





प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान का सदैव से यही प्रयास रहा है कि प्राचीन महत्वपूर्ण विद्या, ज्ञान से सांसारिक मनुष्य परिचित हो सके और अपने जीवन में हमारे ऋषि- मुनियों द्वारा दिये उच्चकोटि के उपदेश, ज्ञान को आत्मसात कर वास्तविक रूप से मानव जीवन को समझने का प्रयास करें। क्योंकि यह मानव जीवन इतना रहस्यमयी है कि जब तक हमें वास्तविक सत्य का बोध नहीं होगा, तब तक मूल उद्देश्य का पूर्ण होना संशयात्मक है और शिष्य के लिये तो आवश्यक ही हो जाता है कि वह गुरु-शिष्य सम्बन्धों की डोर को समझ सके।
अष्टावक्र गीता में गुरु-शिष्य सम्बन्ध की जो अभिव्यक्त की गयी है, वह अपने आप में शिष्य के लिये संजीवनी है, जीवन को परमार्थ तक पहुंचाने का मार्ग है और यह कहना अनुचित ना होगा कि ऐसा दूसरा कोई ग्रंथ इस संसार में दूसरी लिखा ही नहीं गया। यह अपने आप में उच्चकोटि की अद्वितीय ग्रंथ है, जिसे आत्म- सात करने पर शिष्य, साधक को एक मार्ग, लक्ष्य का बोधा होता है। यदी अष्टावक्र गीता क्रियात्मक रूप में धारण कर लिया जाये तो मानव जीवन सार्थक होगा।
उद्दालक मुनि अपनी गुरु भक्ति एवं निष्ठा के लिये बहुत प्रसिद्ध थे, उन्होंने गुरु सेवा करके वेद-वेदान्त का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उनके पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। वह भी अपने पिता के समान पारगामी पंडित थे। उद्दालक की एक पुत्री हुयी, जिसका नाम सुजाता था। उद्दालक के यहां अनेक ब्राह्मण बालक ब्रह्म-विद्या का अध्ययन करने आते थे, उनमें सबसे प्रिय शिष्य कहोड जिसकी सेवा से प्रसन्न होकर उद्दालक ने उसे वेद शास्त्र का पूर्ण ज्ञान दिया, साथ ही अपनी कन्या सुजाता का विवाह भी कहोड के साथ कर दिया।
कुछ समय पश्चात् सुजाता गर्भवती हुयी। उसके गर्भ में अग्नि के समान तेजस्वी शिशु आया, उस गर्भस्थ शिशु ने एक दिन अपने वेदज्ञ ज्ञानी पिता से गर्भ से ही कहा कि पिता जी आप रात-दिन वेद का पाठ करते हैं, किन्तु आपका उच्चारण सम्यक् रूप में शुद्ध नहीं होता। ऐसा न हो कि आपके शिष्य अशुद्ध वेद मंत्रों का उच्चारण करें और आप संसार में उपहास के पात्र बन जायें।
शिष्यों के मध्य बैठे हुये ऋषि ने अपने पुत्र से अपमान पूर्ण वचनों को सुन कर अत्यन्त क्रोधित हो उठे, उन्होंने कहा अभी से इतना टेढ़ा! अष्टावक्र कहीं का। तू मुझ में अभी से दोष दृष्टि रखता है। तू तो बड़ा टेड़ा है रे! कहोड का इतना कहना ही अष्टावक्र के लिये एक प्रकार से श्राप था। जिसके कारण वे आठ जगह से टेढ़े जन्मे थे, इसी कारण उनका नाम अष्टावक्र पड़ा था। जिस दिन अष्टावक्र का जन्म हुआ, उसी दिन उद्दालक ऋषि के यहां भी एक पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम श्वेतकेतु रखा गया। इस प्रकार मामा-भान्जे का जन्म एक ही दिन हुआ।
अष्टावक्र के जन्म कुछ समय पूर्व उनकी माता सुजाता ने अपने पति कहोड से कहा कि शिशु का जन्म होगा इसके संस्कार करने होंगे, इस हेतु कहीं से धन अर्जन का प्रबन्ध कीजिये।
उस समय विदेहराज जनक अपनी दानशीलता और ज्ञान के लिये बहुत प्रसिद्ध थे। जनक के दरबार में सैकड़ो विद्वान ब्रह्म की चर्चा किया करते थे। उनमें एक बंदी नाम का परम विद्वान ब्राह्मण भी था। अपने पांडित्य के कारण उसकी दरबार में बड़ी धाक थी। कहोड ज्यों ही दरबार में पहुंचे बंदी ने उन्हे शास्त्रार्थ करने को कहा। बंदी की यह शर्त थी कि जो शास्त्रार्थ में परास्त होगा, उसे जल में डुबा दिया जायेगा। इसके पूर्व बंदी अनेक विद्वानों को नदी में डुबा चुका था। शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ, बंदी ने कहोड को परास्त कर दिया और शर्त के अनुसार उन्हें नदी में डुबो दिया।
सुजाता यह दुखद समाचार सुनकर बहुत ही संतप्त हुयी और उन्हें अपने पिता उद्दालक ऋषि के पास जाने के लिये विवश होना पड़ा। श्रेष्ठ समय पर अष्टावक्र का जन्म हुआ। वे जन्म से ही वेद-वेदाज्ञ के ज्ञाता थे। उनके मामा भी परम मेधावी थे। दोनों की आयु 12 वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन जब अष्टावक्र अपने नाना उद्दालक की गोद में बैठे थे, श्वेतकेतु भी कहीं से वहां पहुंच गये, वे अष्टावक्र से बोलें, तुम यहां से उठो, मैं अपने पिता की गोद में बैठूगां, अष्टावक्र ने कहा अपने पिता की गोद में मैं बैठूगां। पिता की गोद में बैठने से बड़ा सुख मिलता है, श्वेतकेतु ने पूछा पर तुम्हारे पिता हैं ही कहां?
यह सुनकर बालक का कोमल मन मुरझा गया। वह उदास मन से अपने मां के पास जाकर पूछा कि मेरे पिताजी कहां हैं? और उनका नाम क्या है? इस प्रश्न को सुनकर माता के नेत्रों में पति-वियोग के आंसू छलक आये, डब- डबायी आंखो से कहा, पुत्र तुम्हारे पिता जी को बंदी ने शास्त्रार्थ में परास्त किया और उन्हें जल में डुबो दिया। मैं अभागिन तुम्हें तुम्हारे पिता के दर्शन भी नहीं करा सकी।
इतना सुनना था कि अष्टावक्र के मन में तीव्र रोष उत्पन्न हुआ और प्रतिशोध की भावना जाग्रत हुयी। जनक का पता पूछते हुये वे उसके दरबार की ओर चल पड़े। श्वेतकेतु भी उनके साथ थे। दोनों जनकपुरी पहुंच गये। ये दोनों यज्ञशाला की ओर जा रहे थे कि उधर से राजा जनक की सवारी भी हाथी पर निकली। अष्टावक्र और श्वेतकेतु दोनों राजमार्ग के बीचो-बीच चल रहे थे, राज-सेवक बालको को मार्ग से हटाने लगे, तो अष्टावक्र ने निर्भीकता से कहा कि नहीं राजा से भी पहले ब्राह्मण को मार्ग मिलना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण जन्म से ही गुरु है। महाराजा जनक हाथी के हौदे में बैठे हुये यह सारा वार्तालाप सुन रहे थे, बालक के इन वचनों से वे अत्यंत प्रभावित हुये।
अष्टावक्र तथा श्वेतकेतु यज्ञशाला के द्वार पर पहुंच गये, द्वारपालो ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया और कहा कि बालकों का प्रवेश वर्जित है, यहां तो वृद्ध का ही प्रवेश होता है। अष्टावक्र ने ओजस्वी वाणी में कहा कि सिर के बाल पक जाने से ही कोई वृद्ध नहीं होता। बालक होने पर भी यदि किसी को परम सत्य का बोध हो, तो वही यथार्थ वृद्ध है। पीछे-पीछे चल रहे राजा जनक यह सब देखते-सुनते चले आ रहे थे। अष्टावक्र ने राजा की ओर देखकर कहा- मैंने आपकी बहुत ख्याति सुनी है, आपके दरबार में निरंतर ब्रह्म की चर्चा होती रहती है। यह भी सुना है कि एक बंदी नामक ब्राह्मण विद्वानों से शास्त्रार्थ करता है और शर्त भी है कि उससे जो शास्त्रार्थ में परास्त हो जाये, उसे जल में डुबो दिया जाता है। मैं उस बंदी विद्वान से शास्त्रार्थ करना चाहता हूं, शर्त मुझे मान्य है।
यह सुनकर पहले जनक ने अष्टावक्र से आत्मा व ब्रह्म के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न किये। जनक को यह आभास हुआ कि यह एक तत्वदर्शी ब्राह्मण है। सभी वेदज्ञ ज्ञानी आमंत्रित हुये। अष्टावक्र ने अपने पैने तर्कों से बंदी को परास्त कर दिया। अब शर्त पूरी करने की बात आयी। अष्टावक्र ने कहा विप्र देवता मैने सुना है आज तक आपने अनेक ब्राह्मणों को जल डुबो दिया है। न्याय तो यही कहता है कि आपको जल में डुबो दिया जाये, पर मैं ऐसा नहीं करूंगा। लेकिन आपने ऐसा क्यों किया, इसका कारण स्पष्ट करिये।
उसी समय बंदी ने विनम्र भाव से कहा, ब्रह्मज्ञानी बालक, ब्राह्मणों को जल में डुबोने का तात्पर्य कुछ दूसरा ही है। कारण यह है कि मैं वरूण का पुत्र हूं, मेरे पिता वरूण अपनी विभावरी नामक पुरी में एक विशेष यज्ञ कर रहे हैं। उस यज्ञ में पृथ्वी के श्रेष्ठ ज्ञानी ब्राह्मणों की आवश्यकता थी। मैंने ब्राह्मणों को जल में डुबोकर मारा नहीं अपितु वे मेरे पिता के यंहा यज्ञ सम्पन्न करा रहें हैं। यज्ञ पूरा होने पर वे पुनः पृथ्वी पर आ जायेंगे। हुआ भी कुछ ऐसा ही। समय आने पर सभी ब्राह्मण अपने-अपने घर लौट आये।
इस घटना के बाद से महाराजा जनक को अष्टावक्र के प्रति विशेष आस्था हो गयी। ये कौन जनक थे, यह कहना कठिन है, क्योंकि जनक की परम्परा में उन्नीस जनक हो चुके हैं, ये सब के सब विदेहराज अर्थात् देह तथा मन के धर्म, सुख-दुखादि से परे थे, इसीलिये इन्हें विदेहराज कहा जाता था। राजा जनक का वंश देववंश माना जाता है। मनुष्य कोटि में इनकी गिनती नहीं है।
इसका कारण यह था कि राजा निमि यज्ञ कर रहे थे। इनके गुरु थे वशिष्ठ। वशिष्ठ से निमि ने अपने यहां यज्ञ सम्पन्न कराने का आग्रह किया। उसी समय वशिष्ठ ने दूसरे यजमान को यज्ञ का वचन दिया था। वशिष्ठ ने कारण बताते हुये कहा कि इस समय वे किसी अन्य का यज्ञ कराने जा रहें हैं, लौटकर यज्ञ सम्पन् करायेंगें। पर शिष्य के मन में तीव्र वैराग्य था, उनके मन में विचार आया सत्कर्म में देरी कैसी ? जीवन का क्या भरोसा ? इस दृष्टि से निमि ने दूसरे ब्राह्मण को बुलाकर यज्ञ सम्पन्न कराने लगे। वशिष्ठ जब वापस लोटे तो उन्हें पता चला कि उनके शिष्य ने उन्हें छोड़कर दूसरे ब्राह्मण का वरण कर लिया है। वे अत्यन्त कुपित हुये। उन्होंने अपने शिष्य को शाप दिया कि तुम्हारी मृत्यु हो जाये, शिष्य भी अपने धर्म और सत्य पर स्थिर था। उसने भी उलटकर गुरु को शाप दिया कि आपकी भी मृत्यु हो जाये। क्योंकि आप दक्षिणा के लोभ से दूसरे यजमान के यहां चले गये। मेरे यहां यज्ञ सम्पन्न नहीं कराया। इस प्रकार गुरु ओर शिष्य ने एक-दूसरे को शाप दे दिया। किंतु यह शाप अनिष्टकारी न होकर कल्याणकारी है। आगे चलकर मित्र वरूणी के तेज से वशिष्ठ ने फिर जन्म लिया। इधर निमि राजा जब यज्ञ करा रहे थे तो उस समय उनके गुरु ने जो श्राप दिया उससे वहीं पर उनकी मृत्यु हो गयी। राजा के मरने पर ऋषियो-मुनियो में हाहाकार मच गया। उस यज्ञ में अपना-अपना भाग लेने के लिये देवता भी प्रत्यक्ष उपस्थित हुये थे। ऋषि-मुनियों ने कहा, यह तो बड़ा अनर्थ हो गया, देवता-गण आप लोग ही कुछ कृपा कीजिये।
देवताओं ने निमि को जीवित करने के लिये निमि की आत्मा को बुलाया और कहा जीवात्मन आप इस मृत शरीर में प्रवेश करिये। पर आत्मा ने स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा कि- जिस शरीर ने मुझे विराट् से संकुचित बना दिया, जो मात्र साढ़े तीन-चार हाथ का है और जिसमें अनेक विकार भरे हुये हैं, मैं उसके बंधन से मुक्त हुआ हूं। यह मेरे गुरु की मुझ पर कृपा है। मेरे गुरु ने मुझे विराट् ब्रह्म बना दिया, अब मैं इस घेरे में नहीं आने वाला, इतना कहकर आत्मा अदृश्य हो गयी।
तब निमि के शरीर का मंथन किया गया। उसमें से एक कुमार का जन्म हुआ, शरीर से जन्म होने के कारण इसका नाम जनक पड़ा। मथने से प्रकट हुआ इसलिये मिथिल हुआ। इसी कुमार ने आगे चलकर मिथिला नगरी को बसाया था। मिथिला राजधानी होने का यही कारण था। इस प्रकार महाराजा जनक का वंश, दिव्य वंश है। इस वंश की गणना मनुष्य योनि में नहीं होती है। जनक के परम्परा में जितने राजा हुये सब ब्रह्मज्ञानी थे।
क्रमशः अगले अंक में———————————!
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