





और यह रास्ता तो साल में एक बार खुलता है, जिसे गुरु पूर्णिमा पर्व कहते हैं, और यदि इस पर्व पर भी, इस रास्ते पर चल कर हमने अपने जीवन को पूर्णता का आयाम नहीं दिया तो फिर जीवन बेमानी हो जायेगा, और जीवन का कोई मकसद ही नहीं रहेगा। गुरु पूर्णिमा तों बूंद का समुद्र से मिल जाने का पर्व है, एक उत्सव है, एक आयोजन है, जीवन की उमंग और उत्साह का परिचायक है, यह पर्व तो जोश से भरे हुये उमंग से उछलते हुये साधकों का पर्व है, जिनके रग-रग और रेशे-रेशे में जवानी फूट रही है, जिनके आंखों में चमक है, जिनके होठों पर गीत थिरकते रहते हैं, और जिनके पांवों में मीरा की तरह घुंघरू बंधे हुये हों, वे ही तो इस पर्व का आनन्द ले पाते हैं और ऐसे ही साधकों से जीवन का निर्माण होता है, ऐसे ही साधकों से इतिहास बनता है और ऐसे ही शिष्यों से जीवन की पूर्णता का परिचय होता है।
यह भी मन में अच्छी तरह से विचार कर लेना चाहिये कि जाग जाना अपने आप में जीवन की श्रेष्ठता है, हम सपनों में और नींद में तो चलते ही रहते हैं, और जीवन का बहुत बड़ा भाग इसी प्रकार सपनों को देखने में और नींद में चलते हुये व्यतीत कर दिया है, परंतु जिसके मन में जागने की लालसा है, जो पूरी तरह से चैतन्य हो कर इस विश्व को देखने की प्रक्रिया, रहस्य जानना चाहता है, उसको तो जागना ही पड़ता है, और यह बात भी याद रखो कि जागना अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, पूर्ण रूप से जाग जाना एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना है, जो विश्व में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिख देने के लिये पर्याप्त है।
यह जागने की प्रक्रिया रोज-रोज नहीं हो सकती, यह तो पूरे जीवन में एक बार और शायद एक बार ही घटना घटित होती है, और उसका सारा जीवन जगमगा उठता है। सिद्धार्थ नींद में ही खोये हुये राज्य वैभव में मस्त चले जा रहे थे, कि एक घटना घटी और वे जाग गये, अहसास कर लिया कि जीवन जागने की प्रक्रिया है, और वे बुद्धत्व को प्राप्त हो गये, यही घटना महावीर के पूरे जीवन में एक बार घटी, शंकराचार्य गृहस्थ बनना चाहते थे, परंतु एक क्षण आया और उसने सोचा कि जीवन तो सम्पूर्णता का पर्याय है और उसी क्षण वह संन्यास ले कर घर से निकल पडे़ और वह छोटा सा बालक सही अर्थों में शंकराचार्य बन गया।
गुरु से मिलना ही जागने की प्रतीति- और यह जागने की प्रक्रिया तब होती है जब घर गृहस्थी के जाल से उलझा हुआ व्यक्ति गुरु से मिलने की इच्छा पैदा करता है, और हुलस करके हुमस करके आगे बढ़ता है, और गुरु से मिल जाता है, केवल, मिलता ही नहीं अपितु अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है, और उसका यह समर्पण ही जागने की प्रक्रिया है, उसका यह समर्पण ही गुरु से एकाकार होने की प्रक्रिया है, वह वैसी ही प्रक्रिया है, जैसे एक छोटी सी बूंद समुद्र में मिल कर समुद्र का ही एक भाग बन जाती है, और जिस क्षण साधक या शिष्य आगे बढ़ कर गुरु से एकाकार होने की प्रक्रिया करता है, जैसे एक छोटी सी बूंद समुद्र में मिल कर समुद्र का ही एक भाग बन जाती है, और जिस क्षण साधक या शिष्य आगे बढ़ कर गुरु से एकाकार हो जाता है, वह सही अर्थों में पूरी तरह से जाग जाता है और उसे ज्ञान की, चेतना की, बुद्धत्व की पूर्ण प्राप्ति हो जाती है।
यह संयोग तो कभी-कभी ही होता है- जीवन में चेतना की प्रक्रिया कभी-कभी ही तो हो सकती है, जीवन में कभी कोई क्षण ऐसा आता है कि व्यक्ति करवट बदलता है, और नींद से अलग हो कर जागने की चेष्टा करता है, और जब उसकी आंख खुलती है, तो सामने दरवाजा खुला मिलता है जिसमें से गुजर कर वह पूर्णता को प्राप्त कर सकता है, सिद्धियों के आयाम को हस्तगत कर सकता है, अपने जीवन को बुद्धत्व में बदल सकता है, स्वयं को शंकराचार्य के रूप में घटित कर सकता है। और यह संयोग गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ही आता है, ऐसा द्वार गुरु पूर्णिमा के दिन ही खुलता है, जिस द्वार से तुम प्रकाश की ओर बढ़ सकते हों, ऐसा रास्ता गुरु पूर्णिमा के माध्यम से ही उपलब्ध होता है, जिस रास्ते पर चल कर तुम इतिहास में अपना नाम अंकित कर सकते हों। और यह तुम्हारा पहला जीवन ही नहीं है, कई-कई जीवन व्यतीत हो चुके हैं और तुम नींद में खोये हुये ही रहे हो, इसलिये कि कोई गुरु तुम्हें मिला ही नहीं, जो तुम्हें झकझोर कर जगा सके, कोई ऐसा चेतना पुरूष तुम्हारे जीवन में आया ही नहीं, जो तुम्हें समझा सके कि जीवन का तात्पर्य पूरी तरह से जाग जाना है, तुम्हें जीवन में कोई बुद्धत्व प्राप्त हुआ ही नहीं, जो तुम्हें बता सके कि धन, मान, पद, प्रतिष्ठा ऐश्वर्य और यह गृहस्थ सब स्वप्न है, क्योंकि यह तुम्हारे साथ आया नहीं है, यह तुम्हारे साथ जायेगा भी नहीं, फिर उसे अपना मान लेना भ्रम या निद्रा ही तो है।
पर पहली बार मैं तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा दस्तक दे रहा हूं, तुम्हारी चेतना जागृत कर रहा हूं, तुम्हें आवाज दे रहा हूं, कि यदि जीवन को अपने हाथों में लेना है, यदि जीवन में आनन्द का उपयोग करना है, यदि जीवन में पूर्णता का अहसास करना है तो यह जरूरी है कि हम जगें, हम चैतन्य हों, उस व्यक्ति की उंगली पकडें जो हमें इस रास्ते पर अग्रसर कर सकता है, और यह उंगली पकडने की प्रक्रिया गुरु पूर्णिमा पर्व पर ही होती है।
और मैं फिर तुम्हें आगाह कर रहा हूं कि जिस प्रकार हर जीवन में तुम अपने जीवन को चूक रहे हो, उस प्रकार से इस जीवन में भी अपने आपको चूक मत जाना, अपने आपको भुलावे में मत डाल देना, कि आज नहीं तो कल कर लेंगे, इस बार नहीं तो अगली बार गुरु पूर्णिमा पर पहुंच जायेंगे, अभी नहीं तो फिर कभी बाद में गुरुदेव से मिल लेंगे, पर मैं कहता हूं कि तुम्हारा स्वप्न है, यह नींद में सुप्त बनाये रखने की प्रक्रिया है, यह फिर तुम्हें भुलावा देने की क्रिया है, और इस बार यदि तुम इस छलावें में आ गये, तो निश्चित ही फिर एक बार अपने जीवन को चूक जाओगे, फिर तुम्हारा जीवन सामान्य सा, घटिया गृहस्थ, घटिया व्यापारी सा या मामूली नौकरी पेशे सा जीवन बन कर रह जायेगा। फिर समय को पकड़ने और उसको जी लेने के प्रयोग कम हैं, इसकी अपेक्षा चूक जाने के अवसर ज्यादा है, यह तो तुम्हारे हाथ में है कि तुम इन दोनों में से कौन सा रास्ता अपनाते हो, यह तो तुम्हारे हाथ में है कि इस जीवन में सभी अभिलाषाओं को पूर्णता से प्राप्त कर लेना है, और इसके लिये गुरु पूर्णिमा जीवन का शानदार संयोग है।
आवाज दे रहा हूं- इस बार मैंने तुम्हारे लिये ज्ञान का, चेतना का, बुद्धत्व का दरवाजा खोला है- गुरु पूर्णिमा के माध्यम से, जिसमें से हो कर तुम मुझ तक पहुंच सकते हो, मेरी धड़कनों के साथ अपनी धड़कनें मिला सकते हो, मेरे प्राणों के साथ अपने प्राणों को एकाकार कर सको और मेरे पास जो ज्ञान, जो भी चेतना, जो भी प्रकाश है- उससे तुम अपने आपको पूरी तरह से आप्लावित कर सको।
कई-कई जन्मों के बाद ऐसा अवसर आया है कि तुम्हारे जीवन में सद्गुरुरूपी चेतना पुरूष उपस्थित है, स्वयं बुद्धत्व तुम्हें आवाज दे रहा है- तुम अपने जीवन को सही अर्थों में ऐतिहासिक बना सको। इस गुरु पूर्णिमा पर्व पर मैं तुम्हारे हृदय के दरवाजे पर खड़ा दस्तक दे रहा हूं, दोनों बाहें फैलाये अपने सीने से मिलाने के लिये आवाज दे रहा हूं, कि तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है, चिन्तित और भयग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि तुम मेरे पास जो कुछ छोड़ करके आओगे वह सब कुछ कंकर-पत्थर होंगे, और जो कुछ मुझसे प्राप्त कर लोगे, वह सही अर्थों में हीरे जवाहरात और बहुमूल्य सम्पदा होगी। और मैं इस गुरु पूर्णिमा पर्व पर तुम सबको पूर्णता देने का, ज्ञानश्चेतना देने का, बुद्धत्व देने का विश्वास देता हूं, क्योंकि मैं इस वायदा को इस बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पूरा कर देना चाहता हूं।
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