





वास्तव में परमात्मा के सभी संतान बंधन मान तो सकते हैं, लेकिन बंधन उन्हें हो नहीं सकता। वायु को कोई बांध नहीं सकता है, जल को कोई बांध नहीं सकता है, तुम जमीन को भी बांध नहीं सकते हो। तुम बंधन मान सकते हो, लेकिन बंध नहीं सकते, क्योंकि तुम्हारा यह जन्म पहली बार नहीं है, तुम इससे पहले भी जन्म लेकर मर चुके हो, ऐसा सैकड़ो बार हुआ है, जब तुम्हें जन्म लेना पड़ा, तुम्हारा यह जीवन कोई नया नहीं है।
तुम्हारे स्मृति में कुछ भी नहीं है, ना पूर्व जन्म की पत्नी, बच्चे, मां-बाप कुछ भी नहीं और तुम्हारा सम्बन्ध यदि किसी से भी सदा से है, कुछ ऐसा है जो शाश्वत है तुम्हारे साथ, तो तुम्हारा और गुरु का सम्बन्ध, गुरुत्व शक्ति से जो तुम्हारा सम्बन्ध है, वह शाश्वत है, सदा से है।
इसलिये हमेशा से तुमसे कहता हूं, तुम अपने भीतर के मनुष्य को जानो, अपने को जानो, जितना तुम स्वयं को जान सकोगे जितना अधिक तुम अपने भीतर जा सकोगे, उतना ही तुम अपनी शक्ति की महिमा समझ सकोगे, अपने इष्ट भगवान अथवा गुरु की चेतना को अपने भीतर आत्मसात कर सकोगे, तब ही तुम्हारे भीतर स्वः शक्ति विस्तार हो सकेगा। यह तुम्हारा शरीर तो नश्वर, मरणहार है, इस शरीर के साथ मत अटको, गुरु के शरीर के साथ भी मत अटको। मुझ में भी मत अटकना, मेरे दिये ज्ञान में भी मत अटकना। अपने भीतर जाओ, साध्य करो, तब ही अपने को जान सकोगे। अपने भीतर साधना का दीपक जलाओ, अपने आपका दीपक स्वयं बनो, किसी के दीपक की उधार की रोशनी से तुम्हारे मन का अंधकार नहीं जायेगा।
प्रत्येक व्यक्ति के योग्य कोई न कोई स्थान अवश्य होता है, ऐसे ही जिस विरह की, जिस प्रेम की, जिस ज्ञान की बात मैं कर रहा हूं, उसके योग्य जो होगा, उसे मेरी बात अवश्य समझ आयेगी, जिस प्रार्थना से हृदय द्रवित हो जाये, जिस प्रार्थना को करके असीम आनंद प्राप्त होता हो, वह प्रार्थना आप कर सकें, ऐसा विनय, याचना आप ईश्वर से, गुरु से कर सकें, तो यह आपके जीवन की सबसे बहुमूल्य उपलब्धि होगी। गुरु की पूजा करो, स्तुति करो, प्रतिदिन करो, निश्चय ही गुरु का पूजन करना चाहिये और वास्तव में यदि संसार में कुछ पूजने योग्य है, यदि किसी की पूजा सर्वोपरि है, तो वह केवल और केवल गुरुत्व शक्ति ही है, उनकी पूजा कल्याणकारी है, मंगलदायक है, लेकिन इसके साथ अनिवार्यता यह है कि तुम उनके द्वारा बताये गये पथ का अनुसरण भी करो, तुमने गुरु की स्तुति कर ली, पूजा कर ली, आरती कर ली, उसके पश्चात् तुम सारे कर्म गुरु आज्ञा के विरूद्ध करो, उनके द्वारा बताये पथ का अनुसरण ना करो, तो ऐसे पूजा, स्तुति, साधना का क्या मतलब? जिसमें गुरु के सिद्धांत की अवज्ञा होती हो, तुम केवल जय गुरुदेव, जय गुरुदेव करके गुरु के प्रिय नहीं बन सकते और तुम्हारा लक्ष्य भी यह नहीं है कि तुम गुरु के प्रिय बनो, तुम्हारा लक्ष्य तो है पूर्णता प्राप्त करना।
और पूर्णता तभी प्राप्त कर सकते हो, जब गुरु द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण करो, लेकिन तुम्हें लगता है कि गुरु ने कह दिया, गुरु का तो काम ही है प्रवचन करना, दीक्षा देना, साधना सम्पन्न करवाना, तुम यह चिंतन तो करो कि यह सब किसके लिये, ये सारी क्रियायें गुरु किसके लिये सम्पन्न करता है, वह तुम्हें जो आज्ञा प्रदान कर रहा है, उसका हेतु क्या है, तुम जरा सोचना—! और तुम्हें इस विषय पर सोचना ही चाहिये—!!! तुम कभी शांत मन से सद्गुरुदेव का ध्यान कर चिंतन तो करो, प्रभु नारायण के सूत्रो को कभी खोल के पढ़ो कि वे क्या कहते हैं, किस प्रकार की समर्पण, शिष्यता की बात वे करते हैं, क्या तुम्हारे भीतर वैसा भाव है? क्या तुम उस रूप में स्वयं को पाते हो? आध्यात्मिक साधना के बारे में सद्गुरुदेव नारायण क्या कहते हैं, यह भी तो जान लो। तुमने सद्गुरुदेव की फोटो तो लगा ली, धूप, दीप, अगरबत्ती लगा कर आरती भी गाने लग गये, लेकिन उनके वचनों के अनुसार जीवन को कितना ढ़ाला? यह प्रश्न स्वयं से पूछना—-!!!
तुम अपने हृदय में ईश्वर को बैठाओ, तो वह तुम्हारे हृदय को सच्चे प्रेम से भर देगा, लेकिन कैसे बैठाओगे तुम्हारा हृदय तो सांसारिक बंधनो से भरा पड़ा है। तुम्हारे हृदय में क्या-क्या भरा पड़ा है, तुम्हारे हृदय में भरा है स्त्री अथवा पुरूष का सम्बन्ध। पुरूष है तो स्त्री के बारे में सोचता है, स्त्री है तो पुरूष के बारे में सोचती है, दूसरे अर्थ में इसे कामुकता कहते हैं। काम वासना तो प्राकृतिक है, सृष्टि रचियता की इच्छा से काम वासना प्राप्त हुयी है, लेकिन कामुकता ईश्वर ने नहीं दी, अन्तर है दोनो में, शरीर में हारमोन्स के कारण सहज ही मन में कामवासना जगने लग जाती है, इस कामवासना की पूर्ति तो की जा सकती है, लेकिन कामुकता की पूर्ति नहीं की जा सकती है। पर कई लोगों के मन में सदा एक ही घण्टी बजती है, भीड़ भरा बाजार हो या भरी हुयी ट्रेन, ये लोग इसी ताक में रहते हैं, कि किसी नारी के शरीर से छेड़खानी कर लें, ऐसा वही लोग करते हैं, जिनके मन में सदा कामुकता भरी होती है।
ऋषि पराशर गृहस्थ थे, विवाहित थे, गुरु वशिष्ठ गृहस्थ थे, विवाहित थे, गुरु नानक साहब विवाहित थे, लम्बी कतार है, ऐसे लोगो की, विवाहित ऋषियों की। उन्होंने संतान भी उत्पन्न की और संतान उत्पन्न करने की प्रक्रिया उनकी भी वही थी, जो साधारण मनुष्य की होती है। लेकिन सन्तान उत्पन्न करने के बाद भी, स्त्री-पुरूष का संयोग हो जाने के बाद भी, उनके संत तत्व में कोई कमी नहीं आयी। उनकी ऋषि प्रवृत्ति कोई ढ़ीली नहीं पड़ गयी, पराशर ऋषि ने वेदव्यास जैसे पुत्र को जन्म दिया है। कामवासना तो प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन कामुकता मनुष्य के मन की गिरावट है, नीचता है। अब मुझे बताओ जिस मन में हमेशा कामुकता का चिंतन चलता रहे, जिस मन में विषयों का चिंतन चलता रहे, उस हृदय में ईश्वर, सद्गुरु का वास कैसे होगा? यदि तुम्हारे मन में धन का चिन्तन चलता रहता है कि कैसे भी धन मिल जाये, धन कैसे बढ़ा लूं, खानी तो तुम्हें दो ही रोटियां है, फिर क्यों अम्बार लगाने में लगे रहते हो। मेरे कहने का तात्पर्य ऐसा भी नहीं है कि तुम कर्महीन हो जाओ, कर्म ही ना करो, कर्म भी करो, धन भी कमाओ, पर कमाओं ईमानदारी से, आडम्बर के लिये नहीं, जीवन यापन के लिये संग्रहित करो, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कर्म करो।
तुम अपने मन की वासनाओं से बाहर तो निकलो, दुनिया उसके आगे भी है। पर तुम एक ही चार-दीवारी में अटके हो, तुम उन्हीं बंधनों में स्वयं को जकड़े हुये हो, जकड़ना नहीं है, कर्तव्य पालन करते हुये आगे निकलना है, मानव कर्तव्यों का, जीवन के प्रति जो कर्तव्य हैं, उसका पालन करते हुये स्वयं के लक्ष्य को प्राप्त करना है, यह तुम्हारा उद्देश्य है। तुम अपने उद्देश्य की ओर उन्मुख तो हो, फिर तुम आभास कर सकोगे, कि वास्तविक रूप से तुम्हें क्या करना है।
नव संवत्सर मंगलमय हो——आप का जीवन सफल हो——-!!!
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