





प्रायः सभी मनुष्य अर्थ के लिये कठोर प्रयत्न करते हैं और उसके लिये पाप करने में भी नहीं हिचकते। फिर भी वे इच्छा अनुसार धन अर्जित नहीं कर पाते, क्योंकि प्रारब्ध के बिना उसकी प्राप्ति संभव नहीं हो पाती। इसी प्रकार जिनको संतान नहीं है, वे संतान के लिये बहुत प्रयत्न करते हैं, किन्तु सभी को संतान लाभ नहीं मिल पाता, क्योंकि उसमें भी भाग्य प्रधान है।
अब प्रश्न यह होता है कि पूर्वकृत कर्म अर्थात् प्रारब्ध और संचित कर्म भी इनमें सहायक है या नही? इसका उत्तर यह है कि इनसे सहायता तो प्राप्त होती है, किंतु इनकी प्रधानता नहीं है। पूर्व में निष्काम भाव से किये हुये कर्म और उपासना के फलस्वरूप मनुष्य को संत-महात्माओ का सानिध्य प्राप्त होता है, किन्तु उनके सानिध्य में उनके द्वारा बताये गये चिंतन-क्रियाओं को उन्हीं के अनुसार जब मनुष्य करता है, तो उसका कल्याण होता है।
संसार के सभी मनुष्य अर्थ और भोग की कामना करते हैं, किन्तु मात्र कामना करने पर ही कामनाओं की सिद्धि नहीं होती। किन्तु सही चेतना को धर्म के अनुसार धारण करने पर कार्य सिद्धि हो जाती है। संसार में किसी भी पदार्थ, घटना और मृत्यु हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं है। कोई मरने की इच्छा करे, तो इच्छा करने से मर नहीं सकता और जीने की इच्छा करे तो जी नहीं सकता। इसी तरह अर्थ और काम (भोग रूप पदार्थ) अनुकूल स्थितियां केवल मनुष्य के इच्छा करने से प्राप्त नहीं होती, क्योंकि ये इच्छा पुरूषार्थ पर निर्भर है। पर जो भगवान को चाहता है, उसे भगवान चाहते हैं।
अब यह विचार करना है कि भाग्य क्या है और प्रयत्न क्या है? सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि सब पूर्व के किये हुये कर्मों के जो फल हैं, इन्हीं को भाग्य या प्रारब्ध कहते हैं। इस प्रारब्ध का भोग तीन प्रकार से होता है। अनिच्छा, परेच्छा और स्वेच्छा से। कोई रोग हो जाना, मृत्यु हो जाना, किसी खरीदे हुये पदार्थ का मूल्य घट जाना, पदार्थ का क्षय अथवा आर्थिक, मानसिक, शारीरिक हानि हो जाना, यह सब पूर्व जन्मकृत कर्म के परिणाम हैं। इसके विपरीत देव इच्छा से धन, सुख आदि की प्राप्ति होना पुण्य कर्म का फल है। ये सभी अनिच्छा प्रारब्ध भोग है। पाप कर्म में आकर्षण है, मनुष्य उस क्षणिक आकर्षण के वशीभूत होकर विवेक-बुद्धि को खो बैठता है। अपने मूल स्वरूप को विस्मृत कर बैठता है और पाप कर्म में फंस जाता है। शैतान का मायाजाल कुछ ऐसा मादक-मोहक है कि अनुभव शून्य व्यक्ति उसे गहरी अन्तर्दृष्टि से नहीं देख पाता। यदि पाप में आकर्षण न हो, तो कोई पाप करे ही क्यों?
विश्वामित्र गहन तपश्चर्या में लीन थे। दिन रात चित्त एकाग्र कर अपने योग बल से इन्द्र का सिंहासन जीत लेना चाहते थे। इतने में ही निर्जन वन में एक मधुर कण्ठ से निकला गीत आकर उनके हृदय के तन्त्र से लगा। कहां निर्जन वन और कहां नारी का मधुर गीत। वे छिपकर देखने लगे कि स्वर कहां से आ रहा है। उन्होंने देखा मेनका का लावण्य, सौन्दर्य की मूर्ति, मन को विचलित करने वाली माया। वे उसके आकर्षण में फंस गये। तपस्वी का चित्त चलायमान हो गया। उन्होंने उससे पाणिग्रहण किया। कुछ माह पश्चात् मेनका उनका तप भंग कर विश्वामित्र का साथ छोड़ गयी। महर्षि को भयंकर पश्चात्ताप व आत्मग्लानि हुयी। हजारों बिच्छुओं के काटने जैसी असहनीय पीड़ा से कातर होकर वे बोले- यह मेनका थी, स्वर्ग की अप्सरा! धोखा, छल, माया! हाय! नारी के रूप में इतना जादू! विश्वामित्र अब तुम योग भ्रष्ट तपस्वी हो। यदि पाप में आकर्षण न हो, तो कोई पाप करे ही क्यों? मेरे जीवन की यह दूसरी हार है। मेनका के रूप ने मेरी बुद्धि पर परदा डाल दिया था। मेनका! मैं तुमसे घृणा करता हूं। तुमसे ही नहीं, तुम्हारे ध्यान तक से घृणा करता हूं, पापिनि! मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा था, तुम मेरे मार्ग में बाधा होकर आ गयी। मेरे जीवन की तपस्या मिट्टी में मिल गयी। यह है, पाप के क्षणिक आकर्षण में फंसकर लक्ष्य भ्रष्ट होने वाले साधक की अन्तः करूण पुकार, पश्चात्ताप के आंसू, तपस्वी की आत्मा का हाहाकार।
सांसारिक जीवन में भी अनेक स्थितियां ऐसी आती हैं, जब व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक कर आकर्षण में फंस जाता है। वह अपने मूल उद्देश्य की ओर नहीं बढ़ पाता। लेकिन लक्ष्य की ओर गम्भीर रहने वाले व्यक्ति, अपने स्थान पर अडिग रहते हैं और अडिग रहने वाले ही अंततः सफल होते हैं। अपने द्वारा अपने को समझा-बुझाकर बुराई रहित कर लेना बहुत बड़ा पुरुषार्थ है। अपनी बुराई देखने का ज्ञान सभी में है, यही पुरूषार्थ है। पर असावधानी के कारण उसका उपयोग हम दूसरों की बुराई देखने में करते हैं। ऐसे भी अनेक लोग हैं, जो जटिल परिस्थितियों के कारण गलत पथ पर चलने का निर्णय ले लेते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं- अन्धी वासनाओं के मार्ग पर मत चलो, ज्ञान को-विवेक को अपना सारथी बनाओ और सत्कर्म की राह पर चलो। जीवन भर मित्रों, सम्बन्धियों के लिये चिंतित रहे-कष्ट उठाते रहे, लेकिन अपना काम निकल जाने के बाद वे सम्बन्धी उन्हें पूछते भी नहीं। आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है जहां दूसरे को मात देख कर स्वयं का उत्थान करना होता है। जीवन यापन करने के लिये भी मनुष्य को अनवरत् संघर्ष करना पड़ रहा है। कुछ समझ में नहीं आता कि शिखर तक पहुंचने के लिये मनुष्य कौन सा उपाय करें? गुरुदेव कहते हैं- अपनी प्रकृति के अनुसार अपने कार्य क्षेत्र का चयन करो और उसमें अपने युक्ति, शक्ति, विचार और भक्ति के साथ जुट जाओ, साथ ही ईश्वर पर, सद्गुरुदेव पर विश्वास रखो। सद्गुरुदेव को अपना सारथी बनाओ। वे तुम्हें इतनी सद्बुद्धि और इतना साहस देंगे कि तुम स्वयं मंझधार में फंसी हुयी अपनी नाव को बाहर निकालकर अपने लक्ष्य तक पहुंच जाओगे।
यह बौद्धिक शक्ति का युग है। आपका बुद्धि बल ही आपके लिये दिव्य प्रकाश है। व्यक्ति केवल बुद्धि बल के सहारे, अपनी प्रज्ञा एवं चतुराई के बल पर बिना कोई शस्त्र उठाये, जीवन संग्राम में विजय पा सकता है। जीवन में सफल होने के लिये सभी संसाधन के साथ-साथ तीक्ष्ण बुद्धि भी आवश्यक है। इसलिये अपने-अपने क्षेत्र के लिये आवश्यक श्रेष्ठतम ज्ञान अर्जित कर उस पर कार्य करना चाहिये। इक्कीसवीं सदी का यह संसार बहुत ही भौतिकतावादी है, आडम्बर का वातावरण अपनी जड़े जमा चुका है, वासना और नग्नता का नृत्य हो रहा है। ऐसे में व्यक्ति यदि अपने इन्द्रियों के अश्वों की लगाम कस कर ना थामे तो शिखर पर पहुंच कर भी पतन के गर्त में गिरने में देर ना लगेगी।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि- मानव जीवन विजय प्राप्त करने और ऐश्वर्य भोग का साधन है, परन्तु नदी तभी पूजनीय होती है, जब वह अपनी सीमा में रहे, अपनी मर्यादा में बहे, भोग-विलास की अन्धता विवेक को नष्ट कर देती है और विजय तो तभी प्राप्त होगी, जब हम कर्म से भागेंगे नहीं, ऐश्वर्य तो तभी प्राप्त होगा, जब हम संघर्ष से भागे नहीं। श्री कृष्ण स्वयं बांसुरी बजाते थे, उनकी बांसुरी की मधुर तान सुनकर गोपियां-गोपाल सभी थिरकते आते थे। श्रीकृष्ण ने रास भी किया था और महारास भी, परन्तु उनकी जीवन यात्र महारास पर ही समाप्त नहीं हो गयी थी। समय आने पर उन्होंने गोपालों के साथ गोवर्धन पर्वत भी उठाया था और आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने सुदर्शन चक्र भी धारण किया था। कृष्ण शांति के दूत हैं तो शक्ति के उपासक भी है।
मानव जीवन में शांति और शक्ति का पूर्ण सामंजस्य होना चाहिये। शक्ति की उपासना से अपनी अन्तस चेतना जाग्रत कर सफलता के शिखर को प्राप्त करना मानव का अधिकार है, साथ ही उस शिखर पर पहुंच कर अंहकार रहित रहने के लिये शांति की आवश्यकता है। इसलिये सार्थक, सफल और यशस्वी जीवन के लिये प्रत्येक मनुष्य को धनुर्धारी अर्जुन की तरह कर्मवीर बनना होगा। पुरूषार्थ का धनुष धारण कर सम्पूर्ण विवेक एवं शांति के साथ अपने कर्मक्षेत्र में डटना होगा। साथ ही ध्यान रखना होगा कि श्री कृष्ण रूपी सारथी पर पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, समर्पण रखकर ही शिष्य रूपी अर्जुन सफल श्रेष्ठ जीवन निर्मित कर सकेंगे।
उक्त भावों को अपने ज्ञान और विवेक से समझकर नववर्ष के लिये संकल्पवान बने और उन संकल्पों में निरन्तरता का भाव बना सके, इसी हेतु सद्गुरुदेव से मिलकर सुसफलता का आशीर्वाद् प्राप्त करें।
नववर्ष महोत्सव में आपका सपरिवार स्वागत है–!!!
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