता हूं। किम सी मय यदि कोई चेलेन्ज दें कि ऐसा नहीं हो सकता तो मैं ऐसा कर के दिखा सकता हूं। इसीलिये मैं कहता हूं कि सूर्य उगा हुआ है, अगर कोई कै चैलेन्ज करे, सूर्य नहीं उगा हुआ है, तो मैं दिखा सकता हूं कि सूर्य उगा हुआ हे। तुम्हारे मेरे सम्बन्ध इसीलिये है और इसीलिये में तुम्हें कह रहा हूं कि तुम्हारी आखें बंद होनी चाहिये।
ये बाहर कपट की, झूठ की कम से कम मेरे साथ मत करो बाकी तुम्हारे साथ कपट चलता हो तो चलें में ऐसा भी नहीं कह रहा हूं कि तुम बिल्कुल कपट करोगे ही नहीं, ऐसा संभव नहीं है। झूठ चलेगा, छल-कपट चलेगा, धोखा चलेगा, विश्वासघात चलेगा, यह सब चलेगा। अगर कोई आदमी तुम्हें थप्पड़ मारेगा तो मैं कहता हूं कि तुम्हें दो थप्पड़ मारने चाहिये। मैं तुम्हें अंहिसावादी सिद्धान्त नही कह रहा हूं कि थप्पड़ खा कर बैठ जाओ। इतनी थप्पड़ मारिये कि वापस जिन्दगी में दूसरों को थप्पड़ नहीं मारे वो। मैं तुम्हें ये शिक्षा देता हूं, मगर जिन्दगी का एक हिस्सा, एक व्यक्ति ऐसा भी रखिये जहां अपने आप को पूर्ण समर्पित कर दीजिये। कहिये कि गुरुदेव मैं ऐसा अधम हूं, गलती की हे, मेरे पास कुछ नहीं है, में गरीब हूं या दरिद्र हूं, अच्छा हूं या बुरा हूं, और मैंने आपके साथ ऐसा व्यवहार किया यह सच है ओर ये सब कहने की क्रिया अन्दर जो मन है उसको मांजने की क्रिया है। मन के ऊपर काई जम गई है, पीलापन जम गया है, मैलापन जम गया है, उसको मांजना गुरु के साथ यह बात करने की क्रिया ही मांजना है।
आंसुओं के साथ पांव को पखारना अपने मन को मांजने की क्रिया हे। जो कुछ हम हैं, ओरिजनल हैं, वो उनके सामने रख दें। गुरु तो ढोल पिटेगा नहीं कि ये ऐसा कह रहा था कि मैं छल करता हूं और मैं झूठ बोलता हूं, कि मैं ऐसा करता हूं। गुरु किसी को नहीं कहेगा। गुरु के तुम पुत्र हों, वो तुम्हारी कमजोरियां बाहर नहीं रख सकता, उनको कोई फायदा नहीं है। मगर गुरु तुम्हें रास्ता दिखा सकता है कि तुम अन्दर ज्ञान की ज्योति केसे जला सकते हो और पूरे जीवन में अगर एक क्षण के लिये भी ज्योति जल गई तो वह बहुत है। इस साल तपस्या, इस साल साधना करने की जरूरत नहीं है। तुम इतना करके तो देखो पहले, तुम इतना ही नहीं करते तो मुझे इतनी वेदना, इतना दुःख होता है कि जिन्दगी में में शायद अपने आपको भार स्वरूप समझता हूं।
मैं अब इनको कैसे समझाऊं, किस तरीके से समझाऊं डांट दिया है, प्रताड़ना दे दी है, उनको बुरा भला कह दिया है, फटकार दिया है, हाथ पकड़ के हिला दिया है, मैंने इनको बार-बार बुला-बुला कर कह दिया है, इतने जन्मों तक इनको ठोकर मार दी है, अब मैं और क्याल कर सकता हूं? और ये वबेदना मेरी वेदना है। यह वेदना इसलिये है कि तुम मेरे प्राण हो, मेरे प्रिय हो, मेरे स्वजन हो, मेरे आत्मीय हो, मेरे हृदय के निकट हो और इस बात “फरवरी ‘ 2016 को मैं बहुत बार अगर तुम्हें कहता हूं कि सत्य बोलना चाहिये तो यह बात भी मैं बहुत सत्यता और प्रामाणिकता के साथ इन सभी देवी-देवताओं के सामने उपस्थित होकर कह रहा हूं। कितना अधिक प्यार है तुमसे जितना अपनी जिन्दगी से भी मुझे प्यार नहीं है, इतना प्यार है तुमसे, जिन्दगी तो आज है, कल चली जायेगी। मुझे इस बात का कोई अफसोस है ही नहीं, मुझे मोह नही शरीर का मोह हे ही नहीं, जिन्दगी में मोह रखा ही नहीं, मोह केवल इस बात का है कि मैं तुम्हे कुछ बना दूं, तुम्हें संवार दूं, तुम्हारे मन का बर्तन मांज दूं। तुम्हारे भीतर अंधकार है, मन के उस अन्धकार को दूर करूं। तुम्हें ज्ञान का प्रकाश दूं। तुम्हारे हदय के अन्दर बैठ सकूं, चेतना दे सक, ज्योति दे सके।
पार्वती ने जब पूछा कि आप मुझे अमृत्यु…..मृत्यु से पूर्णतया मुक्त होने की क्रिया सिखायें। तो उन्होंने कहा कि-बहुत अच्छी बात है। अगर तुम जिद्द कर रही हो तो में तुम्हे उन मंत्रो को स्पष्ट करता हूं। जिन मंत्रों के माध्यम से पांचो क्रियायें होती हें। मैं तुम्हें पांचों साधनायें सम्पन्न कराऊंगा। भगवान शिव के प्रत्यक्ष दर्शन, कुबेर साधना, शिव सायुज्य साधना, अमृत्यु साधना, ऋण मुक्ति साधना। क्योंकि व्यक्तियों को इससे बढ़कर और चाहिये ही कया? जो रोगी है उससे पूछिये तुम्हें जीवन में सबसे ज्यादा कया जरूरी है तो वह कहेगा कि घर बार सब लुट जायें, मेरी तबीयत ठीक हो जाये, बस खत्म! जो निर्धन है उसको मालूम है कि पैसे का क्यां मूल्य हैं, अमीर को मालूम नहीं हो सकता इसलिये कुबेर साधना भी उतनी ही जरूरी है और अमृत्यु साधना हम जब तक चाहें जीवित रहे, इस शरीर में, चाहे सिद्धाश्रम में, उससे बड़ा सौभाग्य, उससे बड़ा आनन्ददायक दृश्य कुछ नहीं हो सकता।
जब पार्वती ने बहुत जिद की तो भगवान शिव ने डमरू बजाया जोर से, डमरू इसलिये कि केवल यह बात में पार्वती को ही सुनाना चाहता हूं। पार्वती के अलावा यहां पर कोई मनुष्य, कोई पुरुष, कोई स्त्री, कोई पशु, कोई पक्षी, कोई कौट-पतंग कोई रहे नहीं और कोई नहीं सुने, क्योंकि गोपनीय विद्या है। और उसी अमरनाथ में एक कबूतर और कबूतरी बैठे हुये थे। डमरू बजाया, डमरू बजाने पर सारे पशु-पक्षी, कीट-पतंगें तो उड़ गये, वो कबूतर भी उड़ गया, कबूतरी भी उड़ गई। 12 मील, 12 कोस तक कोई भी जलचर या पशु या पक्षी या मनुष्य या स्त्री कोई नहीं। उस कबूतरी ने एक अण्डा दिया था, उसी समय अण्डा दिया ही था। अण्डा पड़ा था पांच-सात मिनट बीते, शिव ने देखा कि अब कोई नहीं है तो पार्वती को कहा सुन, अब में तुम्हें इन पांचों साधनाओं की, जिन साधनाओं के माध्यम से पूरे संसार में सुख मिल सकता हे। मनुष्य की इच्छा ही यही है। जो मनुष्य सामान्य व्यक्ति हे वह स्वास्थ्य को चाहेगा, फिर थोड़ा ऊंचा उठेगा तो धन को चाहेगा, फिर ऊंचा उठेगा तो पूर्ण गृहस्थ सुख चाहेगा। फिर थोड़ा ऊंचा उठेगा तो अपने ज्ञान का प्रकाश चाहेगा, फिर थोड़ा ऊंचा उठेगा तो अमृत्यु को चाहेगा, पांचों क्रिया को चाहेगा। तो मैं तुम्हे अमर तत्व होने की मंत्र-क्रिया समझा रहा हूं। उसी क्षण अण्डा फूट गया उसमें से बच्चा निकल गया। भगवान शिव सुनाने लगे। एक आदमी कहता हे तो दूसरा हां भरता है।
महादेव कहते रहें पार्वती सुनती रही। अमरकथा, अमरतत्व कथा या वे मंत्र या वो साधना विधि। कथा का मतलब वह साधना विधि, कथा का मतलब कथ्य, जो कहा उसको कथा कहते हें। औरतों को नींद बहुत जल्दी आती है, औरतों में जिद भी बहुत होती है और जिद्द भी बहुत जल्दी आती है। अगर तुममें थोड़ा गुण हो तो आप उनको नींद दिला सकते हो, अब तुम बहुत थक गई हो, ऐसे तेरी आंखे भी बहुत भारी लग रही है, तुझे कुछ पता नहीं पड़ रहा है, तेरी तबीयत पर ईफैक्ट पड़ रहा है और दो-तीन महीनों से में देख रहा हूं तुझे, तू थोड़ी रेस्ट कर ले, तो वह फट से सो जायेगी, पांच मिनट में सो जायेगी। अब तुममें गुण होने चाहिये। तुम कभी अपने इस गुण का ऐक्सपरिमेंट में भी आजमाओ।
शिव ने कहा क्या हुआ तू थको हुई हो, उसने कहा नहीं। मुझे अमरत्व सुनाओ, ये चालाकी नहीं चलेगी। पूरी अमरतत्व कथा मैं सुनूंगीं, मुझे ये ज्ञान, चेतना चाहिये। शिव ने कहा सुन, शिव सुनाने लगे, वो हां हूं करती गयी और शिव सुनाते चले गये। करीब आधी कथा हुई, पार्वती को नींद आ गयी। नींद आ गई, भगवान शिव तो अपने भंग की पीनक में थे ही, भंग तो पीये हुये थे ही, आंखे बंद थी क्योंकि चक्षुरुन्मीलितं येन और शिव कहते रहें और उसके बाद हुंकार की ध्वनि आती रही। वो कबूतर बैठा-बैठा हूं-हूं करता रहा। फिर शिव ने कहा कि सुन रही है। फिर उसको पूरी बात सुनाते……..सुनाते….सुनाते पूरी विधि सुनाई। जिस ढंग से इन पांचो विधियों से ये पांच बीज मंत्र है। ये 5 बीज मंत्रो की साधना ये है। इन साधनाओं के माध्यम से पांखडी, ढोंगी व्यक्ति और ढोंग करता हुआ भी मेरे दर्शन कर सकता है। छल करता हुआ भी, करोडपति बन सकता है। रोगमुक्त हो सकता है। कुबेर सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वो सारी विधियां बतायी और उसमें से उसने शायद रुपये में चार आने तो पार्वती ने सुनी और बारह आने उस कबूतर के बच्चे ने बेठे-बेठे आंख खोली, पूरी बात समझी। पार्वती ने कहा कि-बात क्या हे?
शिव ने कहा बात क्या हें? पूरा अमृतत्व तो तुम्हें सुनाया था। पार्वती ने कहा- सुनाया तो था, पर गर्मी बहुत थी और ठंडी हवा चल रही थी। अमरनाथ में ऐसा ही वातावरण रहता है। तुम कभी अमरनाथ मेरे साथ चले नहीं, में अमरनाथ गया था दो-तीन साल पहले। पार्वती ने कहा- वो ‘हीं’ बीज, वहां तक तो मैंने सुना था। शिव ने कहा- वो ‘हीं’ बीज! वो तो बहुत पहले की बात हैं, उसके बाद तो घंटे भर तक और पूरी विधि समझाई हे। उसने कहा- मुझे तो नींद आ गई। तो “हुं-हुं’ कौन कर रहा था? इस 12 कोस में तो कोई पक्षी नहीं है। डमरू बजाया था मैंने। उसने कहा- आपने डमरू बजाया कि नहीं ये मुझे मालूम नही है, मैंने तो हुं-हुं नहीं किया, में तो नींद में थी। शिव ने ऊंचा नेत्र उठाया, तो कबूतर बैठा हुआ दिखाई दिया, पार्वती के अलावा इसने भी अमर कथा सुन ली और अगर ये संसार में फेल गई तो कोई मरेगा मरेगा नहीं तो, मुझे कोन याद करेगा। संसार में इतना गंदा, इतना घटिया हो जायेगा। जहां देखो बूढ़े-बूढ़े चेहरे दिखाई देंगे। मरेगा तो एक भी नहीं, नये पैदा होंगे नहीं और नये पैदा होते गये और बूढे मरते नहीं गये तो पृथ्वी पर तिल रखने की जगह नही होगी भीड़ से भीड़ सटी होगी पुराना कोई मरेगा तो नया कोई पैदा होगा, ना पेड कोई खत्म होगा ना नया पौधा पैदा होगा। ना कोई मनुष्य खत्म होगा, ये तो सारा संसार अपने आप में बहुत दुर्बल और खांसने वाला और दुः:खी, पीडित ओर परेशान, कुछ होगा ही नहीं।
त्रिशूल फेक जोर से, उस कबूतर को मारने के लिये, कबूतर आगे उडा, पीछे-पीछे त्रिशूल। ये बिल्कुल शिवपुराण की कथा कह रहा हूं। वहां पुलत्स्य ऋषि की पत्नी बेठी-बैठी जल चढ़ा रही थी, भगवान् सूर्य को अर्घ्य दे रही थी और उसने उबासी ली और कबूतर ने देखा कि अब त्रिशूल तो मुझे मारेगा ही उसके मुंह के अंदर घुस गया ऋषि पत्नी के। भगवान शिव स्त्री को तो मार नहीं सकते थे, त्रिशूल रूक गया भगवान शिव भी त्रिशूल के पीछे-पीछे आये। उसने कहा कि मेरा शत्रु तुम्हारे घर में है। उसको बाहर निकाल, मुझे उसको समाप्त करना बहुत ज्यादा जरूरी है, अगर नहीं तो ये सारी सृष्टि का, ब्रह्म ने सृष्टि का निर्माण किया है ओर ब्रह्म ने सृष्टि विध्वंस की है। अगर संहार नहीं होगा तो निर्माण नहीं होगा?
आज एक अरब जनसंख्या है, ओर अगर एक अरब जनसंख्या ओर पैदा हो गई तो ये एक अरब वो भी एक अरब 2 अरब हो गई। 2 अरब, 4 अरब, 8 अरब, 40 अरब होगी, मरेगा एक भी नहीं । तो वो पृथ्वी टिकेगी कहां, खिलायेंगे कहाँ, रहेगें कहाँ? जब विनाश नहीं होगा, तो सृजन कहाँ से होगा? और इसके बाद तो सारी बात फैल जायेगी। ऋषि पत्नी ने कहा कि- मैंने तपस्या की है, में ऋषि पत्नी हूं और तुम्हारा शत्रु अब मेरे पेट में है। जब पेट से बाहर निकले तो मार देना या तो तुम मुझे मारो, स्त्री को मार दो। में खडी हूं, तुम त्रिशूल से मुझे मार सकते हो। शिव ने कहा- मैं स्त्री को तो मार नहीं सकता। ऋषि पत्नी ने कहा- जब संतान उत्पन्न हो, शत्रु तो तुम्हारा वो है, जब पैदा हो तो मार देना। शिव ने कहा- मैं घर के बाहर बैठा रहूंगा, कोई भरोसा नहीं, कब पैदा हो, कब निकल जायें, कोई नो महिने का गर्भ हो, 5 महीने के गर्भ से ही निकल जाये। मैं यहीं धूनी लगाऊंगा।
भगवान शिव ने वही धूनी लगाई, बैठ गये। नौ महीने बीत गये, 10 महीने बीत गये, ग्यारह महीने बीते, बारह महीने, 13-14 महीने बीते। पहले तो पत्नियां, स्त्रियों 21 महीने का गर्भ धारण करती थी। 15 महीनें में उसने पूछा अंदर बच्चे को कि तुझे कोई कष्ट तो नहीं है। उसने कहा- माताजी बहुत आराम से बैठा हूं, बाहर निकलुंगा तो ये शिवजी मार देंगे, अंदर तुम्हें कोई तकलीफ हो रही हो तो बाहर निकल जाऊ। ये मुझे मार नहीं सकता, क्योकि मैने अमरकथा पूरी सुन ली है। मैने सुन ली हे तो मैं मर नहीं सकता, यह गॉरन्टी है। इनका त्रिशूल मेरा कुछ बिगाड़ेगा नहीं। आप चिंता मत करिये आपको कष्ट नहीं होना चाहिये। मुझे क्या कष्ट, तू बैठा रह अंदर बस! भगवान शिव के रोज दर्शन होते रहें। इसी बहाने रोज सुबह-शाम दर्शन करती हूं। पहले पूजा अर्चना करनी पड़ती थी। तू भी ठीक अंदर अच्छा बेठा है। पूरे छ: साल तक अंदर बेठा रहा । भगवान शिव ने कहा-शत्रु को बाहर निकाल। उसने कहा कि- मैं तो अब निकालने वाली कोन होती हूं, यह तो ब्रह्म का नियत्रंण हे, ब्रह्म जब चाहेगा तब ऐसा होगा। अगर वो निकल भी गया तो तुम उसको मार नहीं सकते हो? उसने अमरकथा सुन ली है। शिव ने कहा- ये बात तो सही है।
ऋषि पत्नी ने कहा- त्रिशूल उसका कुछ अहित तो कर नहीं सकता। फिर तुम अपना टाईम बर्बाद क्यों कर रहे हो, फिर यह धूनी लगाये हुये, मेरे घर के आगे राख फैला दी है। ये भूत गण घूम रहे हे, न कोई बाहर जा सकता है। तुम यहां झंडा गाडे हुये बेठे हो। ये छ: साल की सजा हमें क्यों दी है। शुकदेव को कहा- तुम बाहर चलो! शुकदेव शुक माने तोता, देव-माने देवता, इसलिये उसका नाम शुकदेव पड़ा। वो तोता जो था वो अंदर गर्भ में बालक बना, इसलिये उसे शुकदेव कहा। इसीलिये अग्रगाह बालक कहा गया वो। ज्योंहि ही वह बाहर निकला, अगर में यह कह रहा हूं तो आपको आश्चर्य लग रहा है कि तोता कैसे अन्दर घुसा, ऐसा केसे हुआ। यह में शिव पुराण की कथा सुना रहा हूं।
और में यह कह रहा हूं कि सिद्धाश्रम इतना लंबा चौड़ा हे, कि वहां दूधिया प्रकाश और वहां पत्ते मुर्माते नहीं, गुलाब कभी मुर्झाते नहीं, वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होते, तो आप कहते है, केसे होगा? ओर मैं कह रहा हूं कि अमेरिका में 104 मंजिल का एक मकान हे न्यूयार्क में। आप कल्पना करें कि यों आदमी देख नहीं सकता ओर लिफ्ट से ऊपर जाने में भी कम से कम 10 मिनट लगते हें, 104 मंजिल जाने में। तो गुरुजी ऐसा हो सकता हे क्या? अब तुम अमेरिका जाओ तो देखो तभी कन्फर्म होओगे और जब तुम उन साधनाओं मे पहुंचोगे तो मालूम पड़ेगा कि ऐसा हो सकता है। वह पेदा हुआ और पैदा होते ही रवाना हो गया। उसके पिता पीछे दोडे, पुलत्स्य दौड़े, मां दौड़ी। उसने कहा- बेटे तुम क्या कर रहे हो? कहाँ जा रहे हो? बुढापे में बड़ी मुश्किल से तुम्हें पाया हे, पाला है, पोसा हे तुम्हें। और शुकदेव ने कहा- माँ क्या होती हे ?, पिता क्या होता है? ये तो केवल एक निमित्त मात्र होते हें ओर तुम भी केवल एक निमित्त मात्र हो, जन्म देने के एक आधार हो, मेरे जीवन के कर्मों को पूर्ण देने के आधार नहीं हो। जन्म देने के आधार हो। तुमने जन्म दिया है इस बात के लिये तो तुम्हारा ऋणी हूं। मगर तुम मेरे जीवन के कर्मो का संचालन नहीं कर सकते।
मेरे जीवन को एकदम चुश्षरुन्मीलित येन, तस्मै श्री गुरवे नमः!
वो ज्ञान मुझे तुम नहीं दे सकते, उसके लिये मुझे किसी गुरु को ढूंढना पडेगा। मुझे जाना पडेगा, उस जगह, अगर में वहां नहीं जाऊंगा, तो जीवन बहुत छोटा सा है। मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं एक मामूली व्यक्ति बन कर जिंदा नहीं रहना चाहता हूं। 88 हजार ऋषि हैं, मैं उनका सभापति बनूं मैं चाहता तो ऐसा हूं, में बनूंगा तो अद्वितीय बनूंगा, ऐसा सामान्य व्यक्तित्व नहीं बनुंगा।
एक मील तक वो जंगल के पीछे-पीछे दौड़े, आगे तालाब था। गांव के बाहर तालाब होते थे पहले। वहीं औरते भी स्नान करती थी, पुरुष भी स्नान करते थे, ऐसा होता था। वहां कुछ स्त्रियां स्नान कर रही थी। शुकदेव पास में से तो निकले औरते स्नान करती हो हल्ला करती रहीं और फिर शुकदेव के पिता निकले पास में से, तो औरतें हड़बड़ा कर बाहर निकली, बूढ़ा आया है, अभी गालियां देगी कि तुम्हें शर्म नहीं आती है, दिन को स्नान करती हो, तालाब में स्नान करती हो।
उनकी आरती होती है और तो कोई उन्हें पूछे नहीं, तो बैठे-बैठे बड़बड़ाते रहते हैं। घर में अगर कोई वृद्ध हो, तो देखते हो चूड़ी बाजा बजता ही रहता है 24 घंटे। वो बाहर निकली तो। शुकदेव के पिता ने कहा कि- तुम्हें! शर्म नही आती, मेरा जवान लड़का पास से निकल गया तो तुम पानी से बाहर निकली नहीं, स्नान करती रही और में वृद्ध, आंखो से दिखाई देता नहीं और में जब पास से निकला तो तुम हडबड़ा के कपडे पहनने लगी। स्त्रियों ने कहा कि- तुम्हारे पुत्र की आंखों में कोई विकार है ही नहीं, उनको पता ही नहीं कि हम स्नान कर रही है। तुमने घूर के देखा भी कि तालाब हे फिर आंखे खोलकर देखा कि कोई स्त्रियां स्नान कर रही है ओर तुम थोड़े नजदीक भी आये, तुम्हारे आंखों में विकार है। इसलिये शर्म तुमसे हमें आ रही है उस आदमी से हमें शर्म थी नहीं। और आगे जाकर शुकदेव भागवतकार बनें। भागवत की रचना की, भागवत एक पुराण है। जब नेमिषारण्य में 88 हजार ऋषि वेदों इत्यादि के सम्बन्ध में चर्चा करने के लिये एकत्र हुये तो विवाद हुआ कि इस सभा का अध्यक्ष किसे बनाया जाय, पुलत्स्य, वेद व्यास, जमदाग्नि सारे ऋषि बुजुर्ग ऋषि थे सब अपनी-अपनी राय देने लगे तब सारे वरिष्ठ ऋषियों ने कहा कि हम सबसे ज्ञानी शुकदेव मुनि ही है। उम्र में भले ही वे केवल 12 वर्ष के हें लेकिन उन्हें पांचो विद्याओं का पूर्ण ज्ञान है और वे ही इतने ऋषियों को उपदेश दे सकते हैं। वाद-विवाद में कोई निर्णय दे सकते है। संसार में शुकदेव मुनि से ज्यादा ज्ञानी पुरुष अभी इस पृथ्वी पर नहीं है। सारे ऋषियों द्वारा निवेदन करने पर शुकदेव मुनि ने सभा की अध्यक्षता की और पुराण लिखे गये। नये पुराणें की रचना हुई ।
सद्गुरूदेव स्वामी निखिलेश्वशनन्द परमहंस!
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