





वास्तव में यह सद्गुरुदेव नारायण की असीम कृपा का युग है, इस युग के सभी शिष्य ऋणी हैं, जो उन्होंने अपना सर्वस्व, अपनी शक्ति, चेतना, ज्ञान, प्राण ऊर्जा और अपना गुरुत्व पूज्य सद्गरुदेव कैलाश श्रीमाली जी को प्रदान किया, केवल और केवल अपने शिष्यों के जीवन को प्रकाशवान, दैदीप्यमान, ऊध्वर्गगामी बनाने के लिये, उन्हें पूर्णता प्रदान करने के लिये।
यह लेख जिसे मैं आपके सामने स्पष्ट कर रहा हूं, जब विक्रम सम्वत् 2075 का प्रारम्भ होने को है, जब पूज्य सद्गुरुदेव कैलाश श्रीमाली जी को गुरुपद की गरिमा पर आसीन हुये, अपने जीवन के सबसे बहुमूल्य दायित्व का निर्वाह करते हुये, निखिल शिष्यों में प्राणशः चेतना का संचार करते हुये इस विक्रम सम्वत् 2075 को 25 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इन 25 वर्षो की अवधि में पूज्य सद्गुरुदेव के जीवन का जो उद्घोष रहा, जिसे मैं पिछले 25 वर्षो में साक्षीभूत रूप से अनुभव कर रहा हूं, उनके जीवन के उतार-चढ़ाव को मैंने देखा है, जिसके आधार पर मैं कहना चाहता हूं कि उनमें जीवन के संकटो से जूझने का जो साहस, धैर्य, संयम और समुद्र की भांति जो गंभीरता है वह परिचय है, उनकी उस पृष्ठभूमि का जो सामान्यतः दृश्य नहीं होता, जो अदृश्य है।
जो सांसारिक क्रियाओं के आवरण से ढंका अवश्य है, परन्तु अनुभव की पटल पर स्पष्ट है। जिसे अनुभव किया है, इस युग के हजारों-हजारों शिष्यों ने और उन शिष्यों ने यह भी स्पष्ट कहा है कि पूज्य सद्गुरुदेव पूर्णतः सद्गुरुदेव नारायण की भांति ही सभी शिष्यों से आत्मीयता रखते हैं, उनकी ही तरह जीवन के संकटों का निवारण और मार्गदर्शन करते हैं।
वह काल जो विक्रम सम्वत् 2050 के प्रथम दिवस घटित हुआ था, उस समय प्रभु निखिल के जो वक्तव्य थे, जो उन्होंने अपने आशीर्वचन् में पूज्य सद्गुरुदेव से कहा था- मैं तुम्हारे सामने एक ज्योति के रूप में खड़ा हूं, जिसके प्रकाश में तुम निरन्तर अग्रसर हो सको और अपने पूरे जीवन को, अपने पूरे शरीर को, अपने पूरे मन, प्राण और चेतना को, मेरे इन शिष्यों के बीच तुम वितरित कर सको, जो कुछ मैं तुम्हें प्रदान करुं, उसके माध्यम से मेरे शिष्यों को पूर्णता दे सको, उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रख सको, उनकी तकलीफो को दूर कर सकने में, उनको प्राणशः चेतना देने में, उनके जीवन की न्यूनताओं को दूर करने में, ना आप अपनी शरीर की चिन्ता करेंगे, ना प्राणों की, ना सुख की और ना भावनाओं की, ना समय की, ना दिन की और ना रात की केवल एक ही लक्ष्य तुम्हारा रहना चाहिये, केवल एक ही दिशा निर्धारित रहना चाहिये, एक ही क्रिया-कलाप रहना चाहिये, एक ही बात रहनी चाहिये, कि तुम्हें तुम्हारे जीवन का प्रत्येक क्षण इन शिष्यों के लिये व्यतीत करना है।
पूज्य सद्गुरुदेव के जीवन का प्रत्येक क्षण उसी समय से निखिल शिष्यों के कल्याणर्थ, उनके जीवन को सुखमय बनाने की ओर अग्रसर हुआ, जो निरन्तर पच्चीस वर्षों से उसी रूप में गतिशील है। उन्होंने प्रभु नारायण की आज्ञा अनुसार उसी रूप में अपने जीवन का सर्वस्व शिष्यों के जीवन को पूर्णता प्रदान करने में, उनके कर्मदोषों को दूर करने में, शिष्यों के जीवन को आनन्द से सराबोर करने में अपने जीवन की सारी ऊर्जा लगा दी और यह कार्य पूर्ण करने में उन्होंने ना दिन देखा, ना रात देखी, ना उन्हें अपने शरीर की चिंता रही, ना अपने प्राणों की, चाहे एक शिष्य हो या हजार प्रत्येक शिष्य से व्यक्तिगत रूप से मिलते हैं, उसकी समस्याओं को सुनकर निवारण करते हैं, वास्तव में पूज्य सद्गुरुदेव गुरुपद पर आसीन होने के अगले क्षण से ही सद्गुरु नारायण की सानिध्यता में सबसे अधिक साधना शिविर में उपस्थित होते रहे और वे उसी समय से शिष्यों के कल्याण के लिये कार्यरत हैं, जो अनवरत् पच्चीस वर्षों से उसी रूप में गतिशील है, जैसा प्रभु निखिल चाहते थे, उनका कार्य साधना महोत्सव अग्रसर हैं, जैसा वे चाहते थे, जैसी उनकी इच्छा थी।
उन्होंने अपने जीवन का एक ही लक्ष्य, एक ही उद्देश्य रखा कि किस तरह से शिष्यों के जीवन में अनुकूलता प्रदान की जा सके। उनके प्रत्येक क्षण का एक ही चिंतन रहा, कि शिष्यों के जीवन के संकटों का निवारण हो सके, इस हेतु उन्हें अनेक संकटों, समस्याओं, आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, कभी-कभी शिष्यों के रोष का विष भी वे महाकाल की भांति पी गये, लेकिन कभी भी शिष्यों पर आंच नहीं आने दिया। उन्होंने शिष्य समुदाय के संकटों को स्वयं सहन किया, शिष्यों के लिये अनेक कष्ट सहन किये और यह सिद्ध किया कि वे सद्गुरुदेव नारायण के द्वारा निर्धारित पथ के उच्चतम सफल पथिक हैं, सिद्धाश्रम के महान योगी हैं, उनकी विराटता को कई शिष्यों ने अनुभव किया है, उनके विराट स्वरूप का दर्शन किया है और कहा है कि पूज्य सद्गुरुदेव स्वयं में सिद्धाश्रम के पूर्ण सिद्ध तंत्र महायोगी हैं, सद्गुरुदेव नारायण ने स्वयं एक साधना शिविर में इसकी घोषणा अपने श्रीमुख से की थी।
पूज्य सद्गुरुदेव के व्यक्तित्व को शब्दों में समेटा नहीं जा सकता। वे तो ब्रह्म स्वरूप है, जो अनन्त तक असीमित है। सांसारिक आवरण तो गुरु का एकमात्र चोला होता है, जिसे वह समय-समय पर बदलता रहता है। वास्तविक क्रिया तो उस देह में गुरुत्व शक्ति की है, जो स्वयं को देह के माध्यम से अभिव्यक्त करती है।
पूज्य सद्गुरुदेव की क्रियायें भले ही स्वयं में जटिल व कठोर हों, उनका बाहरी स्वरूप भले ही कठोर और सख्त दिखता है, परन्तु उनका मूल स्वरूप, उनका गुरुत्व स्वरूप पूर्ण स्नेह, प्रेम, आत्मीयता और वात्सल्य से भरा है, जो बाहर से चोट तो करते हैं, परन्तु भीतर से एक कुशल कुम्हार की भांति उसे सम्भालते रहते हैं, जब तक उस शिष्य में, उस घड़े में परिपक्वता नहीं आ जाती। और जब वह शिष्य परिपक्व हो जाता है, तो उसे साधना के उच्चतम पथ पर गतिशीलता प्रदान करते हैं, उसके जीवन को अनुकूल बनाने में अपनी ओर से पूरा प्रयास करते हैं।
सत्य यही है कि पूज्य सद्गुरुदेव का सानिध्य और उनकी सामीप्यता पाकर हम शिष्यों का जीवन धन्य-धन्य हो गया। उनके विराट स्वरूप की निकटता सदा मिलती रहें, उनकी सानिध्यता जन्म-जन्म प्राप्त करते रहें, पूज्य सद्गुरुदेव से यही प्रार्थना है, यही विनय करता हुआ, उन्हें कोटि-कोटि नमन करता हूं।
अरूण मिश्रा
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