





इसीलिये प्राचीन समय से ही जितने भी गुरु हुये वे अपने सुयोग्य शिष्य में अपनी पूर्ण चेतना, ज्ञान, ऊर्जा, चिंतन को प्रतिपादित कर दिया, उसमें उड़ेल दिया। जिससे उनके ज्ञान का और अधिक विस्तार हो सके और मानव समाज जाग्रत होकर वास्तविक सत्य से परिचित हो सकें। उनकी यह मानव पर महान कृपा होती है कि शारीरिक रूप से न होकर भी चेतना स्वरूप में जनमानस के मध्य विद्यमान रहते हैं। यही कारण है कि जगद्गुरु कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर हजारों वर्षं पश्चात् भी जनमानस के मध्य चेतना स्वरूप में आज भी विद्यमान हैं। उनके ज्ञान, ऊर्जा, चेतना, आदर्शं को उनके ही मानस पुत्र-पुत्रियां, शिष्य, अनुयायी, भक्तों द्वारा प्रतिक्षण विस्तृत करने का कार्य प्रगति पर रहा है, उनके द्वारा अपनी शक्ति को प्रतिपादित करना भी आवश्यक है क्योंकि मानव की यह प्रवृत्ति है कि जब तक उसे कोई सचेत करने वाला नहीं होता, तब तक वह निरंतर जाग्रत नहीं रह पाता।
अनेक शिष्यों ने यह अनुभव किया कि परम पूज्य सद्गुरुदेव कुछ समय से व्यथित रहने लगे थे, कार्य का दबाव निरंतर उन पर बढ़ता ही जा रहा था। शिष्यों को मार्गदर्शन, साधको के समस्याओं का निदान, शिविर श्रृंखला, दीक्षा दिवस, प्रतिदिन सद्गुरुदेव निखिल से मार्गदर्शन प्राप्त कर भविष्य के योजनाओं को निर्धारित करना, अर्धंरात्रि के पश्चात् तक स्वयं के दैनिक पूजन, साधना, ध्यान, पत्रिका व पुस्तकों का संपादन और अनेक कार्यों का बोझ निरंतर उन पर बना हुआ था। जिसके कारण वे मूल चिंतन पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे थे और इसका प्रभाव स्वाभिवक रूप से उनके शरीर पर दृश्यमान होने लगा है। समय-समय पर सैकड़ो साधक निरंतर परम पूज्य सद्गुरुदेव से यह आग्रह, अनुरोध करते रहें कि क्यों ना गुरुदेव! आप अपने कुछ दायित्व का विभाजन कर दें, जिससे शिष्यों, साधकों को आपका अधिकतम सानिध्य, ज्ञान और प्रेम प्राप्त हो सके, साथ ही सद्गुरुदेव निखिल ज्ञान ज्योति का विस्तार और तीव्र गति हो पायेगा।
पूज्य सद्गुरुदेव ने हल्की मुस्कान के साथ सद्गुरुदेव निखिल की आज्ञा प्राप्त कर आगे की योजना का आश्वासन दिया। परंतु अपने स्वभाव के अनुरुप सद्गुरुदेव निखिल की मनसा कुछ अलग ही थी, यह किसे पता था कि सद्गुरु निखिल की मनसा एक नवीन क्रिया घटित कर अपने मानस पुत्र-पुत्रियों में तीव्रता का संचार करना है। उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि समय की मांग के अनुरूप विस्तार आवश्यक है और अपने चिर-परिचित स्वभाव में सद्गुरुदेव निखिल ने काल के सीने पर पांव रख कर नवीन पद्धति स्थापित करने की स्वीकृति परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश जी को प्रदान की साथ ही स्वयं के द्वारा बताये उद्देश्यों को शीघ्र पूर्ण करने के लिये नवीन परिवर्तन की आज्ञा प्रदान की।
इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा ऐसी ही विशिष्ट क्रियाओं को समेटे हुये ऐतिहासिक रूप से सम्पन्न हुयी। जो शिष्यों, साधकों के मानस पटल पर सदैव-सदैव के लिये अंकित हो गयी और चैत्र नवरात्रि का वह दृश्य चलचित्र की भांति दृश्य होने लगी जब परमहंस सद्गुरुदेव निखिल ने अपने कार्यों का विभाजन कर परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश जी को गुरुपद की गरिमा से विभूषित किया था। चैत्र नवरात्रि का वह दृश्य और गुरु पूर्णिमा के इस दृश्य ने ब्राह्मण्डीय सत्ता की चेतना का साक्ष्य स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया और यह संदेश साधकों, शिष्यों को स्पष्ट रूप से प्राप्त हुआ कि सद्गुरुदेव निखिल पूर्ण चैतन्य स्वरूप में आज भी शिष्यों के मध्य विद्यमान हैं। आवश्यकता सिर्फ इतना ही है कि शिष्य अबोध बालक की भांति अपने गुरु को भाव-विभोर कंठ से पुकारें। फिर तो सभी मनोकामनायें पूर्ण होना निश्चित ही हैं।
इन सब के साथ मार्मिक और वास्तविक सत्य यह भी है कि यह काल खण्ड जिसके हम सब साक्षी हैं, अब अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर है। ऐसे समय में मांग के अनुरुप परिवर्तन आवश्यक है, क्योंकि प्रत्येक गुरु की यही मंशा रहती है कि उनके सम्मुख ही उनके कार्यों को सम्भालने वाला, उनकी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने वाला, उनके चिंतन को धारण करने वाला शिष्य प्राप्त हो जाये, जिसे वे अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा, चिंतन, चेतना, ज्ञान दे सकें, जिससे इस धरा से कभी भी ज्ञान की ज्योति बुझने ना पाये, क्योंकि इस ज्ञान ज्योति को वे अपने प्राणों से सिंचित करते हैं, अपने जीवन का सर्वस्व शिष्यों के जीवन निर्माण में लगा देते हैं, शिष्य के जीवन को जाज्वल्यमान, तेजस्वी, पूर्णता युक्त बनाने हेतु वे किसी की भी परवाह नहीं करते, कितना भी उबड़-खाबड़ पथ हो, नुकीले कांटो से भरा हो, पथरीला हो वे मग्न होकर उस पथ पर भी चलते हैं, केवल इसलिये कि वे शिष्यों को पूर्णता दे सकें।
और वे अपने जीवन काल में मात्र इसी एक उद्देश्य पर कार्य करते हैं, इसीलिये आज तक कोई भी शिष्य अपने गुरु की महिमा का वर्णन ना कर सका, क्योंकि ब्राह्मण्ड में ऐसे शब्द का सृजन ही ना हो सका, जिससे गुरुदेव की महिमा वर्णन किया जा सके, प्रत्येक शब्द उनकी विराटता के सामने बौने प्रतीत होते हैं। उनकी दयालुता का अनुभव किस रूप में शिष्य करते हैं, यह उनके वैचारिक क्षमता, सद्चिंतन, बुद्धि पर निर्भर करता है।
सद्गुरुदेव निखिल ने अपने प्रिय शिष्य पुत्र परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश जी को जो दायित्व दिया था। उसका पालन वे पिछले 40 वर्षों से पूरी तन्मयता से कर रहें हैं, जो किसी भी शिष्य के जीवन की सम्पूर्ण पूंजी होती है, शिष्य के जीवन के बहुमूल्य रत्न होते हैं, जिसकी किसी भी वस्तु से तुलना अथवा मूल्यांकन नहीं की जा सकती है। शिष्य तो सदैव यही आस लगाये रहता है कि हमारे गुरुदेव द्वारा हमें कोई दायित्व सौंपा जाये।
लेकिन अब एक ऐसा समय आ चुका है, जब पूज्य सद्गुरुदेव जी को एक ठोस निर्णय करना पड़ा। क्योंकि अब निश्चय करना आवश्यक हो गया था कि शिष्यों के जीवन पथ में प्रकाश बना रहे, ज्ञान, शक्ति का संचार होता रहे, निखिल ज्ञान चेतना का विस्तार व्यापक स्तर पर हो, इसलिये पूज्य सद्गुरुदेव ने यह निश्चय कर कहा कि मैं जाते-जाते अपने ही समान अपनी प्रतिमूर्ति स्थापित करके जाऊंगा। क्योंकि मुझे आपकी चिंता है, मैं आपसे प्रेम करता हूं और मैं यह भी जानता हूं, कि आप भी मुझ से बहुत प्रेम करते हो, आपके जीवन में मेरा महत्वपूर्ण स्थान है और आज आप भी यह जान लो कि आप भी मेरे हृदय में रहते हो, आप सभी निखिल शिष्यों से मुझे अन्यतम प्रेम है, स्नेह है, यह जताने-बताने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है, प्रेम को अनुभव किया जा सकता है और मुझे विश्वास है एक दिन आप अवश्य अनुभव कर पाओगे।
गुरु पूर्णिमा महोत्सव रायपुर में प्रथम दिवस से ही गुरुदेव के चेहरे पर व्याप्त आभा, तेज, चिंतन किसी अद्भुत् घटना की ओर संकेत कर रहा था। मन में अनेक विचारों का आलोड़न-विलोड़न चल रहा था। लेकिन जैसा कि पूर्व में ही कह चुका हूं कि गुरुदेव की महिमा का अनुमान लगाना संभव नहीं।
प्रथम दिवस 17 जुलाई, दिन में 12 बजे गुरु पूजन, भजन आदि कार्यक्रम के पश्चात् सभी शिष्य शोभा यात्रा में भाग लेने हेतु सांय 6 बजे शिव मंदिर (फाफाडीह चौक) पर एकत्रित हुये, सद्गुरुदेव भी शिष्यों के भावना का ध्यान रखते हुये शीघ्र ही रथ पर आसीन होने के लिये निकले ही थे, कि परम पूज्य सद्गुरुदेव की जय—–हर हर महादेव—–के जयकारों से पूरा वातावरण आनंदित हो गया। कतार बद्ध सभी साधिका बहनों ने अपने सिर पर सर्व मांगल्य शक्ति कलश रख कर अपने जीवन को धन्य-धन्य अनुभव कर रही थी। मध्य में पूज्य सद्गुरुदेव रथ पर आसीन थे, जिनकी नजरे कभी कलश लिये हुये अपने मानस पुत्रियों पर जाता तो कभी नृत्य कर रहे मानस पुत्रों पर, नेत्रों के माध्यम से हो रहे प्रेम वर्षा से कुछ तो अपने सौभाग्य पर गर्व कर रहे थे, कुछ आनंदित, तृप्त अनुभव कर रहे थे, कुछ शिष्य तो दोंनो हाथ जोड़े दूर से ही गुरुदेव के इस लीला को देख कर भाव विह्नल हो गये थे, शोभा यात्रा का समापन शिविर स्थल पर हुआ।
जहां पर गुरुदेव ने अपना संक्षिप्त प्रवचन दिया और इच्छुक साधक-साधिकाओं को उनके प्रकृति के अनुरूप विशिष्ट शक्तिपात दीक्षा प्रदान की। पश्चात् आरती सम्पन्न हुआ। द्वितीय दिवस आषाढ़ शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, प्रदोष काल के साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग के चैतन्य समय मे प्रातः 10 बजे भाव पूर्ण गुरु पूजन प्रारम्भ हुआ। सभी साधक सद्गुरु-सद्गुरु रटते-रटते हो गयी मैं बावंरिया, ना जाने कब आयेंगे गुरुवर दासों की नगरिया————–! के मधुर भजन पर नृत्य करते हुये पूज्य सद्गुरुदेव की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ समय पश्चात् ही सद्गुरुदवे का आगमन हुआ। सभी शिष्यों ने पुष्प और जयकारों से सद्गुरुदेव का स्वागत किया। पूरे दिन विशिष्ट दीक्षा, साधना, सद्गुरुदेव से मिलकर आशीर्वाद् प्राप्त करने के पश्चात् रात्रि कालीन आरती के साथ द्वितीय दिवस के कार्यक्रम समापन हुआ।
गुरु पूर्णिमा का समय निकट था, शिष्यों की भावनायें पूरे उफान में थी, एक-एक क्षण भारी लग रहा था, प्रतीक्षा में व्याकुलता बढ़ती ही जा रही थी। हम शिष्यों की व्यघ्रता और भावना को गुरुवर समझ चुके थे, सद्गुरुदेव विलम्ब ना करते हुये, ब्रह्म मुहुर्त प्रातः 05 बजे शिविर स्थल में पधार चुके थे और सीधे मंच पर पहुंच कर शिष्यों का अभिवादन किया, गुरु पूर्णिमा के पूर्णत्व अवसर अपने गुरुदेव को ब्रह्म मुहुर्त के चैतन्य बेला में अपने सम्मुख पाकर शिष्यों ने गद्-गद् कंठ से गुरुदेव को नमन और जयकारों का अम्बार लगा दिया। इस दृश्य को शब्दों में उतारना संभव नहीं, सिर्फ और सिर्फ शिष्य की भावनायें इसे अनुभव कर सकती हैं, ऐसा आन्नद, ऐसी मस्ती, ऐसा स्नेह, ऐसा प्रेम और गुरुदेव के वरद हस्त से आशीर्वाद् की वर्षा से मन की सभी अभिलाषायें पूर्ण हो गयी थीं। इच्छा हो रही थी, आज ही प्राण त्याग कर उनमें ही लीन हो जाऊं, पर कर्तव्य की डोर से बंधा था। वास्तविक रूप से शिष्यों का परम सौभाग्य है कि शिव स्वरूप गुरुदेव का सानिध्य गुरु पूर्णिमा के चैतन्य दिवस पर ब्रह्म मुहुर्त में प्राप्त हुआ। पश्चात् पूजन, सद्गुरुदेव निखिल आह्वान पूरी भावना, श्रद्धा से सम्पन्न हुआ।
फिर गुरुदेव ने दोष रहित जीवन प्राप्ति दीक्षा, तांत्रोक्त मुक्ति दीक्षा, वीर वैताल शक्ति दीक्षा, सहस्र लक्ष्मी प्राप्ति दीक्षा और सबसे महत्वपूर्ण नारायण तत्व रक्त कण-कण स्थापन दीक्षा के साथ ही उर्ध्वमुखी और पूर्णत्व प्राप्ति जीवन का अशीर्वाद् प्रदान किये।
सांय काल में अनुमान से पूरा विपरीत आचम्भित कर देन वाला दृश्य सामने! नेत्रों पर यकीन नहीं हो रहा था। पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गयी, बार-बार स्वयं को विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहा था। सत्य में क्या यह वास्तविक दृश्य है अथवा मैं स्वप्न देख रहा हूं, मैं एक-टक निहार रहा था, कि तभी मुझे किसी ने जोर से हिलाया, उन वरिष्ठ गुरु भाई ने कहा तुम्हें आवाज दे रहा हूं, सुन क्यों नहीं रहे हो! हड़-बड़ाहट में मैंने कहा मुझे कुछ सुनायी नहीं दिया, वरिष्ठ गुरु भाई कार्य का विभाजन कर दूसरी ओर चले गये, तभी मेरी दृष्टि साधकों पर पड़ी, पूरा प्रांगण शांत था, कोई हलचल नहीं, कोई हरकत नहीं, सभी पलक झपकाये बिना एक-टक मंच की ओर देख रहे थे, तभी सद्गुरुदेव की सारगर्भित वाणी मुझे सुनायी दी। गुरुदेव ने कहा- आश्चर्यचकित ना हो मैं हूं तुम्हारा गुरु, तुम्हारा कैलाश! यह शब्द सुनते ही एक बार फिर पूरे शरीर में बिजली की सिहरन दौड़ गयी। ऐसा अनुभव हुआ कि कैलाश पर्वत आज इसी प्रागंण में उतर आया है, पूरा गुरु रूपी शिव परिवार उपस्थिति था मेरे आंखों के सामने, यह कहना कदापि अनुचित नहीं है कि सम्पूर्ण शिव-परिवार हमारे सामने था। सद्गुरुदेव के बायीं ओर वन्दीय माता जी, छोटी माता निधि श्रीमाली जी, पूज्यपाद् गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी, पूज्य छोटे गुरुदेव प्रशांत श्रीमाली जी सभी मंच पर गंभीर मुद्रा में बैठे हुये गुरुदेव के बातों को ध्यान पूर्वक सुन रहे थे, तभी शिष्य समुदाय में थोड़ी चेतना आयी। दरअसल सभी ऐसी अद्भूत्, कल्पना से परे दृश्य देखकर स्तम्भित हो गये थे। अब पूरा पंडाल निरंतर जोर-दार जयघोष से गुजांयमान हो रहा था।
उत्साह, आनन्द, भावना अपने परम अवस्था में था। सभी प्रेम में मग्न थे, एक-दूसरे का किसी को भान नहीं था। शिव रूपी गुरु परिवार का गुरु पूर्णिमा के चैतन्य दिवस पर दर्शन कर साधक -साधिकायें, स्वयं में आनन्द मग्न थे, क्योंकि इस दिवस पर गुरु तो पूर्ण औघढ़दानी स्वरूप में अपने शिष्यों पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं, गुरु ऋण से उऋण होने का यह श्रेष्ठतम दिवस है, जब शिष्य वर्ष भर का पाप-पुण्य गुरु चरणों में अर्पित कर सुखमय जीवन की कामना करता है और ऐसी चैतन्य बेला पर सम्पूर्ण गुरु परिवार उपस्थित हो तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या होगा?
गुरुदेव ने अपने प्रवचन में बताया कि- आज का यह दिवस अपने साथ अनेक नवीनता लेकर आया है, आज इस गुरु पूर्णिमा पर एक नवीन कार्य सम्पन्न होगा। आज इस गुरु पूर्णिमा के चैतन्य दिवस पर मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र विनीत श्रीमाली को अपने शिष्य रूप में दीक्षित कर रहा हूं, शिष्य रूप में स्वीकार कर रहा हूं, तुम्हें एक नया मार्ग दर्शक, पथ प्रदर्शक सौंप रहा हूं, परम पूज्य पिता सद्गुरुदेव निखिल जी ने हम तीनों को अपनी ऊर्जा, चेतना, ज्ञान, शक्ति और दायित्व प्रदान किया। इसी दायित्व के निर्वाह में मैं कई वर्षों से संलग्न हूं, आज इस पूर्णिमा पर सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानंद की सूक्ष्म उपस्थिति और उनके आज्ञा अनुसार वही शक्ति, वही गुरु के दायित्वों का निर्वाह करने का अधिकार प्रदान कर रहा हूं।
परम पूज्य सद्गुरुदेव निखिल की उस समय की भविष्य वाणी जब विनीत जी का जन्म हुआ था, उस समय सद्गुरुदेव निखिल ने अपने प्रवचन में कहा था कि तीसरी पीढ़ी के गुरु का जन्म हो चुका है! पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के द्वारा सद्गुरुदेव निखिल की भविष्य वाणी को चरितार्थ करना, शिष्यों के लिये यह संकेत है कि सद्गुरुदेव निखिल के कार्यों को पूर्ण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है।
विनीत श्रीमाली जी को गुरुपद पर विभूषित करने से पूर्व शास्त्रोक्त विधान से पूज्य सद्गुरुदेव ने उनका पंचामृत अभिषेक किया, फिर स्वस्तिवाचन के साथ मुण्डन संस्कार सम्पन्न हुआ। इस बीच साधक- साधिकायें उत्साह, आनन्द में मग्न होकर नृत्य, भजन में लीन और ऐसे मनोहर दृश्य देखकर गौरवान्ति अनुभव कर रहे थे।
विशेष पूजन के साथ-साथ विनीत जी के विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र पर तिलक कर सद्गुरुदेव ने उनके कुण्डलिनी चक्रों को तेजस्विता प्रदान की, फिर उर्ध्वपात दीक्षा और पुष्प माला धारण करा कर उन्हें गुरु पद से विभूषित किया।
सद्गुरुदेव निखिल के प्राणवान चित्र को नमन कर आशीर्वाद् प्राप्त करने के पश्चात् पूज्यपाद् गुरुदेव विनीत श्रीमाली जी ने पूर्ण शास्त्रोक्त विधान से रूद्राभिषेक सम्पन्न किया। क्योंकि अखिल ब्रह्माण्ड के प्रथम गुरु महादेव शिव का आशीर्वाद् व उनकी कृपा आवश्यक है किसी भी उत्तरदायित्व का निर्वाह करने हेतु।
निश्चित ही ये सब क्रियायें एक नये युग की द्योतक ही हैं। जिसके साक्षी बनकर हम स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहें हैं।
इन सब तथ्यों से जुड़ा एक अहम और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सद्गुरुदेव निखिल ज्ञान ने जिस प्रकार एक नवीन ज्ञान, चिंतन, चेतना प्रदान किया जिससे यह अंधकारमय संसार प्रकाशित हो रहा है। एक आकड़े के अनुसार अब तक लगभग पांच करोड़ शिष्य, साधक, निखिल को मानने वाले, पूजने वाले, भक्त, सद्गुरुदेव निखिल के अनुयायी इस निखिल ज्ञान से ओत-प्रोत हुये हैं। इसी क्रम में पूज्यपाद् विनीत गुरुदेव जी को गुरुपद से विभूषित करना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम है। जिससे गुरु ऊर्जा का संचार विश्व भर में हो सके, सद्गुरुदेव निखिल की चेतना सर्वस्व विद्यमान हो और यह तभी संभव हो सकता है, जब सद्गुरुदेव का ही अंश गुरुपद की गरिमा बढ़ाये, निखिल अंश गुरु रूप में शिष्यों के मध्य उपस्थित हो। यही शास्त्रों का विधान भी है। गुरु रक्त ही गुरुपद का श्रेष्ठ, सुयोग्य, उनके ज्ञान का विस्तार करने का अधिकारी है। अन्य किसी व्यक्ति में ऐसी समर्थता नहीं होती है। शिष्यों की भी यही मंशा रहती है कि गुरुदेव अपने ही अंश रूप में सदैव हमारे मध्य उपस्थित रहें। हमारी भी यही कामना है कि हे गुरुदेव! जब तक यह जीवन है, तब तक आप अपने ही अंश रूप में हमारे मध्य विद्यमान रहें।
अरूण मिश्रा
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