





मनुष्य को छोड़कर अन्य प्राणियों में उतनी काम कला नहीं होती। वे काम वासना का उपयोग मात्र वंश वृद्धि के लिए ही करते हैं। उतना ही नहीं वे वंश वृद्धि के बाद के अपने उत्तरदायित्वों को भी समझते हैं और उसके बाद उन्हें निभाने के लिये पहले से ही व्यवस्था करने लगते हैं।
स्टिकल बैक नाम की एक मछली होती है, जो समुद्र में पायी जाती है। डॅा- लार्ड ने इस मछली की विभिन्न आदतों और क्रियाओं का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया। बैकोवर आइरलैण्ड में महीनों रह-रह कर इस मछली की जीवन पद्धति का अध्ययन किया और बताया कि मनुष्य चाहे तो इससे अपने पारिवारिक जीवन को सुखी और सुदृढ़ बनाने की महत्वपूर्ण शिक्षा ले सकता है। नर स्टिकल बैक अपना घर बसाने के लिये बहुत पहले से तैयारी प्रारम्भ कर देता है। सबसे पहले सारे समुद्र में घूम-घूम कर वह कोई ऐसा स्थान ढूंढ निकालता है, जहां पर पानी न बहुत तेजी से बह रहा हो न बहुत धीरे। जगह शांत एकान्त हो और वहां हर किसी का पहुंचना भी सम्भव ना हो।
प्राचीन काल की जीवन प्रणाली और शिक्षा पद्धति पर ध्यान दें तो पता चलता है कि सामाजिक मार्गदर्शक आचार्यों ने यह भली-भांति अनुभव किया था कि दाम्पत्य और गृहस्थ जीवन एक महत्वपूर्ण योग साधना है, इसके लिये आवश्यक तैयारियां न की जायें तो लोगों के वैयक्तिक जीवन ही नहीं, पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थायें भी लड़खड़ा सकती हैं। जीवन के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य पूर्ण रहकर विद्या अध्ययन करने और पाठ्यक्रम में धार्मिक आध्यात्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक विषयों के समावेश के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही था कि आने वाले जीवन और जिम्मेदारियों को वहन करने के लिये व्यक्ति में किसी तरह की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक त्रुटि न रह जाये। इसी कारण उन दिनों दाम्पत्य जीवन पारिवारिक- सामाजिक, प्रेम-मैत्री, करुणा, दया, क्षमा, उदारता, सुख-सन्तोष आदि श्रेष्ठ गुणो से भरे रहते थे। जीवन में आनन्द छलकता था, उन दिनों, लेकिन आज जब शिक्षा के ढंग-ढांचे में, हमारी रीति-नीति और जीवन पद्धति में ऐसी तैयारी के लिये कोई स्थान नहीं रहा, तब हमारे पारिवारिक जीवन में कोई उल्लास नहीं रह गया। दाम्पत्य जीवन असन्तोष और अस्तव्यस्तता के पर्याय बन गये हैं।
मनुष्य भूल कर सकता है पर सृष्टि के सैकड़ों जीव-जन्तुओं की तरह स्टिकल बैक मछली यह भूल कभी नहीं करती। वास्तव में जो आनन्द पहले से तैयारी किये हुये दाम्पत्य जीवन में है, वह चाहे जैसे गृहस्थ बसा लेने में नहीं है। यह सारा उत्तरदायित्व पति का है कि वह समुचित व्यवस्थायें स्वयं जुटाये। यदि व्यक्ति की तैयारी में कोई त्रुटि न हो तो पत्नियों की ओर से पूर्ण सहयोग और समर्थन न मिले ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। इस मछली की तरह पूर्व में ही तैयारी किये हुये व्यक्ति अपने दाम्पत्य जीवन का ऐसा आनन्द पाते हैं कि उन्हें न तो स्वर्ग की कल्पना होती है और न मुक्ति की ही। वे इसी जीवन में स्वर्ग भोग का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
तत्परतापूर्वक ढूंढ-खोज के बाद जब उपयुक्त स्थान मिलता है, तब स्टिकल बैक नववधू के लिये सुन्दर घर बनाने की तैयारी करता है। इसके लिये उस बेचारे को कितना परिश्रम करना पड़ता है, स्टिकल बैक पानी में तैरते छोटे-छोटे पौधों की नरम-नरम लकडि़यां, तैरते हुये पौधों की जड़े इकट्ठी करता है और उन्हें यथा स्थान पर ले जाता है। विवाह के लिये स्टिकल को पहले खूब परिश्रम और मजदूरी करनी पड़ती है। अपने शरीर से वह एक प्रकार का लस-लसा पदार्थ निकालता है और एकत्रित सारी वस्तुओं को उसी में चिपका लेता है जिससे उसका परिश्रम व्यर्थ न जाये। उसने जो लकडि़यां एकत्रित की हैं, वह अपने स्थान तक पहुंच जायें।
स्टिकल बैक पूरे आत्म-विश्वास के साथ काम करता है। सारा एकत्रित सामान मजबूती से चिपक गया है, यह विश्वास करने के लिये वह अपने शरीर को फड़फड़ाता हुआ नाचता है, जैसे उसे परिश्रम में आनन्द लेने की आदत हो। जब एक बार विश्वास हो गया कि सामान गिरेगा नहीं, तब आगे बढ़ता है और पूर्व निर्धारित स्थान पर इस सामान से मकान बनाता है। शरीर का लसलसा पदार्थ यहां सीमेन्ट का काम करता है और लायी हुईं लकडि़यां ईट-पत्थरों का। आगन्तुक वधू के लिये महल बनाकर एक बार वह उसे घूम-घूम कर देखता है। लगता है अभी वैभव में कुछ कमी रह गयी। फिर वह रेत के बारीक टुकड़े मुख में भर कर लाता है और मकान के फर्श पर बिछाता है। कोठरी में कहीं टूट-फूट की गुंजाईश हो तो उसे ठीक करता है। सारा मकान वार्निस किया हुआ हो जाने के बाद ही उसे सन्तोष होता है। जब यह तैयारियां पूर्ण हो जाती हैं, तब वह स्वयं मादा की खोज में निकलता है, उसे दहेज और लेन-देन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह जानता है, नारी-नर की अपनी-अपनी आवश्यकता भी है, इसलिये प्रिय वस्तु को भरपूर स्वागत और सम्मान अपनी ओर से ही क्यों न दिया जाये। वह मनुष्यों की तरह दम्भ और पाखण्ड प्रदर्शित नहीं करता।
उपयुक्त पत्नी मिल जाने पर वह उसे घर लाता है। पत्नी कुछ दिन में गर्भावस्था में आती है, तब यह उसे घूमने को भेजता रहता है, घर और अण्डों की देख-भाल तब वह स्वयं ही करता है। यह उनके भोजन आदि का ही प्रबन्ध नहीं करता, वरन् सुरक्षा के लिये द्वार पर कड़ा पहरा भी रखता है । स्टिकल बैक अपने बच्चों और पत्नी के पालन का उत्तरदायित्व पूरी समझ के साथ निभाता है। पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे, इसके लिये वह अपने मकान में दो दरवाजे रखता है। जिससे वहां के पानी में बहाव बना रहता है और ताजी ऑक्सीजन मिलती रहती है, यदि बहाव रूक जाये तो वह तुरन्त शरीर फड़-फड़ाकर बहाव पैदा कर देता है, जिससे रूके हुये पानी की गन्दगी प्रभावित न करे।
स्टिकल बैक का जीवन बहुत ही कलात्मक और सुरुचिपूर्ण होता है। इधर बच्चे निकलने लगते हैं, तो उधर वह मकान के ऊपरी भाग को छत से अलग करके एक बढि़या झूला तैयार करता है। मनुष्यों की तरह गुम-सुम का जीवन उसे पसन्द नहीं। झूला बनाकर उसमें बच्चों को भी झुलाता है और पत्नी को भी। स्वयं चारों ओर परेड करता रहता है, बच्चे झूला छोड़कर इधर-उधर भागते है, तो यह उन्हें झूले में बार-बार डाल देता है, जब तक बच्चे स्वयं समर्थ न हो जायें, सूझ-बूझ से परिपूर्ण और दुनियादारी में परिपक्तव ना हो जायें, तब तक वह उन्हें आवारागर्दी और कुसंगति में नहीं बैठने देता। जब वे अपनी रक्षा करने में समर्थ हो जाते हैं और जीवन जीने की कलाओं में निपुण हो जाते हैं, तब ही वह उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता की अनुमति देता है।
स्टिकल बैक की तरह मनुष्य को भी अपना पारिवारिक गृहस्थ जीवन प्रारम्भ करने से पूर्व सूझ-बूझ के साथ पूरी तैयारी करनी चाहिये, पतिव्रत ही नहीं पत्नीव्रत का भी ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है। सांसारिक जीवन की समस्याओं को देखकर मनुष्य को अपने उत्तरदायित्वों से कतराना नहीं चाहिये। यदि पति-पत्नी एक-दूसरे का पूर्ण सहयोग करें, आत्मीय स्नेह से युक्त हो जाये, तो यह जीवन ही स्वर्ग सा बन जाता है। आपका गृहस्थ जीवन दाम्पत्य जीवन के सभी मूल्यों की पूर्णता से पालन करते हुये श्रेष्ठता प्राप्त करे ऐसा ही आशीर्वाद् प्रदान करता हूं—-
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