





सांसारिक मनुष्य यही विचार करता है कि इस देह में रह कर इस जीवन में रहकर किस तरह से ब्रह्म तत्व के परम तत्व की प्राप्ति की जा सके, परम तत्व का तात्पर्य कोई पदार्थ या वस्तु नहीं। इस जीवन में रहकर हम किस तरह परमात्मा को, श्रेष्ठता को, पूर्णता को प्राप्त कर सके। किस तरह की हम क्रियायें करें, जिससे कि उस ब्रह्म शक्ति को अहं ब्रह्मास्मि स्वरूप को हम धारण कर सकें। जो कुछ भी इस संसार में है, वह हर स्वरूप में मुझे प्राप्त हो सके, उस शक्ति से युक्त बन सकूं और वह शक्ति मुझे निरंतर-निरंतर श्रेष्ठता की ओर, उच्चता की ओर गतिशील कर सके। वह ब्रह्म शक्ति, वह परम शक्ति, वह परम तत्व की स्थिति प्राप्त करने का भाव ही पूर्णता का भाव है। पर अधिकांश-अधिकांश मनुष्य केवल और केवल यह विचार करते हैं कि यह देह, यह शरीर केवल और केवल भोग के लिये बना है और जैसे हमें अपने माता-पिता ने उत्पन्न किया है। वैसे ही हम क्रियायें करके आगे भी उस प्रभाव को बना रखे, केवल और केवल करोड़ों-करोड़ों मनुष्यों का भाव चिंतन यही रहता है। और यह सांसारिक देह हमारी स्वयं की है और ईश्वर नहीं कहता है कि अपने इस जीवन में कंकड़-पत्थर बीने या भीतर में अनेक-अनेक सम-विषम स्थितियों का संग्रह किया। मैंने अपने जीवन को किस तरह से निर्मित किया, उसके बारे में कभी भी ईश्वर नहीं कहता है कि तुमने अपने जीवन को अधोगति की ओर अग्रसर किया या उच्चता की ओर, परम तत्व की ओर अग्रसर किया क्योंकि मैंने तो सभी स्वरूपों में तुम्हारे देह के भीतर में कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय पूर्ण रूप से जाग्रत की और तुमने उन ज्ञानेन्द्रियों का, उन कर्मेन्द्रियों का किस तरह से उपयोग करके सद् स्थिति की अग्रसर हुये या अधोगति की अग्रसर हुये, यह तुम्हारा स्वयं का चिंतन होगा और अधिकांश-अधिकांश मनुष्य का जब यह भाव होता कि केवल और केवल परम तत्व की प्राप्ति, ईश्वर की प्राप्ति, पूर्णता की प्राप्ति मृत्यु से ही संभव है। यह जीवन तो जब तक सांस चल रही है, केवल और केवल सांसारिक पदार्थों का भोग करने के लिये और यदि मृत्यु ही परम तत्व को प्राप्त करने का साधन है, तो मृत्यु का तात्पर्य कि देह की भीतर में जो भी गति का भाव होता है, चाहे वह सांस लेना हो, चलना-फिरना हो, सोचना-समझना हो, बोलना हो, सुनना हो, सब कुछ इस जीवन्त जागृत देह के भीतर ही संभव हो पाता है और मृत्यु का तात्पर्य कि सुनने की क्षमता खत्म हो जाये, देखने की क्षमता खत्म हो जाये, शरीर में कोई स्पंदन नहीं रहे, शरीर में कोई गति का भाव नहीं रहे, कोई गतिशीलता नहीं रहे, कोई क्रियाशीलता नहीं रहे, उस का तात्पर्य मृत्यु है अर्थात् वह मिट्टी के समान देह है, जिसमें कोई भी गतिशीलता नहीं, कोई भी चिंतन नहीं, कोई भी सोच नहीं, कोई विचार नहीं। जब मृत्यु से यह सब स्थितियां प्राप्त होती हैं, तो किस तरह से हम मृत्यु के माध्यम से परम तत्व को, ब्रह्म तत्व को पूर्णता तत्व को प्राप्त कर सकते हैं ? और तो और जब मृत्यु निकट आती है तो परिवार के लोग चारों तरफ इकठ्ठा हो जाते हैं, रामायण पाठ करते हैं, भागवत् पाठ करते हैं, गायत्री मंत्र करते हैं और कोई गुरु मंत्र करते हैं कि शायद वह जो कुछ देर में समाप्त हो जायेगा, तो वह कुछ श्रवण कर सके, सुन सके, उसे गंगा जल पिलाते हैं, पवित्र जल युक्त तुलसी पत्र पिलाते हैं कि जिससे उसे परम तत्व की, मोक्ष की प्राप्ति हो सके। जब वह व्यक्ति मृत्यु शय्या पर बैठा है, उसकी इन्द्रियां काम नही कर रहीं हैं। शरीर के अन्दर कोई गतिशीलता नहीं है, धीरे-धीरे उसकी हृदय की धड़कन कम होती जा रही है, सुनने, सोचने, समझने की शक्ति नहीं है, दिखाई दें नहीं रहा है और हम उस समय भी रामायण का पाठ करके सुनाते हैं, गीता का पाठ करते हैं, गरुड़-पुराण पढ़ते है।
यह क्रियायें बाद में हम करते है, जब जीवित था, उस समय तो कोई गीता का पाठ किया नहीं हमने, हमने कोई गायत्री मंत्र नहीं किया, राम-राम किया नहीं और मृत्यु के समय हम सभी बैठकर हरि-हरि बोलो, राम-राम बोलो, गायत्री मंत्र बोलो, पंडित जी को बुलाओ, जैसा भी हमारा विधि-विधान होता है, हम पाठ कराते हैं, इसी स्थिति के विपरीत यदि जाग्रत अवस्था में ही, वह गीता के पाठ को, रामायण के पाठ को जीवन में उतार लेता, तो ऐसी मृत्यु की प्राप्त ही नहीं होती है और जब शरीर में उसके जल उतरता ही नहीं है, पानी उतरता ही नहीं है, दवाई भी उतरता नहीं है, डॉक्टर भी मना कर देता है। कि इसका शरीर बेजान होने वाला है, समाप्त होने वाला है। अब तो कोई भी दवा इंजेक्शन, कुछ भी इसके लिये उपयोगी नहीं है। अब घर ले के जाओ और जितनी सेवा हो सके करो और चार-छः घण्टे, दस घण्टे, एक-दो दिन वह जितना समय निकाल सके, उतना ध्यान रखना और धीरे-धीरे हम देखते हैं, कि धड़कन उसकी धीरे-धीरे कम होती रहती है, शरीर एक-दम, एक तरफ लुढ़क जाता है और हम समझ जाते हैं कि वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।
उसके पहले हम ऐसी नौटंकीमय क्रिया करते हैं। रामायण का पाठ करना, गीता का पाठ करना या भजन करना, हरि का कीर्तन करना या अन्य जो भी क्रिया करना। यह सब क्रिया करने के पीछे भी एक भाव-चिंतन है, उसके पीछे भी हमारा स्वयं का स्वार्थ है कि जब हम मृत्यु को प्राप्त होंगे तो हमारी संतान भी हमारे लिये ऐसी क्रियायें करे, ये परंपरा चलती आ रही है। मैं पिताजी के लिये कर रहा हूं और जब मैं मृत्यु को प्राप्त होऊंगा तो मेरे संतान मेरे लिये इस तरह की क्रिया करेगी। मैं जब मृत्यु शय्या पर, जमीन पर लेटा होऊंगा या खाट पर पडा होऊंगा तो मुझे भी गीता का पाठ सुना देगा, रामायण का पाठ सुना देगा और मैं परम तत्व को प्राप्त कर लूंगा। मुझमें सुनने की शक्ति नहीं हैं, आंखो से मुझे दिखाई नहीं दे रहा है, आंखे मेरी बंद हैं, धीरे-धीरे मेरी शरीर की जो धड़कन हैं, वह डाऊन होती जा रही है, कम होती जा रही है, जो नार्मल में 72 होना चाहिये, वह अब चालीस हो गयी, 30 हो गयी, 20 हो गयी है और धीरे-धीरे रूधिर में कोई प्रभाव नहीं है, शक्ति नहीं है और उस समय मुझमें यह चिंतन है कि मुझे मेरी संतान सुनायेंगे। मृत्यु के समय मेरा पूरा परिवार मेरे साथ में है, मुझे दिखाई नहीं दे रहा है कि मेरे साथ मेरा पौत्र है, पौती है, नाती है, पुत्र है, बहु है या बेटा है। वो मुझे ज्ञान नहीं है परन्तु यह सब हम ढ़कोसलाबाजी, नाटकबाजी, हम कई-कई जन्मों से करते आ रहें हैं। कईयो ने यह अपने पिता के साथ भी किया, अपने दादा के साथ भी किया। आगे भी हम ऐसी ही परंपरा चलाते जा रहें हैं।
यह विचार नहीं करते कि यही हम जाग्रत अवस्था में ही प्रभु का नाम ले लेते, गुरु का नाम ले लेते, भगवान कृष्ण का नाम लेते, रामायण का पाठ कर लेते, गीता का पाठ कर लेते, ईश्वर का नाम ले लेते, तो ऐसी स्थितियां प्राप्त ही नहीं होती। हमने तो क्या समझ लिया कि जीवन है तो केवल और केवल भोग करने के लिये, आनन्द लेने के लिये, प्रसन्नता लेने के लिये, जितना हम जीवन में अकड़-बकड़ खा सके, उतना हमें ग्रहण कर लेना है और मृत्यु के बाद हम परम तत्व को प्राप्त हो जायेंगे, मृत्यु के बाद में क्या है? मृत्यु के बाद में चार लोग उठाके लेके जायेंगे और जला के आ जायेंगे, वापस वह मिट्टी के राख को पवित्र नदियों में डाल देंगे। और बस हमने अपनी क्रिया खत्म कर ली।
यह पितृ पक्ष भी किस लिये बना है। श्राद्ध पक्ष अभी चल रहा है, श्राद्ध पक्ष में आप भी अपने पिता का, दादा का या माँ का जो भी इस संसार में नहीं है। उसका आप श्राद्ध करते हैं, यह विचार कीजिये कि आप पंद्रह साल से, बीस साल से, अपने पिता का या दादा का श्राद्ध कर रहें हैं, यही बीस साल पहले आप यदि बीस वर्ष तक जो आपने पचास-पचास लोगों को, बीस-बीस लोगों को, पच्चीस-पच्चीस लोगों को, अपने परिवार के लोगो को बुला के श्राद्ध का कार्य करते हैं। हलवा बनाते हैं, खीर बनाते हैं या जो भी पूरी सब्जी बनाते हैं। वे ही अगर दस साल अपने पिता को ही खिला देते तो ऐसे मृत्यु की स्थिति प्राप्त ही नहीं होती। किस लिये श्राद्ध क्रिया कर रहें हैं, खिला रहे हैं, खाना खुद को है। पिता के लिये खीर बना रहें हैं, पिता के लिये हलवा बना रहें हैं। यह पिता का श्राद्ध है, दादा का श्राद्ध है, मेरी माँ का श्राद्ध है, माँ के लिये कर रहा हूं, जीवित जाग्रत माँ थी, तब तो माँ को कुछ नहीं देते, जीवित जाग्रत पिता जी थे, तब तो उनको गालियां दे रहे थे, अब तो मरने के बाद वे केवल और केवल दिखावा करने के लिये ढकोसलाबाजी करने के लिये। ऐसी क्रिया करते हैं, परिवार वाले क्या कहेंगे, समाज वाले क्या कहेंगे, पड़ोसी क्या कहेंगे, पिता का श्राद्ध नहीं किया, रिश्तेदार क्या कहेंगे, लो इसने तो अपने पिता का श्राद्ध ही नहीं किया, माँ का श्राद्ध ही नहीं किया और खाना किसको है ? खाना हमें स्वयं को ही है ? पिता जी तो कोई खायेंगे नहीं, जब पिता जी थे, तो प्रेम से बोल लेते, प्यार से हम बोल देते, प्यार के साथ अच्छे वचनों से हम बात-चीत कर लेते तो उनके साथ अकाल मृत्यु होती ही नहीं इतनी जल्दी। हमारे पिता या माँ या भाई या पत्नी या पति इस संसार से इतनी जल्दी जाता ही नही।
पर उस समय तो हम केवल और केवल अहंकार वश होते हैं, क्रोध वश होते हैं, जो कुछ भी है मै हूं बस यह अहं का भाव चिंतन होता है। जबकि कि भीतर होना चाहिये ब्रह्म तत्व का भाव ईश्वर का भाव, गुरु तत्व का भाव। वह तो हमारे भीतर होता है नहीं। से उतार दिया है, हमारे भीतर क्या होता है, संग्रह क्या करते रहते हैं ईर्ष्या का, द्वेश का, शत्रुता का अनेक-अनेक जो विषम भाव हम संग्रह करते रहते हैं, शुरू में मैंने क्या कहा, ईश्वर ने नहीं कहेगा कि आपने अपने जीवन में क्या संग्रह किया? कंकड़ पत्थर बीने या जो ईर्ष्या, द्वेष के भाव को संग्रह किये, यह ईश्वर नहीं कहेगा। उसी के परिणाम स्वरूप आपको जीवन में स्थितियां प्राप्त होती हैं। यदि सद्कार्य, सद्भाव-चिंतन उत्पन्न की मैने भीतर में तो तो निश्चित रूप में जीवन में सद्-स्थितियां निर्मित होंगी। भीतर में, ईर्ष्या का भाव, द्वेष का भाव, शत्रुता का भाव स्थापित किया तो जीवन में दुःख है, विनाश है, अनेक-अनेक विषमतायें या अनेक-अनेक न्यूनतायें जीवन में उत्पन्न होती हैं।
ये दुःख और सुख कोई भगवान उत्पन्न नहीं करते, ये हमारे महादेव उत्पन्न नहीं करते हैं। महादेव के मंदिर का तो बाल-बांका भी नहीं हुआ, बाकी तो आस-पास के तो हजारों मकान धराशायी हो गये, पशुपतिनाथ के मंदिर का तो कुछ भी नहीं हुआ। क्यों की वह एक पुण्यमय स्थिति है और हम जो संसार में करते है पापमय स्थितियां करते हैं। इसीलिये हमे वह पापमय स्थितियां हमें छः महीने पहले, आठ महीने पहले, हमें देखनी पड़ी, पशुपति महादेव ने नहीं कहा कि तुम इस तरह की विषम क्रियायें करो पर हम क्या करते हैं? हर तरह की नाटकबाजी करते रहते हैं। भगवान को भी ध्यान करते हैं हर हर महादेव करते रहते हैं, परन्तु भीतर में वह महादेव की शक्ति उत्पन्न ही नहीं करते हैं ऊँ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ऊँ निखिलेश्वराय नमः करते रहते हैं, पर भीतर में निखिल की शक्ति, नारायण की शक्ति, गुरु की शक्ति उत्पन्न ही नहीं करते। मैंने तो 9 दिनो में सवा लाख मंत्र जप कर दिया, मैने तो संकल्प लेकर इक्कीस दिनो में इतना मंत्र जाप कर लिया, हवन कर दिया, निखिल स्तवन का पाठ कर दिया, गुरु गीता का पाठ कर लिया। परन्तु उसे जीवन में उतारने की क्रिया नहीं किये प्रार्थना तो रोज करते हैं। जग में रहूं तो ऐसे रहूं ज्यों जल में कमल का फूल रहे, परन्तु अब जग में हूं, जग में ही बैठे हैं, परन्तु भीतर में कमल का भाव-चिंतन क्या है? भीतर में तो कीचड़ का, गंदगी का भाव चिंतन है तो कमल का फूल जीवन में कहां से खिलेगा, कहां से जीवन में कमलमय स्थितियां बनेगी ? कैसे केवल मुख से उच्चारण करने से कोई जीवन में कमल का फूल नहीं उगता।
संसार में दल-दल है, जहां दल-दल है, दल-दल का मतलब जो भी संसार में गंदगी है, जो भी संसार में न्यूनता है, अशांति है, जो क्रोध है, ईर्ष्या है, द्वेष है, ये सब कीचड़पूर्ण स्थितियां हैं। दल-दल पूर्ण स्थितियां है, उसके अंदर मुझे किस तरह से उठके रहना है वह भाव चिंतन उत्पन्न होना चाहिये वह तो होता नहीं है। कोई एक गाली देता है, आप तो चार सौ गाली देने को तैयार रहते हैं, आप एक वचन कहते हैं, अब तो चार सौ वचन निकलते ही नहीं आप से क्यों नहीं निकलता कि भीतर में वैसे ही विषम स्थितिया, वैसे ही इर्ष्या का भाव को हमने ज्यादा संग्रह किया। ये तो विचार करो कि यह आपकी देह है, आपकी देह ने आपका बचपन देखा, आपको मालूम है आपका बचपन कैसे बीता, आप को ज्ञान है, परन्तु आप के बचपन तो समाप्त हो गया, आप के देह ने जवानी देखी है कि मेरी जवानी, मेरा यौवन, अवस्था कैसी थी आप को सब मालूम है, जवानी व्यतीत हो गयी आप की जीवन में वृद्धावस्था आ गयी, अब ये जो मन है, आत्मा है, इसको ज्ञान है कि मेरा बचपन कैसा बीता, मेरी जवानी कैसी बीती, मेरा पिछला जन्म, मतलब पिछला समय कैसा बीता ये सब आपको ज्ञान है। सभी तो व्यतीत हो गया 2004 कैसा बीता, 1988 कैसे बीते, 1980 कैसे बीते यह सब आपको ज्ञान है कि किस तरह से मेरे बचपन में कैसे बीमार हुआ था, किस तरह से मैंने पढ़ाई की, किस तरह से मैंने जवानी में व्यापार किये, किस तरह से अच्छे कार्य किये, बुरे कार्य किये, ये सब आपको ज्ञान है, मन को, आत्मा को ज्ञान है। देह परिवर्तन हो गयी, देह मेरी साठ साल की हो गयी, पचपन साल की हो गयी, पचास साल की हो गयी, देह परिवर्तन हो गयी।
परन्तु हम अधिकांश-अधिकांश क्या करते हैं मन की बात नहीं सुनते, आत्मा की बात नहीं सुनते, हम सुनते हैं दिमाग की बात बुद्धि की बात सुनते हैं, बुद्धि हमेशा कांटे का काम करती है, मन है, आत्मा है वह जोड़ने का काम करती है और हम अधिकांश मन की बात नहीं सुनते हैं बुद्धि की बात सुनते हैं और बुद्धि भी किसकी आस-पास के लोगों की पड़ोसियों की, हमारे मित्रें की, खुद की बुद्धि उपयोग नहीं लेते हैं, खुद का विवेक, विवेक का मतलब आत्मा का भाव, मन का भाव उसका उपयोग हम नहीं लेते खुद की बुद्धि का उपयोग कोई लेते ही नहीं हैं। भगवान ने हमें बुद्धि दी है, परन्तु वो बुद्धि उसको जंग लगाके, उसको हमने बन्द कर दिया है, बुद्धि के ऊपर ताला लगा दिया है। खुद के बुद्धि का तो उपयोग करना ही नहीं है। दूसरों ने क्या सलाह देते उस सलाह के अनुसार चलते हैं। तब हम जब दूसरो के सलाह से चलेंगे तो तब हम अधोगति की ओर अग्रसर होते हैं। खुद की बुद्धि से, खुद की विवेक से, खुद की आत्मा से खुद के मन के भाव चिंतन से हम क्रियाशील होते ही नही और न ही जीवन में श्रेष्ठता और उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं और गुरु की क्रिया यही रहती है कि आप अपने स्वयं की बुद्धि से क्रियाशील रहें, स्वयं की, मन की, आत्मा से, विवेक से क्रियाशील रहें परन्तु आप दूसरों की बुद्धि से ज्यादा क्रियाशील होते हैं। इसलिये जीवन में आप विचार तो करें कि दूसरों की सलाह से मुझे कितना जीवन में नुकसान उठाना पड़ा। उसके बाद में भी विचार करने के बाद एहसास होता है कि मुझे मेरे पड़ोसी ने, मुझे ऐसा गाइड किया था। मेरे मित्र ने मुझे ऐसा ज्ञान दिया था। मुझे यह साल सेफ हो गया, नुकसान हो गया तो भी वापस उस मित्र को छोड़, दूसरे मित्र को पकड़ लेंगे। उस भाई को छोड़ के दूसरे भाई को पकड लेंगे उस पडोसी को छोड़ के दूसरे पड़ोसी को पकडलेंगे।
क्योंकि खुद की बुद्धि का काम उपयोग नहीं लेते हैं, पत्नी की बुद्धि काम में नहीं लेंगे, पति की बुद्धि का काम नहीं लेंगे, बच्चे की बुद्धि का काम में नहीं लेंगे, माता-पिता को तो आप बेकार समझते हैं मतलब तो जानती नहीं हैं, उनको तो कुछ ज्ञान नहीं है तुम तो मेरे सामने बच्चा है, मेरे औलाद तेरी क्या बुद्धि है, मतलब वो सलाह देगा, तो उसको सब मिथ्या समझते हैं, दूसरा कोई फालतू का सलाह देता है, तो वो उतार लेते हैं क्योंकि आपको जो विषपूर्ण रस होता है ना उसमें आपको आनन्द ज्यादा आता है। आपको क्या एक कोई किसी की ईर्ष्या करता है, किसी को आलोचना करता है। कोई गाली-गलौज करता है, कोई सेक्स की बात करता है उसमें आपको आनन्द ज्यादा आता है, उसमे एक रस ज्यादा आता है, मैं आपको सत्यता की बात बता रहा हूं, भगवान की बात बता रहा हूं, ईश्वर की बात बता रहा हूं, आपको इसमें आनन्द नहीं आयेगा, बस आप तो यह विचार करेंगे, कब छः बजे और कब बस इनके रमेश न्यौपाने के तरफ से प्रसाद की व्यवस्था हो, प्रसाद खायें और अपने-अपने घर जायें, आपके चिंतन में यह नहीं रहेगा कि मेरे को जीवन से मलिनता कैसे समाप्त हो? गुरु ये ज्ञान-चिंतन दे रहा है, मेरा ज्ञान-चिंतन से मेरा भला हो रहा है या गुरु का भला हो रहा है, मेरे जीवन में उन्नति हो रही है, परिवार में उन्नति हो रही है, वह चिंतन भाव हम नहीं करते हैं।
हमारे राजस्थान में एक कहावत है, भाई मर जाये पर उसकी चिंतन नहीं, भाभी की मरबट होनी चाहिये। मरबट का मतलब कि भाभी को मैं किस तरह से डाऊन करूं, भाई मर जाये उसका मुझे दुःख नहीं है, बस भाभी को किस तरह से डाऊन करूं, यही भाव चिंतन है। यह भी है कि मेरी आत्मा को, मन को शांति तब मिलेगी, जब पड़ोसी को दुःख होगा, भाई को दुःख होगा। घर में उनके तकलीफ होगी तब मेरी आत्मा को शांति मिलेगी। इससे आपके घर में कौन सी वृद्धि हो जायेगी। आपके कोई पडोसी के घर में अकाल मृत्यु हो गयी, इससे आपके जीवन में क्या उन्नति हो गयी, कोई उन्नति नहीं हुयी। आपको क्या लाभ मिला, कुछ लाभ नहीं मिला परन्तु मन में एक भाव चिंतन, विष पूर्णता का, रस का भाव चिंतन है और यह रस हर समय उत्पन्न होते रहते हैं, मित्र में काम रूपी रस भी उत्पन्न होता है, प्रेम रूपी रस भी उत्पन्न होता है, ईर्ष्या रूपी रस भी उत्पन्न होता है, क्षोभ रूपी रस भी उत्पन्न होता है, एक भूख रूपी रस भी उत्पन्न होता है, जैसा-जैसा उत्पन्न होता है, वैसा-वैसा भाव चिंतन रहता है कि मेरे भीतर प्रेम रूपी रस उत्पन्न होगा, तो मैं आप से प्रेम से बात करूंगा, मेरे भीतर क्रोध रूपी रस उत्पन्न होगा, तो मै क्रोध से बात करूंगा, आपके प्रति मेरे भीतर में ईर्ष्या रूपी रस उत्पन्न होता है तो मैं ईर्ष्या स्वरूप में आपसे बात करूंगा।
जैसे-जैसे भीतर में रस उत्पन्न होते हैं, उससे मालूम पड़ जाता है कि मेरे जीवन में स्थितियां क्या हैं, निरंतर-निरंतर मेरे भीतर ईर्ष्या का भाव आ रहा है, क्रोध का भाव आ रहा है, द्वेष का भाव आ रहा है तो निश्चित रूप से मेरा मानस-चिंतन ऐसा ही है और उसके विपरीत यदि निरंतर-निरंतर मेरे भीतर में प्रेम का भाव आ रहा है, आनन्द का भाव आ रहा है, प्रसन्नता का भाव आ रहा है, कर्म करने का भाव चिंतन आ रहा है तो निश्चित रूप से मैं श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हो रहा हूं या खुद ही निर्णय कर लीजिये कि मेरे अपने जीवन में यदि दुःख, संताप या रोग या कष्ट या पीडायें या जो भी शत्रु बाधायें हैं। स्वयं मैने ही निर्मित किये हैं, मेरे जीवन में यदि सुख है, आनन्द है, परिवार में अच्छाई, सामंजस्य-प्रेम है तो निश्चित रूप से उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी मेरी स्वयं की है, यह स्वयं निर्णय करना है आपको, कोई भगवान ने आपके जीवन में दुःख नहीं डाला है, भगवान ने आपके जीवन में सुख भी नहीं डाला है, भगवान ने आपको इतनी तो समझ दी है, अब उसका उपयोग हम अधोगति की ओर अग्रसर करते हैं या उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं, यह हमारा चिंतन है, प्रारम्भ में मैने क्या कहा कि जीवन में हम जैसे कंकड-पत्थर चुन लें, चाहें तो हम मानसरोवर से हंस की मोती चुन लें या कंटीले पत्थर, मतलब यह कि जीवन में शुचिता, श्रेष्ठता, उन्नति का भाव, प्रगति का भाव किस तरह से कर्मशील रहते हुये, क्रियाशील रहते हुये, किस तरह से मैं श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हो सकूं, ये जीवन में अधोगतिमय स्थितियां कैसे आयी, इसमे इतनी निरंतरता का भाव कैसे रहा। यह रोग एक दिन में नहीं आया आपके भीतर में, मेरे को डायाबिटीज की प्राब्लम है, शुगर की प्राब्लम है, एक दिन में रोग नहीं आया आपमें, उसमें हमने निरंतरता बनाकर रखी है, खान-पान की शुद्धता नहीं रखी, शुचिता नहीं रखी, आचार विचार की शुद्धता नहीं रखी आगड़-बागड़ खाते रहें, तो धीरे धीरे रोग हमारे भीतर में, देह में संग्रहित होते रहें जीवन में अकारण ही एकदम धनहीनता का कमी नहीं आयी।
एक दम ही मेरे दस लाख का लॉस हो गया हो ऐसा नहीं हुआ, बिना बुद्धि का हमने काम किया। जीवन में एकदम ही कर्जा नहीं होता है। आज आप कर्जे से मुक्त हैं, कल आप कहे नहीं-नहीं एक दम मेरे जीवन में दस तारिख को, ग्याराह तारिख को यह था, दस लाख खर्च हो गये। नहीं होगा, दस लाख खर्च एक दिन में। धीरे-धीरे दस हजार का होगा, बीस हजार का होगा, पचास हजार का होगा, दो लाख का होगा। हम सही बुद्धि से काम नहीं करेंगे तो हमारे कर्जे में वृद्धि होंगी। जिस दिशा की ओर अग्रसर होंगे उसी दिशा में जीवन में स्थितियां बनती हैं। निरंतर निरंतर कर्मशील बनते रहेंगे कार्यक्षेत्र के लिये कि मेरे जीवन में नौकरी करने का काम है, मेरे यह मक्के की खेती करने का काम है या धान का काम है या मेरा कोई दुकान है, व्यवसाय है, मुझे उसमे धीरे-धीरे उन्नति प्राप्त करनी है तो निरंतर-निरंतर कर्मशील रहेंगे तो श्रेष्ठता की वृद्धि करेंगे।
यह देह एक दम में आपकी पच्चीस साल की नहीं हुयी है, माता पिता ने धीरे-धीरे, एक-एक दिन, एक-एक रात करके, एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष, पांच वर्ष इस तरह से पच्चीस वर्ष की आयु तीस वर्ष की आयु को प्राप्त हुये, जीवन में उन्नति भी ऐसी ही होती है, अधोगती भी ऐसी ही होती है, अधोगती भी एक दिन में नहीं होती है। मैं एक दम सें सडक के बीचो-बीच में आ जाऊंगा तो एक्सीडेन्ट होगा ही होगा। साईड-साईड में चलता रहूंगा, लेफ्रट साईड में चलता रहुंगा तो एक्सीडेन्ट की स्थितियां ही नहीं रहेंगी। एक दम मेरे ज्ञान चक्षु या मेरी चेतना, एक दम एक्टिव रहेगी तो मैं सही दिशा की ओर चलूंगा, तो मुझे अपने लक्ष्य तक, मंजिल तक, घर तक पहुंच जाऊंगा और अनर्गल क्रिया करते हुये जाऊंगा, तो अधोगति की ओर निश्चित रूप से अग्रसर होऊंगा। नहीं गुरु ने तो आशीर्वाद दे दिया, महामृत्युंजय का आशीर्वाद दिया, मैं तो उस महाकाल के दर्शन करके आ गया, पशुपति के दर्शन करके आ गया। अब तो मेरी मृत्यु भी मेरा कुछ नहीं कर सकता, यमराज भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, पर बीच में चलेंगे तो दो मिनट में एक्सिडेन्ट हो जायेगा, जो कुछ भी क्रिया होनी है, वह स्व के बुद्धि के फल स्वरूप होता है या कुबुद्धि के फल स्वरूप होता है और गुरु की क्रिया उसे कुबुद्धि से, कुस्थितियों से, विषमताओं से, निजात दिलाना है, किस तरह से अधोगति से सदगति की ओर अग्रसर होना, यह भाव चिंतन देता है। इसलिये गुरु बार-बार कहता है कि तुम निरंतर-निरंतर ईश्वर का, ईष्ट का नाम उच्चारण करने से, उनका स्मरण करने से, उनकी शक्तियों को स्वयं में आप्लावित कर सकें, यह बताता है।
जो भी हम शक्ति का भाव चिंतन करते हैं दुर्गा का, शिव का, गणपति का या गुरु का, उससे गुरु की बेईमानी होती है। गणपति की बेईमानी होती है, हमारे पशुपति महादेव की बेईमानी होती है। उसी भाव चिंतन से हम उस शक्ति से युक्त बन सकते हैं। उस शिवमय शक्ति से अर्थात् हमारा जीवन जो शवमय स्थिति की ओर है वह शिवमय स्थिति की ओर, हरिमय स्थिति की ओर, पूर्णमय महामृत्युंजयमय स्थिति की ओर अग्रसर हो सके। जीवन तो शवमय है अर्थात् मृत्युमय स्थिति की ओर हम अग्रसर हो रहे है कुछ भी प्रयास करो मृत्यु तो आनी ही आनी है। ओ हो ऐसा नहीं है कि अब मैंने तो अपने जीवन में बीस लोगों को श्मशान भेज दिया, मैं तो मृत्यु को प्राप्त नहीं होऊंगा, निश्चित रूप से मृत्यु को प्राप्त होनी ही होनी है, भ्रम यही रहता है, मैं तो बस पिताजी को श्मशान छोड़ के आ गया, माँ को छोड़ के आ गया, दादा को छोड़ के आ गया, भाई को छोड़ के आ गया, मुझे तो मृत्यु नहीं आनी है, आनी ही आनी है और मृत्यु आती है न तब एकदम से नहीं आती। धीरे-धीर वैसी स्थितियां जीवन में निर्मित होनी शुरू हो जाती हैं। सुनाई कम देना शुरू हो जाता है, दिखाई कम देना शुरू हो जाता है, शरीर की शक्ति मे धीरे-धीरे कमी आनी शुरू हो जाती है, यह मृत्यु धीरे-धीरे आती है और मृत्यु भी आती है तो जागृत अवस्था में नहीं आती है, आपको बैठे-बैठे मृत्यु नहीं आयेगी, एक दम से बेहोशी अवस्था में आयेगी बेहोशी, अवस्था का मतलब आप को कुछ भी ज्ञान नहीं है, जब कोई आपरेशन भी करता है तो बेहोश क्यों करते है कि आप को ज्ञान नहीं रहेगी, कि कितना ब्लड निकल रहा है डाक्टर ने चीर-फाड़ किया आपको ज्ञान नहीं रहे। बेहोशी अवस्था में आती है जागृत अवस्था में नहीं आती है कि ओ हो अभी मैं चल रहा हूं अचानक मुझे ज्ञान हो जायेगा की दस मिनट बाद मेरा मृत्यु है ऐसा नहीं होगा या तो धीरें धीरे कोई बीमारी निर्मित होगी या हार्ट बीट एकदम से कम हो जायेगी या ब्लड सर्कुलेशन कम हो जायेगा या बेहोश सा हो जाऊंगा। बेहोश हो गये तो कुछ देर बाद मे मृत्यु को प्राप्त हो जाऊंगा, मृत्यु इस तरह से आती है, ऐसा नहीं है कि मृत्यु एक दम आपको कहकर आयेगी। ओ हो 2025 में मै आपके घर में आ रही हूं ऐसे नहीं आयेगी।
मृत्यु एका एक आती है, कुछ भी हो अभी भूकंप हुआ, यह क्या हुआ एक दम प्रकृति का कोई मालुम था क्या? सब इधर जो हजारों हजारों लोग काल कवलित हो गये उनको ज्ञान था क्या ? कि प्रकृति ऐसा कोई तांडव मचा देगी स्वयं हमने ही ऐसी क्रियायें की प्रकृति के साथ हमने खिलवाड किया यह उत्तराखण्ड में जो हुआ प्रकृति के साथ हमने खिलवाड किया हमने ही प्रकृति को रौंदने की कोशिश की तो प्रकृति ने अपना रूप दिखा दिया। हम प्रकृति के विपरीत चलेंगे, ईश्वर के विपरीत चलेंगे तो जीवन में इसी तरह की स्थितियां पुनः आयेंगी। किसी न किसी रूप में आयेंगी जरूर क्योंकि हम सही दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो रहे हैं। इसीलिये हमारे जीवन में ऐसी विषम स्थितियां आती हैं इसीलिये हमारे जीवन में दुःख, संताप, रोग, कष्ट, बाधायें, अड़चने आयेंगी। व्यक्ति मंदिर में वही कामना करता है, भगवान के सामने, गुरु के सामने जो उसके पास नहीं होती है, मेरे पास सुख नहीं है तो मै सुख की कामना करता हूं, मुझे आरोग्यता की प्राप्ति हो, लक्ष्मी की प्राप्ति हो, संतान सुख की प्राप्ति हो, मेरे जीवन में अच्छी वृद्धि हो, व्यापार की अच्छी वृद्धि हो मेरे मित्र सहयोगियों में वृद्धि हो, पुत्र-पौत्र में वृद्धि हो अर्थात निश्चित रूप से मेरे पास में एक चीज ये कम है। दुःख के वृद्धि के लिये मैं कामना नहीं करता हूं, कि नहीं मेरे रोगों में वृद्धि हो, मेरे शत्रुओं में वृद्धि हो, मेरे संतान के हीनता में वृद्धि हो, ऐसे तो कामना नहीं करता हूं। क्योंकि ये मेरे पास में है इसीलिये इसके लिये मै कामना नहीं करता हूं जो नहीं होती है न उसी की हम भगवान से, ईश्वर से, गुरु से, देवी- देवताओं से प्रार्थना स्वरूप हम मांगते है। सुखी की कामना करने के पीछे व अर्थात् हमारा जीवन दुःख पूर्ण स्थिति से ग्रसित है। मुझे जीवन में सुख चाहिये, मुझे जीवन में आनन्द चाहिये अर्थात मेरे जीवन में शोक की स्थितियां ज्यादा आयीं, दुःख की स्थितियां ज्यादा आयीं, मुझे जीवन में प्रसन्नता चाहिये अर्थात् मेरे जीवन में हर्ष-उल्लास नहीं है, मुझे जीवन में धन चाहिये अर्थात् मैं धन से युक्त नहीं हूं, धनहीन स्थिति में हूं तभी वही तो कामना करेंगे न, तो इसीलिये गुरु की क्रिया यही रहती है कि इन विषम स्थितियों से सम स्थितियों की ओर किस तरह से अग्रसर हुआ जाये। उसमें श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हों।
वह भाव चिंतन दीक्षा के माध्यम से, पूजा अर्चना के माध्यम से, वह उस साधक में, उस शिष्य में अर्पित करता है, निर्मित करता है। एक अंकुरण बीज उत्पन्न करता है, जिस तरह से आप जमीन के अन्दर बीज बोते हैं न तो वह क्या बीज के अंदर कोई स्पन्दन नहीं है, बीज में वह शक्ति है कि वह जमीन को फाड़ देता है। इतना सा बीज होता है, वह मामूली सा एक बाजरे के दाने के बराबर, गेहूं के दाने से भी आधा होता है और वह जमीन को फाड़ के उसमे से अंकुरण फूट जाता है। हम तो इतने शक्ति से युक्त हैं तो क्या हम अपने जीवन में जो भी इस तरह की कठोर रूपी जो स्थितियां है उनको हम समाप्त कर नहीं सकते? निश्चित रूप से कर सकते हैं। भीतर में वह एक ऊष्मा का भाव होना चाहिये, एक अग्नि तत्व का भाव होना चाहिये, एक ऊर्जा तत्व का भाव होना चाहिये, वह गुरु दीक्षा के रूप में प्रदान करता है, चेतना का भाव होना चाहिये, क्या एक बीज के अंदर इतनी शक्ति होती है कि वह कठोर जमीन को भी देखो आप कैसे इन पहाडों के ऊपर भी पत्थरों को बड़े-बडे़ पत्थरों को फाड़ के पौधा उग जाता है, कैसे उग जाता है? उसमें चट्टान को भी कैसे तोड़ने की शक्ति होती है, तो हम तो एक छोटी-छोटी समस्याओं को, क्या हम जीवन में समाप्त नहीं कर सकते है? निश्चित रूप से कर सकते हैं, परन्तु भीतर में वह जीवट शक्ति का भाव होना चाहिये एक निरंतरता का भाव होना चाहिये।
बीज को देखो कि आज बीज डाल दिया, कल वापस खोद के देखो, ओ हो क्या अंकुरण तो फूटा ही नहीं, कल, परसों और फिर खोद के देखें तो बीज तो कट जायेगा। आपकी क्रियायें ऐसी ही हैं, यह नित्य-नित्य ओ हो आज तो मैंने गुरु का स्मरण कर दिया 51 माला कर दी मुझे क्या लाभ मिला, एक दिन में लाभ नहीं मिलेगा, ओ हो आज तो मैंने प्रदोष काल में मैने महादेव के दर्शन कर लिये, अब मुझे जीवन में गौरी की स्थितियां प्राप्त हो जाये, शिव की स्थितियां, गणपति की स्थितियां, कार्तिकेय की स्थितियां, शुभ-लाभ की स्थितियां प्राप्त हो जाये, एक दिन में प्राप्त नहीं होता निरंतरता का भाव रखना पड़ता है, जब हमें मालूम है कि जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है, मृत्यु हमारे हाथ में नहीं है।
कोई निश्चित Time और Date बता सकते हैं कि मेरे बच्चे का जन्म कब होगा, मेरे पौत्र का जन्म कब होगा या पौत्री का जन्म कब होगा कोई बता सकता है? कोई मृत्यु का समय बता सकता है? ओ हो अमुक-अमुक समय पर 10 बज के 45 मिनट और 12 सेकेन्ड में मृत्यु प्राप्ति होगी कोई बता सकता है? जब जनम का समय हमें ज्ञान नहीं है, मृत्यु का समय हमें ज्ञान नहीं है और फिर हम इस देह के बारे में इतना अधिक गुरुर, घमंड और अपने आप में इतना ईर्ष्या का भाव, द्वेष का भाव वैमनस्यता का भाव कि बस जो कुछ भी भीतर में, ये क्या सब स्थितियां उत्पन्न करते हैं, असुर वृत्ति की स्थितियां उत्पन्न करते हैं तो जीवन में भी असुरमय स्थितियां बनती हैं जिसमें कोई भी सुर नहीं हो कोई भी आनन्द का भाव नहीं हों। राक्षस तत्वों को हम संग्रहित करते रहते हैं। इसीलिये रावण के क्यों दस सिर बतायें, क्यों इन पंद्रह दिन बाद में दशहरा आयेगा तो अर्थात् दशा को हरने वाला, जो भी जीवन में दुःख, संताप, रोग, बाधा, अड़चने, शत्रु, धन हीनता, संतान हीनता, गृहस्थ सुख की अभिवृद्धि में जो भी बाधायें हैं, वे दस रूपों में उनको हर सके। वह विजय दशमी का भाव चिंतन है। ऐसा नहीं कि रावण का डेथ हो गया, रावण का डेथ तो हजारों हजारों साल से हम करते आ रहे हैं पुतला बना देंगे, जला देंगे आप भी करते है आपके पूर्वज भी करते आ रहे थे, वह दशानन का मतलब है कि इन दस तरह कि जो जीवन में समस्यायें बाधायें हैं उन्हें किस तरह समाप्त किया जाये, उन्हें किस तरह से हराया जाये, उन्हें किस तरह से नेस्तानाबूत किया जाये, वह चिंतन, भाव ही दशानन है।
यह जो सब कुछ स्थितियां आयेंगी, विषम स्थितियां, दुःख कष्ट बाधायें, अपने दशों स्वरूपों में मेरे सामने ही है, पीछे नहीं है कुछ भी मेरे जीवन के पीछे नहीं है, सब मेरे सामने ही सामने है, घर में कलह है, घर में तनाव है, घर में संतान हीनता है, घर में धन हीनता है, घर में रोग है, घर में कष्ट है, घर में शत्रु बाधा है, यह सब कुछ मेरे सामने ही है, उन सबको समाप्त करने का भाव, चिंतन दशानन का भाव चिंतन है। बार-बार मै क्या कहता हूं कि हम क्या प्रार्थना करते हैं कि पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में माया तीसरा सुख सुलक्षणा पत्नी या पति, चौथा सुख श्रेष्ठ संतान प्राप्ति, अब ये बता दो कि चारों सुखों से कौन युक्त है? कोई भी युक्त नहीं है, पहला सुख निरोगी काया अर्थात आरोग्यमय स्थिति किसके जीवन में आरोग्यमय स्थितियां हैं, अगड-बगड तो हम खाते हैं, जर्दा, तंबाकू लेते हैं, बीडी-सिगरेट पीते हैं, मांस भक्षण करते हैं, मद्यपान करते हैं, दारू पीते हैं तो फिर शरीर में रोग नहीं आयेंगे कष्ट नहीं आयेंगे, तो क्या आयेंगे फिर शरीर में Capability है नहीं, उसके कारण से विचार कैसे आयेंगे? जब तामसिक स्थितियां लेंगे तो तामसिक विचारें ही आयेंगी, सात्विक स्थितियां लेंगे तो जीवन में सत्यपूर्ण स्थितियां आयेंगी, सत्यपूर्ण मतलब जीवन का सचपूर्ण स्थितियां है, वे जीवन में स्थितियां निर्मित होंगी, तामसिक स्थितियां लेंगे तो वे तमसपूर्ण स्थितियां जीवन में बनेगीं। अर्थात क्रोधमय स्थितियां जीवन में बनेगीं।
दूसरा सुख घर में माया अर्थात घर में लक्ष्मी है कहां? जो भी हम कमाते हैं वह तो उसे ज्यादा तो हमारे सामने खर्चा तैयार रहता है और निरंतर-निरंतर परिश्रम करने के बाद भी हमको कुछ लाभ भी नहीं मिलता है, सुलक्षणा पति या पत्नी हम सुलक्षणा से कितना युक्त हैं, जब शरीर ही हमारा कंट्रोल में नहीं है, खान-पान ही हमारा कंट्रोल में नहीं है, जिह्ना ही हमारे नियंत्रण में नहीं है, बुद्धि हमारे स्व के नेम में हम लेते नहीं है बुद्धि हमारी दूसरे कोई चलाते रहते हैं तो हम फिर क्या अभिलाषा करें कि मैं सुलक्षणों से युक्त बनूंगा, मेरे में क्या सुलक्षण है क्या मेरी जब खुद के भीतर में सुलक्षण नहीं है और दूसरों में हम देखते हैं कि मेरी पत्नी एकदम आज्ञाकारी बने और खुद का मन में कितना कंट्रोल है, पत्नी तो आज्ञाकारी बन जायेगी, पति तो आज्ञाकारी बन जायेगा, खुद में क्या है, मतलब प्रेम की भावना है, स्नेह की भावना है, आत्मीयता की भावना है, कर्मशीलता की भावना है और भीतर में मेरे है नहीं दूसरे सब से कहता हूं कि मेरे संतान आज्ञाकारी बने, मेरा पड़ोसी, मेरे एकदम नियंत्रण में रहे, मेरी पत्नी मेरे कंट्रोल में रहे, मेरा रिश्तेदार मेरे साथ नियंत्रण में रहे।
अरे! जब खुद का मन ही नियंत्रण में नहीं है, दूसरों का नियंत्रण कैसे करेंगे, स्वः का मन तो नियंत्रण में कर लें पहले, स्व का मन तो नियंत्रण में है नहीं, बुद्धि नियंत्रण में है नहीं, विचार तो अनेक-अनेक दिशा मे घूमते रहते हैं, दौडते रहते हैं, वह भी कर लूं, वह भी कर लूं, गुरु जी मैंने ये प्लानिंग किया है, अरे प्लानिंग तो क्या Implement करने के लिये क्या किया है ? Implement तो कुछ नहीं किया, गुरु जी बस प्लान बना रहा हूं, बस ये ऐसा प्लान—- अरे प्लान तो बना रहे हो, योजना तो बना दिया, आपने अच्छी बात है पर योजना को दृढ़ करने के लिये कर्म के भाव में क्या है ? कर्म भाव तो है नहीं गुरु जी कर्म करने की इच्छा ही नहीं रहती है, बहुत आलस्य रहता है, बस ऐसा यकायक कुछ हो जाये, आप ऐसा चमत्कार कर दो कि महाविद्या महाकाली आ जाये और मेरे सब शत्रुओं का नाश कर दे और बस भगवान शिव आ जायें और मुझे मृत्युंजय स्थितियां प्राप्त हो जाये, रोगों से मुझे निवृत्ति प्राप्त हो जाये, लक्ष्मी आ जाये और मेरे घर में धन भर दे। लक्ष्मी ऐसे आयेगी कैसे शरीर के, अंदर खुद के अंदर ही क्रूरता बनी हुयी है खुद के अंदर ही कर्म हीनता का भाव है, लक्ष्मी भी ऐसे घर में जाकर भी करेंगी क्या? मैं आज चाहूं मेरे को एक सोलह साल की लड़की एकदम मेरे से Attract हो जायं, Impossible सी बात है और देखिये कि अरे गुरु जी आपका चेहरा तो एकदम मुरझाया हुआ सा है, झुरियां पड़ी हुयी सी हैं, बाल उडे हुये हैं, मै आपके साथ आकर क्या मेरे को संतोष दे पायेंगे, आयेगी ही नहीं, तो अप्सरा, उर्वशी मेरे पास थोडे़ ही आयेगी, मेरे खुद के अंदर भीतर में कर्म करने का भाव ही नहीं है, लक्ष्मी कैसे आयेगी, लक्ष्मी ऐसे भीतर में थोडे ही बैठी है कोई शक्ति ऐसे खुद तो निर्बल और एक दम कृषकाया से बने हुये हैं खुद तो एकदम, खुद में कर्म करने का भाव चिंतन ही नहीं है, शक्ति महाकाली आयेगी आकर करेगी क्या?
बगलामुखी आ जाये, धूमावती आ जाये, छिन्नमस्ता आ जाये और सब शत्रुओं का विनाश कर दें और शत्रुओं को उत्पन्न किसने किया? भगवान ने तो भेजा नहीं था आपके साथ में दीन-हीनता गरीबी, भगवान ने तो नहीं भेजी थी न? स्वयं ही उत्पन्न की न! तो स्वयं को ही दूर करनी पड़ेगी। भगवान ने तो कर्मेन्द्रियां, ज्ञानेन्द्रियां, सोचने-विचारने की शक्ति दी है न? उसका तो हम उपयोग करते नहीं है कि अब खुद की बुद्धि से, खुद के आंखों से, खुद के कानों से, खुद के वाणी में हमारे मिठास है नहीं सुनना आप पसंद करते नहीं है, सुनाना आप पसंद करते हैं तो जब अब सहन करने की शक्ति नहीं है तो जीवन में श्रेष्ठता आयेगी कैसे और गुरु की क्रिया ये है कि इन विषम स्थितियों से सम स्थितियों की ओर श्रेष्ठ स्थितियों की ओर अग्रसर करना और आज मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं, कि यदि आप कर्म करते हैं, श्रेष्ठता को धारण करने का प्रयास करते हैं, तो निश्चित ही सफलता प्राप्त कर सकेंगे, ऐसी ही मंगलकामना करता हूं, आशीर्वाद् देता हूं।
परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली
काठमांडू शिविर नेपाल
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