





इन्हीं सब के मध्य में एक ऐसा भी अवसर आ जाता है जब केवल प्रकृति ही नहीं मनुष्य खुद भी अपने उनींदेपन को छोड़ कुछ अचम्भित हो अपने नेत्रों को विस्फारित करते हुये देखने लग जाता है, कि अचानक यह चारों ओर क्या घटित हो गया है? या यों कहें कि वह बस अपने दो नेत्रों से ही नहीं, रोम-रोम से कुछ का कुछ और देखने लग जाता है। लेकिन वह देखना भर भी कहां होता है? वह तो सुनना भी होता है रोम-रोम को कान बनाकर! उन मादक स्वर लहरियों में, बिखरे गीतों को सुनना, जिन्हें स्वयं प्रकृति ने ही रचा होता है और स्वयं ही गाया भी होता है।
ये गीत होते है प्रेम के, यौवन के, यौवन की मस्तियों के, खिलने के, बिखरने के और बस बिखरने के ही नहीं छितरा जाने के भी, ज्यों हरे भरे खेतों में सरसों के फूल अपनी पीली आभा के साथ मीलों-मील तक छितरा जाते हैं, क्योंकि यह वसंत के पर्व का अवसर होता है, प्रकृति में कुछ विशेष घटित होने का क्षण होता है।
आवश्यक है कि साधक एक और जहां जीवन के बाह्य पक्षों का श्रृंगार करे, वहीं दूसरी ओर अन्तः मन को भी सुदृढ़ करने का यह प्रयत्न करे। वसंत इन दोनों ही बातों को एक साथ, एक ही घड़ी में सम्पन्न करने का अवसर प्रदान करता है और तभी तो जहां एक और यह अनंग साधना पर्व होता हैं, वही सरस्वती साधना का भी। दोनों साधनाओं में बस बाह्य भेद है, अन्तः सम्बन्ध तो प्रखरता से विद्यमान है ही।
वास्तव में ही यह दिन परिवार के सभी सदस्यों के लिये अत्यधिक उपयोगी है, देवताओं तक ने इस दिवस का उपयोग श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिये किया। भारत के श्रेष्ठ योगियों ने इस दिन का उपयोग कर अपने जीवन में पूर्णता प्राप्त की। गोरक्ष-संहिता में बताया गया है कि निरक्षर गोरखनाथ को उनके गुरु ने वसंत पंचमी पर्व पर विशेष साधनात्मक क्रिया के द्वारा उनके कण्ठ और जीभ पर सरस्वती को स्थापित किया, जिसकी वजह से उन्हें सभी वेद, उपनिषद कण्ठस्थ हो सके और संसार में गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुये।
सरस्वती विद्या का स्वरूप, विश्व व्यापार संचालन, वार्ता, प्रशासक, नेतृत्व, स्मरण शक्ति में निहित है। भगवती सरस्वती भारती, ब्राह्मी, गीतदेवी, वाग्देवी, वाणी, भाषा, शारदा, त्रयीमूर्ति स्वरूपों में विद्यमान हैं। इनके उपासक अपनी बुद्धि, कौशल व विचार शक्ति से पूर्ण रूप से सफल होते हैं। व्यक्ति चाहे नौकरी करें अथवा व्यापार, सफल वही हो सकता है, जो श्रेष्ठ वार्तालाप कर सकता है, सही समय पर सही निर्णय ले सकता हो, जो सही तर्क कर सकता हो, अपने वाक् शक्ति से दूसरों को प्रभावित कर सकता हो।
नेतृत्व क्षमता भी उसी में विकसित हो सकती है, जो दूसरों के मन की भावनाओं को समझते हुये उसके अनुरुप कार्य कर सके। ये तो काल ज्ञान वार्ता, प्रशासनिक सेवा की अधिष्ठात्री देवी हैं, मोहिनी सरस्वती शक्ति से साधक आकर्षण युक्त शांत चित्त वाला बनता है।
विद्यार्थी और सरस्वती- वर्तमान में शिक्षा के क्षेत्र में इतनी अधिक प्रतिस्पर्धा हो गई है कि छात्र प्रारम्भ से ही एक बोझ के नीचे दबा हुआ है। प्रत्येक मां बाप के मन में भी यह विचार रहता है कि हमारी संतान उच्च शिक्षा ग्रहण कर डॉक्टर, इन्जीनियर, प्रशासनिक अधिकारी के श्रेष्ठ पद अवश्य ही प्राप्त करें।
तीन वर्ष से चौदह वर्ष तक के बालक-बालिकाओं के लिये यह समय जीवन निर्माण से जुड़ा होता है, यह ऐसा अवसर होता है, जिसे जीवन को संवारने, सफलता प्राप्त करने की दृष्टि से उपयोग करना उचित होता है। कहा जाता है यदि भवन की नींव मजबूत हो, तो इमारत अपनी शोभा चिर-स्थायित्व तक बिखेरती है, इसी प्रकार यदि बालक- बालिकाओं को प्रारम्भ में ही श्रेष्ठ ज्ञान, चिंतन, संस्कार प्रदान किया जाये, तो उनके जीवन में अद्भुत निखार आता है, जीवन जीने की सही कला वे अपने भीतर उतार पाते हैं। साथ ही साथ शैक्षिक रूप से पूर्ण निपुण, कौशल युक्त होने में सफल होते हैं। जिसके फलस्वरूप उनका स्वयं, परिवार और समाज सभी का कल्याण होता है।
नौकरी और सरस्वती- नौकरी में वही व्यक्ति श्रेष्ठ उन्नति कर पाता है, जिसमें प्रशासानिक ज्ञान का प्रकाश हो, जो उच्च स्तर के अधिकारियों को अपने अनुकूल कर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अपने नियंत्रण में रख सकता हो, जो प्रतिपल सचेष्ट रहते हुये अपने कार्यों को श्रेष्ठता से दूसरों से पहले सम्पन्न करते हो, योग्यता प्रत्येक में होती है, अपने कार्य और कौशल से अपनी योग्यता को परिभाषित कर व्यक्ति पदोन्नति प्राप्त कर सकता है। वर्तमान में सरकारी नौकरी में कमी होती जा रही है और प्राईवेट नौकरियां बढ़ती जा रही है, जिसमें प्रमोशन का आधार व्यक्ति की योग्यता ही होती है।
व्यापार और सरस्वती- व्यापार का आधार है वार्ता, जिससे व्यक्ति अपने ग्राहक को प्रभावित कर सके, व्यापार में कुशाग्र बुद्धि अत्यधिक लाभ देती है, व्यापार मे प्रतिदिन निर्णय लेना पड़ता है, अपने कार्य को बढ़ाने के लिये चारों ओर दिमाग लगाना पड़ता है साथ ही उचित प्रशासनिक क्रिया भी करनी पड़ती है, शारदाम्बा शक्ति की चेतना जाग्रत होने पर व्यापारिक कार्य श्रेष्ठता से सम्पन्न होते हैं। जिससे व्यक्ति ग्राहक को अपना बना लेता है, साथ ही उसके साथ अभिन्न सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। शारदाम्बा सरस्वती शक्ति से व्यक्ति व्यापार में सफलता अर्जित कर लक्ष्मी का चिरस्थायित्व स्थापित कर सकता है।
गृहस्थ जीवन और सरस्वती- गृहस्थ जीवन का आधार पति-पत्नी का प्रेम है, आपस में सामंजस्य, एक दूसरे के भावनाओं को समझने की क्षमता और उसके साथ ही मधुर सम्भाषण गृहस्थ जीवन के आधार हैं, मधुरता मोहिनी शक्ति से परिवार में प्रेममय वातावरण बनता है, स्त्रियों का प्रेम सम्भाषण पूरे परिवार को अपने अधीन कर प्रभावित करता है।
इन सभी सांसारिक क्रियाओं में भगवती सरस्वती का पूर्ण वर्चस्व है, जो अधिकांश सांसारिक कार्य क्षेत्रों की आधार स्वरूपा हैं, भौतिक जीवन की वर्धन शक्ति इन्हीं को कहा गया है। अर्थात् वसन्तोमय कामदेव रसेश्वरी की कृपा से ही जीवन में वृद्धि संभव हो पाती है। ये ही त्रिशक्ति आद्या शक्ति स्वरूपा में माँ सरस्वती को वरदायिनी हैं। जो अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। जो जीवन में वृद्धि, विकास और उच्चता व योग की प्रतीक हैं। रसमय वंसत उत्सव को गृहस्थ जीवन में श्रेष्ठमय बनाने के लिये नवनिधि अनंग शक्ति सौन्दर्यतमा साधना दीक्षा ग्रहण करने से पूरा वर्ष भर भोग-आनन्द और सुख युक्त निर्मित होता है।
सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी महाराज के आशीर्वाद् से सिद्धाश्रम चैतन्य भूमि कोरबा (छ-ग-) में गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी के सानिध्य में सर्व शक्ति प्रदायक महामाया भूमि पर 15-16-17 दिसम्बर को सर्व दुःख हरण महामाया लक्ष्मी शक्ति साधना महोत्सव सम्पन्न होगा।
सूर्य तेजस्वी पितृ कार्य पौषीय अमावस्या पर रविवार प्रातः बेला में सद्गुरुदेव नारायण और शक्ति स्वरूपा माँ भगवती साधकों और शिष्यों को अष्ट सिद्धि नवनिधि की विशेष चेतना से आपूरित करेंगी। जिससे साधक के जीवन का प्रत्येक भाव सुन्दर, सौम्य, आनन्द, धन लक्ष्मी सुखमय युक्त निर्मित होगा।
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