





प्राचीन समय में ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिये ऋषि मुनियों के सिद्धाश्रम, विद्यापीठ, गुरुकुल, गुरुधाम आदि थे जो श्रद्धा को प्रतिष्ठित करने की कोशिश में लगे थे तथा श्रद्धा हमारे रक्त कण-कण में स्थापित हो गयी थी जिसे तुम बडी सरलता पूर्वक स्वीकार कर लेते थे तुम्हें कोई प्रयास नहीं करना पडता था अपितु संदेह करना उस समय बड़ा असंभव था।
सामान्य मनुष्य ही नहीं राजा भी श्रद्धा करते थे गुरुओं पर, तभी राजा दशरथ ने अपने बाल कुमारों-राम व लक्ष्मण को समर्पित कर दिया था विश्वामित्र को। बड़े-बड़े राक्षसों को मृत्युदण्ड देने के लिये। कहां वे बाल कुमार तथा कहां भयंकर राक्षस। लेकिन विजय श्रद्धा की होती है और दोनों बालकों ने राक्षसों को समाप्त कर डाला तथा साथ ही सुफल भी दिया गुरु ने सीता के रूप में।
आज के युग में हम पहली क्लास से लेकर अन्तिम कक्षा तक संदेह ही विकसित करते है क्योंकि कोई विचार संदेह के बिना उत्पन्न नहीं होता यदि कोई विचार करे तो संदेह करना ही चाहिये। प्राचीन समय में मन का आधार श्रद्धा थी, आज मन का आधार संदेह है, उस समय श्रद्धा ऐसे ही सहज थी जिस प्रकार आज संदेह सहज है। युग परिवर्तन के साथ-साथ मन का भी बदलाव हुआ है विज्ञान की उन्नति के साथ-साथ संदेह भी प्रतिष्ठित हुआ, क्योंकि विज्ञान का जन्म संदेह से हुआ है श्रद्धा पुराने समय में प्रतिष्ठित थी, आज संदेह प्रतिष्ठित है जैसे श्रद्धा धर्म की नींव है उसी प्रकार संदेह भी विज्ञान की नींव है। और विचार करेंगे तो ही संदेह उत्पन्न होगा। इसी प्रकार श्रद्धा करेंगे तो ही निर्विचार हो पायेंगे किसी पर श्रद्धा करेंगे तो ही विश्वास होगा उस पर और कोई संदेह हमारे मन में नहीं आ पायेगा। हम निश्चित होंगे उसके प्रति। और विज्ञान के अधिक विकसित हो जाने पर वस्तुओं का, भोग-विलास आदि के उपकरणों की अधिकता हो जाती है अर्थात् मनुष्य उनकी और भागता है यह बाहर की यात्रा होती है लेकिन जब ज्ञान बढ़ता है तो मनुष्य अपने अन्तर की यात्रा करता है।
आज हमें किसी बात को स्वीकार करने में बड़ा समय तथा प्रयत्न करना पड़ता है हमारे अन्दर-ही-अन्दर एक कशमकश, एक उलझन सी मची रहती है कि पता नहीं यह व्यक्ति ठीक है अथवा धोखा है और श्रद्धा अपनी जगह सही है और संदेह भी अपनी जगह ठीक है लेकिन ज्ञान में, धर्म में श्रद्धा ही प्रमुख है श्रद्धा के बिना तुम साक्षात्कार नहीं कर पाओगे।
ज्ञान प्राप्त करने के भिन्न-भिन्न प्रकार के मार्ग है उनमें से एक मार्ग है ‘श्रवण’ अर्थात् सुनना किसी बात को सुनना। गुरु के वचनों को सुनना। इतिहास में अनेक उदाहरण है जो श्रवण के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त कर गये। भगवान बुद्ध के, भगवान महावीर के कुछ शिष्य भी श्रवण अर्थात् उनकी वाणी को सुन कर बुद्धत्व को उपलब्ध हो गये। लेकिन यह उस समय की बात है जब साधक गुरु के पास अनेक वर्ष सेवा करके, गुरु से, स्वयं का ताल-मेल स्थापित करता था। एक आन्तरिक संबन्ध बनाता था। अपने हृदय के तारों को गुरु के हृदय के तारों से जोडने की क्रिया करता था उसके लिये गुरु आज्ञा ही सर्वस्व होती थी। यह सब श्रद्धा के कारण ही संभव होता था। दोनों के बीच अप्रत्यक्ष रूप से, अदृश्य रूप से एक सूक्ष्म किरण के द्वारा संबन्ध जुडा होता था यदि गुरु को कोई पीडा होती थी तो शिष्य को भी पीडा होती थी तथा यदि शिष्य किसी संकट में होता था तो गुरु को भी पता चल जाता था और वे दूर होने पर भी शिष्य के संकटों का समाधान कर देते थे। ऐसा आज भी संभव है केवल आवश्यकता है तो केवल श्रद्धा एवं विश्वास की।
यह सब एक दिन में नहीं हो जाता था। यह सब, कुछ वर्ष सेवा के द्वारा शिष्य स्वयं को शुद्ध करके गुरु का ही प्रतिरूप बन जाता था। तब उसे किसी साधना की आवश्यकता नहीं होती थी। केवल गुरु के वचन सुनने मात्र से गुरु का ज्ञान शिष्य में उतर जाता था। केवल श्रवण मात्र करना ही साधना थी लेकिन आज जिनसे हम प्रेम करने की बात करते है उनसे भी हम आन्तरिक रूप से जुडे हुये नहीं है जिन्हें हम अपना निकटवर्ती कहते है उनसे भी दूरी मालूम पड़ती है। सद्गुरु की समीपता का, उनकी निकटता का लाभ तुम्हें तभी मिल सकता है
जब तुम इसके लिये तैयार होते हो, उनके पास जाने से पहले ही किसी पक्षपात की धारणा मन में मत पालिये, निर्मल हृदय से, कुछ प्राप्त करने की भावना से उनकी शरण में आदर व नम्रता पूर्वक जाइये तथा आपको जो अच्छा लगे उसे आत्मसात् करें तथा जो रूचिकर न लगे तो निर्णय लेने में शीघ्रता न करें। हो सकता है जो बातें आपको पसंद न आयी हो वहीं बातें अन्यों के लिये हितकर हो। चैतन्य होकर उनका दर्शन करें। उनकी प्रत्येक मुद्रा पर पूरा-पूरा ध्यान दें, प्रसंगानुकूल केवल वहीं प्रश्न पूछे जिन्हें पूछना आवश्यक हो। श्रद्धा का अर्थ है विश्वास, दूसरे पर विश्वास करना। सद्गुरु पर विश्वास, ईश्वर पर, किसी पर भी। दूसरे पर इतना अधिक विश्वास करना कि वह जो कहें वह घटित हो जाये तो श्रद्धा कहलाती है। और जब श्रद्धा चुक जाये तो केवल स्वयं पर ही विश्वास रह जाता है और फिर साधना ही स्वयं को विश्वास दिलाती है अब स्वयं परिश्रम करना पड़ेगा दूसरे से कोई सहायता नहीं मिलेगी।
आज के युग में साधना करने की आवश्यकता है, प्राचीन समय में श्रद्धा प्रमुख थी पहले श्रवण मात्र से काम चल जाता था शास्त्रों में वर्णित है कि राम का नाम लेने से ही, सुनने से ही कायाकल्प हो गया तब सरलता थी तथा श्रद्धा ही प्रमुख थी जिन्हे लाभ हुआ है वह आन्तरिक रूप से तैयार थे। केवल मात्र नाम की चिंगारी भी श्रद्धा रूपी बारूद में आग लगा देती थी। नाम श्रवण का लाभ लोग ले लेते थे लेकिन अब तो संदेह रूपी घडा जो भरा हुआ है वह श्रद्धा उत्पन्न ही नहीं होने देता अतः स्वयं पर भरोसा रख कर और साधना करके अनुभव कर लो।
यदि तुम एक अंधेरे कमरे से कुछ समय पश्चात् निकल कर एकदम से बाहर प्रकाश में आओं तो तुम्हारी आंखे प्रकाश में भी कुछ देर तक कोई दृश्य नहीं देख पाती। आंखे झपक जाती है। इसी प्रकार जिस संसार को तुम अनेक-अनेक जन्मों से देखते आ रहे हो, यदि सब को सद्गुरु अपने शक्तिपात से तुरन्त विलीन भी कर दे तो यह जगत तो विलीन हो जायेगा परंतु तुम्हारे आंखे ईश्वर को नहीं देख पायेगी। क्योंकि बहुत समय से तुम्हारी आंखे अंधेरे को देखने की अभ्यस्त जो होती है। अतः साधना करने से तुम्हारे आंखे, तुम्हारा मन परिपक्व होता है क्योंकि तब प्रकाश का धीर-धीरे आगमन होता है साधना करने से क्षमता का विकास होता है अन्यथा उस ईश्वर के विराट स्वरूप के दर्शन तुम्हारी आंख नहीं सह पायेगी। साधना द्वारा श्रद्धा की जो कमी तुम्हारे भीतर है वह पूरी हो जाती है। जो श्रद्धा की जगह खाली होती है वह साधना से भर जाती है।
आज के युग में प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक मनुष्य संदेहास्पद प्रतीत होता है जबकि प्राचीन समय में ऐसा नहीं था तब श्रद्धा और विश्वास अधिक मात्र में था तथा संदेह की कोई संभावना नहीं होती थी लेकिन इस कलि काल में मनुष्य सद्गुरु के रूप को, संत के रूप को किस प्रकार पहचान करें, आंकलन करें इसका क्या मापदण्ड है यह बड़ा कठिन सा प्रतीत होता है। लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों ने इस सब की पहचान हो। इसके लक्षण, व्यवहार आदि से कर हमें बताकर उपकार ही किया है।
सद्गुरु इस संसार में ईश्वर के कार्यकर्ता के रूप में आते है जो मानव में ईश्वर के प्रति चेतना उत्पन्न कर उन्हें साधनाओं के मार्ग पर अग्रसर कर समाधि का अनुभव कराकर ईश्वर से साक्षात्कार कराते है। वे स्वयं ईश्वरमय होते हैं, साक्षात्कार प्राप्त होते हैं वे इस पृथ्वी पर देव तुल्य हैं, वह हीरे-जवाहरात को भी कंकड पत्थर के समान समझते है सुख व दुःख में सम रहते हैं। वे केवल ईश्वर को जानते ही नहीं बल्कि स्वयं ईश्वर का प्रतिरूप होते हैं। और ईश्वर भी स्वयं सद्गुरु में अपनी अनंत शक्ति, अपना अनंत ज्ञान तथा परमानन्द एवं अपने दिव्यता आदि को दर्शाते है। ईश्वर की ओर उर्ध्वगत होने वाले मनुष्यों के लिये सद्गुरु सीढ़ी बन जाते हैं तथा शिष्य के सभी भार को स्वयं के ऊपर ले लेते हैं। सद्गुरु के कदम तथा उनकी परछाई भी जिस स्थान पर पड जाती है वह स्थान भी तीर्थवत् बन जाते हैं।
सद्गुरु अपने शिष्यों के पाप-दोषों का निवारण उसी प्रकार करता रहता है जैसे एक माली किसी पौधे के आस-पास उगे हुये खरपतवार की कटाई-छटाई कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। सद्गुरु सूर्य के समान है जो अपनी तेजस्वी किरणों से सोये हुये लोगों को जगाता रहता है वह एक सुगंधित पवन का झोंका है जो सोये हुये शिष्यों को चैतन्यता देने के लिये उनके प्राणों में रच-पच जाता है, सद्गुरु ईश्वर का वह परिन्दा है जो इस धरा पर उडते हुये आया है और तुम सब को अपने सुरीले गीतों को सुना कर याद दिलाने के लिये कि तुम भी हमारी तरह ईश्वर के अंश हो तुम्हारा वास्तविक घर यह नहीं है जो तुम समझ बैठे हो तथा यहां मोह, माया, भोग-विलास प्रपंचों में तुम उलझकर रह गये हो यह शरीर, यह देह भी तुम्हारा असली घर नहीं है, यहां तो कुछ समय का विश्राम है जिस प्रकार एक पथिक राह में कुछ समय के लिये थक जाने पर किसी वृक्ष की छाया में विश्राम के लिये रूक जाता है तथा कुछ समय पश्चात् अपने गन्तव्य की ओर चल पडता है उसी गन्तव्य की याद तुम्हें दिलाने के लिये सद्गुरु आते है तथा बस एक ही संदेश देते है कि यहां तो बस सराय है असल घर, शाश्वत घर, तो कहीं ओर है जिसे तुम्हें पाना है।
सद्गुरु स्वभाव से दयालु होते हैं, वह प्रेम की मूर्ति होते हैं, उनके हृदय से, रोम-रोम से करूणापूरित किरणें निकलती रहती है तथा जो भी उनके सम्पर्क में आता है उस का स्वतः कल्याण ही होता है। वह दूसरों की त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते, वह बुराई के बदले भलाई ही करते हैं। तथा स्वयं का अपमान करने वाले अथवा विष तक देने वाले को भी वरदान ही दे देते हैं। वे कभी मांगते नहीं सदैव देते ही रहते हैं तथा वे ऐश्वर्य सम्पन्न तथा वैभव शाली होते है। ऐसे सद्गुरु तो कोई बिरले ही होते हैं, वे मनमौजी होते हैं ऐसे सद्गुरु की प्राप्ति इतनी सरल नहीं होती तथा ऐसे सद्गुरु सर्व सुलभ तथा सर्व प्राप्य नहीं होते।
वे युवाओं में युवा, वृद्धों में वृद्ध, बालकों में बालक, शूरवीरों में शूरवीर, बन जाते हैं। वे दूसरों के दुःखों को अपना ही दुःख समझते हैं। सद्गुरु का जीवन सादा जीवन उच्च विचारों से ओतप्रोत तथा आकर्षण से भरा हुआ होता है उनके क्रियाकलाप सुव्यवस्थित होते हैं तथा वे सदैव प्रसन्नचित्त रहते हैं वे सदैव निडर होते हैं चक्रवर्ती सम्राट भी उन पर अपना अधिकार नहीं मानते।
उनका कार्य मनुष्य कल्याण अर्थात् उन्हें ईश्वर की याद दिलानी है जिन झूठे स्वप्नों में तुम खो गये हो उन स्वप्नों के टूटने से तुम तिलमिला जाते हो क्योंकि जिस प्रकार कोई व्यक्ति सोते हुये स्वप्न देखता है कि वह चक्रवर्ती सम्राट बन गया है तथा स्वप्न में ही सभी आदेश अर्थात् बडबडाता है लेकिन उसके साथ वाला व्यक्ति समझता है कि यह स्वप्न देख रहा है जो जाग रहा होता है वह उसे उठा देता है तो स्वप्न वाला व्यक्ति भी जागकर कहता है कि कितना सुन्दर स्वप्न था मुझे क्यों जगाया इसी प्रकार सद्गुरु भी अपने शिष्यों को जगाता है इन संसारी स्वप्नों, मोह-माया आदि से।
जब इस मोहमाया से सद्गुरु जगाता है तो तुम तिलमिला जाते हो क्योंकि इस जीवन में तुम्हारी आकांक्षायें चक्रवर्ती सम्राट बनने की होती है, जो स्वप्न होती है, जिसके टूटने पर तुम्हें क्रोध आता है, सद्गुरु की चोट ऐसी ही होती है और तुम क्रोध के कारण, मोह के कारण, लोभ के कारण, उनके शत्रु बन जाते हो, सुकरात को विष पिला डाला, भगवान बुद्ध पर, भगवान महावीर पर पत्थर फेंके गये, कबीर को सताया गया, जीसस को सूली पर लटकाया गया। तुम सब उसी डाली को काट रहे हो जिस पर तुम स्वयं बैठे हो जिस पर कुछ घडी बैठकर विश्राम कर तुम उस निश्छल आकाश की ओर प्रस्थान कर सकते थे। तुम उसी सीढी को तोड़ रहे हो जिसका सहारा लेकर तुम ईश्वर का दर्शन सुगमता से कर सकते थे, तुम उनका विनाश करने में लगे हो जिन सकेंतो को पकड़कर तुम परम लक्ष्य तक पहुंच सकते हो। हर युग में सद्गुरु का पदार्पण हुआ है, अलग-अलग रूपों में जो तुम्हें जगाता रहता है और स्वयं को छिपाता भी रहता है, स्वयं को बचाने के लिये। ऐसा नहीं है कि वह डरता है वह तो निर्भय है मृत्यु भी उसकी मित्र है मृत्यु भी उसका कुछ नहीं बिगाड सकती सद्गुरु तो उस जगह पहुंचे हुये होते हैं।
जहां उनका कुछ बिगड नहीं सकता, मृत्यु भी उनसे कुछ छीन नहीं सकती तो तुम उनका क्या कर लोगे लेकिन तुम अपना अहित अवश्य कर लोगे, उनसे बिगाडकर, उनसे शत्रुता कर, उनके शत्रु बनकर। क्योंकि तुम फिर वहां तक न पहुंच पाओगे जिसके लिये तुमने यह जन्म लिया है उनकी चोट को प्रेमपूर्वक सहोगे तभी यात्रा कुछ कदम आगे बढ़ेगी। उनके शब्दों को, उनके संकेतों को प्रेम पूर्वक हृदय भाव से स्वीकार करना, चोट तो लगेगी तिलमिला तो अवश्य जाओगे क्योंकि सद्गुरु के पास पहुंचने पर तुम कुछ नये नियमों में बंधे हुये प्रतीत पड़ोगे, उनके क्रिया कलाप अजीबो गरीब लगेंगे। लेकिन मजबूरी है वे भी चोट करने की इच्छा नहीं रखते लेकिन तुम स्वयं ही इतने लिप्त हो गये हो कि तुम चोट का अहसास करते हो मगर कुछ ऐसा अवश्य है कि जो कहने पर चोट होती है, उनसे बचना असम्भव है लेकिन सद्गुरु वह चोट देकर भी अपने शिष्यों को संभाल लेता है कबीर भी कहते है –
और समाज में रहते हुये सद्गुरु की पहचान कठिन है सभी लोग इन्हें एक साधारण मनुष्य ही समझते हैं। एक संत ही संत की पहचान कर सकते है क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें कब कैसा व्यवहार करना हैं, कब उन्हे मूर्खों जैसा व्यवहार करना है, कब ब्रह्म वेता जैसा व्यवहार करना है। तुम उनके व्यवहार करने पर अपना निर्णय नहीं दे सकते। यदि तुम उनके पास श्रद्धा भाव से, भक्ति भाव से, विश्वास भाव से मुमुक्षु बन कर विनम्र भाव से उनके समक्ष जाओगे तो वे आपको परम ज्ञान प्रदान करेंगे। यदि आपके अन्दर उनके समक्ष जाने पर उचित भाव नहीं होंगे तो वे भी आपको पागलों जैसे ही प्रतीत होंगे और आप उनके ज्ञान से, कृपा से, वंचित हो जाओगे।
सद्गुरु का प्रतिभाशाली होना आवश्यक नहीं है न ही उनका वाकपटु अर्थात् भाषण प्रवचन में प्रवीण होना अथवा उनका प्रोफेसर होना भी आवश्यक नहीं है उनका मौन भी उनके ज्ञान का प्रमाण है उनका स्पर्श ही तथा उनकी करूणापूरित दृष्टि भी कल्याणकारी होती है। रामकृष्ण परमहंस भी इसका उदाहरण है वे भी वाकपटु या भाषण शैली अथवा शास्त्रों में उनकी गति नहीं थी अपितु वे पूर्ण रूपेण समाधिस्थ सद्गुरु ही थे। सद्गुरु की विद्वता दिव्य है वह अन्तर्ज्ञानी होते हैं उनके समीप जाने पर (भक्तिपूर्वक) सभी संशय स्वयं दूर हो जाते हैं। वे अप्रत्यक्ष रूप में शिष्य के सहायक बने रहते है। सद्गुरु जाति-पाति के बन्धन से मुक्त होते हैं उनकी कोई जाति नहीं होती वास्तव में धर्म में कोई जाति नहीं होती। मोची, जुलाहा तथा अछूत भी सद्गुरु महात्मा हो चुके हैं। उनके संदेश एक दूसरे से मिलते जुलते होते हैं वे आत्मिक ज्ञान की पुष्टि के लिये मनुष्य को प्रेरित करते रहते हैं।
और यदि एक मनुष्य यह सोचता है कि मै जाति से श्रेष्ठ हूं तो मुझमें ईश्वर है तो यह झूठ है एक सद्गुरु की वाणी में-
मनुष्यों में ही नहीं इस संसार के तुच्छ से तुच्छ जीव कीट-पतंगों में भी वही पूर्ण रूप से विराजमान है सब कुछ उसी की शक्ति से चल रहा है एक तिल मात्र अर्थात् एक तिल रखने जितनी जगह भी कहीं नहीं है जहां पर उसकी उपस्थिति न हो अर्थात् वह सब जगह है कीट-पतंगों तक में। कहीं कोई जगह नहीं खाली, तो तुम कैसे बचे रहे हो, तुम में भी तो वहीं विराजमान है उसे स्वयं के भीतर ढूंढो, उसे पहचानों। लेकिन स्वयं में कोई नही ढूंढता।
अंधे तो ग्रन्थो में ढूंढते हैं उन ग्रन्थों में जिन्हे हाथों से लिखा गया कागजों पर मनुष्यों द्वारा। जो लिखा गया स्याही से, उन कागजों में, उन ग्रन्थों में कहीं राम छिपा है? तथा किसी को मिला हो। वह तो स्वयं के अन्दर ही छुपा हुआ बैठा है। कबीर भी कहते है- लिखा लिखी की है नहीं, देखा देखी बात। वह बात अर्थात् ईश्वर साक्षात्कार का अनुभव, वह प्रेम अमृत लिख कर बताने में नहीं आता उसे कभी नहीं लिखा गया यदि उसे लिखकर समझाया जा सकता तो फिर उसे पाना बड़ा सरल हो जाता है फिर ज्ञान तथा विज्ञान में कोई अन्तर नहीं होता, जैसे विज्ञान को लिपीबद्ध किया जा सकता है ज्ञान को नहीं उतारा जा सकता पन्नों पर। उसे तो देख कर स्वयं अनुभव कर ही जाना जा सकता है, मैं भी कहूं कि ईश्वर है तो भी कुछ नहीं होगा। तुम्हें स्वयं ही अपने अन्तर में खोजना होगा सद्गुरु को सीढ़ी बना कर चढ़ना होगा।
तुम सद्गुरु को अपनी सांसारिक तराजू पर नहीं तौल सकते तथा स्वयं के दृष्टिदोष के कारण उन पर दोषारोपण भी नहीं कर सकते। क्योंकि तुम उनके गुणों का आंकलन कर पाने समर्थ नहीं हो, सद्गुरु के कर्म रहस्यपूर्ण तथा अजीब से होते है व तुम्हारी समझ से परे होते है। यदि तुम लोग यह कर कर चोरी करने लगोगे कि भगवान कृष्ण भी माखन चोर थे और आप लोग भी आज के समय में चोरी करने लगे तो आप लोग मुसीबत में पड जायेंगे, सद्गुरु तो देशकाल परिस्थितियों के अनुसार जागृति हेतु क्रिया करते रहे हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने तो विराट रूप भी दिखाया था क्या आप दिखा सकते है? वे सुदर्शन चक्र चलाने में सक्षम थे क्या आप कर सकते है? अतः आपको महान संतों सद्गुरुओं की कही बातों का, आदेशों का पालन करना चाहिये तभी आप ईश्वर से साक्षात्कार प्राप्त कर पायेंगे। सभी सद्गुरुओं ने जो बात कही है उसका अर्थ एक ही निकलता है कि यह सारा जगत स्वप्नवत है यह सांसारिक रिश्ते-नाते, सुख सम्पत्ति, यश-सम्मान, आदर-सत्कार, पद, देह सभी एक स्वप्न है। जब मृत्यु आती है, ये सब स्वप्न भंग हो जाते हैं। सद्गुरु यही समझाते है जो अभी है और अभी नहीं रहेगा वह स्वप्न है और सत्य उसे कहा है जो अभी भी है, पहले भी था, पीछे भी होगा, वह हमारी मृत्यु से पहले भी था तथा बाद में भी रहेगा उसकी तुम्हें पहचान करनी है वही सत्य है, उसी से तुम्हें अपना संबंध बनाना है तुम्हें स्वयं को पहचानना है कि तुम कौन हो?
अभी तो तुम यह पूछने पर कि तुम कौन हो? अपना नाम, जाति, गोत्र, गांव, देश आदि का बखान कर अपनी पहचान बताते हो लेकिन यह सब तो तुम पर थोपी गई पहचान है तुम जन्म से पहले भी तो थे तब तो तुम्हारा कोई नाम, जाति, परिवार, गोत्र नहीं था, यह तुम्हारा आत्म साक्षात्कार नहीं है। तुम अभी से अपनी पहचान के लिये प्रयास करना शुरू कर दो तुम्हारा मन मैं कौन हूं का जो उत्तर तुम्हें दे तुम इन्कार करते रहना अन्त में जब मन जवाब देना बन्द कर दे तो केवल एक साक्षी भाव बचा रहेगा उस साक्षी भाव में स्वयं को निहारना वह तुम्हें सब कुछ दिखा देगा जब तुम साक्षी भाव से देखना सीख जाओंगे तो तुम स्वयं को जान जाओंगे फिर तुम इस संसार में किसी भी प्रकार से रहो तुम अमृतमय होकर जीवन व्यतीत करोगे।
जो स्वयं को पहचान लेता है वह ईश्वर को भी जान जाता है। स्वयं के अन्तर में उतरकर परमात्मा को, ईश्वर को अनुभव कर लो तो फिर सर्वत्र ही उसका दर्शन हो जाये तो फिर सब में वही दृष्टिगोचर होता है क्योंकि एक तिल रखने की जगह भी खाली नहीं है जहां उसकी उपस्थिति नहीं। जिनमें श्रद्धा है वे सद्गुरु के पास खिंचे चले आते है चुंबक की तरह। किसी योग-तपस्या के कारण नहीं, किसी सिद्धान्त, शास्त्रों के कारण भी नहीं, किसी कर्मकाण्ड के करने से भी नहीं। बस थोडी सी सम्भावना है आत्मा की उनके भीतर। उन्हें सद्गुरु का आकर्षण खींच लेता है चाहे परिवार का विरोध हो अथवा समाज का या फिर यह सारा जगत भी उसका शत्रु बन जाये तथा उसे पागल कहे, यह पागल होना भी उसके लिये कल्याणकारी होता है।
सद्गुरु का अर्थ है जो तुम्हारी कही हुयी बातों को समझता हो, जो तुम्हारे ही जैसा हाड-मांस का बना है इसका अतीत तुम्हारे जैसा ही था, लेकिन वर्तमान बदल गया है। उसके जीवन में ईश्वर का अंश उतर गया है, वह ईश्वर की भाषा को समझने लगा है। वे तुम्हारे तथा ईश्वर के बीच अनुवादक बन सकता हैं। अतः गुरु एक अनुवादक है, वह ईश्वर को भली प्रकार समझता है तथा उसकी भाषा को भी। वह तुम्हें भी अच्छी प्रकार से जानता है तथा तुम्हारी भाषा को भी। वे परमात्मा को तुम्हारी भाषा में, तुम्हारे अनुकूल बनाता है जिसे तुम सह सकों। जिस प्रकार विद्युत को ए-सी- से डी-सी- में कन्वर्ट किया जाता है एडाप्टर के द्वारा। इसी प्रकार गुरु भी धीरे-धीरे तुम्हें इस योग्य बनाता है कि ईश्वर की कृपा को आत्मसात कर सको।
एक छोटे पौधे को जिस प्रकार सुरक्षा की आवश्यकता होती है लेकिन बडा होने पर सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती। छोटे पौधे पर यदि बादल भी बरस जायें तो वह समाप्त हो सकता है उसे वर्षा से भी बचाना पड़ता है। ताप यदि ज्यादा हो जाये तो भी समाप्त हो सकता है, हालांकि सूर्य से ही पौधे को जीवन मिलता है लेकिन छोटा पौधा इतना सक्षम नहीं होता कि वह सूर्य के अत्यधिक ताप को सहन कर सके अतः माली गुरु की भांति उसकी देख भाल करता है।
सद्गुरु की केवल यही कोशिश रहती है कि वह ईश्वर को इस प्रकार बना दें कि वह तुम्हें तथा तुम्हारी भाषा को समझ सकें और तुम्हें ईश्वर के योग्य बना दें तुम भी ईश्वर को समझ सकों वह सद्गुरु ईश्वर को थोडा समय रोकता है कि इतना अधिक शीघ्रता से अपनी कृपा मत बरसाओ क्योंकि तुम योग्य नहीं होते हो, तुम समाप्त हो सकते हो, वह तुम्हें तैयार करता है, सक्षम बनाता है तथा थोडी प्रतीक्षा करने को कहता है। वह तुम्हें उस वर्षा में कम भीगने के लिये कहता है तो तुम्हारे बचाव के लिये ही। तुम ज्यादा लेने के लिये आतुर होते हो लेकिन सक्षम नहीं होते। सद्गुरु ईश्वर को, देवताओं को कम देने के लिये तैयार करता है तुम्हारी सुरक्षा के लिये। लेकिन जब सद्गुरु देखता है कि तुम में और ईश्वर में एक ताल-मेल बन गया है तो सद्गुरु भी तुम्हारे बीच से हट जाता है।
यदि तुम सद्गुरु से नहीं जुड पाये तो तुम्हारी दशा ऐसी ही होगी जैसे कि तुम हिन्दी जानते हो और दूसरा फ्रेंच। तुम हिन्दी बोलोगे और वह फ्रेंच तो दोनों के कुछ समझ में नहीं आयेगा, दोनों में कोई ताल-मेल नहीं बन पायेगा अतः कोई दूसरा ऐसा चाहिये जो हिन्दी भी जानता हो और फ्रेंच भी जानता हो जो ताल-मेल बनवा दें या अनुवाद कर दोनों को समझा दें। और सद्गुरु संबन्ध बनवा देता है। और यह सद्गुरु की इच्छा पर ही निर्भर करता है।
उसे इससे कुछ प्राप्त नहीं होता लेकिन सद्गुरु कृपालु होते हैं, करूणाशील होते हैं। इसलिये वह सहर्ष शीघ्रता से मान जाते हैं बिना किसी स्वार्थ के, सद्गुरु की यह करूणा, यह कृपा तभी मिलती है जब तुम तैयार होते हो। और सद्गुरु की कृपा पाने के लिये क्या तैयारी करनी पडती है? गुरु कृपा प्राप्त करने के लिये शिष्य को श्रद्धा करनी पडेगी जब तक पूरी श्रद्धा नहीं होगी तो सद्गुरु कृपा भी पूरी नहीं होगी। जब श्रद्धा पूर्ण हो जाती है तो कृपा भी पूर्ण हो जाती है। तथा हृदय कमल खिल उठता है।
सद्गुरुदेव कैलाश चन्द्र श्रीमाली जी
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