





पूर्व में कहा गया है कि ज्ञान-प्राप्ति के लिये शिष्य की पात्रता ही मुख्य है, गुरु गौण है। गुरु की केवल उपस्थिति आवश्यक है जिससे घटना घटती है। गुरु कुछ करता नहीं, वह न ज्ञान दे सकता है, न मुक्ति अपितु शिष्य की पात्रता ही इसका कारण होती है किन्तु गुरु की उपस्थिति के बिना यदि घटना घटती है तो वह उससे सँभल नहीं सकता। उस स्थिति में गुरु ही सँभालता है। किन्तु आत्म-ज्ञान हो जाने पर वह शिष्य स्वयं गुरु हो जाता है। वास्तविक गुरु तो भीतर बैठी आत्मा ही है, अन्य कोई नहीं। उसी गुरु को प्रकट करने में बाहरी गुरु सहायक मात्र होता है। इसलिये यह बाह्य गुरु निमित्तमात्र होता है एवं आत्म-ज्ञान के पूर्व ही उसकी आवश्यकता होती है। बाद में स्वयं का भीतरी गुरु प्रकट हो जाने पर इस बाह्य गुरु का भी त्याग कर देना चाहिये जैसे अन्य विधि-विधान, शास्त्र, धर्म, सम्प्रदाय, जाति आदि का त्याग किया जाता है, यहां तक कि मूर्ति-पूजा, कर्मकाण्ड, साकार-उपासना आदि का एवं ईश्वर का भी त्याग कर देना चाहिये वरना वे भी बन्धन बन जाते हैं जैसे रामकृष्ण ने काली का त्याग किया था, शंकराचार्य इसीलिये ईश्वर को भी माया कह कर त्याग करने की बात कहते हैं, बुद्ध ने आत्मा के भी त्याग की बात कही है।
इसी प्रकार स्वयं का गुरु प्राप्त होने पर इस बाह्य गुरु का भी त्याग आवश्यक है वरना जो गुरु मुक्त कराता है वही बाद में बन्धन बन जाता है। आत्मा ही हमारा सच्चा गुरु है। बुद्ध इसीलिये कहते हैं ‘अपना प्रकाश स्वयं बनो’ (अप्प दीपो भव) दूसरों के दीपक से काम नहीं चलेगा। अष्टावक्र कहते हैं कि जो किसी भी विधि से, चाहे वह अपेक्षा की हो अथवा समता की, चाहे इन संसारी द्वन्द्वों की उपेक्षा कर दी जाय अथवा इनको समान मान लिया जाय, कृष्ण ने समता की बात कही है ‘सुखदुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ’ (सुख-दुःख, लाभ-हानि एवं जय-पराजय को समान मानकर) अथवा किसी अन्य युक्ति से जिसने अपने चैतन्य स्वरूप को जान लिया है वही अपने को संसार से तार लेता है एवं ऐसा ज्ञानी स्वयं ही गुरु है।
फिर उसे अन्य गुरु की आवश्यकता नहीं है। जैसे किनारे लगने पर नाव का त्याग किया जाता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आत्म-ज्ञान के पहले भी गुरु नहीं होना चाहिये किन्तु वह गुरु भी आत्म-ज्ञानी ही हो सकता है, अन्य कोई न गुरु हो सकता है, शिक्षक भी हो सकता है किन्तु वह गुरु नहीं कहला सकता।
मनुष्य का वास्तविक स्वरूप चैतन्य आत्मा है। यह भूत-सृष्टि उसका विकारमात्र है, उसका विकृत स्वरूप है। मनुष्य की जैसी दृष्टि होती है वैसी ही यह सृष्टि दिखाई देती है। ज्ञान के अभाव में यह सत्य एवं आकर्षक प्रतीत होती है इसका कारण है हमारी इच्छायें, वासनायें, हमारे हित इससे जुड़े हैं इसलिये इसका यही स्वरूप हमें दिखाई नहीं देता। हम उसकी उपयोगिता को दृष्टि में रखकर देखते हैं। जो हमारे लिये उपयोगी है, हमारी इच्छाओं और वासनाओं को पूरा करती है जिससे हमारा हित होता है उसे हम श्रेष्ठ समझते हैं व दूसरों को व्यर्थ। इसलिये हमारी स्त्री, हमारे बच्चे, हमारा घर, हमारा खेत आदि के साथ हमारे स्वार्थ व वासनायें, कामनायें, अपेक्षायें जुड़ी होने से हमें जितने अच्छे लगते हैं उतने दूसरे नहीं किन्तु यह उनका वास्तविक स्वरूप नहीं है। यह उन पर हमारे मन का ही प्रक्षेपण है अन्यथा व्यक्ति-व्यक्ति में, वस्तु-वस्तु में भेद नहीं है। अष्टावक्र कहते हैं कि संसार में यह समस्त भूत, सृष्टि, इन्द्रिय, देह आदि उस चैतन्य आत्मा का विकार है। इसे तू चैतन्य से भिन्न भूतमात्र देखेगा उसी क्षण तू बन्ध से मुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जायेगा।
वासना के कारण यह सृष्टि भूतमात्र न दिखाई देकर अन्य प्रकार की दिखाई दे रही है। यही बन्ध है। अतः इस बन्धन-मुक्ति के लिये केवल दृष्टि-परिवर्तन करना है। वस्तु को अपने स्वरूप में देखना ही ज्ञान है।
इसी को स्पष्ट करते हुये अष्टावक्र कहते हैं कि यह संसार भूत मात्र है किन्तु हमारी वासना के कारण ही यह हमें सत्य दिखाई देता है अन्यथा है मिथ्या, सारहीन। इसलिये वासना ही संसार है एवं वासनाओं के त्याग से ही संसार-त्याग हो जायेगा। संसार तो जैसा है वैसा ही रहेगा किन्तु तू इससे मुक्त हो जायेगा, वासना के कारण ही यह संसार तेरा बन्धन है। इसने तुझे बाँधा नहीं है, अपनी वासना के कारण तू खुद ही इससे बँध गया है।
अपनी वासनापूर्ति हेतु तथा अनेकों प्रकार की अपेक्षाओं के कारण ही तू स्त्री, पुत्र, घर-गृहस्थी, परिवार, समाज आदि से बँधा है। जिस क्षण वासना एवं अपेक्षाओं का त्याग कर दिया उसी क्षण तू मुक्त ही है। तुझे मुक्त होने के लिये कहीं घर छोड़कर जंगल भागना नहीं पड़ेगा, पत्नी, बच्चे, परिवार, समाज आदि कुछ भी छोड़ना नहीं पड़ेगा। वासना यदि छूट गई तो फिर तू जहाँ चाहें वहाँ रह। वासना के रहते तू हिमालय की गुफा में जाकर रहेगा तो भी संसार में ही है। वहाँ भी मुक्त नहीं है। अष्टावक्र सभी प्रकार की वासना की बात कह रहे हैं चाहे वह लोक-वासना हो या शास्त्र-वासना अथवा शरीर-वासना। शरीर एवं शास्त्र-वासना का भी त्याग करने से आत्म-ज्ञान हो जाता है किन्तु अन्त में आत्मा, ईश्वर आदि के भी त्याग से ही मुक्ति होती है। यह शुद्ध वासना या अहंकार है जिसके मुक्त होने से ही परम मुक्ति या निर्वाण है।
इसलिये बुद्ध ने आत्मा को भी असत्य कहा है। यह परम नहीं है।
नवें प्रकरण में अष्टावक्र ने कहा कि यह संसार द्वन्द्वात्मक है जिसमें शांति है ही नहीं अतः इसकी उपेक्षा करने से ही शांति प्राप्त हो सकती है। वासना का त्याग ही उसके प्रति उपेक्षा है। इस प्रकरण में अष्टावक्र कहते हैं कि मोक्ष-प्राप्ति में ‘काम’ दुश्मन के समान है। जहाँ काम अर्थात् कामना है वहीं संसार है तथा अर्थ अथवा धन-सम्पत्ति तो अनर्थ का कारण है ही। संसार के सारे अनर्थों के मूल में कामना और अर्थ ही है। इन दोनों की उपेक्षा से ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। यहाँ पर भी अष्टावक्र इन्हें छोड़ने की बात न कह कर उनके उपेक्षा की बात कहते हैं कि न ये प्रशंसनीय हैं न निंदनीय बल्कि उपेक्षा के योग्य हैं। आत्म-ज्ञानी को इनकी उपेक्षा करनी चाहिये क्योंकि निंदा व प्रशंसा दोनों में कामना ही है जो वैरस्वरूप है। साथ ही अष्टावक्र इन दोनों के कारण रूप-धर्म की भी उपेक्षा करने की बात कहते हैं। शास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों को महत्व दिया है। संसारी व्यक्ति को प्रथम तीन का सेवन करते हुये मोक्ष-प्राप्ति की ओर ही बढ़ना चाहिये, क्योंकि वही जीव की अन्तिम स्थिति है किन्तु मोक्ष-प्राप्ति से ध्यान को हटाकर बाकी तीन का सेवन करते रहना ही भोगवादी दृष्टि है एवं मोक्ष का ध्यान रखकर इनका सेवन करना धर्मसम्मत माना गया हैं अष्टावक्र आत्म-ज्ञानी जनक को मोक्ष-प्राप्ति-हेतु काम तथा अर्थ के साथ ऐसे धर्म की भी उपेक्षा करने को कहते हैं क्योंकि ऐसा धर्म भी धर्म नहीं है, यह भी बन्धन का कारण है। यह भी साधनमात्र था। सिद्धि मिलने, पर, सभी साधन छोड़ देने चाहिये। तभी होती है परम स्वतन्त्रता, परम मुक्ति।
भारतीय धर्म संसार विरोधी कभी नहीं रहा। उसने कभी भी नहीं कहा कि संसार मिथ्या है, झूठा है, नरक है, माया है, इसमें दुःख ही दुःख हैं, सुख इसमें है ही नहीं, ये स्त्री, पुत्र, धन, मकान, मित्र, सगे-सम्बन्धी आदि सभी नरक में ले जाने वाले हैं इनका त्याग कर जंगल में भाग जाओ, हिमालय की गुफा में रहो, ये सब बन्धन के कारण हैं, इनको छोड़ने से मुक्ति हो जायेगी आदि। ये सब मूढ़ मान्यतायें हैं जो धर्म से अनभिज्ञ अज्ञानियों द्वारा व्यक्त की गई हैं। धर्म तो संसार को मोक्ष-प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन मानता है जिसमें रह कर ही मोक्ष उपलब्ध किया जा सकता है इसीलिये देवता भी मोक्ष-प्राप्ति हेतु पुनः संसार में आने के लिये लालायित रहते हैं। यह संसार ही वह पाठशाला है जिसमें अनुभव प्राप्त कर मुक्ति की साधना संभव है किन्तु इसमें आकर भोगवादी दृष्टि से मनुष्य का पतन होता है। अतः निंदा संसार की नहीं इसके प्रति वासना, तृष्णा, अहंकार, कामना आदि की है।
इसका भी कारण यह है कि यह संसार व इसके भोग एवं सभी नाते-रिश्ते क्षणिक हैं, शाश्वत नहीं है, थोड़े दिन के हैं। भारतीय अध्यात्म क्षणिक की अपेक्षा शाश्वत को महत्व देता है। भारत ने इस शाश्वत को ही सत्य कहा है जो तीनों काल में स्थिर रहे। क्षण-क्षण बदलने वाला सत्य नहीं है। इसी कारण अष्टावक्र कहते हैं कि जैसा स्वप्न में सब कुछ दिखाई देता है किन्तु उसके टूटने पर सारा विलुप्त हो जाता है, इन्द्रजाल में कई वस्तुयें भ्रमवश दिखाई देती हैं इसी प्रकार मोक्ष की इच्छा करने वाले को इस संसार को स्वप्नवत् एवं इन्द्रजाल के समान मानना चाहिये। क्योंकि ये मित्र, खेत, धन, मकान, स्त्री, भाई आदि समस्त सम्पदायें थोड़े समय के लिये सत्य हैं। ये शाश्वत नहीं हैं कि हर जन्म में तुम्हारे साथ रहेंगी ही। मृत्यु पर स्वप्न की भाँति सारा दृश्य बदल जायेगा। अगले जन्म में फिर सब नये सम्बन्धी होंगे, नये रिश्ते होंगे। इस प्रकार अनेक जन्मों में अनेक रिश्ते बनेंगे व मिटेंगे। इनमें तुम्हारा साथ देने वाला कोई भी नहीं है न तुम किसी का साथ दे सकोगे। ये सब तीन या पाँच दिन ही टिकेंगे यानि क्षण-भंगुर हैं। अतः ज्ञानी को मोक्ष-प्राप्ति हेतु इन सबकी उपेक्षा करनी चाहिये। अष्टावक्र भी इन्हें छोड़कर भागने की मूर्खता-पूर्ण बात नहीं कहते हैं। वे कहते हैं कि इस तथ्य का बोध हो जाना पर्याप्त है। इस बोध से ही आत्म-क्रान्ति हो जायेगी। बिना बोध के संसार छोड़ने से कुछ नहीं होगा। उनका सारा उपदेश बोध का ही है।
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