





इसीलिये ऐसे विशिष्टतम अवसर पर श्रेष्ठ साधक सिद्ध चैतन्य स्थल अपने सद्गुरूदेव के सानिध्य में जीवन की सभी विपदाओं के समाप्ति हेतु हवन, पूजन, साधना, तांत्रोक्त दीक्षायें आत्मसात करने की क्रिया पूर्ण करते हैं। इसी दिवस पर सद्गुरुदेव शिष्यों के जीवन और बीते वर्ष की सभी बाधाओं, अड़चनो, कठिनाईयों, पाप-ताप, संताप, धनहीनता को होलिकाग्नि में भस्मीभूत करने की श्रेष्ठतम क्रिया सम्पन्न करते हैं। जो प्रत्येक वर्ष गुरुधाम की चैतन्य भूमि जोधपुर में सम्पन्न होता है, इसी क्रम में इस वर्ष जीवन के सभी संताप, दुख, तंत्र-शत्रु बाधाओं, धनहीनता के शमन हेतु विशिष्ट तांत्रोक्त धूम्र विलोचन नृसिंह भैरव साधनात्मक क्रिया परम पूज्य सद्गुरूदेव होलाष्टक की रात्रि में होलाग्नि प्रज्ज्वलित कर सिद्धाश्रम शक्ति तेज पुंज युक्त क्रियायें प्रत्येक साधक को सम्पन्न करायेंगे। जिससे प्रत्येक साधक के जीवन से सभी पाप, दोष, विकार, न्यूनता, धनहीनता, जड़ता, बाधा, रोग, व्याधि, पीड़ा होलाग्नि के तेज में भस्मीभूत हो सकेगा। ऐसी चैतन्य साधनात्मक क्रियायें सम्पन्न कर साधक पूर्ण रूप से सहस्र लक्ष्मी को चिरस्थायित्व कर सकता है और जीवन को उच्च स्थिति में स्थिर कर सकेगा।
एक बार कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती अपने स्वामी शिव के साथ बैठी हुई थीं। उन्हें वहाँ बैठे हुये अत्यधिक समय व्यतीत हो चुका था और पार्वती को क्षुधा लग रही थी। अतः उन्होंने शिवजी से कहा कि मुझे भूख लग रही है, किन्तु शिवजी मौन ही रहे। जब कई बार कहने पर भी कोई उत्तर प्राप्त न हुआ तो भगवती पार्वती ने शिवजी को उठाकर निगल लिया। ऐसा करने पर उनकी देह से धूम्र-राशि निकलने लगी, अतः उन्हें धूम्रा तथा धूमावती कहा जाता है। मां धूमावती दस महाविद्याओं में श्रेष्ठ महाविद्या मानी जाती है। निरन्तर क्षुधा से व्याकुल होने के कारण अपने साधकों के पाप दोषों व तंत्र बाधाओं का भक्षण कर समाप्त करती हैं।
धूमावती की कथा में तो दो बातें विशेष रूप से हैं, प्रथम तो यह दुर्गा की विशेष कलह निवारिणी शक्ति है, दूसरी कथा के अनुसार यह पार्वती का विशाल एवं रूक्ष स्वरूप है, जो क्षुधा से विकलित कृष्ण वर्णीय कलहकारी, कुटिल रूप है, जो भक्तों को अभय देने वाली तथा उसके शत्रुओं के लिये साक्षात् काल स्वरूप है, जहां धूमावती साधना संपन्न होती है वहां इसके प्रभाव से शत्रु नाश, बाधा नाश निश्चित रूप से होता है। इसके साथ ही साथ समस्त पाप दोष से मुक्ति मिलती है और कामनाओं की पूर्ति होती है।। धूमावती साधना मूल रूप से तांत्रिक साधना है, भूत-प्रेत पिशाच तो धूमावती साधना से इस प्रकार गायब होते हैं, जैसे जल को अग्नि देने पर वाष्प रूप में विलीन हो जाता है। धूमावती का स्वरूप क्षुधा अर्थात् भूख से पीडि़त स्वरूप है और इसे अपने भक्षण के लिये कुछ न कुछ अवश्य चाहिये। अतः जब साधक इसकी साधना करता है तो वह प्रसन्न होकर साधक के शत्रुओं का भक्षण ही कर लेती है।
मानव आज अपना जीवन यापन कठिन परिस्थितियों में रहकर कर रहा है, चाहे वह किसी संस्था में कार्यरत हो या व्यवसाय कर रहा हो अथवा स्वतंत्र क्षेत्र में कार्य कर रहा हो, हर क्षेत्र में कठिनाई, बाधायें, शत्रु बाधा एवं प्रतिस्पर्धा आदि चुनौतियां हर पल व्यक्ति को पराजित करने के लिये तत्पर रहती हैं। इन सब कारणों की वजह से व्यक्ति हर पल अपने सम्मान की रक्षा के लिये चिन्तित रहता ही है। इसके समाधान एवं अपने क्षेत्र में निष्कंटक प्रगति के लिये प्रबल दैवीय संरक्षण प्राप्त होना, आज के इस भौतिकवादी वातावरण में नितांत आवश्यक हो गया है।
दैवीय संरक्षण कैसे प्राप्त हो, इसके लिये साधक को थोड़ा सा प्रयास करने की एवं उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इन दोंनों की समन्वित क्रिया से साधक दैवीय कृपा प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। वैसे भी प्रत्येक देवी, देवता मनुष्य को हर पल, हर क्षण, रक्षा-सुरक्षा प्रदान करने के लिये तत्पर रहते हैं, आवश्यकता केवल इस बात की है, कि हम उनसे सहयोग एवं आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रबल भावना एवं पात्रता रखें।
जीवन में चाहे भौतिक पक्ष में उन्नति की बात हो अथवा आध्यात्मिक उन्नति एवं पूर्णता प्राप्त करने की बात हो, उसमें महाविद्या का महत्व सर्वोपरि है। अलग-अलग कार्यों हेतु शिव के वरदान स्वरूप उनकी शक्ति स्वरूप से इन दस महाविद्या की उत्पत्ति मानी गयी है, जिनकी साधना साधक अपनी समस्या के निवारण के लिये उचित मुहूर्त पर सम्पन्न कर सफल व्यक्ति बनकर अपने जीवन में निरन्तर प्राप्त हो रही बाधाओं को शमन कर उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।
होलिका अग्नि पर्व है क्योंकि हम उस अग्नि की पूजा करते है, जिससे साधना के बल पर होलिका देवी भक्त प्रहलाद को अपने गोद में लेकर बैठी, लेकिन अग्नि ने उन्हें अपने प्रभाव से मुक्त रखा, यह साधना, तपस्या और प्रभु कृपा का फल है। जो अग्नि पूजक तांत्रिक होते है उनके कई उदाहरण मैंने देखे हैं, कि वे जलते हुए अंगारों पर इस प्रकार चलते है मानों सामान्य जमीन पर चल रहे हो। होलिका दहन के समय जो चारों ओर खड़े रहकर उसकी पूजा करते है, उन्हें उस विशिष्ट अग्नि के ताप से शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके जीवन के दोष शांत होते है, आवश्यकता है मन में सच्ची श्रद्धा और विश्वास की।
यह सम्पूर्ण सृष्टि जिसका प्रत्येक कण दूसरे कण से जुड़ा है और ईश्वर के माध्यम से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में तादात्म्य हुआ है, यदि पूरे विश्व में कहीं पर भी कोई हलचल होती है तो सचेत साधक को वह स्पर्श अवश्य करती है। यह स्थिति साधना के माध्यम से कोई भी प्राप्त कर सकता है। अंतर केवल इतना होता है कि जहां सफल या सिद्ध साधक प्रत्येक क्षण का महत्व जानता है और तर्क-कुतर्क छोड़कर अपने गुरु के बताये ढंग से साधना में गतिशील रहता है, वहीं आम व्यक्ति अपना अधिकांश समय और ऊर्जा आलोचना व संदेह में गवां देते है। वास्तविक साधक जानता है कि उसे किस क्षण कौन सी साधना करनी चाहिये और वह प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों के प्रति चौकन्नी दृष्टि रखते हुये तंत्र साधनाओं की ओर गतिशील होता है।
शास्त्र अनुसार होलाष्टक से होली तक का समय एक विशेष तांत्रिक समय है। जिस समय विशेष साधनायें सम्पन्न कर अपनी वर्षो की मनोकामनाओं को पूर्ण किया जा सकता है। होलिका दहन की अग्नि में प्रज्ज्वल तेजस्विता से भूत-प्रेत, नजर दोष, बाधायें भस्मीभूत हो जाते हैं। परन्तु आवश्यक है कि हम उस प्रक्रिया को समझ सके, जान सके जिससे हमारे जीवन की भी न्यूनताओं का शमन हो सके।
यह होली का पर्व हर दृष्टि से साधक के जीवन में से दुःख कष्ट, शत्रु बाधा, भूत-प्रेत, तंत्र बाधा निवारण के लिए और पूर्णता प्राप्त करने का सिद्ध मुहूर्त है। ऐसे श्रेष्ठ मुहूर्त में साधना और शक्तिपात दीक्षा प्राप्त की जाये तो जीवन सफल होता ही है। इसमें कोई संदेह नहीं।
धूम्र विलोचन नृसिंह भैरव की क्रियात्मक चेतना साधक के जीवन को पूर्ण निर्भय बनाती है और जीवन में आनन्द, सुख, सौभाग्य की पूर्णता प्राप्त होती है। इसी हेतु होलिका के सुश्रेष्ठतम अवसर पर धूम्र विलोचन नृसिंह भैरव होलिका महोत्सव 11-12 मार्च को कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में सम्पन्न होगा। जिससे साधक की कामनाओ एवं इच्छायें पूर्ण होकर जीवन में सौन्दर्य, सम्मोहन, वशीकरण, निर्भयता, शत्रु दमन और अक्षुण्ण धन वैभव के साथ नृसिंहत्व चेतना शक्ति पूर्णता से आत्मसात कर सकेंगे।
आप सभी का कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में हृदय भाव से स्वागत है——–!
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