





हम निखिल धर्म की पताका को सम्पूर्ण विश्व में लहराने के लिए एक ऐसा अटूट परिवार का निर्माण करेंगे जो एक क्रान्तिकारी मील का पत्थर विश्व रूप में विख्यात होगा उसके लिए हमें एक ठोस स्तम्भ (शिष्य) के रूप में स्वयं को विकसित करना पड़ेगा इसके लिए हमें अपनी नीव मजबूत करनी पड़ेगी और नीव तभी मजबूत होगी जब हम सद्गुरु के प्रति समर्पित भाव से निस्वार्थ सेवा कर जीवन में विश्वास पैदा करे तथा आनन्द युक्त होकर जीवन में संतुष्टि का भाव ला सके। हम अपने जीवन में गुरु के प्रति सेवा, समर्पण, विश्वास, आनन्द व संतुष्टि, श्रद्धा भाव रखकर निखिल धर्म के विस्तार में सहायक बने।
इन सभी को क्रियान्वित करता है एक शिष्य अध्यात्म जगत में सबसे मुख्य स्तम्भ शिष्य ही होता है। क्योंकि ईश्वर से साक्षात्कार हम स्वयं करने में असमर्थ होते है और इस पथ पर आगे बढने के लिये कोई न कोई माध्यम अवश्य बनाना पडता है और ईश्वर पाने की आकुलता में ही गुरू को माध्यम बनाया गया और गुरू शिष्य की परम्परा चलती गई जो भगवान बन गये वे भी पहले शिष्य बने राम, कृष्ण, महावीर बुद्ध आदि इसके उदाहरण है इसीलिये गुरू पूर्ण होने ही चाहिये जो नाना पंथ से घुमाकर सदमार्ग पर शिष्य को अग्रसर कर सके। जो शिष्य अपनी निस्वार्थ सेवा से गुरू को प्रसन्न कर सकता है, अंधकार रहित हो सकता है वैराग्य युक्त होकर जीवन में संतुष्टि का भाव ग्रहण कर सकता है और आज तक किसी भी सद्गुरू को उसके शिष्योंके कार्यों से, त्याग से, सेवा से, समर्पण से पहचाना गया और शिष्यों को सद्गुरू की ज्ञान शक्ति से। सद्गुरूदेव निखिल के शिष्य इतने कायर व स्वार्थी भी नहीं हो सकते कि वह उनके द्वारा प्रज्ज्वलित ज्ञान की ज्योति को आत्मसात कर श्रेष्ठता व नूतनता न प्राप्त कर सकें तथा इस समाज में, विश्व में एक सुंदर सौहार्द पूर्ण परिवेश को निर्मित करने में अपना सहयोग दे सकें।
और सभी का प्रश्न होता है कि निखिल को क्या प्रिय है? क्योंकि जो गुरू को प्रिय है वही शिष्यों का मार्ग है उनको प्यारा क्या है? यह पता चल जाये तो हम भी उनके प्यारे बन सकते हैं उनकी पसंद, उनका लगाव, उनकी रूचि कहॉ हैं? यदि यह पता चल जाये तो हमे मार्ग का पता चल जायें।
गुरू का प्रिय बन जाना जीवन का एक विशिष्ट आयाम, एक मुख्य स्वरूप है जिसके प्रसन्न होने पर जीवन में सत्परिणाम घटने निश्चित होते है। हमारे जीवन जीने का ढंग तथा जीवन शैली कुछ ऐसी है जिसका हम पूर्ण रूप में लुत्फ (आनन्द) नहीं उठा पाते, अनुभूति नही कर पाते है। इन सब के लिये एक विशिष्ट जीवन शैली की आवश्यकता होती है जो हमें अपने सद्गुरू के बताये मार्ग पर, साधनाओं के मार्ग पर, सेवा के मार्ग पर, अहंकार रहित होकर चलने पर ही प्राप्त हो सकती है।
निखिल कहते है कि साधना में निरन्तर रत हुआ साधक हानि व लाभ की दशा में समभाव रखता हुआ अपने मन को मेरे प्रति प्रेम भाव में दृढ़ निश्चय रखने वाला शिष्य ही मुझे प्रिय है।
गुरू तो व्यक्ति के शुष्क जीवन में बहार के समान है, एक सगन्ध का झोका है उसे किसी शर्त पर नहीं रखा जा सकता। उनके प्रसन्न होने पर प्रकृति, ईश्वर, समाज आदि सभी की उस पर कृपा होती है अर्थात् निश्चित रूप से जीवन में सुपरिणाम स्वतः घटित होते है। धर्म के मार्ग पर चलने में अनेकों कठिन परिस्थितियों को सामना करना पडता है परन्तु शुद्ध भाव से निस्वार्थ भाव से कोई भी कार्य पूर्ण मनोयोग से करने पर पूर्ण होता ही है हम निखिल के शिष्य बन सके निखिल के ज्ञान को विस्तार करने में सहयोग दे सकें तथा विश्व में निखिल धर्म को स्थापित कर सके ऐसी कृपा सद्गुरूदेव हमें निरन्तर प्रदान करते रहें।
अर्थ – हम धन का उपार्जन करें, संग्रह करें, बुद्धि का उपार्जन करें तो हम उसका उपयोग लोक कल्याण कार्यों के लिये करें न कि स्वयं के उपभोग के लिये यदि किसी भी सिद्धि का उपभोग करेंगे तो वह हमें विनाश कर सकती है। परन्तु उसका उपयोग दूसरों के लिये करेंगे (शुभ के लिये) तो उसमें बढ़ोतरी निश्चित है।
हम अपनी धन सम्पत्ति का संग्रह अपनी सन्तान आदि के लिये करते है और अंत समय में उनको ही प्रदान करते है और वही हमें जानते है अन्य कोई हमारा नाम भी नहीं जानते लेकिन यदि हम अपनी धन सम्पत्ति का कुछ भाग लोक कल्याण में दान कर सकें तो अपना नाम कई कई जन्मों तक अमर कर सकेंगे और जो हम स्वयं के भोग के लिये अर्थ संचय करते है वह सभी हमारे ऊपर भार बन कर एक सर्प कि भॉति हावी हो जाता है वह न केवल हमारा विनाश ही करता है वरन् हमारी भावी पीढि़यों के लिये भी विनाशकारी सिद्ध होता है। सामाजिक परिवेश में जितने अपराध, ऐयाशियां आदि का जन्म हुआ है तो उसका एक बडा कारण यही है कुछ लोग धन का संग्रह कर अपने पुत्र पुत्रियों आदि को दे गई यदि उनकी संतानों को कमाने का स्वयं मौका मिला होता तो वे कुमार्ग पर नहीं बढते तथा इन सब पापों का परिणाम उनके पिता पर नहीं पडता।
निखिल धर्म के अनुसार हम धन का उपयोग करें उपभोग नहीं उपयोग उसे कहते है जिन व्यक्तियों को जहां जरूरत है वहां उन आवश्यकताओं के लिये हम अपने धन का उपयोग करें, बुद्धि का उपयोग करें, पैसे का उपयोग करें श्रम का उपयोग करें, ज्ञान का उपयोग करते चलें तो जो भी संग्रह हमने किया हैं वह हमारी मेहनत की कमाई थी, ज्ञान की कमाई थी उसे हमने सही लक्ष्य पर खर्च किया इससे हमारे अंदर एक सन्तुष्टि का भाव आता है। इन कार्यों को क्रियान्वित करने पर हमें निखिल का प्रिय बनने का सौभाग्य प्राप्त होता ही है। जो सिद्धि हमे प्राप्त हुई उसका उपयोग हम अन्य व्यक्तियों के कष्टों को दूर करने में समाप्त कर दे तो उन दीन दुःखी व्यक्तियों के हृदय से निकली भाव सम्वेदनाओं, मंगलकामनाओं, शुभ कामनाओं से हमारे हृदय को, मन को, कितनी शांति, कितनी राहत, कितना संतोष, कितना उल्लास प्राप्त होगा वह किसी भी अति धन संग्रह से भारी होगा।
अतः हमे अपनी महत्वाकांक्षाओं को भौतिकता की तरफ से मोडना होगा तथा अध्यात्म की ओर अग्रसर करना होगा। जिससे हम अपना नाम निखिल धार्म को स्थापित करने में अंकित करा सकेंगे।
क्योंकि व्यक्ति पर अपने गुरू, इष्ट, समाज के प्रति परिवार के प्रति कर्तव्य का पालन करना ही होता है इन सभी को प्रसन्न रखने पर ही कर्तव्य की पूर्णता होती है। परन्तु परिवार बन्धु बान्धव आदि एक निश्चित समय तक ही आपका साथ देते है, वे आपका साथ जीवन भर नहीं दे सकते है। अतः ऐसे सम्बन्ध की आवश्यकता है जो हमारा पल पल साथ निभा सकें तथा अनन्त काल तक साथ निभाता चलें अतः ऐसा सम्बन्ध एक मात्र गुरू से ही हो सकता है। अतः हम क्यों न सद्गुरूदेव निखिल से अपना नाता जोडलें।
भगवान निखिल कहते है कि लक्ष्य विहीन व्यक्ति पशुवत होता है, धन, वैभव, पति, पत्नी, संतान ये जीवन के लक्ष्य नहीं हो सकते है। जीवन में भौतिक सम्पूर्णता के लिये आवश्यक है आध्यात्मिक लक्ष्य, क्योंकि भौतिक पूर्णता का जो लक्ष्य है वह आध्यात्मिक मार्ग से ही गुजरता है, यानि व्यक्ति जब दैवीय शक्ति से संयुक्त होता है तो वह भौतिकता को पूर्णता से जी पाता है। आप कल्पना कीजिये यदि भगवान निखिल भी अपने गृहस्थ जीवन तक ही सीमित होते तो यह विश्व जो आज निखिल ज्ञान ज्योति से सरोबार है जो विलुप्त होते भारतीय विद्यायें, साधनाओं का जटिलताओं को इतने सरल रूप से आज प्रत्येक साधक सम्पन्न कर पा रहा है क्या यह सम्भव होता?
व्यक्ति निखिल धर्म का पालन करते हुये जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। आज के विकृत और क्षीण मानसिकता से बचाव के लिये ही निखिल धर्म की आवश्यकता है और यह श्रेष्ठता, सर्वोच्चता, सम्पन्नता और आध्यात्मिक सम्पूर्णता प्राप्त करने का सर्वोत्तम उपाय है।
समर्पणः– हम सभी अपने जीवन में शांति, सद्बुद्धि, संम्पन्नता, की आकांक्षा करते हैं। किसी चीज के पीछे जो है ही नहीं मूर्खो की तरह भागने से हमें सिर्फ कष्ट, क्लेश, पीड़ा की अनुभूति होती है, जब तक हमारे मन में समर्पण नहीं होगा, लक्ष्य नहीं होगा तो हम कैसे किसी चीज को पा सकेंगे। आपको अगर अपने जीवन में पूर्णता चाहिये तो समर्पण का भाव का होना अति आवश्यक है। समर्पण ही आपको एक दिशा, एक राह प्रदान करेगा।
सेवाः- सेवा का अर्थ है कि निःस्वार्थ कार्य करना, सच्चे मन से बिना कोई अपेक्षा किये। निःस्वार्थ सेवा करने से जो संतुष्टि की अनुभूति होती है, उस की तुलना संसार के किसी भी सुख से नहीं की जा सकती। यह सेवा का सुख अनमोल व पवित्र होता है इससे हमें आतंरिक शांति व सुख की अनुभूति होती है। सेवा का सच्चा भाव तभी महसूस हो सकेगा, जब हमारा समर्पण हमारे गुरू के प्रति हमारे ईष्ट के प्रति, हमारे कार्य के प्रति पूरी निष्ठा भाव से होगा। आप सभी का लक्ष्य मात्र इस संस्था, इस धर्म के विकास की तरफ हो इस प्रकार की सेवा करके हमारा स्वयं का, हमारे परिवार जनों का, हमारे इस निखिल समाज का विकास होगा। सेवा मात्र भक्त ही नहीं, उसका ईश्वर भी करता है, जिस प्रकार प्रकृति हमें निःस्वार्थ शुद्ध जल, वायु, फल, शाक-सब्जी आदि अनंत चीजे प्रदान करती है, परन्तु हम एक क्रूर भोगी की भांति इसका शोषण करते हैं, जिसका फल हमें नहीं अपितु हमारी आपने वाली पीढ़ी हमारे बच्चों को भोगनी होगी। ऐसे समाज का निर्माण निखिल भक्त कैलाश सिद्धाश्रम का योगी न तो कभी चाहेगा न होने देगा। हम गुरू सेवा से एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जिसका आज व आने वाला कल उज्ज्वल व प्रगतिशील रहेगा।
आनन्दः- आनंद क्या है? हमें इसकी अनुभूति कब और कैसे होती है, यहां बैठे सभी लोगों के लिये आनंद की परिभाषा विभिन्न है। किसी को अपनी नौकरी, व्यापार में तरक्की मिलती है, किसी को परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर आनंद की अनुभूति होती है, कुछ पेटू को अच्छे पकवान, मिठाई का सेवन कर आनंद की अनुभूति होती है, तो कुछ को सांसारिक प्रलोभन, व्यसन, काम, भोग से आनंद की अनुभूति होती है, परन्तु यह सभी आनंद क्षणिक हैं, यह आनन्द सदैव आपके साथ नहीं रहेंगे, पदोन्नति, संतान-सुख, दादी-दादा, नाना-नानी, यह भी एक अनमोल आनंद है, परन्तु क्या आपको लगता है कि यह आनंद जीवन भर के लिये होंगे।
तो फिर ऐसा क्या आनंद होगा जो सदैव हमारे साथ रहेगा। हम हर पल, हर क्षण इसे महसूस करें, हम उस आनंद में ऐसा खो जायें कि हमें कोई कष्ट, दुख, वेदना की अनुभूति न हो और यह आनंद समर्पण भाव से गुरू सेवा करने से ही प्राप्त होगा। क्योंकि यह सेवा, यह समर्पण आपका स्वयं का ही है, जो आपने कमाया है। यह सुख आपके साथ हर पल, हर क्षण रहेगा और इसका प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर बहुत ही प्रभावशाली ढंग से पड़ेगा। आप स्वयं एक ऊर्जा व आनंद का स्रोत होंगे। आपके समीप आने वाला हर व्यक्ति आपसे आकर्षित होगा। यह आनंद सभी सुखों से परे होगा इसकी प्राप्ति कर कैलाश सिद्धाश्रम का योगी एक सम्पूर्ण व्यक्ति बनकर अपना जीवन सुखमय व्यतीत करेगा।
मोक्षभाव संतुष्टिः- संतुष्टि की प्राप्ति एक व्यक्ति को तब होती है, जब वह अपनी जीवन की सारी आकांक्षायें, इच्छायें, महत्वकाक्षाओं को पूर्ण कर चुका होता है, परन्तु शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होता है जो अपने जीवन से संतुष्ट हो, क्योंकि हमारा जीवन हमेशा परिवर्तनशील होता है, रोज सुबह उठते ही हमें नई संभावनायें, नई इच्छायें उत्पन्न्न होती हैं, और इन सबके पूर्ण न होने से हम असंतुष्ट हो जाते हैं, तो क्या हम अपनी सारी इच्छाओं को भूल जायें? जिस व्यक्ति की सभी इच्छायें सुचारू रूप से पूरी हो जाती हैं और वह अपने जीवन से खुश होता है तो वह मोक्ष की तरफ बढ़ने लगता है, परंतु मनुष्य तो स्वभाव से भोगी ही है, तो फिर वह कैसे संतुष्टि की अनुभूति करें। संतुष्टि की अनुभूति हमें तभी हो सकती है जब कोई चीज स्थायी रूप से सदैव हमारे साथ रहे, ऐसी कोई चीज जो जीवन-मरण से परे हो और सदैव-सदैव के लिये हमारे साथ ही रहे, और वह संतुष्टि गुरू शरण में ही है, क्योंकि आपके जीवन में माता-पिता, भाई-बहन, मित्र सभी साथ छोड़ देंगे पर गुरू कभी साथ नहीं छोडेंगे। गुरू की चेतना, गुरू का आशीर्वाद अपने अंदर समाकर एक ऐसी संतुष्टि का आभास होगा जो अबोध्य है।
हम अपने निष्ठुर, निष्काम जीवन के मूल उद्देश्य को भूल एक मूर्ख की तरह लक्ष्यहीन दौड़ते रहते हैं, पर जब हमें इसका आभास होता है तो बहुत देर हो चुकी होती है, और हम हमारी इस स्थिति के लिये किसी न किसी को कसूरवार ठहराते हैं।
हमारे जीवन का उद्देश्य यह नहीं है कि सबको भुलाकर एक जोगी की तरह जीवन व्यतीत करें, अपितु पूरे समर्पण भाव से सेवा भाव में लीन होकर, एक ऐसे अद्वितीय आनंद की अनुभूति करें, जिससे हम हमारे जीवन को संतुष्ट बनायें।
इस ज्ञान को बताने वाले, जताने वाले कई महापुरूष परमात्मा, गुरु मिल जायेंगे परन्तु सच्चे सद्गुरु से ज्ञान प्राप्त कर कैलाश सिद्धाश्रम का योगी ही इस निखिल धर्म स्वरूप को अपना सकता है। सद्गुरु का गुणगान उनके ज्ञान से नहीं परन्तु उनके भक्त की निष्ठा, भक्ति, ऐश्वर्य से होता है।
सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी
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