





संकल्प बल का अर्थ एक ऐसी भावना से है जो हृदय में गहराई तक बैठ चुकी हो तथा कुछ भावना का प्रकटीकरण यथार्थ रूप में प्रस्तुत होने के लिये हमारे प्राणों में आकुलता छायी हुई हो। ऐसे समय में लिया गया संकल्प, विघ्न बाधाओं के आने पर भी बीच में सफलता से पहले न तो रूकता है तथा न ही शिथिल होता है। उसका एक मात्र ध्येय सफलता और सफलता ही होता है जो लक्ष्य भेद की पश्चात् ही विश्राम ले पाता है।
संकल्प बल का अर्थ है जो संकल्प के उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिये ऊर्जा है, यह ऊर्जा साधक की सम्पूर्ण स्थिति को लक्ष्य भेद की ओर उन्मुख करती है तथा उसके हृदय, बुद्धि, मन, प्राण, शरीर के अर्थात उसके हृदय की भावना, बुद्धि के विचार, मन की आकांक्षायें, प्राणों के आवेग तथा शरीर के रोम-रोम से निसृतः ऊर्जा संगठित होकर लक्ष्य संधान की ओर चल पड़ती है।
संकल्प बल एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोई विकल्प नहीं होता तथा संकल्पित साधक के सम्मुख एक मात्र उद्देश्य, एक लक्ष्य तथा एक ही मंजिल होती है और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उस कार्य को पूर्ण करने के लिये कटिबद्ध होता है। संकल्प के साथ ऐसे प्रयास चमत्कारिक रूप में फलित होते है। साधक के मन के संकल्प के अनुसार ही कठिन से कठिन राहें भी आसान बन जाती है।
संकल्पित साधक के लिये कोई भी कार्य कठिन अथवा असंभव नहीं रहता। अपनी संकल्प शक्ति के बल से साधक असंभव को संभव कर दिखाने में सक्षम होता है। असंभव को संभव कर दिखाने की विलक्षण सामर्थ्य संकल्प बल के कारण ही होती है। इसके बल पर ही हम जो चाहे वह पा सकते हैं। दुर्बल व्यक्ति भी यदि मन में कुछ ठान लें तो वह भी दुर्बलता को अपनी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में परिवर्तित कर सकता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे इतिहास में अंकित है। अनपढ़ कालिदास भी संकल्प बल के आधार पर ही महाकवि कालिदास कहलाये।
कठिन प्रतीत होने वाले कार्यों को यदि संकल्प लेकर किया जाय तो वह सरलता पूर्वक सम्पन्न हो जाते है तथा जीवन में नई उमंग व उल्लास के रंग भरने से मन व शरीर भी स्वस्थ रहता है। तथा उन्नति की ओर अग्रसर होते है। वास्तव में, बाधाओं, कष्टों, प्रतिकूलताओं के बीच ही संकल्प की परीक्षा होती है। प्रत्येक संकल्प के पूर्ण होने पर साधक के अंतस में एक शक्ति का विस्फोट सा होता है जिससे अन्तर्मन खिल उठता है, आत्म-विश्वास बढ़ जाता है और विश्वास की शक्ति भी द्विगुणित हो जाती है। दैनिक जीवन में संकल्प बल की क्रियाओं के सहज परिणाम प्रस्तुत होते है।
संकल्प बल की कर्मशक्ति में कमी होने पर विपरीत परिणाम भी भुगतने पड़ सकते है। जिससे जीवन में निराशा, असफलता एवं कुण्ठा जैसी यंत्रणा साधक को मिलने पर वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। यह स्थिति अधूरे मन से लिये गये संकल्प का परिणाम होता है। ऐसे मे मनुष्य अपना आत्मविश्वास खो बैठता है। ऊपरी मन से लिये गये संकल्प साधक के जीवन में विफलता ही प्रस्तुत करते है व अन्तः मन एवं बाहरी जीवन में कलह का वातावरण बनाती है। संकल्प लेते समय कभी भी शीघ्रता न अपनायें।
अपनी शक्ति सामर्थ्य का आंकलन करके लक्ष्य को चुन कर तथा उसके उद्देश्य के प्रति आश्वस्त होकर ही संकल्प लेना बुद्धिमत्ता है। किसी कार्य की पूर्णता के लिये अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा तथा खाली कल्पना करना उचित नहीं होता। विपरीत परिस्थितियों में संकल्प लेकर अपना मनोरथ साध लेना संकल्प शक्ति की पूर्णता है। साथ ही संकल्पित कार्य के प्रयोग में मंद गति उचित नहीं है। इसमें निरंतरता व तीव्रता आवश्यक है।
हमारा लिया गया संकल्प पूर्ण सफल हो तथा विकसित भी हो इसके लिये हमारा उद्देश्य उच्च आदर्शों से जुड़ा हो तथा स्वयं के कल्याण हेतु आने वाली बाधाओं और अवरोधों का सामना करने का भाव भी हो। तभी हमारे अन्तर्तम में विराजमान परमात्मा की शक्ति का प्रकटीकरण पूर्ण रूप से संभव हो पाता है तथा सभी शक्तियां संगठित होकर निर्द्वन्द्व भाव से लक्ष्य संधान की ओर गतिशील होती है।
संकल्प बल से छोटे-छोटे प्रयोगों को पूर्ण करके हम बडे़ अथवा महान कार्यों को भी पूर्णता दे सकते हैं। जीवन में सभी कार्य, सभी क्षेत्र में संकल्प लिया जा सकता है। स्वयं के दुर्गुणों-दोषों को त्याग कर स्वयं के व्यक्तित्व को निखारने के लिये सद्गुणों को धारण करने में संकल्प बल पूर्ण सिद्ध होता है। यदि किसी गलत आदत से अपना जीवन अस्त-व्यस्त, प्रभाव हीन तथा असफल अनुभव करते हो, जैसे खान-पान, आपसी व्यवहार, मानसिक चिंतन आदि तो स्वयं का आकलन कर संकल्प करें तथा इसे निभाकर अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर विकास तथा सफलताओं का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
संकल्प लेने पर उसमें किसी प्रकार की विकल्प की स्थिति नहीं रहनी चाहिये अर्थात यदि संकल्प पूर्ण ना हो पाये तो यह मान लेना कि इतना कार्य तो हो ही गया, ऐसा मानना अभीष्ट मनोरथ सिद्धि में एक बड़ा अवरोध है। विकल्प रहित संकल्प ही चमत्कारिक उपलब्धियों के साथ पूर्ण होते है। संकल्प के माध्यम से ही व्यक्तित्व के निखार एवं विकास में यही तथ्य क्रियाशील होता है। जटिलताओं एवं बाधाओं के समुद्र को पार किये बिना कार्यो में पूर्णता प्राप्त नहीं होती। एक श्रेष्ठ सैनिक का निर्माण भी अनेक-अनेक दुष्कर प्रशिक्षण के पश्चात् ही होता है। जो बाद में उसकी प्राण रक्षा एवं देश रक्षा में सहायक होता है।
प्रत्येक सफलता के साथ हमारा विश्वास अधिक दृढ़ होता जाता है तथा इसकी जड़ों का सिंचन भी होता है। छोटी-छोटी समस्यायें तो साधक के सामने कोई महत्व ही नहीं रखती बल्कि कठिन समस्याओं को भी वह सरलता से सुलझाने में सक्षम हो पाते हैं तथा हम स्वयं अपने भाग्य विधाता होने का एहसास करते हैं। किसी भी साधना का संकल्प लेने से पहले अपने समय का सामंजस्य व बैठने की क्षमता आदि का आकलन करके ही साधना में रत होना श्रेयस्कर रहता है।
शोभा श्रीमाली
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