





और किस प्रकार से चौसठ कला पूर्ण बना जा सकता है। हमने किस प्रकार से उनकी रास-लीलाओं पर ध्यान दिया, किस प्रकार से उन्होंने सोलह हजार एक सौ आठ रानियों से विवाह किया, अनेक-अनेक गोपियों से योग किया, लेकिन हमने उनके उच्चतम लीलाओं को वासना पूर्ण ढंग से देखा, जब कि वो योग (जुडाव) की श्रेष्ठतम भाव-भूमि थी। वो संदेश देना चाहते थे कि सभी के साथ प्रेम की स्थिति किस प्रकार से निर्मित की जा सके, वह उन्होंने संसार को बताया सोलह हजार रानिया होने के बाद भी योगेश्वर कहा जाता है, जगद्गुरु कहा जाता है। इसके पीछे संदेश यह था कि भोग की स्थिति प्राप्त करते हुये योग की स्थिति किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।
इसीलिये हमे कहा जाता है कि हम धर्म अर्थ काम मोक्ष में पूर्णता प्राप्त कर सके अर्थात धर्म का पूर्ण रूप से आचरण कर सके सांसारिक जीवन में हमारी चारित्रिक विशेषतायें धर्म के अनुकूल हों और अर्थ की प्राप्ति अर्थात् गृहस्थ जीवन चलाना है और अपने आप को संसार में बना के रखना है तो धन की पूर्ण आवश्यकता पडेगी और काम की प्राप्ति अर्थात् गृहस्थ जीवन में निरंतर-निरंतर वृद्धि को प्राप्त हो सकें। उसके बाद मोक्ष प्राप्ति से तात्पर्य है कि हम धर्म, अर्थ और काम की स्थितियों में सामंजस्य स्थापित करते हुये पूर्णता प्राप्त कर सकें।
परन्तु मोक्ष का मतलब हमने समझ लिया है कि मृत्यु प्राप्त कर सके। वास्तविकता में मृत्यु तो पल-पल हो रही है, हमारे जो जीवन में कष्ट है, अभाव है, बीमारी है, असम्मान की स्थितियां है, उन मृत्यु तुल्य स्थितियों को समाप्त कर हम अमृत्यु की ओर अग्रसर हो सकें। जीवन के समस्त अंधकारमय स्थितियों को समाप्त कर प्रकाश पूर्ण स्थितियों को प्राप्त कर सके। वह जीवन में धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता का भाव चिंतन है। ऐसा नहीं कि देह की वृद्धि हो रही है, समय बीत रहा है और हम आया राम गया राम हो गये। और फिर हम विचार करते है कि कुछ भी जीवन में किया नहीं। हमें यह चिंतन करना है कि किस प्रकार से मंद बुद्धि कालिदास ने श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त किया कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन में हमें निश्चय करना है और निरंतरता का भाव प्राप्त करना है। मेरा स्वयं का जीवन है, मै किस प्रकार से वृद्धि को प्राप्त कर सकता हूं, उन्नति को प्राप्त कर सकता हूं और निरंतर श्रेष्ठमय स्थितियों में रह सकूं। हम तो सिर्फ प्लान बनाते रहते हैं कि गुरुजी मेरे जीवन में श्रेष्ठ जीवन साथी होना चाहिये, मुझे श्रेष्ठ मकान चाहिये, मुझे श्रेष्ठ व्यापार खड़ा करना है। परन्तु उसके लिये हम क्रिया रूप में कुछ भी करना नहीं चाहते है। जब क्रिया शक्ति का अभाव होता है तो जीवन में श्रेष्ठ स्थितियों का निर्माण नहीं हो सकता है। किसी भी कार्य को करने से पहले हमें यह ध्यान देना होगा कि मैं स्वयं में कितना सक्षम हूं, यदि सक्षम नहीं हूं तो अपनी योग्यता का विकास करने के लिये मैं क्या कर रहा हूं। सिर्फ विचार करने से हम योग्य नहीं बन सकते, तात्पर्य है कि इच्छा शक्ति, विचार शक्ति और क्रिया शक्ति जब तीनों का सामंजस्य स्थापित होगा तभी स्वः पर नियंत्रण होगा और अनूकूल परिस्थतियां निर्मित होंगी।
लोग यह चाहते हैं कि गुरु जी एकदम से कुछ चमत्कार कर दें और सब कुछ सेटल हो जाये। अक्सर युवा कहते हैं पूजा-पाठ साधना तो बुढापे की चीजें हैं। बुढ़ापे में जब कमर सीधी होगी नहीं, घुटने दर्द करेंगे, ढंग से बैठा नहीं जायेगा, तब साधना कैसे हो पायेगी? उसके लिये अभी से प्रयास करना पडे़गा। हम चाहेंगे बहुत कुछ, पर मेहनत कुछ नहीं करेंगे, प्रत्येक व्यक्ति के पास हर तरीके के बहाने है स्वयं को सही सिद्ध करने के सौ तरीके हैं परन्तु उन बहानों को बदलने के लिये कर्म का भाव चिंतन नहीं है।
भीतर में ज्ञान तो है कि मेरे पास मकान भी होना चाहिये, संपत्ति होना चाहिये परन्तु उस के लिये हमने कर्म क्या किया? यह भाव चिंतन नहीं है। वह कर्म करने के लिये जिस ऊर्जा शक्ति कि आवश्यकता होती है। वह निरंतर कर्मशील रहने से ही प्राप्त होती है। हम कृष्ण के मंदिर जाते है, पूजन करते है, नवरात्रि में जगदम्बा का पूजन करते हैं, गणपति का पूजन करते है, हनुमान का पूजन करते है, राम कथा सुनते है, परन्तु उन महापुरूषों ने क्या कहा, कैसे वो महान बने, उनके आदर्शों को जब तक हम अपने जीवन में धारण नहीं कर पायेंगे तब तक हम लकीर के फकीर ही रहेंगे। अर्थात् जब तक कर्मशीलता का भाव नहीं होगा तब तक हमारे जीवन में स्वः निर्माण की स्थितियां विकसित नहीं हो सकती।
शक्ति का भाव निरंतर और निरंतर प्रयत्नशील रहने से ही प्राप्त होता है। हमें स्वः निर्माण के लिये आवश्यक सभी तत्वों तथा शारीरिक संरचना पर भी अत्यंत सूक्ष्मता से ध्यान देना होगा। अर्थात् निरंतर प्रयत्नशील रहने के लिये उचित आहार की अत्यंत ही आवश्यक होती है। क्योंकि अनर्गल खान-पान से मानसिकता दूषित होती है। जैसा अन्न होता है वैसा ही मन होता है, इसी के साथ समुचित योग, प्राणायाम और गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र की शक्ति को निरंतर धारण करने पर ही श्रेष्ठता का मार्ग प्राप्त हो सकता है। कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करने से ही नहीं अपितु उसका समुचित भाव चिंतन कि कैसे वो आसुरी प्रवृत्तियों के विरूद्ध संघर्षरत रहे, शिक्षा के लिये सुदूर उज्जैन में सांदीपन आश्रम गये, आदि-आदि उनके जीवन चरित्रों का पालन करना पडेगा तभी हम श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकते हैं।
इसी प्रकार दशरथ चाहते तो राम और भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न की शिक्षा स्वः स्थान पर ही संपन्न हो सकती थी। परंतु चारों वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने के लिये गये साथ ही राम और लक्ष्मण ने विश्वामित्र से शस्त्र विद्या भी प्राप्त की परंतु चारों में राम सबसे अधिक पूजनीय रहे और मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाये अर्थात् उन्होंने अपने गुरु के आचरण को अपने जीवन में उतारा और उनके ही आदर्शों पर गतिशील रहें अर्थात् जिस प्रकार एक ही क्लास के पचास बच्चों को गुरु समान रूप से शिक्षा देता है, परन्तु उनमें सभी बालक प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण नहीं होते कुछ फेल भी हो जाते है कुछ द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते है और कुछ मेरिट में आ जाते हैं।
तात्पर्य यह है कि गुरु के ज्ञान और आदर्शों को जो अपने अंदर जितना समाहित कर सकता है, वो उतना ही श्रेष्ठ बन सकता है। तात्पर्य यह है कि जैसे बीज को वृक्ष बनने के लिये मिट्टी में समाहित होना पड़ता है, उसी प्र्रकार हमें भी गुरु और महान पुरूषों के ज्ञान और आचरण को निरंतर और निरंतर अपने में धारण करना पडे़गा। आज इस कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष रूप से रोहिणी नक्षत्र में और आज बुधवार भी है। बुध का मतलब है जीवन में सुस्थिति की ओर अग्रसर हो सकें, भाग्यशील स्थिति की ओर अग्रसर हो, वह श्रेष्ठ बुधवार (गणपति) दिवस कहलाता है। महामृत्युंजय का मतलब है जीवन में जो निरंतर-निरंतर हम अभावपूर्ण स्थितियां रोग-शोक कष्ट और कर्ज के रूप में हमें प्राप्त हो रही है, उन पर हम विजय प्राप्त कर सके अर्थात् अंधकार पूर्ण स्थितियों से प्रकाश पूर्ण स्थितियों कि तरफ अग्रसर हो सकें।
हमारे जीवन में मृत्यु पूर्ण स्थितियां, जैसे निरंतर कलह का वातावरण रहना, शत्रु से भय व्याप्त रहना, रोगों से ग्रस्त रहना, असम्मान की स्थितियां प्राप्त होना, धन हीनता रहना, हमारे कार्य में वृद्धि न होना, ये सब मृत्यु के प्रकार हैं। जीवन की अंधकार पक्ष से ज्योति की ओर अग्रसर होना महामृत्युंजय कहलाता है। जीवन में अकाल मृत्यु अर्थात् जो स्वभाविक मृत्यु के आने से पूर्व ही धन हीनता, रोग, कर्ज, शत्रु बाधा, निरंतर कलह, मानसिक कष्ट की स्थितियां होती हैं। ये सब स्वभाविक मृत्यु जो पच्चीस वर्ष बाद आयेगी, उससे पूर्व ही मृत्यु की तरफ अग्रसर करती हैं। उस क्षण-क्षण अभाव पूर्ण मृत्यु पूर्ण स्थितियों से निकलने को महामृत्युंजय कहते हैं। यह महामृत्युंजय दीक्षा एक प्रकार से सौभाग्य दीक्षा है, सौभाग्य अर्थात् कुस्थितियों का समापन। अष्ट लक्ष्मी चेतना अर्थात् जीवन में आरोग्य लक्ष्मी, वैभव लक्ष्मी, माधुर्य लक्ष्मी, अर्थात् हमारे कुटुम्ब में प्रेम हो, संतान आज्ञाकारी हो, शिक्षित हो, व्यापार में सहायक हो, धन पूर्ण वातावरण हो और इसके साथ ही हम पूर्ण रूप से धर्म, अर्थ, काम की स्थितियों को भोग सके इसके लिये पूर्ण आयु प्राप्त कर सकें। पूर्ण स्वस्थ रहें, हर प्रकार के सुखों को भोग कर सके, पूर्ण सौभाग्यशाली हो अर्थात् मृत्युंजय पूर्ण लक्ष्मी से युक्त हो।
माघ मास के शक्ति के विशेष दिवस गुप्त नवरात्रि के आद्या शक्ति काली के दिवस और वसन्त पंचमी के दिवस और विशेष रूप से इस नगरी की स्थापना की दिवस भी यही है इसी विशेष अवसर पर राजा रतन सिंह ने इसकी स्थापना सम्पन्न की थी। तो निश्चित रूप से इस महोत्सव का हमारे जीवन में कोई न कोई हेतु है और जीवन में क्रियायें भी हम अपनी हित और अनुकूलता की वृद्धि के लिये करते हैं, ऐसे श्रेष्ठ अवसर पर हमारे जीवन की शुष्कता और रूग्णता का भाव समाप्त हो सके और जीवन में प्रेम आनन्द का भाव और वसन्तमय स्थितियां खिल सकें। निश्चित रूप से हमारे जीवन में जो सद्गुरु का भाव है उसी के अनुरूप स्थितियां निर्मित होती हैं। जहा सद्गुरु का चिंतन है, पूजन है, उनके प्रति नमन का भाव है वहां निश्चित रूप से वसंतमय स्थितियां आती ही हैं और जहां सांसारिक जीवन में अपने इष्ट एवं गुरु के प्रति नमन एवं प्रेम का भाव चिंतन नहीं है, वहां अशांतमय स्थितियां होती हैं। इसीलिये हमें यह निश्चय करना है कि हमे क्या चाहिये? ऐसे श्रेष्ठ वसन्तमय उत्सव के द्वारा हमारे जीवन में आनन्दमय स्थिति प्राप्त हो सके उसके लिये विशेष क्रियायें सम्पन्न करनी पड़ेगी। सिर्फ पीले वस्त्र पहनने से, पीले पुष्प चढ़ाने से वसंतमय स्थितियां नहीं आती हैं। वसंतमय स्थितियां स्वतः ही भीतर से उत्पन्न होती है और चेहरे तथा मन-मस्तिष्क पर आनन्द का भाव झलक जाता है।
ऐसी ही चेतना का भाव प्राप्त करने के लिये अभी मैं आप से मिलूंगा और जैसा आपका भाव चिंतन होगा, उस अनुसार मैं आपको क्रियायें सम्पन्न कराऊंगा। अपने गुरु, इष्ट, बन्धु और वृद्ध जनों के योग्य निर्देशों का श्रेष्ठ भावना अनुसार पालन करने से जीवन में अनुकूल स्थितियां निर्माण होता ही है। शक्ति के इन विशेष दिवसों पर हम वसन्तमय तथा गौरीमय स्थितियों को गुरु आज्ञा पालन के अनुसार ही क्रियाशील होकर आत्मसात कर सकते हैं। यही क्रिया और चिंतन देने के लिये गुरु ऐसे विशिष्ट अवसर पर रचनायें करते है। साधक के जीवन में निरंतर-निरंतर ऐसी ही आनन्दमय स्थितियों में वृद्धि हो और उनके जीवन से शुष्कता, रूग्णता और पतझड़ रूपी भाव समाप्त हो सके और जीवन में महादेव गौरीमय चेतना की वृद्धि हो सके। ऐसी क्रिया हम अभी आपस में बैठ कर एक-दूसरे के भावों को समझकर सम्पन्न करेंगे। हमारे भीरत में उमंग, उल्लास एवं रस तत्व का प्रादुर्भाव हो सके ऐसा ही मैं विशेष रूप से शुभ आशीर्वाद प्रदान करता हूं।
भीतर से भाव चिंतन आता नहीं है तो हमारे जीवन से दुर्गति समाप्त होती नहीं है। भीतर में शिव का भाव चिंतन आता नहीं है, तो शवपूर्ण स्थितियों से मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? हर-हर महादेव का तात्पर्य है कि हे महादेव मेरे पापों को हरना, केवल हर-हर महादेव करने से या शिव का भाव चिंतन रखने से हमारे स्थितियों में सुधार नहीं होगा। अपितु हमें यह चिंतन करना पड़ेगा कि अपने जीवन में शिव किस प्रकार क्रियाशील रहें। शिव और गौरी का चिंतन करने के पीछे तात्पर्य है कि मेरे जीवन में भी जो मलिनता का भाव है, शिव और गौरी के माध्यम से समाप्त हो सके, तो जीवन में दुर्गति और दुर्भाग्य की समाप्ति कर सकूंगा तब जीवन में सौभाग्य प्राप्त हो सकेगा।
सिर्फ माथे पर बिन्दी लगाने या सिंदूर लगाने से सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा। हजारों स्त्रियां इस प्रकार के क्रिया-कलाप करती है। फिर भी इनके जीवन में विपरीत परिस्थितियां और दुर्भाग्य बना हुआ है क्योंकि हम उस शिव गौरी के चिंतन के अनुसार क्रिया कलाप अपने जीवन में सम्मलित नहीं कर पाते। इसलिये कहा जाता है-
इसका तात्पर्य हम प्रत्येक प्रकार से सुख प्राप्त कर सकें और निरोगी रह सकें आरोग्यमय स्थितियां रहने से हमारे अन्दर शुद्ध विचार आयेंगे शक्ति का भाव आयेगा और उन विचारों को सही रूप से संचालित कर पाऊंगा और अपने जीवन की पशु पूर्ण स्थितियों से मुक्ति प्राप्त कर पाऊंगा। क्यों जब हम शक्ति की प्रार्थना करते है तो वन्दना करते हैं, तो हम कहते हैं-
अर्थात् हे भगवती आद्या शक्ति मैं ज्ञान से युक्त बनुं और मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूं। फिर हम प्रार्थना करते है-
अर्थात् हर रूप से शक्ति से युक्त हो सकूं इसलिये मैं आपको प्रणाम करता हूं फिर ज्ञान और शक्ति से युक्त होने के पश्चात् हम प्रार्थना करते हैं कि- या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः अर्थात् मैं अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकूं मेरे जीवन में जो भी कामनायें इच्छायें और लक्ष्य हैं, वो पूर्ण हो सके इसलिये मैं आपको नमस्कार करता हूं। ये तीनों प्रार्थनायें शक्ति से ही इसलिये की जाती है क्यों कि जीवन में ज्ञान, शक्ति और लक्ष्मी शक्ति से प्राप्त हो सकती है, जब तक शक्ति का भाव चिंतन नहीं होगा तब तक जीवन में पूर्णता प्राप्त नहीं होगी। ज्ञान बुद्धि और चेतना के द्वारा ही हम अपने लक्ष्यों और योजनाओं को निर्धारित करते हैं और शक्ति और लक्ष्मी के द्वारा लक्ष्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त कर पाते हैं। बुद्धि नहीं होगी तो सामाजिक ज्ञान कैसे होगा? किस प्रकार बात करनी है और आचरण करना है बुद्धि के द्वारा निर्धारित होता है। यह कोई वसन्त उत्सव सामूहिक रूप से नहीं मनाया गया कि सरस्वती की वन्दना कर ली और माघ मास की नवरात्रि के पीछे भाव चिंतन यह है कि शक्ति के माध्यम से ही जीवन में वसन्त पूर्ण स्थितियों का सृजन संभव है। वसन्त पंचमी मनाने से या पीले-लाल कपड़े पहनने से या पीले पुष्प अर्पण करने के पीछे उसके श्रेष्ठ भाव चिंतन को अपने जीवन में समाहित करने का भाव चिंतन होना चाहिये।
गुरु की चेतना कहती है कि जीवन की रूग्णता को समाप्त करना साधक और शिष्य को क्रियाशील करना उसको दक्ष करना, जीवन में जो कमियां और अभाव हैं उसके बारे में उसको उर्जा और चैतन्य चेतना का भाव देना है, मेरे जीवन में सुख पूर्ण स्थितियों का, अनुकूल स्थितियों का, आनन्द और हर्ष की स्थितियों का जीवन में समावेश हो सके। अभी कुछ दिन बाद नवरात्रि का पर्व आयेगा, गणपति का पर्व आयेगा, शिवरात्रि का पर्व आयेगा, लक्ष्मी पूजन का पर्व आयेगा तो क्या हम उन देवताओं की वन्दना नहीं करेंगे? तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार जीवन में ज्ञान, बुद्धि और लक्ष्मी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन में विभिन्न प्रकार के भाव शक्तियों का समावेश आवश्यक है, परन्तु साथ ही त्रिशक्तियों का सामंजस्य और संतुलन स्थापित होना भी आवश्यक है, क्यों कि बिना ज्ञान के शक्ति और लक्ष्मी व्यर्थ हैं। उसी प्रकार लक्ष्मी बहुत है पर ज्ञान, बुद्धि और कर्म शक्ति का अभाव है तो जीवन में लक्ष्मी का प्रवाह विनाश की ओर अग्रसर करता है।
महाकाली का तात्पर्य यह नहीं है कि कोई बहुत विकराल जिह्ना बाहर निकाले हुये काली और भयंकर मूर्ति अर्थात् हमारे जीवन के अनेक-अनेक दुःख रूपी शत्रु, अभाव रूपी शत्रु, रोग रूपी शत्रु, कष्ट रूपी शत्रु उनका हम शमन कालिका शक्ति की माध्यम से कर सकें और जीवन में गौरी पूर्ण स्थितियों अर्थात् प्रसन्नता, धवलता, हर्ष, उल्लास, उमंग और सौभाग्य का भाव उत्पन्न होगा।
महालक्ष्मी से तात्पर्य जीवन में महान-महान लक्ष्यों की पूर्ति से होता है। लक्ष्मी का तात्पर्य धन, यश, पुत्र, सम्मान, व्यापार वृद्धि भवन-निर्माण और विलास आदि सीमित अर्थों में ही समाहित नहीं है। ये तो मनुष्य जीवन के पड़ाव मात्र हैं, लक्ष्मी का तात्पर्य जीवन के महान लक्ष्यों और विशिष्ट कार्यों की सम्पन्नता से है। जीवन में सुयोगों का अवसर बहुत कम प्राप्त होता है अतः सभी व्यक्ति, श्रेष्ठ अवसर को प्राप्त करने का अवश्य प्रयत्न करें और अपने जीवन को महाकाली और महालक्ष्मी की शक्तियों से परिपूर्ण करें। उसी प्रकार वर्तमान समय रसपूर्ण स्थितियां प्राप्त करने का श्रेष्ठ समय है।
ऐसे अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिये कि हम आंतरिक रूप से गुरु और इष्ट के आदर्शों को अपने जीवन में चरितार्थ कर सके और निरंतर भीतर से रस पूर्ण और कर्मशील हो सके। भीतर का विद्वेष और कालिमा एक दिन में समाप्त नहीं होती। हमने जैसे उसे धीरे-धीरे एकत्र किया है वैसे ही वो धीरे-धीरे गुरु की शक्ति को अपने अंदर समाहित करने से अंदर विशेष प्रकार का प्रकाश तरंगित होता है। जिस प्रकार हमें शारीरिक शुद्धता के लिये रोज स्नान करना पड़ता है उसी प्रकार अध्यात्मिक उन्नति के लिये निरंतर और प्रति क्षण सजग रहना आवश्यक है। अधिकतर व्यक्ति भूत काल और भविष्य काल के विषय में कल्पना कर चिंतित रहते है, परंतु जो अपने वर्तमान के कार्यों का विश्लेषण करता है और कार्यशील होता है, वही श्रेष्ठ कहलाता है। विशेष रूप से चैतन्य दिवस गुप्त नवरात्रि का तात्पर्य यही है कि कई बार हमें ज्ञात ही नहीं होता कि आसुरी शक्तियां, पैशाचिक शक्तियां, तांत्रोक्त शक्तियां हमारे शरीर को घुन की तरह खोखला करती रहती हैं।
और जीवन में केवल और केवल निराशा, हताशा और उदासी और हर तरह की न्यूनताओं में वृद्धि होती रहती है और ज्ञात नहीं होता कि समस्यायें, न्यूनतायें, बाधायें क्यों बढ़ रही है? ऐसी पिशाच और तांत्रोक्त क्रियाओं को हम सामान्य रूप से नहीं देख पाते हैं। शरीर मेरा अस्सी साल का है और मन में चिंतायें बनी रहती हैं कार्य करने की इच्छा नहीं होती है, किसी से बात करने की इच्छा नहीं होती, मन में प्रसन्नता नहीं होती, जो मन में भाव व्यक्त करना चाहते है, व्यक्त नहीं होते तो निश्चित रूप से ऐसी गुप्त और पिशाच शक्तियां हमारे जीवन में बनी रहती हैं।
उनके निवारण के लिये विशेष रूप से गुप्त नवरात्रि का पर्व आता है, रात्रि का अर्थ होता है अंधकार का समय अर्थात जीवन में जो भी प्रकाश का भाव है, उल्लास का भाव है उसके विपरीत की स्थितियां। हमारे जीवन में न्यूनता समाप्त हो सके, अंधकार समाप्त हो सके और उज्ज्वलता प्रकाश और शक्ति का भाव आयें। उसका तात्पर्य यह गुप्त नवरात्रि है और इस रात्रि में कात्यायिनी का जो हर तरह का कष्टों का हरण कर सके। माघ मास का यह पर्व वसन्त पंचमी, नवरात्रि के मध्य में घटित हुआ है। इस तांत्रोक्त दिवस में हम निरंतर आसुरी शक्तियों का विनाश करने की विशिष्ट क्रियायें गुरु के संरक्षण में सम्पन्न करते हैं।
पंचदेवों की शक्तियों के माध्यम से हम अपने जीवन में उपलब्धियों को प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिये हम देवी-देवताओं के शरण में जाते हैं, उनकी वन्दना करते हैं, उनके मंत्र जप और साधनायें करते है, भाव यह है कि विशिष्ट तांत्रोक्त पर्व में तांत्रोक्त और पिशाच शक्तियों का उन्मूलन के पश्चात् ही श्रेष्ठता उज्ज्वलता प्राप्त हो सकती है। इसीलिये आज महाकाली, महालक्ष्मी और कात्यायिनी की दीक्षायें प्रदान की। जिससे जीवन के दुःख, कष्ट, अभाव न्यूनतायें, दुष्प्रवृत्तियां समाप्त हो सके और जीवन प्रकाश पूर्ण हो सके। उसमें उमंग और आनन्द का भाव विद्यमान हो सके और साथ ही साथ जिह्ना पर शक्तियों के बीज अंकन की क्रिया सम्पन्न करायी जिससे शक्ति का भाव चिंतन हमारे रक्त के कण-कण में समाहित हो सके और हम निरंतर वृद्धि की ओर अग्रसर हो सकें। हमारे कार्यों में सुफल की प्राप्ति हो, मनोकामनायें पूर्ण हो, हम ज्ञान, शक्ति, लक्ष्मी से युक्त हो सके।
जीवन में वाणी का महत्वपूर्ण स्थान है, इसके माध्यम से हम किसी के दिल में भी उतर सकते है और दिल से निकल भी सकते है। मैं आपको गाली दूंगा तो आपके दिल से उतर जाऊंगा, प्रेम से बात करूंगा तो आपके दिल में बस जाऊंगा। बोलने-बोलने का फर्क है। जितने भी जीवन में महात्वपूर्ण घटनायें घटी सब अनर्गल संभाषण के कारण घटी। कैकेयी ने राम को कठोर शब्द के माध्यम से वनवास भेज दिया, वाणी के कारण ही महाभारत का भीषण युद्ध घटित हुआ। कटु वचन के कारण अनेक राजाओं के राज चले गये।
वहीं सुवचनों के माध्यम से श्री कृष्ण जगद्गुरु कहलाये, हमारे भीतर के विचार ही मस्तिष्क में जाने के पश्चात वाणी द्वारा व्यक्त किया जाता है। अतः वाणी का विशेष महत्व है इसलिये शक्ति बीजों के अंकन की श्रेष्ठ क्रिया अवश्य संपन्न करे। जीवन में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका समाधान नहीं होता परंतु उस समस्या को हटाने का पूर्ण भाव चिंतन होना चाहिये। वर्तमान समय में प्रत्येक साधक स्वयं की अनर्गल क्रियाओं के माध्यम से अधोगति को प्राप्त करता है। जब कि जीवन में हम दैवीय शक्ति और आनन्द को प्राप्त करने के लिये उत्पन्न हुये हैं। आनन्द और देव शक्तियों को प्राप्त करने के लिये विशेष क्रियायें सम्पन्न करनी पडती हैं। अभी हमारे कार्य-कलाप हमारी भावना चिंतन के विपरीत है, हम श्रेष्ठ बनना तो चाहते हैं, पर क्रिया शक्ति का अभाव है। हम अपनी ढुल-मुल स्थितियों में ही जीना चाहते है। हम हर समय भविष्य की चिंता करते हैं, पर वर्तमान के कार्यों का पूर्ण लगन और निष्ठा के साथ संपादन नहीं करते हैं।
यह निश्चित जान लीजिये कि यदि कोई भी बालक अपने जीवन में पच्चीस वर्षों की आयु तक ज्ञान, बुद्धि और चेतना के साथ श्रेष्ठ कार्य करता है, तो उसके जीवन के अगले पचास वर्ष स्वयं ही श्रेष्ठ बनेंगे। इसके विपरीत जिसके जीवन के शुरुआत के प्रथम पच्चीस वर्ष कुटिलता, मक्कारी और अज्ञानता में व्यतीत होते हैं, उनका सारा जीवन नर्क पूर्ण हो जाता है। अब आप सब फैसला करें कि संतान को किस प्रकार की स्थिति में पालन पोषण करना है। आप सभी का जीवन सुस्थितियों की ओर अग्रसर हो सके, योग, शक्ति, माधुर्य से आप सम्पन्न हो सकें, यही आशीर्वाद् प्रदान करता हूं, मंगल कामना करता हूं—–!
परम पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली
उज्जैन शिविर म- प्र
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