





अग्नि बिलकुल ही इसके विपरीत है, ऊर्ध्वगामी उसका पथ है। आकाश की ओर ही दौड़ती चली जाती है। कहीं भी जलायें उसे, कैसे भी रखें, दीपक को उलटा भी लटका दें तो भी ज्योति, शिखा ऊपर की तरफ ही भागेगी। चेतना दोनो तरह से बह सकती है, पानी की तरह भी और अग्नि की तरह भी। अधिकांश मनुष्य पानी की तरह बहते हैं। नीचे की ओर, हमारी चेतना नीचे उतरने का मार्ग पाते ही तत्काल ऊपर की सीढ़ी छोड़ देती है, होना चाहिये अग्नि की तरह पर हम हैं पानी की तरह। हमारा चिंतन अग्नि की तरह होना चाहिये, जरा अवसर मिले, नीचे का रास्ता छोड़ दें, पंख फैलाकर आकाश को समेट लें अपनी बांहो में।
ऊपर की यात्रा साथ ही साथ भीतर की भी यात्रा है और ठीक उसी तरह नीचे की यात्रा बाहर की भी यात्रा है। ऊपर-भीतर, नीचे-बाहर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। जितने भीतर जायेंगे, उतने ही ऊपर चले जायेंगे, जितने बाहर जायेंगे, उतने नीचे चले जायेंगे। अस्तित्व की दृष्टि से ऊपर और भीतर एक ही अर्थ है, भाषा की दृष्टि से नहीं। जिन लोगों ने भी भीतर की यात्रा की, उनका अंधेरा कम होता गया, ज्योति बढ़ी, प्रकाश बढ़ा। अग्नि में एक और गुण है, उसका यह स्वभाव है, जो शुद्ध होता है, बचा लेती है, अशुद्ध को जला देती है। सोने को अग्नि में डाल दें, तो जो अशुद्ध है उसे जला देती है और शुद्ध बचा लेती है, शुद्ध निखर आता है, इसलिये अग्नि परीक्षा बन गयी, अशुद्ध को जलाने के लिये, शुद्ध को बचाने के लिये। अग्नि प्रतीक है, इस बात का कि जो अशुद्ध है, उसे जला देगी, शुद्ध को बचा लेगी। यह अग्नि का स्वभाव है, शुद्ध को बचाने के लिये आतुर रहती है।
हमारे भीतर बहुत कुछ अशुद्ध है, इतना ज्यादा अशुद्ध है, कि शुद्ध का पता ही नहीं है। कहीं होगा छिपा हुआ शुद्ध। गुरु बताये भी कि भीतर तुम्हारे स्वर्ण भी है, तो सभी कंकड़-पत्थर के सिवा कुछ पाते ही नहीं है, इतना अन्दर छिपा हुआ है कि मिट्टी-कचरे के अलावा कुछ मिलता ही नहीं और जिस स्वर्ण पर ज्यादा कालिमा हो, जो ज्यादा काली हो, उसे ज्यादा देर तक अग्नि में तपाना पड़ता है। ये स्वर्ण जो मुझे मिले है, वे कोयले की खान से मिले हैं, कोयले की पूरी कालिमा उनमें समाहित है, उस कालिमा के बीच कहीं स्वर्ण दबा होगा, इसीलिये कोयले को तपाना पड़ता है, जब तक स्वर्ण ना मिल जाये। तप का यही तात्पर्य है कि हम इतनी अग्नि से गुजरे कि जो भी अशुद्ध है, वह जल जाये और जो भी शुद्ध है, वह बच जाये। इसलिये ज्ञानी, चेतनावान साधक कहते हैं, कि हे अग्नि, हे देव, मुझे सन्मार्ग पर ले चल। मुझे कुछ पता नहीं कि क्या रास्ता है! मुझे यह भी पता नहीं है कि शुभ क्या है, क्या अशुभ है! मैं अज्ञानी हूं, तू मुझे ले चल।
देवता कौन? देवता वही है, जो दिव्य है, इतना ही नहीं, जो दिव्य की ओर ले जाता है, जो दिव्य की ओर उन्मुख करता है, वह देवता है। इसलिये लोगों ने कहा गुरु देवता है, जहां दिव्यता की ओर इशारा मिल जाता है, संकेत मिल जाता है, जिसके पास पहुंच कर असीम शांति की अनुभूति होती है, जिसके पास बैठने से हृदय की वीणा झंकृत हो जाये, वही देवता है। जो साधक यह पुकार करता है कि हे देव! मुझे सन्मार्ग पर ले चल, तो यह पुकार ही सन्मार्ग की तरफ जाने का मूल आधार बनती है। यह पुकार असाधारण है, क्योंकि हमारी प्रत्येक वृत्ति, हमारी प्रत्येक वासना, हमारी प्रत्येक इच्छा असद् मार्ग की तरफ ले जाती है। इसके लिये प्रार्थना नहीं करनी पड़ती है, पुकारना नहीं पड़ता। इसके लिये प्रकृति ने हमें काफी उपकरण दिया है, वह अपने आप हमें ले जाती है। नीचे की तरफ उतरना हो तो किसी पुकार, किसी प्रार्थना की कोई भी आवश्यकता नहीं है। अंधेरे की तरफ आपको आपकी प्रकृति ले ही जाती है, ले ही जा रही है। आपके अपने ही कर्म लिये जा रहें हैं, आपकी आदतें और संस्कार लिये जा रहे हैं।
और ऐसा भी नहीं है कि कोई देवता आपको सन्मार्ग की तरफ ले जायेगा। इस भ्रांति में मत रहना। सन्मार्ग की तरफ जाना तो आपको ही है। लेकिन यह प्रार्थना आपको जाने में समर्थ बनायेगी। यह प्रार्थना आपके भीतर के द्वार तोड़ देगी, यदि यही प्रार्थना सघन हो जाये, घनीभूत हो जाये, अगर प्यास और पुकार बन जाये और रोयां-रोयां चिल्लाने लगे, श्वास-श्वास कहने लगे कि ले चल मुझे सद्गुरु प्रभु! उर्ध्वगमन की ओर, ऊपर की ओर। तब आप पूरे साधक हो जायेंगे साधना में लीन हो जायेंगे, आपके सारे बहाने समाप्त हो जायेंगे, फिर समय मिल जायेगा साधना के लिये, प्रभु का स्मरण करने के लिये। साधना के द्वारा जब प्राण का रोयां-रोयां कंपित होने लगे, हृदय की धड़कन-धड़कन आंदोलित होने लगे, रात के स्वप्न भी उससे प्रभावित होने लगे, वह आपकी धुन बन जायें, तब आप स्वयं अनुभव कर सकेंगे सद्गुरु को, अपने निकट अनुभव कर पायेंगे, बिलकुल आत्मा और प्राण की भांति। लेकिन उसके पहले आपको पहल करनी पड़ेगी, साधना करनी पड़ेगी।
आप स्मरण रखना आपकी साधना करने कोई और नहीं आयेगा, अपनी साधना से ही आप बदल सकते हैं, आपका रूपांतरण हो सकता है। साधना करना ही अपने आप में फल है, इसलिये फल मत देखना कि साधना तो कर ली अब फल कब प्राप्त होगा? साधना तो स्वयं में ही फल है। इसलिये साधना करके चुपचाप भूल जाना। आप साधना कर सके, यही बहुत बड़ी बात है। आप साधना प्रारम्भ कर सको, यही अपने आप में आपके जीवन का बहूमूल्य फल है, क्योंकि साधना करना कोई साधारण क्रिया नहीं है, यह तो असाधारण है। वर्षो बीत जाते हैं, केवल यह सोचने में कि कल से साधना प्रारम्भ करुंगा, और आज तक कल आया नहीं, ना ही आपकी साधना प्रारम्भ हो पायी। हो सकती है, बस थोड़ा सा स्वयं को व्यवस्थित करना है, थोड़ा सा जीवन के भाग-दौड़ में सामंजस्य बनाना है।
जो ऐसा करने में सफल होते हैं, उन्हें साधना की महत्ता ज्ञात होती है, वो ये जानते हैं, कि गुरु क्या होता है? कितनी अनुकम्पा उनकी है। वह साधक परिचित हो जाता है, जीवन के रहस्यों और अपने लक्ष्य की ओर गतिशील होता है, वह संसार में रहते हुये भी सारे क्रिया-कलापों में सम्मलित होते हुये भी अपने लक्ष्य पर, उर्ध्वगति प्राप्त करने के लिये तटस्थ होता है। नारायण सद्गुरुदेव के आशीर्वाद स्वरूप अमृत तो बरस रहें हैं, लेकिन लोग अपना घड़ा उल्टा रखकर बैठें हैं। ऐसा नहीं है कि जिस दिन घड़ा सीधा होगा, उसी दिन अमृत बरसेगा, कृपा बरसेगी, अमृत तो उस दिन भी बरस रहा था, जिस दिन आपका घड़ा उल्टा था, और वहां भी बरस रहा था जहां कोई घड़ा नहीं था।
परमात्मा रूपी सद्गुरुदेव का तो स्वभाव ही कृपा है, अमृत उनका स्वभाव है, वे तो बरस ही रहें हैं। वे सतत् बरस रहें, हमारी ही मटकी उल्टी है। अहंकारी मटकी को उल्टा रखकर बैठता है और भरने की कोशिश करता है। मटकी को सीधी रखने का मतलब है, मैं ना कुछ हूं, इसकी घोषणा करना। जब मटकी सीधी होती है तो भीतर का खालीपन ही तो प्रगट होता है। उल्टी मटकी अपने भरे होने का भ्रम पैदा कर लेती है, सीधी होकर मटकी को पता चलता है कि मैं तो सिवाय खालीपन के और कुछ भी नहीं हूं, और जब यह भाव आता है कि मैं कुछ भी नहीं हूं, तभी शिष्यता का पहला कदम प्रारम्भ होता है। तब उस मटकी में कुछ भरा जा सकता है।
फिर कृपा उसमें भर जाती है, क्योंकि मटकी सीधी हो गयी। यद्यपि आप मटकी सीधी ना करें तो उसकी कृपा का अनुभव कैसे कर पायेंगे। आपकी ही कृपा है कि आपने मटकी सीधी रखी और अपने आप पर कृपा करना ही साधना है, मंत्र जप है और आप स्वयं पर कृपा करो, साधना में प्रवेश करो, इतना तो आपको करना ही चाहिये।
नववर्ष की नूतन चेतना आपके रोम-रोम को जाग्रत कर आनन्द का संचार कर सके, आपकी संकल्प शक्ति में और अधिक दृढ़ता आये, आप अपने प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर सकें, जीवन मार्ग पर सचेत होकर अपने लक्ष्य पर तटस्थ रह सके, आपके चिंतन, विचार सद्गति की ओर अग्रसर हों, आप ऊर्ध्वगामी बने, मैं इस पथ पर आपके साथ हूं, आपका सहयोगी हूं, आपके मार्गदर्शक के रूप में सदा आपके लिये।
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