





प्राचीन भारतीय सभ्यता के अनुसार समस्त सप्त ऋषियों में विश्वामित्र परम पूजनीय है। क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के बाद भी उन्होंने भीषण तपस्या कर ब्रह्मऋषि की उपाधि प्राप्त की थी। हमारे हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों में वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के बालकाण्ड में ऋषि विश्वामित्र का वर्णन है। महाभारत के आदि पर्व में भी विश्वामित्र का वर्णन है। गायत्री मंत्र की रचना ऋषि विश्वामित्र द्वारा की गई है, इसके साथ ही ये ऋग्वेद के मुख्य मंडलों के रचनाकार भी हैं। विविध पुराणों के अनुसार समस्त सृष्टि में केवल 24 ऋषिगण ही गायत्री मंत्र की महत्वत्ता, इसकी शक्ति व इसके अर्थ को पूर्णतया समझ पाये हैं, विश्वामित्र इन सभी में सर्वप्रथम थे।
हमारे ऋषिगणों ने अपना समस्त ज्ञान व उनके द्वारा किये गये अनुसंधानों को शास्त्रों व पुराणों के रूप में संयोजित किया है जो हमें सिखाते हैं कि समस्त सृष्टि में रहने वाले हम सभी प्राणियों के समक्ष अपने आध्यात्मिक विकास के लिये समान अवसर है, बस इन्हें अनुभव कर ज्ञानार्जन करने की आवश्यकता है।
हम सभी विश्वामित्र को महर्षि के रूप में जानते हैं, परन्तु इससे पूर्व वे (विश्वरथ) कौशिक नाम के एक कुशल शासक (राजा) भी थे, जिन्हें अपनी प्रजा अत्यन्त प्रिय थी। एक बार राजा कौशिक अपने सैनिकों की टुकड़ी के साथ हिमालय के जंगलों में शिकार खेलने गये। बहुत देर तक शिकार करने के बाद विश्राम के लिये स्थान देखने लगे, वहाँ उन्हें ब्रह्मऋषि वशिष्ठ का आश्रम दिखा। राजा कौशिक ने आश्रम में जा गुरु वशिष्ठ को आदरपूर्वक प्रणाम किया वशिष्ठ जी ने राजा कौशिक का यथोचित आदर सत्कार किया और उनसे कुछ दिन आश्रम में ही रह कर आतिथ्य ग्रहण करने का अनुरोध किया। इस पर विचार करके कि राजा के साथ उनकी विशाल सेना भी है और सेना सहित आतिथ्य करने में वशिष्ठ जी को कष्ट होगा, राजा ने नम्रता पूर्वक अपने जाने की अनुमति माँगी किन्तु वशिष्ठ जी के अत्यधिक अनुरोध करने पर उन्होने कुछ दिनों के लिये उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया। ऋषि वशिष्ठ ने नंदिनी गौ (कामधेनु गौ की पुत्री) का आह्नान कर राजा कौशिक तथा उनकी सेना के लिये कई प्रकार के व्यंजन व समस्त प्रकार की सुख- सुविधा की व्यवस्था कर दी।
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के आतिथ्य से राजा और उनके साथ आयी सेना बहुत प्रसन्न हुये। राजा कोशिक नंदिनी गौ से बहुत प्रभावित हुये और वशिष्ठ जी से आग्रह करने लगे कि यह गाय वे उन्हें सौंप दें ताकि वे इसकी सहायता से अपनी प्रजा का कल्याण कर सकें। राजा ने कहा कि इस आश्रम में रहकर यह गाय नाम मात्र के लोगों के काम आ रही है, जबकि वह उनके राज्य में हजारों की संख्या में लोगों की सहायता कर सकती है। नंदिनी गौ के एवज में राजा ने उन्हें सौ गाय देने की बात कही लेकिन वशिष्ठ ने यह कहते हुये मना कर दिया कि यह गाय उन्हें देवताओं ने दी है, वह राजा कौशिक के सम्पूर्ण राजपाट के बदले भी यह नंदिनी गौ उन्हें नहीं दे सकते।
यह सुनकर राजा अत्यधिक क्रोधित हो उठे, उन्होंने अपने सैनिकों को उस गाय को जबरन छीन लेने का आदेश दे दिया। इतने में नंदिनी ने योगबल से अत्यन्त मारक शस्त्र-अस्त्रों से युक्त पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने शीर्घ ही शत्रु सेना को परास्त करना आंरभ कर दिया, दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध छिड़ा था, इसमें राजा कौशिक की सेना के साथ उनके पुत्रों का भी वध हो गया केवल एक पुत्र शेष रह गया था। अपनी सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से राजा बहुत दुखी हुये। अपने बचे हुये पुत्र को राज सिंहासन सौंप कर वे तपस्या करने के लिये हिमालय की कन्दराओं में चले गये।
राजा कौशिक ने अपना सारा जीवन बड़ी सहजता के साथ बिताया था इसलिये उन्हें तप, योग, प्राणायाम और ध्यान जैसी बातों का कोई ज्ञान नहीं था।
इसीलिये हिमालय की गुफाओं में ध्यान करते समय उन्हें कई कठिनाईयाँ हुई, लेकिन उनके भीतर अपने उद्देश्य को पूर्ण करने की जिज्ञासा थी, जिसके कारण अनेक कठिनाईयों के बाद भी अपने मार्ग से भटके नहीं। कठोर तपस्या करके विश्वामित्र जी ने महादेव को प्रसन्न कर लिया और उनसे दिव्य शक्तियों के साथ सम्पूर्ण धनुर्विद्या के ज्ञान का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके बाद विश्वामित्र ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से अपनी पराजय का बदला लेने के लिये उनके आश्रम की ओर चल दिये। उन्हें ललकार कर विश्वामित्र ने अग्निबाण चला दिया जिससे उनकी कुटिया नष्ट हो गई। ऋषि वशिष्ठ ने भी अपना धनुष संभाल लिया और वे बोले कि ‘मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, तुम मुझ पर वार करो। आज मैं तुम्हारे अभिमान को चूर-चूर करके बता दूँगा कि क्षात्र बल से ब्रह्म बल श्रेष्ठ है। क्रुद्ध हो विश्वामित्र ने एक के बाद एक आग्नेयशस्त्र, वरूणास्त्र, रूद्रास्त्र, ऐन्द्रस्त्र तथा पाशुपतास्त्र एक साथ छोड़ दिये जिन्हें वशिष्ठ ऋषि ने अपने मारक अस्त्रों से मार्ग में ही नष्ट कर दिया। इस पर विश्वामित्र ने और भी अधिक क्रोधित होकर मानव, मोहन, गन्धर्व, जूंभण, दारण, वज्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वरूणपाश, पिनाक, दण्ड, पैशाच, क्रौंच, धर्मचक्र कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्य, मंथन, कंकाल, मूसल, विद्याधर, कालास्त्र आदि सभी अस्त्रों का प्रयोग कर डाला। ऋषि वशिष्ठ ने उन सबको नष्ट कर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र की भयंकर ज्योति और गगनभेदी नाद से सारा संसार पीड़ा से तड़पने लगा।
सभी ऋषि-मुनि ऋषि वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे कि वे ब्रह्मास्त्र से उत्पन्न हुई ज्वाला को शान्त करें। प्रार्थना से द्रवित होकर उन्होंने ब्रह्मास्त्र को वापस बुलाया और मंत्रों से उसे शान्त कर दिया। पराजित होने पर विश्वामित्र ने धैर्य नहीं खोया, ब्राह्मणत्व प्राप्ति के लिये वे दक्षिण दिशा की ओर चल दिये और पुनः तपस्या में लीन हो गये। उन्होंने तपस्या करते हुये अन्न का त्याग कर केवल फलों पर जीवन यापन करना आरंभ कर दिया।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि का पद प्रदान किया। परन्तु विश्वामित्र इस पदवी से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि उन्हें तो महर्षि, देवर्षि आदि पद की आकांक्षा थी। उन्हें आभास हुआ कि उनकी तपस्या अभी भी अपूर्ण थी और वे पुनः घोर तपस्या में लीन हो गये। कड़ी तपस्या करते हुये विश्वामित्र ने अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण प्राप्त कर स्वयं को सभी प्रकार के आकर्षण से मुक्त कर लिया था। विश्वामित्र की तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र भयभीत हो गये थे क्योंकि विश्वामित्र आगे चलकर उनके लिये चुनौती बन सकते थे। विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र ने स्वर्ग से मेनका नाम की अप्सरा को विश्वामित्र की तपस्या में बाधा डालने के लिये भेज दिया। मेनका ने कई दिनों तक अनेकों प्रयास किये और अंततः वह विश्वामित्र की तपस्या में बाधा डालने में सफल हो गई। अप्सरा की खूबसूरती और आकर्षण से विश्वामित्र स्वयं को बचा नहीं सके और उनकी तपस्या भंग हो गई। मेनका और विश्वामित्र की एक पुत्री हुई जिसका नाम शकुंतला रखा गया। शकुंतला के जन्म के बाद मेनका वापस स्वर्ग चली गई। विश्वामित्र ने उसे लालन- पालन हेतु ऋषि कण्व को सौंप दिया ताकि वे अपनी तपस्या पुनः आरंभ कर सके। विश्वामित्र को माया की शक्ति भली प्रकार से समझ आ गई थी। वे जंगलों की ओर प्रस्थान कर पुनः तपस्या में लीन हो गये। इस बार उनकी तपस्या पहले से कही ज्यादा कठोर थी, वे एक पैर पर खड़े होकर साधना में लीन हो गये थे, अन्न-जल सब त्याग दिया था। इन्द्र का भय फिर बढ़ गया, इस बार उन्होंने रंभा को धरती पर भेजा। इस बार विश्वामित्र इन्द्र के जाल में नहीं फंसे और रंभा को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। अब विश्वामित्र श्वास को रोककर हिमालय की ऊंचाइयों पर महादारूण करने लगे थे।
उस समय इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नाम के एक राजा थे जो सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे, अपनी इस मनोकामना को पूर्ण करने हेतु वे ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के समक्ष गये, परन्तु वशिष्ठ जी ने इस कार्य की पूर्ति में असमर्थतता जताई क्योंकि यह स्वर्ग के सिद्धांतों के विरूद्ध था। त्रिशंकु ने अपनी जिद नहीं छोड़ी और वे विश्वामित्र के पास पहुंच गये। विश्वामित्र ने कहा कि तुम मेरी शरण में आये हो, मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूँगा। उन्होंने सफलता पूर्वक यज्ञ सम्पन्न किया और त्रिशंकु मानव शरीर के साथ स्वर्गलोक भी पहुँच गया।
त्रिशंकु को स्वर्ग के दरवाजे पर खड़ा देख इन्द्रदेव और बाकी देवताओं ने त्रिशंकु को धरती पर वापस भेज दिया। त्रिशंकु का सिर नीचे था और पैर ऊपर, वे ऋषि विश्वामित्र से खुद को बचाने का आग्रह करने लगे। विश्वामित्र अपनी शक्ति से त्रिशंकु को ऊपर भेजते थे और देवता उन्हें पुनः नीचे भेज देते। इस तरह त्रिशंकु हवा में लटके रह गये। ऋषि विश्वामित्र त्रिशंकु को वचन दे चुके थे इसलिये उन्होंने त्रिशंकु को नीचे गिरने से बचाने के लिये अन्य स्वर्ग का निर्माण कर दिया, जिसके राजा त्रिशंकु बने।
आज भी त्रिशंकु एक तारे के रूप में चमकते हैं। ऋषि विश्वामित्र अपनी सारी शक्तियाँ खोते जा रहे थे, इस लिये उन्होंने और अधिक कड़ी तपस्या करने का निश्चय किया। समय और वर्ष बीतते गये, वे हिमालय की ऊँची पहाडि़यों पर जाकर असाध्य तप करने लगे। विश्वामित्र ने विचार किया लाख प्रयत्न करके भी मैं तपस्या में सफल नहीं हो पा रहा हूँ, माया कब प्रवेश करती है मुझे पता ही नहीं चलता, लगता है कि मैं अपने बल से इन बाधाओं पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता। अनन्तः विश्वामित्र ने परमात्मा का ध्यान कर ‘ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।’ (यजुर्वेद, अध्याय 36, कण्डिका 3) अर्थात् ऊँ शब्द से उच्चारित, भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों में तत्वरूप से व्याप्त ‘सवितुः’-ज्योतिर्मय परमात्मा आपके ‘वरेण्य भर्ग’ अर्थात् तेज का हम ‘धीमहि’ – ध्यान करते हैं। ‘नः धियः प्रचोदयात्’ – मेरी बुद्धि में निवास कर मुझे प्रेरणा दें। इस प्रकार स्वयं को परमात्मा के प्रति समर्पित कर विश्वामित्र तपस्या में लगे रहे। माया विश्वामित्र के पास आई, उनकी परिक्रमा कर लौट गयी।
इस बार उनका तप बहुत कठिन था कि सत्यलोक में बैठे ब्रह्मा जी की दृष्टि उन पर पड़ी। ब्रह्मा जी व अन्य सभी देवता ऋषि विश्वामित्र के समक्ष प्रकट हो गये, ब्रह्माजी ने ऋषि को बताया कि उनकी तपस्या अब पराकाष्ठा पर पहुँच गईं है। अब वे क्रोध और मोह की सीमाओं को पार कर गये हैं। अब उनके तेज से समस्त संसार प्रकाशित हो उठा है। सूर्य और चन्द्रमा का तेज भी आपके तेज के सामने फीका पड़ गया है। अतएव आपकी समस्त अभिलाषा पूर्ण हो। ब्रह्मा जी ने उन्हें ब्राह्मण की उपाधि दी और कहा कि आज से आप ब्रह्मर्षि हुये।
परन्तु विश्वामित्र ने कहा कि ‘हे भगवन् जब आपने मुझे यह वरदान दिया है तो मुझे ओंकार, षट्कार तथा चारों वेद भी प्रदान कीजिये। विश्वामित्र ने कहा ‘यदि मैं ब्रह्मर्षि हूँ, तो वेद मेरा वरण करें, विश्वामित्र के पास वेद भी आ गये। (वेदों का अध्ययन नहीं करना पड़ता बल्कि प्राप्ति के साथ मिलने वाली प्रत्यक्ष अनुभूति का नाम वेद है) वेद का अर्थ है जानकारी, परमात्मा को जानना। प्रभो! अपनी तपस्या को मैं तभी सफल समझूँगा जब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ मुझे ब्राह्मण और ब्रह्मर्षि मान लेंगे। विश्वामित्र की बात सुनकर सभी देवतागण ऋषि वशिष्ठ के समीप गये व उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया। उनकी तपस्या की कथा सुनकर वशिष्ठ जी विश्वामित्र के पास पहुँचे और उन्हें अपने हृदय से लगाकर बोले कि ‘विश्वामित्र जी! आप वास्तव में ब्रह्मर्षि हैं। मैं आज से आपको ब्राह्मण स्वीकार करता हूँ।’ जैसे ही ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र के भौंहों के मध्य में हाथ रखा, विश्वामित्र का तीसरा नेत्र जागृत हो गया। विश्वामित्र को अपने सामने अलौकिक प्रकाश नजर आया। उन्हें सात सुर नजर आये, जिनके आधार पर ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है।
इस प्रकार ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के बारे में जानकर हमें शिक्षा मिलती है कि दृढ़ इच्छा शक्ति व संकल्प शक्ति द्वारा हम क्रोध, प्रतिरोध, काम आदि भावनाओं को वश में कर धैर्यवान बनकर, अडिग साधना के बल पर असंभव से असंभव कार्य को सिद्ध करने में सफल हो सकते हैं।
निधि श्रीमाली
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