





जब सुख आता है तो जीवन में भोग-विलास भी बढ़ जाता है। भोग-विलासी मनुष्य तन-मन से भोग एवं वासनाओं में निरत तथा मस्त हो जाता है। जबकि यह शास्त्रोच्चित नहीं है। राजा से संन्यासी बने भर्तृहरि जी कहते हैं कि- जब व्यक्ति केवल भोग-विलास में ही लिप्त हो जाता है, तब जीवन भोग के योग्य ही नहीं रह जाता, अपितु भोग ही जीवन को भोग-भोग कर खोखला कर देता है और अन्त में उसे विनाश के दावानल में झोंक देता है। क्योंकि भोगी व्यक्ति को यह ध्यान ही नहीं रहता कि वह अपने सुखों को जाग्रत अवस्था में भोग रहा है अथवा तन्द्रा अवस्था में। कहा जाता है कि- तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः अर्थात् भोग भी त्याग के साथ, सुख भी होश के साथ भोगा जाये तो वह योग बन जाता है।
मनुष्य दुःख को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है, क्योंकि अधिकांश व्यक्ति दुःख से जूझने की जगह आँसू गिराता है और वह निराश होकर कहने लगता है कि ऐसा जीवन समाप्त हो जाये तो ही अच्छा है। जबकि पुरूषार्थी के लिये प्रतिकूलता, विषमता एवं कठिनाइयाँ वरदान स्वरूप सिद्ध होती हैं। भगवान राम का चौदह वर्ष का वनवास कोई अभिशाप नहीं था। उन्होंने कठिनाइयों से भरे वर्षों में वह सब कुछ सीखा, समझा और पाया जिसे वे सामान्य काल में शायद ही पा सकते। राम ने माता सीता का हरण होने के बाद भी असीम धैर्य और सहनशीलता से विपरीत परि- स्थितियों का सामना किया। यही विषम स्थितियां उनके लिये प्रेरणा स्त्रोत बनी और उन्होंने रीछ-वानरों जैसे दुर्बल और कमजोर समझे जाने वाले प्राणियों को इकट्ठा करके महाबली और सर्व साधन सम्पन्न योद्धा रावण से युद्ध किया और विजयश्री प्राप्त की।
अर्जुन और दुर्योधन के जीवन में भी स्थितियां कुछ ऐसी ही बनी। भोग-विलास में पूरी तरह से चूर दुर्योधन ने केवल पुण्य का फल भोगा, भोग-भोग उसे खोखला व विनाश के दावानल में झोंक दिया और उसी के फलस्वरूप पूरी कौरव सेना का विनाश हो गया। जबकि बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के कठोर अज्ञातवास की अवधि में अर्जुन ने विषम परिस्थतियों से लड़कर-जूझकर पाशुपतास्त्र सहित अनेकों-अनेक दिव्य अस्त्रों का ज्ञान और उन शक्तियों को प्राप्त करने में सफल हुये। यदि अर्जुन के समक्ष प्रति पल प्रतिकूलताओं और कठिनाइयों की भयावह स्थिति नहीं होती तो वे भी कष्ट रूपी मार्गदर्शक सारथीमय दिव्य अनुदानों-वरदानों से वंचित ही रहते। प्रतिकूलता अर्जुन की चुनौती बनी व इसे स्वीकार करते हुये संयम तथा साहस के साथ सामना करते हुये विजयश्री का वरण किया।
अब्राहम लिंकन बड़े अभावों और कठिनाइयों के बीच पलकर बढ़े हुये थे। कहा जाता है कि अब्राहम ने स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ाई पूरी की थी। लेकिन अपने अथक परिश्रम, प्रबल इच्छा शक्ति और अदम्य साहस के बल पर वे अमेरिका के राष्ट्रपति पद तक पहुँच गये थे। सूरदास जन्म से अन्धे और निर्धन परिवार से सम्बन्ध रखते थे। भूख से लड़ते हुये वे श्री कृष्ण की भक्ति के रस में ऐसे डूबे कि भगवान् प्रकट हो गये। उनकी काव्य-रचना अद्भुत है। आज भी उनके भजनों को गुन-गुनाकर भक्त झूमने लगते हैं।
स्वामी शरणानन्द भी अन्धे थे और निर्धन भी, परंतु उन्होंने अपने पुरूषार्थ के द्वारा ज्ञान का ऐसा आलोक फैलाया कि उनकी गिनती आज महाज्ञानियों और भक्त-शिरोमणियों में की जाती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में परचम लहराने वाले अधिकांश सन्तों का जीवन कठिनाइयों और अभावों में ही बीता था। नियमित अभ्यास, अथक परिश्रम, चुनौती को स्वीकार करने की प्रबल इच्छा शक्ति, ईश्वर कृपा, गुरु कृपा का आश्रय लेकर व्यक्ति एक के बाद एक सफलता अर्जित कर अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो सकता है। आदमी जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है। इसलिये वैसा सोचो जैसा बनना है। हर काली रात के बाद सुहानी सुबह आती है, इसलिये सदा उजाले की ओर देखो। यदि विचार ऊँचा हो और संकल्प शक्ति दृढ़ हो तो सफलता हमारे पीछे दौड़ी चली आयेगी।
भारतीय संस्कृति को विश्व-संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित करने वाले स्वामी विवेकानन्द के बचपन को छोड़ दिया जाये तो उनका समूचा जीवन भीषण विषमता के दावानल में गुजरा। पिताजी के देहावसान के बाद युवा नरेन्द्र के सामने पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आ खड़ी हुई। अनेक विषम पस्थितियों और साधनहीन होने के बाद भी स्वामी विवेकानन्द ने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया और वह सब कुछ कर दिखाया, जिसे करने के लिये हजारों प्रकार के साधन भी कम पड़ सकते हैं।
साधन एवं सुविधाओं से कोसों दूर क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस ने युद्ध तकनीकों के विशेषज्ञ व साधन सम्पन्न अंग्रेजी सरकार को ऐसी मात दी, जिसे कभी भूला नहीं जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रतिकूलता, विषमता एवं चुनौतियाँ हमें सशक्त बनाती हैं, परंतु हम इन्हें किस रूप में लेते हैं, यही महत्त्वपूर्ण है। यदि कठिन घड़ी में हम रोते-बिलखते रहें तो जीवन अभिशप्त लगने लगेगा और इससे पलायन करने का मन करेगा, भले ही इससे भागना सम्भव हो या नहीं। यदि प्रतिकूलता को हम एक चुनौती की तरह स्वीकार करें, तो हमारे भीतर निश्चित ही संघर्ष से जूझने की इच्छा शक्ति पैदा होगी, हमारा आत्मविश्वास बढ़ेगा। कठिनाइयाँ हमारा सम्बल बनेगी और चुनौती सफलता का सबसे बड़ा आधार और अवसर सिद्ध होंगी।
इस दृष्टिकोण से देखा जाये तो प्रतिकूलतायें अभिशाप नहीं, अपितु वरदान स्वरूप सिद्ध होती हैं। कठिनाइयाँ हमें समर्थ बनाती हैं और चुनौतियां लक्ष्य के प्रति सजग और सचेष्ट करती हैं। विषमता एवं प्रतिकूलता में तन और मन की सारी ऊर्जा एकत्रित होकर उससे निकलने के लिये तत्पर हो उठती हैं। प्रतिकूलता अभिशाप तो उनके लिये होती है, जो दुःख में दुःख के कारणों को दूसरो पर आरोपित करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया जाये तो मनुष्य दुःख में भगवान् के अधिक समीप होता है। सुख में तो वह भगवान् को भूल ही जाता है। जीवन भर दुःख भोगने के बाद भी कुन्ती ने श्री कृष्ण से दुःख ही मांगा था, क्योंकि वह जानती थी कि जब-जब भी उन पर विपत्ति आयी, तब-तब उसने श्री कृष्ण को अपने पास खड़ा देखा और दुःखों से मुक्ति पायी। सरलता व्यक्ति के शक्ति का केन्द्र है, सरलता ईश्वर को भी प्यारी है, आपने देखा होगा जैसे-जैसे बालक चतुर होता जाता है, निजानन्द को खोता जाता है।
संसार के व्यक्तियों में जो बहुधा शिष्टाचार दिखता है, वह प्रायः छलमय होता है और हम अपने आस-पास अधिकांश ऐसे छलमय व्यवहार करते हैं। इस व्यवहार से हृदय आक्रान्त हो उठता है। बालक के हृदय में इस प्रकार का कपट व्यवहार नहीं होता। इसलिये वह हर क्षण आनन्द मग्न रहता है। लेकिन आज-कल सभ्यता का दूसरा नाम छल है। अब सभ्यता कपट-व्यवहार का विकसित रूप है। वास्तव में आज का मनुष्य चतुर बनकर कुछ भी स्थायी लाभ प्राप्त नहीं कर पाता। चतुर व्यक्ति सांसारिक क्रियाओं में कुशल हो सकता है, किन्तु वह आत्मज्ञान से वंचित रहता है। आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिये हमें सरलता को अपनाना चाहिये।
ऋषि-मुनियों ने सहिष्णुता को आध्यात्मिक उन्नति के लिये बहुत ही आवश्यक माना है। श्रेष्ठ बनना अवश्य ही कष्ट साध्य है। लेकिन जिसमें सहनशीलता नहीं, वह उन्नति के शिखर तक नहीं पहुंच सकता। आध्यात्मिक उन्नति की बात छोड़ भी दें, व्यावहारिक जीवन में भी इसकी अत्यन्त आवश्यकता है। वर्ष भर में अनेक ऋतु कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी लू, कभी वर्षा और कभी ओले गिरते हैं, तो कभी भूकम्प आता है, कहीं तीखे कांटे पड़े रहते हैं, तो कहीं नुकीले कंकड़, कभी भूख लगती है, तो कभी प्यास, इस तरह से अनेक अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियां बनती बिगड़ती रहती हैं। इन सबको सहन करना पड़ता है, सहिष्णुता से ही मनुष्य आगे बढ़ता है और उसका व्यक्तित्व, उसके विचार, उसकी आत्मशक्ति विकसित होती है।
सहिष्णु व्यक्ति घबराता नहीं, चिल्लाता नहीं, परवाह नहीं करता। वह प्रतिकूलताओं को अपनी परीक्षा का अवसर मान कर, डटा रहता है। धीरज ही ऐसे व्यक्ति का सम्बल है।
जो व्यक्ति धीरज से भरा है, वह किसी भी समस्या का स्थायी समाधान कर लेता है, जबकि जिनके अन्दर धैर्य का अभाव होता है, वे हड़-बड़ाहट में स्वयं और दूसरो को भी संकट में डाल देते हैं। धैर्य हमें शांति से समस्या के समाधान का मार्ग बताती है, जो धैर्यवान होते हैं, वे सभी समस्याओं का समाधान सरलता से करने में सफल हो जाते हैं।
साधना के पथ पर असीम धैर्य और विश्वास की आवश्यकता होती है, धैर्य आपको टूटने नहीं देगा और श्रद्धा, विश्वास से आपको ईश्वरीय चेतना से प्रेरणा प्राप्त होगी, जिससे आप सही मार्ग का चुनाव कर सकेंगे। ईश्वर हमारी हर प्रकार से मदद करता है, आवश्यकता तो भक्त के समर्पण भाव की है, द्रोपदी की सारी चेष्टायें जब धरी रह गयी, तब उन्होंने कृष्ण को पुकारा और उनके पुकारते ही कृष्ण आये, ईश्वर तो हर क्षण आपकी मदद के लिये तैयार बैठा है, वह तो आपके पुकार का इंतजार कर रहा है—!!
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,