





महाभारत युद्ध के समय अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों और आदरणीयों को देख कर मोह-ग्रस्त हो गये और युद्ध भूमि से पलायन करने के लिये अनेक तर्क दिये। कृष्ण जो अर्जुन के सारथी ही नहीं परम मित्र भी हैं, ऐसे समय में अर्जुन को कर्म योग का ज्ञान देते हैं। जिसे श्रीमद् भगवद् गीता के रूप में जाना जाता है।
सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रकार का युद्ध है, जो दो स्तर पर लड़ा जाता है- बाहर की परिस्थितियों से और अन्दर की अपनी वृत्तियों से, अर्जुन अपने सामने उपस्थित कर्म से भागना चाहते थे, परंतु कर्म से भागना सम्भव नहीं है, यदि मनुष्य कर्म से भाग रहा है, तो भी वह भागने का कर्म कर रहा है। लड़ रहा है, तो लड़ने का कर्म कर रहा है। खाना, पीना, उठना, बैठना, सोना, जागना सब कर्म के अंतर्गत ही आता है। कर्म तो तभी समाप्त हो सकता है, जब जीवन ही ना रहे। जीवन का एक भी क्षण कर्म के बिना व्यतीत नहीं हो सकता-
इस स्थिति में मनुष्य के सामने दो विकल्प होते हैं- कर्म का चुनाव करना और कर्म के प्रति अपना दृष्टिकोण परिमार्जित करना। दृष्टिकोण इसलिये परिमार्जित करना पड़ता है, क्योंकि कभी-कभी कर्म का चुनाव करना भी अपने वश में नहीं होता, वह उस परिस्थिति के अधीन होता है। यदि किसी जंगल में एक शेर किसी व्यक्ति पर हमला कर दे तो उस व्यक्ति के पास दो ही विकल्प बचते हैं- लड़ना या भागना। यदि व्यक्ति ऐसे स्थान पर हैं, जहां से भागा ही नहीं जा सकता तो मनुष्य को मात्र लड़ना ही पड़ता है। विकल्प शून्य की स्थिति जीवन में अनेक बार आती है। ऐसी स्थिति में कर्म के प्रति अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना ही उचित है।
गीता के इस सर्वाधिक लोकप्रिय श्लोक में कहा गया है- कर्म पर तुम्हारा अधिकार हो सकता है, फल पर नहीं। कर्म फल की प्राप्ति हेतु कर्म ना करो, अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति ना हो।
विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान का विकास चाहे जितना हो जाये, अन्ततः कर्म करने के दो ही प्रमुख उपकरण शरीर और मन होते हैं। मन की चंचलता और इसे नियंत्रित रखने की कठिनाईयों से सभी परिचित हैं। अर्जुन भी कृष्ण से कहते हैं- कि मन बड़ा चंचल एवं बलवान है। इसे वश में करना वायु को रोकने की भांति दुष्कर है। श्री कृष्ण अर्जुन के इस बात से सहमत तो होते हैं, पर वे कहते हैं-
निश्चित रूप से मन चंचल और कठिनाई से वश में आने वाला है, परंतु मन अभ्यास और वैराग्य द्वारा वश में आता ही है- अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते। प्रायः यह देखने को मिलता है कि कार्य करने का प्रमुख उपकरण मन मनुष्य के नियंत्रण में नहीं रहता। मन तो फिर भी मन है, हमारा शरीर भी हमारे नियंत्रण में नहीं रहता। हृदय, मष्तिष्क, गुर्दा आदि शरीर के महत्वपूर्ण अंग हमारी अनुमति के बिना ही कार्य करते रहते हैं। किसे पता है कि हमारा अमुक अंग कब कार्य करना बन्द कर देगा? कोई भी श्रेष्ठ कार्य करने की स्थिति तब ही बनती है, जब शरीर और मन दोनों सामान्य रूप से स्वस्थ हों, यदि मन ठीक नहीं तो भी श्रेष्ठतम कार्य नहीं कर सकते हैं, यदि मन ठीक है परंतु शरीर बीमार है, तो भी श्रेष्ठ कार्य करना संभव नहीं हो पाता। तात्पर्य यह है कि कर्म पर हमारा अधिकार निश्चित रूप से नहीं होता है, हम श्रेष्ठ कर्म को तभी कर सकते हैं, जब शरीर और मन का सहयोग प्राप्त हो।
इसीलिये श्री कृष्ण कहते हैं, कर्म पर तुम्हारा अधिकार हो सकता है, लेकिन कर्म पर तुम्हारा ही अधिकार है, यह भ्रम की स्थिति है। साथ ही श्री कृष्ण यह भी स्पष्ट करते हैं कि कर्म फल पर तुम्हारा अधिकार कदापि नहीं है।
अब आज के सामान्य व्यवहार में यह बड़ी ही असमंजस की स्थिति बनती है, कि यदि कर्म हम करते हैं, तो कर्मफल मिलना ही चाहिये। कर्म-सिद्धान्त भी यही कहता है कि कर्म अपना फल कर्मकर्ता को देता ही है। कर्म के गणित में निरस्तीकरण का नियम नहीं है, आपने यदि दस अच्छे और दस बुरे कर्म किये तो कर्मफल शून्य नहीं होगा। दस अच्छो कर्मों का अच्छा फल मिलेगा तथा दस खराब कर्मों का दस खराब फल, परंतु फल कब प्राप्त होगा? फल का स्वरूप क्या होगा? यह एक रहस्य है, कर्मों की गति बड़ी ही गहन है।
कर्म सिद्धान्त के अनुसार हर कर्म का फल होता है और श्री कृष्ण कहते हैं- कि कर्मफल पर तुम्हारा अधिकार कदापि नहीं है। सृष्टि में कर्म करने वाले हम अकेले नहीं हैं, सम्पूर्ण निसर्ग निरन्तर कुछ न कुछ कर्म कर रहा है, कर्म फल इन सारे कर्मों के प्रभाव से निर्धारित होता है। किसी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर कौन होगा? इसका निर्धारण प्रथम स्थान पाने वाला प्रतियोगी ही नहीं करता, अपितु सारे प्रतियोगियों का प्रयास इसका निर्धारण करता है। अर्थात् कर्म फल पर और कर्मों की भी भूमिका होती है। इस कारण जहां कर्म सिद्धान्त अटल है। वहीं श्री कृष्ण का यह कथन कि कर्मफल पर आपका अधिकार नहीं है, यह भी पूर्ण सत्य है।
इसीलिये यदि सफल होना है, तो अपना ध्यान फल पर नहीं, अपितु कर्म की भली-भांति परिपूर्णता पर रखना होगा। यदि फल पर ही ध्यान केंद्रित रहेगा तो इसके दो तरह से हानि होंगे- कर्म उत्तम प्रकार से नहीं हो पायेगा तथा फल नहीं प्राप्त होने पर कुण्ठा व विषाद उत्पन्न होगी। कर्म सिद्धान्त के अनुसार कर्मफल तो मिलना ही है, लेकिन कर्मफल ना मिलने से उत्पन्न होने वाली कुण्ठा, हताशा और विषाद से बचा जा सकता है।
श्री कृष्ण यह भी कहते हैं- कि अकर्म में तुम्हारी रूचि न हो, अर्थात् अकर्मण्यता, आलस्य, प्रमाद आदि से तुम मुक्त रहो। एक ऐसा व्यक्ति जो निरंतर कर्मशील है, परंतु कर्मफल की आशा से मुक्त है, यदि उसे कर्म के अनुरूप फल प्राप्त ना हो तो भी वह कुण्ठित, निराश और हताश नहीं होगा। इसीलिये फल की आकांक्षा का परित्याग तथा निरन्तर क्रियाशील रहना अत्यन्त श्रेष्ठ स्थिति है। यह स्थिति प्राप्त करना कठिन है, परंतु अंसभव नही। जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियां कठिनाई से ही प्राप्त होती है।
जीवन में सफलता प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति सफल नहीं होता। इसका कारण सफलता के प्रति उचित तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण का विकास अत्यन्त आवश्यक है। गीता में कर्म सिद्धि और सफलता के पांच कारण बताये गये हैं-
कर्म करने का क्षेत्र कर्म करने वाला कर्म करने का साधन विभिन्न प्रयत्न व चेष्टायें।
कर्म सिद्धि के चार कारण होते हैं- यदि हम गलत क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, तो हमारी सफलता संदिग्ध हो जाती है। इसलिये सफलता के आकांक्षी को कार्य क्षेत्र का चुनाव बहुत सोच-विचार कर करना चाहिये, यदि कर्म करने वाला पूरे मनोयोग से कार्य नहीं कर रहा है, तो भी परिणाम अनुकूल होना सम्भव नहीं होता। कर्ता की एकाग्रता, समर्पण तथा कर्म की गति परिणाम को प्रभावित करता है, कर्ता द्वारा प्रयोग में लाये साधन भी महत्वपूर्ण होते हैं, साधन भी कर्म, देश, काल तथा परिस्थितियों के अनुसार होने चाहिये और सब कुछ होते हुये भी यदि चेष्टायें न की जायें तो परिणाम आ ही नहीं सकता है। कभी-कभी व्यक्ति की सारी सम्भव चेष्टायें भी सफलता का सूत्र नहीं बन पाती हैं, क्योंकि सफलता का पांचवा कारण है- दैवं चैवात्र पंचमम्।
देव, भाग्य, प्रारब्ध, योग एक ऐसी अदृश्य शक्ति है, जिसकी भूमिका हमारे जीवन में अनिवार्य रूप से सम्मिलित है। कभी-कभी बहुत हाथ-पांव मारने पर भी कुछ प्राप्त नहीं होता। जब देव रूपी गुरु कृपा होती है, तो सफलता थोड़े प्रयास से ही मिल जाती है, अन्यथा हमारे सारे प्रयास निष्फल होते रहते हैं।
सफलता-असफलता का चक्र जीवन में चलता रहता है। हमें अपनी सम्पूर्ण चेष्टायें करनी चाहिये, पूरा प्रयत्न करना चाहिये। इसके बाद कर्म फल के रूप में जो भी प्राप्त हो, उसे प्रसाद समझ कर ग्रहण करना चाहिये। जिसे प्राप्त करने में प्रसन्नता का अनुभव हो, उसे ही प्रसाद कहते हैं।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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