





समर्पण और कर्तव्य जब साथ-साथ चलते हैं, तो जीवन का लक्ष्य प्राप्त होता है। शिष्य के जीवन का लक्ष्य तो सद्गुरुदेव की मुस्कान में निहित होता है। सद्गुरुदेव के वचन उसके लिये मंत्र होते हैं, सद्गुरुदेव के भाव उसके लिये कार्य होते हैं, उनका प्रत्येक प्रवचन हजारो रहस्यों को उद्घाटित करता है। जिन्हें सद्गुरुदेव से भावपूर्ण प्यार है, वे तो उन्हें अपने हृदय में स्थापित कर लेते हैं और इस भाव से साधक को हर पल सद्गुरुदेव की उपस्थिति का भान रहता है।
21 अप्रैल तो पावनतम पर्व है, यह हर्ष और उल्लास का वह पर्व है, जिस दिन सद्गुरुदेव इस धरा पर पधारे देह रूप में माया बिखेरी, लीला दिखाई, साधना और तपस्या का योग बल पुनर्जीवित किया, साधक को उसके स्व का आभास कराया। मार्च 1998 में सद्गुरुदेव ने शिष्यों का आवाहन करते हुये कहा कि- मुख्य बात तो यह है, कि तुम वह स्वरूप साक्षात् कर लो, उसका दर्शन प्राप्त कर लो, जिसे निहारने के बाद समाधि कोई पृथक भाव भूमि रह ही नहीं जाती। गुरु से मिलना, ऐसा ही साक्षात् करने का क्षण होता है। वही समाधि की वास्तविक दशा होती है और ऐसी समाधि किसी भी परिभाषा से बद्ध नहीं होती। न यह निर्विकल्प होती है न सविकल्प, निर्विकल्प अथवा सविकल्प होना तो जड़ समाधि की स्थिति हो सकती है, किन्तु यह स्थिति तो प्रत्येक जड़ता से उन्मुक्त होने की घटना होती है। 21 अप्रैल वस्तुतः तुम्हारे ही नूतन जन्म लेने का पर्व है, क्योंकि गुरु जन्म-मरण की उपाधियों से नितांत मुक्त ही होते हैं। गुरु का जन्म तो प्रतिक्षण होता रहता है। प्रतिक्षण वे जन्म लेने को एक प्रकार से कहूं तो आतुर ही रहते हैं- अपने शिष्यों के हृदय में, उसकी मनोभावनाओं में—!
कितनी भाव पूर्ण रूप से सद्गुरुदेव ने बताया कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध सबसे अधिक पवित्रतम सम्बन्ध होता है। उन्होंने संदेश दिया कि- तुम बार-बार आकर मुझसे मिलते हो, लेकिन सिर्फ शब्दों से ही मिलते हो, कहने मात्र के लिये मिलते हो। तुम्हारा मुझसे मिलना तो तब सार्थक हो सकेगा, जब तुम मुझे अपना जीवन बना लोगे, जब तुम मुझे अपने खून की एक-एक बूंद में उतार लोगे। मुझे अपने अन्दर इतनी गहराई में उतार लो, कि तुम मुझसे अलग रह ही न सको और ऐसा तभी सम्भव हो सकेगा, जब मैं तुम्हारा हृदय बन तुम्हारे भीतर धड़कने लगूंगा। ऐसा नहीं है कि तुमने प्रयास नहीं किया है, मुझे अपना हृदय बनाने का, लेकिन इस बार जब तुम आओगे, तो मैं अवश्य तुम्हारे प्रयास को सार्थक कर दूंगा।
गुरु जन्म दिवस तो प्रेम का दिवस होता है, अमृत दिवस होता है, जिसमें शिष्य उस प्रेम से अभिभूत होता है, कि मैं कितना धन्य हूं और यह दिवस कितना धन्य है, जब सद्गुरुदेव इस धरा पर आये।
यह एक ऐसा उत्सव है, जो होली के रंग-बिरंगे रंगों से सराबोर है, जो दीपावली की जगमगाहट एवं साधनात्मक तीव्रता से युक्त है, जो महाशिवरात्रि के अमृत तत्व से पूर्ण है एवं जो कृष्णमय प्रेम दृष्टि से आप्लावित है, और यही कारण है कि हमारे वेदों, शास्त्रों एवं ऋषियों ने गुरु जन्म दिवस को महोत्सव की संज्ञा से विभूषित किया है।
21 अप्रैल को भगवान नारायण ने जन्म लेकर गुरु गरिमा से गौरवमय बना दिया है, जिसके साथ अनंत शिष्यों, साधकों के जीवन की साधनात्मक चेतना जुड़ी हुयी है। 21 अप्रैल का दिवस अपने भावों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिये आया है। हमारे हृदय का उल्लास, हमारे हृदय की भावनाओं से व्यक्त होगा और जहां भावनायें हैं, वहां सब कुछ प्राप्त हो सकता है। यह आवाहन सद्गुरुदेव के समर्पित शिष्यों के लिये है जिन्होंने गुरु ज्ञान को समझा, गुरुत्व चेतना को जाना, जिन्होंने सद्गुरुदेव को अपने हृदय कमल पर विराजित किया और उनसे आत्मीय रूप से जुड़े हैं।
शिष्य का अहोभाग्य है कि वह अपने जीवन में बार-बार ऐसे दिव्य अमृत महोत्सव से अभिभूत हो पाये व अपने जीवन में सिद्धाश्रम शक्ति युक्त सद्गुरुमय चेतना से आप्लावित होने की क्रिया में निरन्तर संलग्न रहे, क्योंकि ऐसा अवसर तो वर्ष में कभी-कभी ही सृजित होता है और जाग्रत, चैतन्य साधक ही उस दिव्य चेतना को पूर्णतः आत्मसात कर अपने रोम-रोम में समाहित कर पायेंगे।
इस दिव्य अवसर पर जीवन की सभी विषमतायें पितृ दोष, तंत्र दोष, काल रूपी स्थितियां, पूर्व जन्मकृत दोष, भूमि वास्तु दोष, जाने-अनजाने हुये पाप कर्म दोष व नवग्रहों की प्रतिकूलता का शमन सद्गुरुमय महाकाली भैरव सर्व बाधा संहारक तेजमय चेतना में साधनात्मक क्रिया सम्पन्न करने से भौतिक जीवन की दुर्बलता, मलिनता, धन हीनता का शमन हो सकेगा।
इस अमृत महोत्सव में आने पर आपके जीवन में सुमंगलमय स्थितियां निश्चित ही निर्मित होंगी और सद्गुरु नारायण महामाया भगवती सौभाग्य शक्ति की चेतना से युक्त होने हेतु पारदेश्वर ज्योतिर्लिंग पर महामृत्युंजय धन लक्ष्मी रूद्राभिषेक सम्पन्न कर आप अपने जीवन में आरोग्यमय चेतना से आप्लावित होंगे और पूर्ण स्वस्थ दीर्घायु जीवन की प्राप्ति के साथ ही जीवनी शक्ति से आपूरित होंगे व शिव-गौरी परिवारमय गृहस्थ जीवन की सुस्थितियां निर्मित होंगी।
आदि गुरु शंकराचार्य व सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी के अवतरण दिवस पर सर्व शक्ति प्रदायक महामाया भूमि भाटापारा छ-ग- में सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी व वन्दनीय माता जी के दिव्य सानिध्य में 20-21-22 अप्रैल को नारायण भगवती अमृत महोत्सव में सिद्धाश्रम संस्पर्शित नारायण महामाया राजयोग कर्ण पिशाचिनी व अक्षय सौभाग्य धन लक्ष्मी शक्तिपात दीक्षा व साधना सम्पन्न करने से साधकों का जीवन धन लक्ष्मी गणपति कार्तिकेय रिद्धि-सिद्धि शुभ-लाभ शिव-महामाया शक्ति चेतना से युक्त हो सकेगा, जिससे अक्षय धन लक्ष्मी, कार्य व्यापार वृद्धि, संतान सुख, सौभाग्य शक्ति व शत्रु विहीन जीवन निर्मित होगा। सद्गुरु जन्मोत्सव पर आपका सपरिवार हृदय भाव से स्वागत है—!!
सद्गुरुदेव नारायण का अवतरण दिवस 21 अप्रैल सभी शिष्यो, साधको के लिये हर्ष, गौरव, उत्सव के साथ ही साथ सद्गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिव्य दिवस है। प्रत्येक वर्ष इस दिवस पर हम सभी मिलते हैं और अपने भावमय कंठ से उनका आवाहन कर उनकी करूणा, उनके प्रेम के प्रति आभार प्रकट कर अपने जीवन की जो भी दुर्बलता, विषमता होती है, उनसे पार पाने की याचना, विनय करते हैं। हर वर्ष इस दिव्य दिवस पर उपस्थित होकर हम अनेक विशिष्टतायें स्वयं में समाहित कर पाते हैं, वास्तव में यह जन्मोत्सव तो सद्गुरुदेव का बहाना है, मूल उद्देश्य तो शिष्यों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना होता है, शिष्यों के जीवन की समस्याओं का निराकरण करना होता है।
यह अवसर हमें सद्गुरुदेव द्वारा निर्धारित पद् चिन्हों पर जाग्रत, चैतन्य भाव से अग्रसर रहने की प्रेरणा देता है, साधना, तप, पूजन, दीक्षा के माधयम से जीवन को उन्नति-प्रगतिमय बनाने की समर्थता प्रदान करता है। इस नारायणमय दिवस पर सद्गुरुदेव और आपके गुरु-शिष्य आत्मीय सम्बन्धों में और अधिक प्रगाढ़ता आये और आपका जीवन खुशहाल, समृद्ध, वैभवशाली और यशस्वी बन सके। इस हेतु आपका हृदय से आवाहन करता हूं।
आपका गुरुदेव
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