





जीवन है, लेकिन जीने का भाव नहीं! जीवन है, लेकिन एक बोझ की भांति! वह सौंदर्य, समृद्धि और शांति नहीं है और यदि आनंद न हो, आलोक न हो, तो निश्चय ही जीवन नाम मात्र को ही जीवन रह जाता है। क्या हम जीवन को जीना ही तो नहीं भूल गये हैं? पशु-पक्षी और पौधे भी हमसे ज्यादा सघनता, समृद्धि और संगीत में जीते हुये दिखते हैं।
लेकिन शायद बाहरी दृष्टि से मनुष्य की समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है, फिर भी उत्तर में मैं कहूंगी, परमात्मा मनुष्य को उसकी तथाकथित समृद्धि से बचाये। वह समृद्धि नहीं, बस केवल दरिद्रता और दीनता को भुलाने का उपाय है। यह समृद्धि, शक्ति और प्राप्ति से पलायन है। समृद्धि के बाहरी वस्त्रों को उतार कर जब मनुष्य को देखती हूं तो उसकी आंतरिक दरिद्रता को देख कर हृदय बहुत विषाद से भर जाता है। क्या इस दरिद्रता को छिपाने और विस्मरण करने के लिये ही हम ऐसी समृद्धि ओढ़े हुये हैं?
जो थोड़ा सा भी विचार करेगा, वह सहज ही इस सत्य से परिचित हो जायेगा। आत्महीनता से पीडि़त व्यक्ति पद को खोजता है और आत्म-दरिद्रता से ग्रसित धन और संपदा को। मनुष्य जो भीतर होता है, साधारणतः ठीक उसके विपरीत ही वह बाहर स्वयं को प्रकट करता है। इसलिये ही दरिद्र संपदा को खोजते हैं और जो संपदाशाली हैं, वे दरिद्रता को वरण कर लेते हैं! क्या आपने दरिद्रों को सम्राट और सम्राटों को दरिद्र होते नहीं देखा है?
इसलिये यह न कहें कि मनुष्य की समृद्धि बढ़ गई है। वस्तुओं की समृद्धि तो बढ़ी है पर मनुष्य की समृद्धि नहीं। वह और भी दरिद्र हो गया है। मनुष्य बाह्य समृद्धि को बढ़ाने की पागल दौड़ में निरंतर और भी दरिद्र ही होता जायेगा। क्योंकि इस दौड़ में वह यह भूलता ही जा रहा है कि एक और प्रकार की समृद्धि भी है, जो बाहर नहीं, स्वयं के भीतर ही उपलब्ध की जाती है। वस्तुओं का बढ़ता जाना ही एकमात्र विकास नहीं है। एक और विकास भी है, जिसमें स्वयं मनुष्य भी बढ़ता है। निश्चय ही वही विकास वास्तविक है जिसमें मानवीय चेतना बढ़ती हों और प्रगाढ़ता, सौंदर्य, संगीत और सत्य को उपलब्ध होती हों।
मैं आपसे ही पूछना चाहती हूं कि क्या आप वस्तुओं के संग्रह से ही संतुष्ट होना चाहते हैं? या चेतना के विकास की भी प्यास आपके भीतर है? जो मात्र वस्तुओं में ही संतुष्टि सोचता है वह अंततः असंतोष के सिवाय और कुछ भी नहीं पाता है, क्योंकि वस्तुयें तो केवल सुविधा ही दे सकती हैं और निश्चय ही सुविधा और संतोष में बहुत भेद है। सुविधा कष्ट का अभाव है, संतोष आनंद की उपलब्धि है।
आपका हृदय क्या चाहता है? आपके प्राणों की प्यास क्या है? आपके श्वासों की तलाश क्या है? क्या कभी आपने अपने आपसे ये प्रश्न पूछे हैं? यदि नहीं, तो मुझे पूछने दें। यदि आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगी, उसे पाना चाहता हूं जिसे पाकर फिर कुछ और पाने को नहीं रह जाता। क्या मेरा ही उत्तर आपकी अंतरात्माओं में भी नहीं उठता है?
यह मैं आपसे ही नहीं पूछ रही हूं और भी हजारों लोगों से पूछती हूं और पाती हूं कि सभी मानव-हृदय समान हैं और उनकी आत्यंतिक चाह भी समान ही है। निश्चय ही जो परम आकांक्षा है, वह बीज रूप में प्रत्येक में प्रसुप्त होनी चाहिये, क्योंकि जिस बीज में वृक्ष न छिपा हो, उसमें अंकुर भी नहीं आ सकता है। हमारी जो परम कामना है, वही हमारा आत्यंतिक स्वरूप भी है, क्योंकि स्वरूप ही अपने पूर्ण विकास में आनंद और स्वतंत्रता में परिणत हो सकता है। स्वरूप ही सत्य है और उसकी पूर्ण उपलब्धि ही संतोष बनती है। बाहर की कोई भी संपत्ति भीतर के अभाव को कैसे भर सकेगी अभाव आंतरिक है, तो बाहर की किसी भी विजय से उसका भराव नहीं होता है। इसलिये बाहर सब पाकर भी कुछ भी पाया सा प्रतीत नहीं होता है और बाहर सब होकर भी व्यक्ति भीतर रिक्त ही बना रहता है।
बुद्ध ने कहा है, तृष्णा दुष्पूर है। कैसा आश्चर्य है कि चाहे हम कुछ भी पा लें, फिर भी पाने पर जो प्रतीत होता है, वह उतना ही रहता है जितना पाने के पूर्व था। इसलिये सम्राटों और भिखारियों का अभाव समान ही होता है। उस पल उनमें कोई भी भेद नहीं है। फिर बाह्य संपत्ति की दिशा में जो मिला हुआ भी मालूम होता है, उसकी भी कोई सुरक्षा नहीं है, क्योंकि किसी भी क्षण वह छिन सकता या नष्ट हो सकता है। अंततः मृत्यु तो उसे छीन ही लेती है। जो छीना जा सकता है, उसे हमारे अंतर्हृदय कभी भी अपना न मानता है। इसलिये संपत्ति सुरक्षा नहीं देती है, हम उसे सुरक्षा के लिये खोजते हैं, उलटे हमें ही उसकी सुरक्षा करनी होती है।
यह ठीक से समझ लें कि बाह्य संपत्ति, सुविधाओं और शक्तियों से न अभाव मिटता है, न असुरक्षा मिटती है, न भय मिटता है। उनके मिथ्या आश्वासन में ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति उन्हें भुला रह सकता है। इसलिये ही संपत्ति को मद कहा गया है। उसकी मादकता में जीवन की वास्तविक स्थिति के दर्शन नहीं हो पाते हैं और अभाव का इस भांति विस्मरण अभाव से भी बुरा है, क्योंकि उसके कारण अभाव को मिटाने की वास्तविक दिशा में दृष्टि नहीं उठ पाती है।
जीवन में जो अभाव है, वह किसी वस्तु, शक्ति या संपदा के न होने के कारण नहीं है, क्योंकि उन सभी के मिल जाने पर भी उसे मिटते नहीं देखा जाता है। जिनके पास सब कुछ है, क्या उससे जरा सी भी दरिद्रता और दीनता मिटी है? अभावों का मूल कारण बाहर की किसी उपलब्धि का न होना नहीं, वरन स्वयं की दृष्टि का बाहर होना है। इसलिये जो अभाव कुछ भी पाकर नहीं मिटते हैं, वे ही दृष्टि के भीतर मुड़ने पर पाये जाते हैं।
आत्मा का स्वरूप ही आनंद है। वह उसका कोई गुण नहीं, वरण उसका स्वरूप ही है। आत्मा का आनंद से कोई संबंध नहीं है, वस्तुतः आत्मा ही आनंद है। वे दोनों एक ही सत्य के नाम हैं। सत्ता की दृष्टि से जो आत्मा है, अनुभूति की दृष्टि से वही आनंद है।
लेकिन उस आनंद को आत्मा मत समझ लेना जिसे साधारणतः आनंद कहा जाता है। वह आनंद आनंद नहीं है, क्योंकि आनंद के मिलते ही सारी तृष्णायें समाप्त हो जाती है, जिसके मिलने से तृष्णा और प्रबल होती है, जिसे पाकर खोने का भय पीडि़त करता है, वह आनंद का मिथ्या आभास है, निश्चय ही वह जल जल नहीं है जिससे प्यास और भी बढ़ जाती हो।
क्राइस्ट का वचन है: आओ, मैं उस कुएं का पानी तुम्हें दूं, जिसे पीने से प्यास सदा के लिए मिट जाती है। हम सुख को ही आनंद समझ लेते हैं, जब कि सुख आनंद का आभास मात्र है, छाया और परछाईं है। इस आभास और भ्रम में ही अधिक लोग जीवन को गंवा देते हैं और अंततः अतृप्ति और असंतोष के सिवाय और कुछ भी उन्हें हाथ नहीं लगता है। निश्चय ही यदि कोई मनुष्य झील के पानी में चांद के प्रतिबिम्ब को देख उसे खोजने को निकल पड़े तो अंततः वह क्या पायेगा? वस्तुतः उसकी खोज उसे जितना ज्यादा झील की गहराई में डुबायेगी उतना ही ज्यादा वह वास्तविक चांद से दूर निकलता जायेगा। सुख की खोज में ऐसे ही व्यक्ति आनंद से दूर निकल जाते हैं। सुख को खोजते जो मिलता है वह सुख नहीं, दुख ही होता है।
प्रत्येक सुख, आनंद का आश्वासन और आकर्षण देता है, क्योंकि वह आनंद की छाया है, लेकिन उसके पीछे जाने पर कुछ भी नहीं मिलता है, सिवाय असफलता, विषाद और दुख के। क्योंकि आपकी छाया को पकड़ कर भी मैं आपको कैसे पकड़ सकती हूं? और फिर यदि आपकी छाया को पकड़ भी लूं तो भी मेरी मुट्ठी में क्या कुछ हो सकता है?
यह भी स्मरण दिला दूं कि प्रतिबिंब सदा ही विरोधी दिशा में बनते हैं। मैं एक दर्पण के समाने खड़ी हो जाऊं तो दर्पण में जहां मैं दिखाई पड़ रही हूं वह ठीक उस जगह से विपरीत है जहां मैं हूं। ऐसा ही सुख भी है। वह अपने आप में मूलतः दुख है, क्योंकि वह आनंद का प्रतिबिंब है। आनंद तो भीतर है, इसलिये सुख बाहर मालूम होता है। आनंद आनंद है, इसलिये सुख वस्तुतः दुख है।
मैं जो कह रही हूं, उसे किसी भी सुख का पीछा करके जान लो। प्रत्येक सुख अंत में दुख में परिणत हो जाता है और जो अंत में जैसा है, वह वस्तुतः आरंभ में भी वैसा होता है। हमारे पास आंखें गहरी नहीं होती हैं, इसलिये जिसके दर्शन प्रारंभ में होने थे, उसके दर्शन अंत में हो पाते हैं। यह असंभव है कि जो अंत में प्रकट हो, वह आरंभ में ही उपस्थित न रहा हो। अंत तो आरंभ का ही विकास हैं आरंभ में जो अप्रकट था वहीं अंत में प्रकट हो जाता है। सुख की दिशा स्वयं से संसार की ओर है, आनंद की दिशा संसार से स्वयं की ओर है।
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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